स्वास्थ्य सुविधाओं से आगे

धरमजयगढ़ के आदिवासी गाँवों में प्रचलित समुदाय-आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी मान्यताओं की दिलचस्प कहानियाँ और उन पर चिंतन-मनन।

स्वास्थ्य सुविधाओं से आगे

फरवरी 2026 के पहले सप्ताह में मैंने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ ब्लॉक के दूरदराज के आदिवासी गाँवों में कुछ समय बिताया था। उन दिनों मैंने जो देखा, उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी कार्यों के प्रति मेरे नज़रिए को किसी व्याख्यान या पाठ्यपुस्तक से कहीं अधिक प्रभावित किया। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक नए नज़रिए से समझने में मदद मिली।

मैं सिद्धांतों यानी स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक निर्धारक, गरीबी, भौगोलिक स्थिति और शिक्षा के संयुक्त प्रभाव आदि का अच्छे से अध्ययन करके इस क्षेत्र में गया था। मैंने इसकी रूपरेखा तैयार की थी, उसके डायाग्राम बनाये थे और भोपाल में अपने विश्वविद्यालय की कक्षाओं में इन ढांचों की रूपरेखा पर चर्चा भी की थी। लेकिन, इस अध्ययन के बाद मुझे यह समझ में आया कि हर आँकड़े के पीछे एक उलझी हुई, जिद्दी और किसी भी रूपरेखा की तुलना में कहीं अधिक जटिल ज़िन्दगी छिपी है।

ये असाधारण जगहें नहीं हैं। ये साधारण गाँव हैं। यहाँ अभी भी अच्छी सड़कें, मोबाइल सिग्नल, सुलभ अस्पताल और सुचारू रूप से चलने वाले संस्थाओं जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुँच पायी हैं। हम में से अधिकतर लोग इन्‍हें जीवन जीने के लिए जरूरी मानते हैं। यह दूरी हमेशा किलोमीटर में नहीं मापी जा सकती। कभी-कभी यह वर्षों की उपेक्षा के परिणाम के रूप में मापी जाती है। यह हर महत्त्वपूर्ण सूची में हमेशा अंतिम स्थान पर रहने की तकलीफ के रूप में भी मापी जाती है और इस बात पर गौर फरमाना बहुत ज़रूरी है।

हम अक्सर “समुदाय-आधारित दृष्टिकोण” के बारे में बात करते हैं। लेकिन, जब आप लैपटॉप बंदकर पक्की सड़कों से हटकर, इन घने जंगलों से होते हुए उस गाँव तक पैदल जाते हैं, जहाँ पिछले मानसून के बाद से कोई एम्बुलेंस नहीं गई है, तब आप वास्तव में “समुदाय-आधारित दृष्टिकोण” का सही-सही अर्थ समझ पाते हैं।

ओंगना गाँव में एक माँ के साथ हुई त्रासदी 

ओंगना गाँव में लगभग 1,200 लोग रहते हैं। इनमें बिरहोर (हाशिए का एक जनजातीय समूह), उराँव और कंवर समुदाय शामिल हैं। यहाँ तीन आँगनवाड़ी केंद्र हैं। जिनमें तीन से छह वर्ष की आयु के बीच के कुल 59 बच्चे पंजीकृत हैं। मैंने इन तीनों केंद्रों का चार बार दौरा किया। वहाँ मुझे पाँच या छह बच्चे ही मिले। यह पंजीकृत संख्या का मुश्किल से दस प्रतिशत है।

यहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था इस अनुपस्थिति की आदी हो चुकी है। इसके लिए हमेशा एक जैसा ही स्पष्टीकरण दिया जाता है : आदिवासी परिवार अपने बच्चों को खेतों में, जंगलों में, या जहाँ दिन में काम की ज़रूरत होती है, वहाँ अपने साथ ले जाते हैं। यह एक स्थापित तथ्य बन गया है कि इसे बिना किसी जांच के कार्यक्रम संबंधी रिपोर्टों में मान लिया जाता है। कोई नहीं पूछता कि (आंगनवाडी) केंद्र के होने का क्या उद्देश्य है, रजिस्टर में खानापूर्ति कर दी जाती है। जिन बच्चों के लिए ये कोशिशें की जा रही है, वे ही गायब हैं। इसे लेकर कोई भी इतना चिंतित नहीं है कि इसके कारणों का पता लगाए।

A woman in traditional clothing walks with a stick, accompanied by two boys, as they guide a herd of cows along a rural path surrounded by greenery.

स्थानीय आशा कर्मियों को ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस (VHSND) की तैयारी में मदद करते हुए, मेरी मुलाकात एक महिला से हुई। वह 31 साल की थी और चार महीने की गर्भवती थी। यह उसकी सातवीं गर्भावस्था थी। इससे पहले के छह बच्चों में से चार जीवित थे। उसने प्रसव पूर्व देखभाल के लिए पंजीकरण नहीं कराया था। उसने अपना आधार कार्ड भी खो दिया था। यह भारत में प्रशासनिक असुविधा का एक बड़ा कारण है। कार्ड होने से लगभग हर सरकारी लाभ को प्राप्त करना आसन हो जाता है। इसके तहत पोषण सहायता, नकद (आर्थिक सहायता) और बच्चे को अस्पताल में जन्म देने की सुविधा या प्रसव के दौरान मिलने वाली अन्य सुविधाएं शामिल हैं। आधार कार्ड के बिना, वह व्यवस्था की नज़रों में ओझल हो जाती हैं, भले ही व्यवस्था (स्वास्थ्य केंद्र) उनसे कुछ सौ मीटर दूरी पर ही क्यों न हो।

मितानिन (छत्तीसगढ़ में आशा कर्मी को मितानिन कहते हैं) और पड़ोसियों से बात करके, मैं उसकी स्थिति को बेहतर ढंग से समझने लगा। वह और उसका पति शराब की लत से जूझ रहे थे। गरीबी और शराब पीने की लत इस कदर आपस में जुड़ गए थे कि यह कहना मुश्किल था कि किस वजह से कौन की समस्या पैदा हुई। इन समुदायों में नशे की लत के बारे में नैतिक दृष्टिकोण के अलावा शायद ही कभी किसी अन्य दृष्टिकोण से चर्चा की गई होगी। ओंगना में यह समस्या हर जगह देखने को मिलेगी और बीते सालों में यहाँ ये आम बात हो गई है। ये सभी चीजें दैनिक जीवन में इस तरह से घुलमिल गई हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों का इन पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ता है। फिर यह भी पता चला कि उसका छठा बच्चा, जो कि मात्र 9 महीने का था, पानी की टंकी में डूबकर मर गया था। क्योंकि, उसकी माँ नशे की हालत में उस बच्चे को पानी पिलाने की कोशिश कर रही थी। उसने बच्चे को टंकी में गिरा दिया और उसे घंटों बाद इसका पता चला। जब उसके बड़े बेटे ने टंकी की ओर इशारा करके पूछा कि बच्चा हिल क्यों नहीं रहा है।

मैं छिपाऊँगा नहीं, पहले तो मैंने उसे नैतिक आधार पर जज किया। इस संदर्भ में मेरी पहली प्रतिक्रिया आदेश देने थी। मैं बहुत अलग होने का दिखावा नहीं करूँगा। यह मेरे जैसे एक ऐसे व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया थी। मुझे रोग का रोकथाम करने, जिम्मेदारी निभाने और कुछ अलग करने के बारे में सोचने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इसलिए, मेरे अंदर भी यह प्रवृत्ति सहज रूप से तुरंत आई और मुझे ये उचित लगी। मुझे यह समझने में अधिक समय लगा कि मेरे सामने वास्तव में क्या परिस्थिति है। मेरे सामने एक ऐसी महिला थी जो आत्म-विध्वंसक परिस्थितियों में जीवित बची हुई थी। हममें से अधिकतर लोग इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। वह बिना किसी सहारे के, बिना किसी समझदार साथी के और बिना किसी समर्थन के, अपने शरीर में सातवाँ बच्चा पाल रही थी। वह एक ऐसी महिला थी जो पहले ही अपने दो बच्चों को खो चुकी है।

अगली सुबह, जब वह स्वास्थ्य केंद्र पर नहीं आई, तो मैं एक पुरुष मितानिन प्रशिक्षक के साथ उसके घर गया। जब हम वहाँ पहुँचे, तो उसका पति दिन के शुरू होने से पहले ही नशे में धुत था। वह एक टूटी हुई लकड़ी से उस महिला को पीटने की धमकी दे रहा था। उसने कहा कि उसकी पत्नी ने VHSND में जाने से इनकार कर दिया है। उस नशे की हालत में, हमारे पास सच्चाई जानने का कोई तरीका नहीं था। हालांकि, हम उसे शांत कराने में कामयाब रहे। मैं उस महिला को स्वास्थ्य केंद्र ले गया, जहाँ ग्रामीण स्वास्थ्य संगठक (छत्तीसगढ़ में आरएचओ को सहायक नर्स दाई/बहुउद्देशीय कार्यकर्ता कैडर के रूप में जाना जाता है) ने उसकी गर्भावस्था का पंजीकरण किया और आवश्यक जाँचें कीं। इस सब में लगभग दो घंटे लगे। हमारे इस प्रयास ने उसे यह समझने में मदद की कि स्वास्थ्य केंद्र की देखेरेख हुई गर्भावस्था और बिना किसी स्वास्थ्य केंद्र की देखरेख के पहले हुई गर्भावस्था के बीच क्या अंतर है।

पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सबसे ज़्यादा यही बात चौंकाती है कि यह सब लगभग हुआ ही नहीं होता। अगर उसका नाम मितानिन की सूची में न होता। अगर हमने उसकी गैरहाज़िरी पर ध्यान न दिया होता। अगर मैं अपने शुरुआती फ़ैसले को ही आख़िरी मान लेता और सोच लेता कि यह परिवार हमारी पहुँच से बाहर है।

हस्तक्षेप छोटा था, लेकिन उसके लिए कितने “अगर” पार करने पड़े।

कई बार सार्वजनिक स्वास्थ्य का काम ऐसे ही परिवारों तक पहुँचना होता है, जिन्हें समाज पहले ही छोड़ चुका होता है, जिनकी कोई आवाज़ नहीं होती, जिनकी मुश्किलें किसी की नज़र में नहीं आतीं, और जिनका होना तक जैसे किसी के लिए मायने नहीं रखता।

जब भौगोलिक परिस्थितियां स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं  :  कानकुला  में संचार  माध्यमों की कमी

कानकुला धरमजयगढ़ से लगभग 28 किलोमीटर दूर है। यहाँ मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुँचता है। वहाँ जाने वाली सड़क तो सड़क कहने लायक भी नहीं है। यह रास्ता घने जंगलों, सूखी नदी और ढीली रेत के बीच से गुजरता है। इस इलाके में मोटरसाइकिल का जाना भी मुश्किल है। इस गाँव में 61 परिवार हैं और यहां 217 लोगों की आबादी रहती है। मानसून के दौरान, यह क्षेत्र स्वास्थ्य व्यवस्था के मानचित्र से पूरी तरह गायब हो जाता है, क्योंकि, सारे रास्ते डूब जाते हैं और कोई भी स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्तों तक वहाँ नहीं पहुँच पाता। 

An old building with a blue and white exterior located in a rural area, partially obscured by trees and with bags stacked in front.

मैंने स्वास्थ्य सुविधाओं में बाधा पैदा करने वाली भौगोलिक अलगाव की परिस्थितियों के बारे में पढ़ा था। लेकिन, मैंने कानकुला में इसे नए नजरिये से समझा। अलगाव सिर्फ दूरी नहीं होता- वह उन तमाम चीज़ों का जमा हुआ असर है जो कभी पहुँच ही नहीं पाईं: हर वह संदेश जो रास्ते में ही रह गया, हर वह कोशिश जो पहुँच योग्य इलाके की सीमा पर आकर थम गई, हर वह योजना जो सड़क के पास रहने वालों को ध्यान में रखकर बनाई गई।

जब मैंने लोगों को टीकाकरण के लिए प्रेरित करने के लिए आँगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ घरों का दौरा किया तो पाया कि हर  बार  आँगनवाड़ी  कार्यकर्ता दरवाजा खटखटाती, तो अंदर से “नहीं” का जवाब पाकर वह आगे बढ़ जाती है। लोग नही अपने इस जवाब का कोई स्पष्टीकरण देते और नही आँगनवाड़ी कार्यकर्ता उन्हें समझाने का प्रयास करती। जब मैंने पूछा कि वह आगे क्यों बढ़ जाती हैं, तो आँगनवाड़ी कार्यकर्ता ने सीधे कहा : “वे नहीं आएँगे।” उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। बस एक निराशा थी – वह निराशा जो वर्षों तक एक ही दरवाजे खटखटाने और एक ही जवाब पाने के बाद पैदा होती है। उसने यह विश्वास करना बंद कर दिया था कि कभी कोई दरवाजा खुलेगा। मैं इसके लिए उसे दोष नहीं दे सकता था।

मैंने खुद परिवारों से बात करने की अनुमति मांगी। मैंने पाया कि उनके मना करने का कारण बहुत सीधा और तर्कसंगत था। उनका कहना था कि “इंजेक्शन लगने के बाद बच्चों को बुखार आ जाता है। हम टीकाकरण नहीं करवाना चाहते।”

यह अज्ञानता नहीं थी। बल्कि, गाँववासियों का एक अनुभवजन्य सत्य था। इन परिवारों ने बच्चों को टीके लगवाते और हल्का बुखार आते देखा था। किसी ने उन्हें यह नहीं समझाया था कि वास्तव में, टीका लगने के बाद बुखार आना सही है, यही होना चाहिए। बुखार एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है। वह अभ्यास कर रही है, सुरक्षा के लिए तैयार हो रही है। इस सही जानकारी के अभाव में, उन्होंने अपना स्वयं का स्पष्टीकरण गढ़ लिया था और वह सुसंगत था। यह बात एक माँ से दूसरी माँ तक फ़ैल गई और पूरे गाँव ने इस पर बात को एक सर्वमान्य सत्य के रूप में मान लिया। यह बात गाँव के लोगों के लिए एक अनुभवजन्य सत्य की तरह विश्वसनीय और निर्विवादित थी। आप इसे केवल उनका “भ्रम” कहकर खारिज नहीं कर सकते। यह ऐसी बात थी, जिसपर समुदाय के लोगों ने अपने पास उपलब्ध साक्ष्य के आधार को सोच-समझ कर अपनी यह धारणा बनायीं थी।

यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक रचनावाद (social constructivism) का एक अच्छा उदाहरण है। बीमारी, उपचार और शरीर के बारे में हमारी मान्यताएँ किसी अलगाव में नहीं बनती हैं। वे साझा अनुभव, सामुदायिक चर्चा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक-दूसरे को सुनाई जाने वाली कहानियों के जरिये बनती हैं। कानकुला में, “टीके से बुखार आता है” की धारणा कोई गलतफहमी नहीं थी; यह सामाजिक रूप से निर्मित सत्य था। जो इस गाँव में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई गयी कहानियों के आधार पर मजबूत हुई थी। इसका कारण था कि यहाँ कोई भी बाहरी स्वास्थ्य सूचना कभी भी भरोसेमंद ढ़ंग से लोगों के पास नहीं पहुँची। इस बात को समझना आपके काम करने के तरीके को बदल देता है। आप उन्हें गलत साबित करने के लिए उनके पास नहीं जाते हैं। बल्कि, आप उन्हें सुनने और समझने के लिए उनके पास जाते हैं। यह समझने कि लोगों ने जो देखा है, उसके आधार पर उन्हें वह बात क्यों सही लगी। फिर, जो पहले से मौजूद समझ है, उसके साथ-साथ कुछ नया निर्माण करने के उद्देश्य से उनके बीच जाते हैं। सामुदायिक ज्ञान को अज्ञानता मानकर उसे खारिज करने से वह गायब नहीं हो जाता। यह बस संवाद स्थापित करने का दरवाजा बंद कर देता है।

A healthcare worker administering treatment to an infant while being assisted by two women in a community setting, with children playing in the background.

मैंने पहले पुरुषों के साथ समय बिताया। मैंने उन्हें सुना और बातचीत के माध्यम से उनके साथ एक सहजता स्थापित की। इस मेल-जोल को बढ़ाने की दिशा में, मैंने उनसे उन विषयों पर भी हंसी मजाज़ किया जो स्वास्थ्य से नहीं जुड़े थे। फिर, मैंने उन्हें समझाया कि टीका कैसे काम करता है। मैंने उन्हें बुखार आने के कारणों के बारे में समझाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सुबह जंगल जाने की योजना बना रहे तीन परिवार टीकाकरण करवाने के लिए आ गए।

बाद में, पुरुष आरएचओ ने मुझे बताया कि ये परिवार वर्षों से टीकाकरण के दिन भाग जाते थे। ऐसा वो न किसी शत्रुता के कारण के करते थे और न ही किसी हठधर्मिता के कारण। बल्कि, इसलिए करते थे क्योंकि कभी किसी ने उन्हें इतने इत्मिनान और ईमानदारी से, रुकने और टीकाकरण कराने का फायदा नहीं समझाया गया था।

इन समुदायों और पूरे स्वास्थ्य तंत्र के बीच केवल भौगोलिक दूरी नहीं है। यह दूरी बरसों तक उन्‍हें नज़रअंदाज़ करने, सूचनाओं से वंचित रखने से पैदा हुई है। यह दूरी उन संस्थाओं ने पैदा की जिन तक पहुँच पाना कभी आसान नहीं रहा और उन योजनाओं ने भी पैदा कीं जो इन्‍हें ध्‍यान में रखकर कभी बनायी ही नहीं गईं। इस दूरी को पाटना निरंतर चलने वाली नीरस प्रक्रिया है। यह अक्सर रिपोर्टों में दर्ज नहीं होता, न ही इससे सुर्खियाँ बनती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की असली ज़मीन यहीं है। इस पर चर्चा घर के दरवाज़े पर, पहाड़ी पर, सूखी नदी के किनारे होती है और उन जगहों पर होती है जहाँ सड़क नहीं पहुँचती।

जमीनी स्तर पर करना हमें क्या सिखाता है

गरीबी, भौगोलिक स्थिति, साक्षरता, अवसर जैसे सामाजिक निर्धारकों पर कक्षाओं में होने वाली चर्चाएँ गलत नहीं हैं। लेकिन जब तक कि आप इन्हें किसी खास व्यक्ति के संदर्भ में, किसी खास घर के संदर्भ में और किसी ख़ास सुबह साकार होते नहीं देख लेते, तब तक ये अमूर्त सिद्धांत ही बने रहते हैं। जैसे – एक शराबी पति, जिसके हाथ में टूटी हुई लकड़ी का टुकड़ा है। आँगनवाड़ी केंद्र में टूटा और बेकार पड़ा हुआ विकास निगरानी उपकरण, जिससे स्वास्थ्य केंद्र आने वाले बच्चों की लंबाई उनके उम्र के अनुपात में मापना मुश्किल है, कि वे अपनी उम्र के अनुसार बढ़ रहे हैं या नहीं। ये कोई अपवाद नहीं हैं। बल्कि, ये काम का अभिन्न हिस्सा हैं।

A shelf in a room displaying a scale with a digital display, a cardboard box labeled 'HANDLE WITH CARE', and several items including bags and clothing on top.

मैं बार-बार इसी बात पर लौटता हूँ कि कितना कुछ सक्रिय मौजूदगी पर निर्भर करता है। यानी शारीरिक, धर्यपूर्ण और बिना चमक-दमक वाली उपस्थिति से बहुत फर्क पड़ता है। कानकुला के परिवारों को किसी अभियान की जरूरत नहीं थी। उन्हें बस एक ईमानदार बातचीत की जरूरत थी। ओंगना की महिला को किसी नई नीति की जरूरत नहीं थी। उसे बस किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो बिना किसी पूर्वाग्रह के एक आम मंगलवार की सुबह उसके दरवाजे पर आए और यह बताए कि उसकी गर्भावस्था कितना मायने रखती है, इसके लिए जरूरी स्वास्थ्य संबंधी प्रयास किए जा रहे हैं।

जमीनी स्तर पर काम करने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास जो ज्ञान होता है, वह किसी डैशबोर्ड (औपचारिक डिजिटल माध्यम) द्वारा नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि, जमीनी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही ये बात जानते हैं कि किन परिवारों ने दरवाजे पर दी गई दस्तक का जवाब देना बंद कर दिया है और क्यों। वे जानते हैं कि जुलाई में कौन सी सड़कें नदी में डूब जाती हैं। वे जानते हैं कि किसका पति शराब पीता है, कौन सा बच्चा तीन महीने से नहीं तौला गया है, कौन सा परिवार मुलाकात का जवाब देगा और किन घरों को अतिरिक्त सहायता की जरूरत है। यह ज्ञान किसी कारगर हस्तक्षेप का आधार बनता है, जो वास्तव में काम करता है। जब हम थकान के कारण या किसी अन्य कारण से कार्यकर्ताओं के अनुभवों को नज़रंदाज़ कर देते हैं, तो हम स्वास्थ्य प्रणाली द्वारा लंबे समय के अनुभव के साथ अर्जित महत्त्वपूर्ण जानकारी को खो देते हैं। जबकि स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली इसी के आधार पर वह काम करती है।