रोग की पहचान से निरन्तर देखभाल तक : जनजातीय समुदायों में फैले उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों (NTDs) के प्रति स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण

निग्लेक्टेड ट्रापिकल बीमारियों (एन टी डी) यानी गर्म जलवायु में संक्रमण से फैलने वाली बीमारियों जैसे कुष्ठ रोग, लिम्फैटिक फाइलेरिएसिस, और स्केबिस (खुजली) की रोकथाम के लिए संवेदनशील और विशेष प्रयासों की ज़रूरत होती है। इस लेख में बताया गया है कि सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर रुग्णता प्रबंधन इकाई के साथ मिलकर एन टी डी के रोगियों की कैसे मदद करते हैं।

रोग की पहचान से निरन्तर देखभाल तक : जनजातीय समुदायों में फैले उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों (NTDs) के प्रति स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण

बस्तर के बकावंड ब्लॉक में कई उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग (NTDs) जैसे – कुष्ठ रोग, लिम्फेटिक फाइलेरियासिस (LF) और खुजली व्यापक स्तर पर फैले हुए हैं। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इसका असर देखा जा सकता है। इन बीमारियों को शायद ही कभी इतनी गंभीरता से लिया जाता है। इन्हें आमतौर पर त्वचा पर होने वाले एक छोटे से दाग़ या धब्बे के रूप में देखा जाता है। इसमें महीनों या वर्षों में धीरे-धीरे करके दर्द रहित सूजन पैदा होती है। इसमें लगातार खुजली होती है। इसके शुरुआती लक्षणों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है और घर पर ही इसका घरेलू इलाज किया जाता है। इसे किसी बीमारी के लक्षण के रूप में पहचानने के बजाय सामान्य जीवन का हिस्सा मान लिया जाता है।

उन्होंने बताया कि “मैं डर गया था। मैं अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहता था। लोग मुझसे पूछते रहते थे कि मुझे क्या हुआ है।”

कई परिवारों के लिए तुरंत इलाज करवाना संभव नहीं था। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। इलाज स्वास्थ्य केंद्रों की दूरी, उपलब्ध सेवाओं के बारे में सीमित जानकारी, रोजमर्रा की प्राथमिकताओं के बीच की तय प्राथमिकता (कौन सा काम पहले ज़रूरी है) और इस सोच पर निर्भर करता है कि स्थिति “अभी इतनी गंभीर नहीं है” कि इलाज करवाया जाए। ये सभी कारण रोगी के इलाज को प्रभावित करते हैं।

इसके चलते बीमारी का इलाज होने से पहले ही लोग अक्सर उस बीमारी के साथ जीने के आदी हो जाते हैं।

जब रोग के शुरुआती लक्षण अनदेखे रह जाते हैं

जोनामणि पारा के 52 वर्षीय सोना सिंह कुष्ठ रोग से जुड़ी जटिलताओं के बार-बार होने वाले दौर से जूझ रहे थे, जिन्हें ‘लेप्रा रिएक्शन’ (lepra reactions) कहा जाता है। वह इसके साथ जीने के आदी हो चुके थे, जिसके कारण उनके विकलांग होने का ख़तरा बना हुआ था। इन ‘लेप्रा रिएक्शन’ (lepra reactions) के कारण उनके चेहरे पर सूजन आ गई थी और उनकी आँखों से लगातार पानी गिरता रहता था। हालाँकि, रोग के लक्षण साफ़ तौर पर देखे जा सकते थे, लेकिन वे इलाज के लिए घर से बाहर निकलने से कतराते थे।

उन्होंने बताया कि “मैं डर गया था। मैं अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहता था। लोग मुझसे पूछते रहते थे कि मुझे क्या हुआ है।”

इसी बीच एक रिश्तेदार ने आशंका जताई कि यह कुष्ठ रोग हो सकता है। इसके बाद, उस रिश्तेदार ने मुझसे दूरी बना ली और मिलना जुलना बहुत कम कर दिया। अन्य लोग भी मुझसे दूर होने लगे। जिस कारण लोगों से बातचीत भी कम हो गई। मैं भी बिना किसी टकराव के खुद ही चुपचाप अलग-थलग रहने लगा।

इसके बावजूद उन्होंने किसी स्वास्थ्य केंद्र का रुख नहीं किया। क्योंकि उन्‍हें उपलब्ध सेवाओं के बारे में जानकारी ही नहीं थी। न तो उन्‍हें इस बीमारी का इलाज करवाने का ख्याल आया और न ही इसकी ज़रूरत महसूस हुई।

शक्ति (SHAKTHI) के तहत समुदाय-आधारित स्वास्थ्य प्रणाली का सुदृढ़ीकरण

लेप्रा (LEPRA) सोसायटी द्वारा संचालित शक्ति (SHAKTHI) (Sustainable Health Approaches for Key Tribal Communities Health Interventions) कार्यक्रम इन बाधाओं को दूर करने की कोशिश कर रहा है। यह कार्यक्रम सामुदाय-आधारित स्वास्थ्य व्‍यवस्‍था को बेहतर बनाने का प्रयास है। यह मुख्‍य रूप से उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों (NTDs) की रोकथाम, शुरुआती पहचान, उपचार और दीर्घकालिक देखभाल पर ध्‍यान देता है। इसके साथ ही यह तपेदिक, मलेरिया, जापानी इंसेफेलाइटिस और सिकल सेल रोग जैसी अन्य प्राथमिक स्वास्थ्य समस्याओं पर भी काम करता है।

लेप्रा (LEPRA) सोसायटी भारत की एक स्वतंत्र और गैर-लाभकारी संस्था है, जो कुष्ठ रोग और अन्य उपेक्षित बीमारियों से प्रभावित लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत है। इसकी स्थापना सन् 1989 में हैदराबाद में हुई थी। यह संस्था सरकारी स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ मिलकर रोगों की रोकथाम, उपचार, पुनर्वास और सामुदाय-आधारित देखभाल करती है।

यह संस्था वर्तमान में 11 राज्यों में काम कर रही है और महिलाओं, बच्चों, आदिवासी समुदायों तथा प्रवासी आबादी जैसे वंचित और हाशिये पर रहने वाले समूहों पर विशेष ध्यान देती है। कुष्ठ रोग, तपेदिक, लसीका फाइलेरिया और एचआईवी/एड्स पर काम करने के साथ-साथ LEPRA Society अंधत्व की रोकथाम और सस्ती नेत्र-स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने के लिए नेत्र-चिकित्सा कार्यक्रम भी चलाती है। यह खासकर उन इलाकों में काम करती है जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित हैं।

समुदाय स्तर पर प्रशिक्षित कम्युनिटी हेल्थ वर्कर (CHW), आशा कार्यकर्ताओं के सहयोग से, नियमित रूप से घर-घर जाकर स्वास्थ्य जाँच और निरंतर निगरानी करते हैं। फील्ड स्तर की इन गतिविधियों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में पर्यवेक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे CHW का मार्गदर्शन करते हैं, संदिग्ध मामलों की पुष्टि करते हैं, स्क्रीनिंग के परिणामों की समीक्षा करते हैं और यदि रोगी को आगे के लिए रेफर करना है तो इस संबंध आवश्यक चिकित्सीय निर्णय लेते हैं। इसके बाद इन मामलों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) से जोड़ा जाता है। वहाँ चिकित्सा अधिकारी रोग की पुष्टि कर उपचार शुरू करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में PHC में तैनात परियोजना स्टाफ नर्सें समन्वय का काम करती हैं।

इस सब गतिविधियों के साथ ही, सीएचडब्ल्यू और पर्यवेक्षक मिलकर सामुदायिक स्तर पर जागरूकता फैलाने के आवश्यक कार्यक्रम लेता है और ग्राम पंचायतों के साथ जुड़कर रोग निवारक तरीकों को प्रोत्साहित करता है। जिसमें साफ़ सफाई को बढ़ावा देना, वेक्टर नियंत्रण (वाहक नियंत्रण) और संचारी तथा आनुवंशिक परिस्थितियों के बारे में जागरूकता फैलाना शामिल है।

घर-घर संपर्क से लेकर उपचार करवाने तक की प्रक्रिया

सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों ने अपनी क्षेत्रीय गतिविधियों के तहत सोना सिंह के घर जाकर उनसे मुलाकात की। शुरुआती मुलाकातों में झिझक और अनिश्चितता साफ दिखाई देती थी, इसलिए बातचीत भी काफी संकोचभरी रही। फिर भी, ये मुलाकातें लगातार जारी रहीं।

यह अनुभव अब भी आसान नहीं है, लेकिन यह इस बात की मिसाल है कि निरंतर और धैर्यपूर्ण देखभाल धीरे-धीरे व्यक्ति के स्वास्थ्य और आत्मविश्वास- दोनों को फिर से संवार सकती है।

आगे चलकर, सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों ने सोना सिंह को उनके रोग की हालत में बारे में समझाया और इसके उपचार के विकल्पों पर चर्चा की। उन्होंने सोना सिंह को बकावंड सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में स्थित मोर्बिडिटी मेनेजमेंट यूनिट (MMU) के बारे में बताया। यह एक समर्पित स्वास्थ्य सेवा संस्थान है। यहाँ कुष्ठ रोग और एलएफ जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोगों की नियमित चिकित्सीय जाँच होती है और उनकी समस्याओं को हल किया जाता है। रोगियों को उचित परामर्श दिया जाता है। उन्हें खुद अपनी देखभाल करने में सक्षम बनाया जाता है। वहाँ इलाज से संबंधित सहायक उपकरण उपलब्ध हैं और जरूरत पड़ने पर बेहतर इलाज के लिए आगे रेफर भी किया जाता है। इस तरह धीरे-धीरे परस्‍पर विश्वास वाले रिश्ते की शुरुआत हुई।

अंततः सोना जाँच कराने और इलाज शुरू कराने के लिए मान गये। उनकी हालत में सुधार भी हुआ है। उनका इलाज अभी भी चल रहा है और उन्हें नियमित जाँच के लिए जाना होता है।

उन्होंने (सोना सिंह) कहा कि “धीरे-धीरे मैं बेहतर हो रहा हूँ। मैंने अपनी दवाएँ और जाँच जारी रखी है।”

सोना सिंह थोड़ा बहुत ही सही, लेकिन अब घर से बाहर निकलने लगे हैं। हालांकि, यह परिस्थिति अभी भी उनके लिए बहुत जटिल है। लेकिन, यह दर्शाता है कि कैसे देखभाल लगातार जारी रखने से धीरे-धीरे स्वास्थ्य और आत्मविश्वास दोनों ही बहाल हो सकता है।

वे स्थितियाँ जो धीमी गति से आकर लेती हैं 

हमने पाया कि कई घरों में कुष्ठ रोग अक्सर त्वचा पर एक छोटे से दाग के रूप में शुरू होता है, जिसे आमतौर पर गंभीरता से नहीं लिया जाता है। चूंकि, कुष्ठ रोग तुरंत ही रोजमर्रा के जीवन को बाधित नहीं करता है, इसलिए लोग अक्सर इसका घरेलू इलाज करने की कोशिश करते है या फिर इस पर ध्‍यान ही नहीं देते। लेकिन जब सुन्नता, दिखाई देने वाले दाग या विकलांगता जैसे लक्षण बढ़ने लगते हैं तभी इसे एक स्वास्थ्य समस्या के रूप में लिया जाता है।

तब तक कई ऐसी जटिलताएँ विकसित हो चुकी होती हैं, जिन्हें समय रहते रोका जा सकता था।

यहाँ सामुदायिक स्‍तर पर लगातार संपर्क के कारण जो बदलाव आया है वह तुरंत रोग की पहचान का नहीं, बल्कि शुरुआती जागरूकता का है। इसके तहत सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता बार-बार घरों का दौरा करते हैं, समय रहते लक्षणों पर नज़र रखते हैं और दी गयी जानकारी को बार-बार दोहराते हैं। इससे परिवारों को धीरे-धीरे यह समझने में मदद मिलती है कि कब चिकित्सीय सेवा लेने की जरूरत है।

समुदाय स्तर पर पहुँच और लगातार संपर्क के कारण जो बदलाव आया है, वह तुरंत पहचान का नहीं, बल्कि शुरुआती जागरूकता का है। कम्युनिटी हेल्थ वर्कर बार-बार घरों में जाकर लोगों से मिलते हैं, समय के साथ लक्षणों पर नज़र रखते हैं और लगातार जानकारी साझा करते रहते हैं। इससे परिवार धीरे-धीरे यह समझने लगते हैं कि कब चिकित्सकीय सहायता की ज़रूरत है।

लिम्फेटिक फाइलेरियासिस के साथ जीवन : पुरानी बीमारी के साथ तालमेल 

लिम्फेटिक फाइलेरियासिस (LF) मच्छरों से फैलने वाला एक परजीवी संक्रमण है। समय के साथ यह शरीर के अंगों, विशेषकर हाथों और पैरों में लंबे समय तक रहने वाली सूजन का कारण बन सकता है। इसमें अक्सर दर्दनाक तीव्र दौरे पड़ते हैं।

कटनचर गाँव की रहने वाली लक्ष्मण भगेल एक मध्यम आयु की महिला हैं। वे कई वर्षों से इस बीमारी से पीड़ित हैं। उसके शरीर में धीरे-धीरे सूजन काफी बढ़ गयी थी।

पहले तो उन्‍होंने सोचा कि यह सूजन हमेशा नहीं रहेगी, यह एक अस्थायी समस्या है।

उन्‍होंने कहा “यह एक सामान्य सूजन लग रही थी, आती-जाती रहने वाली सूजन जैसी ही थी।”

उन्‍होंने अपनी परिस्थितियों के साथ समझौता करते हुए, अपनी दैनिक गतिविधियाँ जारी रखीं। समय बीतने के साथ, उनका रोग बढ़ता गया। उन्‍हें बार-बार दर्द के दौरे पड़ते थे और बढ़ती सूजन की वजह से हिलना-डुलना भी मुश्किल हो गया था।

हालाँकि, उनकी बीमारी पूरी तरह से ठीक नहीं हुई है, लेकिन बीमारी की गंभीरता और बार-बार आने वाले दर्द के दौरे कम हुए हैं। जिससे वे अपने दैनिक जीवन के कामकाज कर पाती हैं तथा उनकी स्थिति में सुधार आया है। 

फिर भी, उन्‍होंने इलाज कराने में देरी की।

उन्‍होंने कहा कि “मैं रोग से पीड़ित थी, लेकिन मैं नहीं जानती थी कि अपनी इस स्थिति को कैसे ठीक करूँ।”

शक्ति (SHAKTHI) की टीम के बार-बार घर आने-जाने से उन्‍हें यह पता चल पाया कि खुद की देखभाल कैसे की जाए। इस संबंध में उसे नियमित स्नान, अंगों की देखभाल और कुछ सरल व्यायाम करने की सलाह दी गयी। साथ ही, उन्‍हें अपनी देखभाल के लिए किट भी दी गयी। शुरू में, इन चीजों को आदत में शुमार करना थोड़ा कठिन था।

A group of individuals participating in an event for the International Day of Persons with Disabilities, featuring a woman receiving a basket of goods from a man's hands in a community center setting.

लेकिन, शक्ति की टीम लगातार उनके पास जाती रही। उन्हें परामर्श देती रही और बार-बार देखभाल के तरीकों के बारे में जागरूक करती रही।

धीरे-धीरे, इनमें से कुछ चीजें उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गईं।

उन्‍होंने बताया, “अब मेरी सूजन और पीड़ा कम हो गई है। मैं स्वस्थ महसूस करती हूँ।”

हालाँकि, उनकी बीमारी पूरी तरह से ठीक नहीं हुई है, लेकिन बीमारी की गंभीरता और बार-बार आने वाले दर्द के दौरे कम हुए हैं। जिससे वे अपने दैनिक जीवन के कामकाज कर पाती हैं तथा उनकी स्थिति में सुधार आया है।

स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय के और करीब लाना 

बकावंड में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा है कि अब घर-स्तर पर शुरुआती पहचान को स्वास्थ्य केंद्रों में मिलने वाली निरंतर देखभाल से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

पहले, बीमारी के लक्षणों की पहचान होने पर भी, लोग इलाज के लिये नियमित रूप से स्वास्थ्य केंद्र नहीं आते थे। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को अक्सर लोगों की पहुँच से दूर माना जाता था। यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं थी। बल्कि, रोज़मर्रा की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के संदर्भ में भी ये बात लागू होती थी।

उन्‍होंने कहा कि “अब मेरी तकलीफ़ कम हो गई है। मैं बहुत बेहतर महसूस करता हूँ।” वह अब काम पर भी लौट चुके हैं। वे सालों से जिस तकलीफ़ से परेशान थे, अब उससे निजात पा चुके हैं।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में पुराने रोगों के प्रबंधन संबंधी सेवाओं को मजबूत करने से यह अंतर कम हुआ है। यह सुनिश्चित किया गया कि समुदाय में पहचाने गए पीड़ित लोगों का निरंतर उपचार किया जायेगा, समस्याओं का निवारण किया जायेगा और समय के साथ निरन्तर देखभाल के लिए उन्हें एमएमयू (MMU) से जोड़ा जायेगा।

रामदेव नाग, मंगनार गाँव के निवासी हैं। उनकी उम्र 40 वर्ष है। वे कई वर्षों से हाइड्रोसील की समस्या से जूझ रहे थे। हाइड्रोसील अंडकोश की एक दर्द रहित सूजन होती है। जो आमतौर पर एलएफ (LF) से जुड़ी होती है। इसका आकार समय के साथ बढ़ सकता है और यह बीमारी दैनिक जीवन के कामकाज में बाधा पैदा कर सकती है।

उन्होंने समय के साथ इस बीमारी के साथ जीवन जीने की आदत डाल ली थी।

उन्होंने कहा कि “पहले, मैं अपनी इस स्थिति को नजरअंदाज कर रहा था।”

दूसरों की तरह उन्होंने भी शुरुआत में स्वास्थ्य केंद्र जाने को ज़रूरी नहीं समझा। कामकाज के दबाव, बीमारी को लेकर तात्कालिक चिंता के अभाव और इलाज को लेकर असमंजस के कारण इलाज टलता चला गया।

शक्ति (SHAKTHI) की टीम की लगातार कोशिश से उन्हें अपनी स्थिति और उपलब्ध उपचार के बारे में पता चल पाया। इसमें सर्जरी भी शामिल थी। फिर भी, वे हिचकिचा रहे थे।

हमारी टीम की तरफ से लगातार आश्वासन मिलने पर, उन्होंने अंततः अपना इलाज करवाया। उन्हें सरकारी दिमरापाल मेडिकल कॉलेज में रेफर किया गया। जहाँ उनकी सर्जरी हुई।

उन्होंने बताया, “अब मेरी पीड़ा कम हो गई है। मैं बहुत बेहतर महसूस करता हूँ।”

वह अब वह काम पर भी लौट चुके हैं और वे सालों से जिस तकलीफ़ से परेशान थे, अब उससे निजात पा चुके हैं।

धीरे आने वाला स्पष्ट बदलाव

यदि पूरे बकावंड पर एक नज़र डालें तो यहाँ एनटीडी रोग को समझने और उसका प्रबंधन करने के तरीके में धीमी गति से ही सही लेकिन स्पष्ट बदलाव देखने को मिलता है।

ये बदलाव भले ही छोटे हों, लेकिन बहुत सार्थक हैं : इससे बीमारी के कारण होने वाली गंभीर जटिलताएँ कम हुई हैं, रोग से होने वाली पीड़ा में कमी आयी है और स्वास्थ्य प्रणाली में धीरे-धीरे विश्वास बढ़ा है।

जिन परिस्थितियों को पहले सामान्य मान लिया जाता था, उन लक्षणों को अब पहले ही पहचान लिया जाता है। सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता इस बदलाव में एक केन्द्रीय भूमिका निभा रहे हैं। यह एक बार के संपर्क से नहीं, बल्कि उनकी निरंतर भागीदरी के कारण सफल हुआ है।

इसके साथ ही, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मॉर्बिडीटी प्रबंधन सेवाओं की स्थापना, उपचार और निरन्तर देखभाल के लिए एक स्पष्ट रास्ता तैयार कर रहा है। इसके कारण, जो लोग पहले स्वास्थ्य केंद्रों में जाने से बचते थे, वे अब उनका उपयोग करवने लगे हैं। कई बार वे बातचीत के बाद स्वास्थ्य केंद्र जाने को राज़ी हो जाते हैं तो कभी-कभी दूसरों में सुधार देखकर वे स्वास्थ्य केंद्र जाने के लिए प्रेरित होते हैं।

ये बदलाव सभी जगह एक समान नहीं है। अभी भी कई कामों में देरी होती है और सभी पहचाने गए मामले तुरंत उपचार के लिए नहीं आते हैं।

लेकिन, इस दिशा में प्रगति जरुर हुई है।

अब ज्यादातर लोग बीमारी के शुरुआती लक्षणों की पहचान करने में सक्षम हैं। कुछ परिवार खुद से भी देखभाल के उचित तरीकों को अपना रहे हैं। जरूरत पड़ने पर इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्र आने वालों की संख्‍या बढ़ी है।

ये बदलाव भले ही छोटे हों, लेकिन ये बहुत सार्थक हैं। बीमारी से पैदा होने वाली गंभीर जटिलताएँ कम हुई हैं, रोग से होने वाली पीड़ा में कमी आयी है और स्वास्थ्य प्रणाली में धीरे-धीरे विश्वास बढ़ा है।

बीमारी के लक्षणों की शुरुआती पहचान से लेकर निरंतर देखभाल तक की यह प्रक्रिया अभी भी पूर्ण रूप से विकसित होने के क्रम में हैं। लेकिन, इन समुदायों में ये प्रक्रियाएं धीरे-धीरे जड़ पकड़ने लगी हैं।