सार्वजनिक स्वास्थ्य ख़र्च में मामूली बदलाव

भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी ख़र्च अपने बराबरी के देशों के मुकाबले काफ़ी कम है। लेकिन, इसमें थोड़ी-सी बढ़ोतरी और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर ज़्यादा ध्यान देने से बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य ख़र्च में मामूली बदलाव

अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में अपने शुरुआती काम के दौरान मेरी मुलाकात एक सेवानिवृत्त अधिकारी से हुई थी। वे अधिकारी भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपने काम के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने हमारी योजनाओं को ध्यान से सुना और कहा—“आप अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। जब तक स्वास्थ्य के फंड और उसके मैनेजमेंट में बुनियादी बदलाव नहीं होंगे, तब तक बहुत ही कम सुधार हो पाएँगे। स्वास्थ्य के मुद्दे से राजनीतिक फायदा नहीं मिलता, इसलिए मुझे नहीं लगता कि कोई बड़ा बदलाव होगा।”

आंकड़ों के मुताबिक, 2021-22 में केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति 3,169 रुपये ख़र्च किए। यह देश की जीडीपी का लगभग 1.84% है। यह ख़र्च भारत के बराबर वाले दूसरे देशों के मुकाबले प्रति व्यक्ति ख़र्च और सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के प्रतिशत के मामले में काफ़ी कम है। जैसे – ब्राजील, चीन और मलेशिया जैसे देश अपने जीडीपी का 3% से 6% तक स्वास्थ्य पर ख़र्च करते हैं और प्रति व्यक्ति ख़र्च भी भारत से 5 से 10 गुना ज़्यादा है। वहीं, विकसित देशों में यह ख़र्च और भी ज़्यादा होता है। वे अपने जीडीपी का 6% से 10% तक स्वास्थ्य पर ख़र्च करते हैं और प्रति व्यक्ति ख़र्च भारत से लगभग 100 गुना अधिक होता है।

किसी भी देश की स्वास्थ्य स्थिति सीधे इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार उस पर कितना ख़र्च करती है, इसलिए यह आंकड़े बेहद ज़रूरी होते हैं। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था पर फंडिंग की कमी का असर साफ़ दिखाई देता है।

अब यह बात साफ़ हो चुकी है कि किसी भी समाज की सेहत सबसे ज़्यादा इस बात पर निर्भर करती है कि प्राथमिक यानी अग्रिम स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं में कितना निवेश किया जाता है, न कि किसी और चीज़ पर।

कुछ दिन पहले, मैं बेहतरीन ढंग से चलाए जा रहे एक ज़िला अस्पताल में गया था। यह अस्पताल देश के पश्चिमी राज्य था और अस्पताल में काफ़ी भीड़ थी। मेरी एक आदत है कि मैं किसी भी अस्पताल की स्थिति उसके शौचालयों की सफाई से आंकता हूँ। मैंने साथ चल रहे व्यक्ति से पूछा कि यहाँ के शौचालयों की हालत इतनी ख़राब क्यों है। उन्होंने बताया कि 300 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में 16 शौचालय ब्लॉकों की देखभाल-साफ़-सफ़ाई के लिए सिर्फ़ एक पुरुष और एक महिला सफ़ाई कर्मचारी हैं, वे दिन में सिर्फ़ एक बार ही सफ़ाई कर पाते हैं।

विकासशील देशों को सलाह दी जाती है कि सरकार अपने कुल स्वास्थ्य बजट का कम-से-कम 70% हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च किया जाना चाहिए। लेकिन, भारत में यह हिस्सा 50% ही है।

मैं एक दूसरे सरकारी सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल में भी गया। यह अस्पताल दक्षिण भारत में था। यहाँ 120 बिस्तरों की देखभाल सिर्फ़ 60 नर्सों कर रहे थे। नर्सों की यह संख्या ‘भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों’ को पूरा करने के लिए ज़रूरी संख्या का सिर्फ़ एक-तिहाई है।

ज़रूरत से कम फंडिंग का सबसे ज़्यादा असर शुरुआती स्तर की प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर देखने को मिलता अब यह बात साफ़ हो चुकी है कि किसी भी समाज की सेहत सबसे ज़्यादा इस बात पर निर्भर करती है कि प्राथमिक यानी अग्रिम स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं में कितना निवेश किया जाता है, न कि किसी और चीज़ पर। विकासशील देशों को सलाह दी जाती है कि सरकार अपने कुल स्वास्थ्य बजट का कम-से-कम 70% हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च किया जाना चाहिए। लेकिन, भारत में यह हिस्सा 50% ही है।

सरकार अपने बजट में थोड़ा बदलाव करके सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ख़र्च को जीडीपी के 1.9% से बढ़ाकर 2.5% कर सकती है। यह सुझाव 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भी दिया गया था।

इसी वजह से आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पोषण, टीकाकरण, माँ और बच्चों की देखभाल तथा गैर-संक्रामक बीमारियों की जांच जैसे ज़रूरी काम करने वालों को अकुशल मज़दूरों के बराबर भी न्यूनतम मज़दूरी नहीं मिल पाता है। इसी वजह से सरकारी बीमा योजनाओं में आउटपेशेंट इलाज (बिना भर्ती हुए) शामिल नहीं होता, जबकि यही ख़र्च — ख़ासकर दवाइयों का — गरीब परिवारों पर अचानक बड़ा बोझ डालता है।

बीमारियों से बचाव और लोगों को स्वस्थ रखने का काम सबसे ज़्यादा प्राथमिक स्तर पर काम करने वाले लोग करते हैं। इसलिए, अगर यहाँ अतिरिक्त निवेश किया जाए तो बड़े अस्पतालों (सेकेंडरी और टर्शियरी केयर) में मरीजों की भीड़ भी कम हो सकती है।

यह नहीं कह रहा कि भारत अपनी सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद अपने बराबर वाले दूसरे देशों जितना ही स्वास्थ्य पर ख़र्च करे। लेकिन, इतना ज़रूर किया जा सकता है कि बजट में थोड़ा बदलाव करके सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ख़र्च को जीडीपी के 1.9% से बढ़ाकर 2.5% कर दिया जाए। यह सुझाव 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भी दिया गया है।

अगर इस बढ़े हुए बजट का ज़्यादा हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च किया जाए, तो ज़मीनी स्तर के काम करने के लिए मिलने वाला पैसा लगभग दोगुना हो सकता है। इससे कई ज़रूरी काम किए जा सकते हैं, जैसे—आशा कार्यकर्ताओं और नर्सों की काम की शर्तों में सुधार करना और उन्हें बेहतर सुविधाएं देना, दूर-दराज़ के इलाकों में अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना, ओपीडी (बिना भर्ती इलाज) के ख़र्च को भी सरकारी बीमा में शामिल करना।

marginal budgetary

मारियों से बचाव और लोगों को स्वस्थ रखने का काम सबसे ज़्यादा प्राथमिक स्तर पर काम करने वाले लोग करते हैं। इसलिए, अगर यहाँ अतिरिक्त निवेश किया जाए तो बड़े अस्पतालों (सेकेंडरी और टर्शियरी केयर) में मरीजों की भीड़ भी कम हो सकती है।

अगर हम ऐसे छोटे-छोटे बदलाव करने के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति दिखाए, तो इससे भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ा और लंबे समय तक असर डालने वाला सुधार हो सकता है।