कई आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में यह देखने को मिलता है कि माता-पिता और खासकर माताएँ खेतों, जंगलों या दिहाड़ी मज़दूर के रूप में घंटों काम करते हैं। इस दौरान, छोटे बच्चे अक्सर बड़े भाई-बहनों या दादा-दादी के पास घर पर रहते हैं। जिस कारण उनकी देखरेख ठीक से नहीं हो पाती होती है और उन्हें समय पर भोजन भी नहीं मिलता है।
हमने अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की तरफ से ज़मीनी स्तर के एनजीओ के साथ साझेदारी में काम करते हुए, 7 महीने से 3 साल तक के बच्चों के लिए सुरक्षित और पोषणयुक्त जगह उपलब्ध कराने के लिए क्रेच सुविधा की शुरुआत की। ये क्रेच एक ऐसी समुदायिक जगह है, जहाँ बच्चे दिनभर में रह सकते हैं। उन्हें पौष्टिक भोजन मिलता है और वे खेल-कूद की गतिविधियों में भाग ले सकते हैं।
बच्चों की देखभाल के साथ-साथ क्रेच के जरिये बच्चों के विकास की पूरी निगरानी रखी जाती है तथा कुपोषण के शुरुआती लक्षणों की पहचान की जाती है। ये क्रेच परिवारों को भोजन एवं स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी देने और उन्हें जरूरी सलाह देने के लिए एक महत्त्वपूर्ण मंच की तरह काम करते हैं। बीतते समय के साथ, ये जगहें केवल बच्चों की देखभाल के केंद्र ही नहीं रह गए हैं, बल्कि ये क्रेच एक भरोसेमंद सामुदायिक संस्थान बन गए हैं। जहाँ विभिन्न परिवारों को सहयोग मिलता है और बच्चों को स्वस्थ और पुष्ट बनाने के लिए जरूरी निगरानी व स्वास्थ्य सेवा मिलती है। हम छत्तीसगढ़ में अपने क्रेच को लइका घर कहते हैं।
ये क्रेच केवल बच्चों की देखभाल की जगहें नहीं रह जाती हैं। बल्कि, ये सुरक्षा, पोषण और बच्चों के नियमित विकास की निगरानी के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण जगहें बन जाते हैं। यहाँ बच्चों का वज़न मापा जाता है। उन्हें गरमा-गरम भोजन परोसा जाता है और बारीकी से उनका निरीक्षण किया जाता है।
क्रेच के कामों के दौरान हम अक्सर आंकड़ों में बात करते हैं। हम इस बात पर चर्चा करते हैं कि कितने केंद्र (क्रेच) चल रहे हैं, कितने बच्चे नामांकित हैं, कितने कम वज़न के बच्चे हैं और कितनों को इलाज के लिए रेफर किया गया है, आदि। ये आंकड़े बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। क्योंकि, ये आंकड़े ही हमें पैमाने (scale) और प्रगति को समझने में मदद करते हैं। हालांकि, कभी-कभी इन आंकड़ों से असली कहानी का पता नहीं चल पाता है।
हर आंकड़े के पीछे एक बच्चा है। एक बच्चा जो दोस्तों के साथ खेलते हुए हंसता है, जो भूख लगने पर रोता है और जब उसे कोई तकलीफ होती है तो वह यह उम्मीद करता है कि कोई उस पर ध्यान देगा। उस बच्चे के पीछे एक परिवार है, जो अपने पास मौजूद संसाधनों और सीमित ज्ञान के साथ संघर्ष कर रहा है।
हमें यह बात छत्तीसगढ़ के धरमजयगढ़ ब्लॉक में एक क्रेच के साथ काम करते हुए, साफ तौर पर समझ में आयी।
रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ के आदिवासी गाँवों में, बच्चों का बचपन सरल लेकिन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में गुज़रता है। यहाँ के आदिवासी परिवार मुख्य रूप से खेती और वन उत्पादों जैसे जंगलों से प्राप्त महुआ व तेंदू पत्ता पर निर्भर हैं। यहाँ के गाँव बिखरे हुए हैं। सड़कें ऊबड़-खाबड़ हैं। हालाँकि, कुछ स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन अक्सर उन तक पहुँचना आसान नहीं होता है।
ऐसे परिवेश में, ये क्रेच केवल बच्चों की देखभाल की जगहें नहीं रह जाती हैं। बल्कि, ये क्रेच सुरक्षा, पोषण और बच्चों के नियमित विकास की निगरानी के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण जगहें बन जाते हैं। यहाँ बच्चों का वज़न मापा जाता है। उन्हें गरमा-गरम भोजन परोसा जाता है और उनका बारीकी से निरीक्षण किया जाता है। कई परिवारों के लिए तो ये क्रेच वह पहली जगह होती है, जहाँ वे अपने बच्चे के विकास और पोषण स्तर के बारे में जान पाते हैं।

हम कुछ समय से इन शिशु देखभाल केंद्रों (क्रेच) में नियमित रूप से बच्चों की लंबाई और वज़न माप रहे थे। विकास (ग्रोथ) चार्ट सावधानीपूर्वक भरे जा रहे थे। जब किसी बच्चे का वज़न अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ता था, तो यह चार्ट पर दिखने लगता था। हम बहुत कम वजन या गंभीर कुपोषण के शिकार बच्चों की पहचान कर सकते थे।
हमने इस डेटा का विश्लेषण करते समय, खुद से कुछ मुश्किल सवाल पूछना शुरू किया:
जब हम किसी बच्चे को कुपोषित या बीमार पाते हैं, तो उसके बाद क्या होता है?
जब हम कहते हैं कि बच्चे को इलाज की जरूरत है, तो क्या परिवार वास्तव में अस्पताल तक पहुँच पाते हैं? अगर वे अस्पताल तक पहुँच पाते है, तो क्या उन्हें उचित देखभाल मिलती है? क्या वे यह समझ पाते हैं कि दी गई दवाओं को कैसे खाना है? क्या वे नियमित जाँच के लिए दुबारा अस्पताल जाते हैं?
या क्या रेफरल का मामला केवल एक सलाह बनकर रह जाता है, जिस पर कभी अमल नहीं होता?
खुद से इन सवालों को पूछते हुए, हमें ये एहसास हुआ कि हम वास्तव में इन सवालों के जवाब नहीं जानते थे।
इसलिए हमने इस पर अध्ययन करने का फैसला किया। यह मान लेने के बजाय कि प्रक्रिया और व्यवस्था सही से काम कर रही है, हमने इसे और करीब से समझने का प्रयास किया। हमने धरमजयगढ़ ब्लॉक के दूरदराज के इलाकों में स्थित कुछ क्रेच में एक छोटा सा प्रायोगिक अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य बच्चों को केवल चिकित्सा परामर्श के लिए भेजना भर नहीं था, बल्कि परिवारों द्वारा अनुभव की जाने वाली पूरी प्रक्रिया को समझना था। रोग की पहचान से लेकर इलाज और नियमित जाँच तक की पूरी प्रक्रिया को समझना था।
पहला कदम: माता-पिता से बात करना
यह प्रक्रिया बातचीत से शुरू हुई।
क्रेच सुपरवाइजर ने माता-पिता के साथ बैठकर उन्हें उनके बच्चे का विकास (ग्रोथ) चार्ट दिखाया । उन्होंने ज़ेड-स्कोर या गंभीर कुपोषण जैसी तकनीकी भाषा के बजाय, उन्हें सरल भाषा में सबकुछ समझाया। उन्होंने बच्चों के माता-पिता को बताया कि बच्चे का वज़न जितना होना चाहिए, उससे काफी कम है और बच्चे का कम वज़न उसे कमजोर बना सकता है। साथ में, इससे बीमारी की आशंका बढ़ जाती है क्रेच सुपरवाइजर माता-पिता को ये सुझाव देते थे कि अस्पताल जाने से बच्चे के स्वास्थ्य को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है।
माता-पिता समस्या को नजरअंदाज नहीं कर रहे थे। उन्हें बस इस बात की जरुरत थी कि कोई उन्हें इस बात को सही और आसान भाषा में समझाए तथा आगे क्या करना है, इसके लिए उनका उचित मार्गदर्शन करे।
ये जल्दबाजी में की जाने वाली बातचीत नहीं थीं। बल्कि, ये धैर्यपूर्वक की गई चर्चाएँ थीं।
आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भी इन बैठकों में शामिल हुईं। उनकी मौजूदगी मायने रखती थी, क्योंकि परिवार उन पर भरोसा करते थे।
इस बातचीत के दौरान कुछ दिलचस्प चीज़ें देखने को मिली। जैसे कि माता-पिता ने ध्यान से सुना। उन्होंने सवाल पूछे। कुछ तो चिंतित लग रहे थे और कुछ सोच-विचार में डूबे हुए थे। लेकिन, उनमें से लगभग सभी ने इस बात को लेकर सहमति जताई कि वे अपने बच्चे को चिकित्सा जाँच (मेडिकल चेक-अप) के लिए ले जाना चाहते हैं।
हमें उस समय कुछ महत्त्वपूर्ण बातें समझ में आयीं :
माता-पिता समस्या को नजरअंदाज नहीं कर रहे थे। उन्हें इस बात की जरूरत थी कि कोई उन्हें इसे समझने में और अगला कदम बढ़ाने में उनकी मदद करे।
माता-पिता की दुनिया को समझना
यह मान लेना बहुत आसान है कि यदि ये आदिवासी परिवार अस्पताल नहीं जाते, तो इसका कारण उनकी लापरवाही या अरुचि है। लेकिन, जब हमने माता-पिता की बात सुनी और समझी, तो एक अलग ही तस्वीर सामने आई।
दूरदराज के कई ग्रामीण परिवारों के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक जाना एक आसान फैसला नहीं होता है।
इसका कारण कई तरह बाधाएं थी, न कि उनकी अनिच्छा थी। ये बाधाएं ही उनके रास्ते का असल रोड़ा थीं। जब स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचने की बाधाओं को दूर कर दिया गया, तो हमें अभिभावकों की तरफ से अच्छी प्रतिक्रिया मिली।
ऐसा हो सकता था कि स्वास्थ्य केंद्र जाने के लिए उन्हें एक दिन की दिहाड़ी छोड़नी पड़े।
इसके लिए उन्हें ऐसे परिवहन की व्यवस्था करनी पड़ सकती है, जिसका किराया देने के लिए उनके पास पैसे न हो।
इसमें लंबी दूरी तक पैदल चलना या अनिश्चित सार्वजनिक परिवहन का इंतजार करना शामिल हो सकता है।
इसका मतलब यह भी हो सकता है कि उन्हें एक ऐसे अस्पताल में जाना पड़े, जहाँ वे इस बात से असुरक्षित महसूस करते हो कि आगे क्या होगा या उन्हें क्या करना है।
हमें कुछ माता-पिता ने बताया कि वे इस बात घबरा जाते हैं कि डॉक्टर के लिखे नुस्खे या चिकित्सा निर्देश उन्हें पूरी तरह से समझ आयेंगे या नहीं।
वे अपने इस डर को शायद ही कभी खुलकर साझा कर पाते हैं, लेकिन उनके अंदर का ये डर उनके फैसलों को जरूर प्रभावित करता है।
जब हमने इन समस्याओं को चिन्हित किया, तो हमें कुछ महत्त्वपूर्ण बातें समझ में आयीं:
इसका कारण कई प्रकार बाधाएं थी, न कि उनकी अनिच्छा थी। ये बाधाएं ही उनके रस्ते का असल रोड़ा थीं। जब स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचने की बाधाओं को दूर कर दिया गया, तो हमें अभिभावकों की तरफ से अच्छी प्रतिक्रिया मिली।
विश्वास की ताकत
इस अनुभव से हमें एक और बड़ा सबक भरोसे की ताकत के बारे में मिला।
बीतते समय के साथ, क्रेच सुपरवाइजरों ने परिवारों के साथ एक सहज रिश्ता बना लिया था। वे क्रेच गतिविधियों और समुदायिक दौरों के समय माता-पिता से नियमित रूप से मिलते थे। वे खाना, बीमारी, स्वच्छता और बच्चों की देखभाल के बारे में उनसे बात करते थे। कभी-कभी जब कोई बच्चा बीमार पड़ जाता था, तो वे उनके घर भी जाते थे।
रोजमर्रा की इस बातचीत ने आपसी तालमेल को बढ़ाया।
भरोसे को अक्सर एक कमजोर अवधारणा माना जाता है। लेकिन, सामुदायिक कार्यों के दौरान हमने यह जाना कि ये भरोसा सफलता की सबसे मजबूत नींव में से एक है।
इसलिए, जब सुपरवाइजरों ने उन्हें अस्पताल जाने का सुझाव दिया, तो माता-पिता को यह नहीं लगा कि यह सलाह किसी अजनबी ने दी है। बल्कि, ये सलाह किसी ऐसे व्यक्ति से आई थी, जो पहले से उनके बच्चे को जानता था।
यह भरोसा अस्पताल आने-जाने के दौरान और भी साफ तरीके से दिखा। स्वास्थ्य कर्मचारियों ने बताया कि अक्सर माता-पिता छोटे बच्चों का ब्लड टेस्ट करवाने से झिझकते हैं। लेकिन, इस मामले में अधिकतर माता-पिता बिना किसी झिझक के मान गए।
इसका कारण बहुत सरल था- उन्हें अस्पताल लेकर आए लोगों पर भरोसा था।
भरोसे को अक्सर एक कमजोर अवधारणा माना जाता है। लेकिन, सामुदायिक कार्यों के दौरान हमने यह जाना कि ये भरोसा सफलता की सबसे मजबूत नींव में से एक है। भरोसे के बिना, सबसे अच्छे कार्यक्रम को भी सफलतापूर्वक लागू नहीं किया जा सकता है। भरोसे के कारण मुश्किल काम भी आसान हो जाते हैं।
स्वास्थ्य प्रणाली में सहयोग का ईज़ाद
पायलट अभियान का एक और उत्साहजनक पहलू सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से मिला सहयोग था।
जब सामुदायिक कार्यक्रम स्पष्ट रूप से अपने उद्देश्यों को सामने रखते हैं और इसके लिए पहले से तैयारी की जाती है, तो स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रभावी ढंग से अपना काम कर पाती हैं।
डॉक्टरों ने धैर्यपूर्वक बच्चों की जाँच की। उन्होंने अभिभावकों से खाना खिलाने के तरीकों, बीमारियों और अब तक हुए टीकाकरण के बारे में पूछा। जहाँ जरूरी था, उन्होंने जाँच की सलाह दी और जहाँ दवाएँ उपलब्ध थीं, वहाँ दवाएं दीं। अगर कुछ दवाएँ तुरंत उपलब्ध नहीं थीं, तो इस मामले पर खुलकर चर्चा की गई और इस समस्या को हल करने की कोशिश की गई।
हमारे इस अनुभव ने हमें यह बात याद दिलायी कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली स्वाभाविक रूप से उदासीन नहीं होती है। अक्सर तालमेल की कमी के कारण कई चुनौतियां पैदा हो जाती हैं।
जब सामुदायिक कार्यक्रम स्पष्ट रूप से अपने उद्देश्यों को सामने रखते हैं और इसके लिए पहले से तैयारी की जाती है, तो स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रभावी ढंग से अपना काम कर पाती हैं। इस मामले में दोनों पक्ष एक साझा उद्देश्य के साथ काम कर रहे थे: वह उद्देश्य था बच्चे की मदद करना।
यह समझना कि रेफरल एक प्रक्रिया है
इस पायलट परियोजना से पहले, रेफरल को अक्सर एक ही चरण के रूप में देखा जाता था। एक बार बच्चे की समस्या का पता चल जाने के बाद, उस परिवार को अस्पताल जाने की सलाह दी जाती थी। इसके बाद की प्रक्रिया काफी हद तक परिवार पर निर्भर थी।
इस अनुभव के जरिये हमने सीखा कि रेफरल कोई एकल (single) क्रिया नहीं है। बल्कि, यह तो एक लंबी यात्रा की तरह है।
इसकी शुरुआत बच्चे की समस्या का पता लगने के साथ होती है।
यह परिवार को स्थिति समझाने के साथ जारी रहती है।
इसके अंतर्गत यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि माता-पिता उचित चिकित्सा सेवा प्राप्त कर पायें।
इसमें परिवारों को इलाज की प्रक्रिया को समझने में मदद करना भी शामिल है।
बच्चे की हालत में सुधार हो रहा है कि नहीं, इसे समझने के लिए नियमित जांच (follow-up) भी शामिल है।
यदि इनमें से कोई एक चरण भी छूट जाता है, तो पूरी प्रणाली बाधित हो जाती है।
पायलट परियोजना से आगे की सोच
हालाँकि, इस पायलट में केवल कुछ ही परिवार शामिल हुए, लेकिन इससे हमें कई महत्त्वपूर्ण सीखें मिलीं।
जब व्यवस्था बात को समझती और सुनती है, जब समुदाय भरोसा करता है और जब लोग धैर्यपूर्वक मिलकर काम करते हैं, तो सबसे दूर के इलाके में रहने वाला बच्चा भी जरूरी स्वास्थ्य सेवा प्राप्त कर सकता है।
इस प्रक्रिया ने हमें दिखाया कि बच्चों में स्वास्थ्य सुधार का अर्थ केवल वज़न मापना या उन्हें पोषक भोजन देना नहीं है। यह विश्वासपूर्ण संबंध बनाने, बाधाओं को कम करने और यह सुनिश्चित करने के बारे में है कि सारी व्यवस्थाएं एक साथ मिलकर काम करें।
क्रेच इस प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वहाँ नियमित रूप से बच्चों की देखरेख होती है। वहाँ विकास की शुरुआती निगरानी की जा सकती है और किसी समस्या के गंभीर होने से पहले ही परिवारों का उचित मार्गदर्शन किया जा सकता है।
जब सामुदायिक मंच प्रभावी रूप से स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ते हैं, तो समय रहते हस्तक्षेप की संभावनाएँ काफी हद तक बढ़ जाती हैं।
जब मैं अपने इस अनुभव के बारे में पीछे मुड़कर सोचता हूँ, तो मुझे इसकी योजना बैठकें या रेफरल सूचियाँ याद नहीं आतीं। बल्कि, मुझे वे पल याद आते हैं :
- जब एक सुपरवाइजर धैर्यपूर्वक एक चिंतित माँ को विकास (ग्रोथ) चार्ट समझा रहा है।
- जब एक आशा कार्यकर्ता झिझकते माता-पिता को आश्वस्त कर रही है।
- जब एक डॉक्टर सावधानीपूर्वक एक बच्चे की जाँच कर रहा है।
ये पल मुझे याद दिलाते हैं कि विकास कार्य केवल कार्यक्रमों के बारे में नहीं है। बल्कि, यह लोगों के बारे में है।
हर बच्चा स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट होने का अवसर पाने का हकदार है। हर माता-पिता को अपने बच्चे के भविष्य की रक्षा के लिए जरूरी सहायता मिलनी चाहिए।
कभी-कभी बदलाव बहुत बड़े या जटिल नहीं होते हैं। बल्कि, वे उन छोटे-छोटे कामों से संभव होते हैं, जो निरंतरता और सावधानी के साथ किए जाते हैं।
जब व्यवस्था बात को समझती और सुनती हैं, जब समुदाय भरोसा करता है और जब लोग धैर्यपूर्वक मिलकर काम करते हैं, तो सबसे दूर के इलाके में रहने वाला बच्चा भी जरूरी स्वास्थ्य सेवा प्राप्त कर सकता है।
और शायद यही सबसे महत्त्वपूर्ण सबक है, जो यह यात्रा हमें सिखाती है।
