मेरा नाम आलोक है। मैं पिछले एक साल से स्वास्थ्य स्वराज संस्थान में काम कर रहा हूँ। यह एक गैर-लाभकारी संगठन है। यह संगठन दक्षिण-पश्चिमी ओडिशा के घने जंगलों के भीतर की दूर-दराज़ की बस्तियों और गाँवों में रहने वाले कुटिया कोंध नाम के आदिवासी समुदाय में बीच काम करता है। हम उनके हालातों में सुधार लाने के लिए पूरी शिद्दत के साथ लगे हुए हैं।
इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मलेरिया, टीबी, कुपोषण, सिकल सेल रोग और एनीमिया जैसी बीमारियाँ फैली हुई हैं। स्वास्थ्य स्वराज संस्थान ज़मीनी स्तर पर अभियान चलाकर इन बीमारियों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। ये अभियान बीमारी को ठीक करने के लिए देखभाल, जल्द बीमारी ठीक करने, तुरंत इलाज शुरु करने और सही समय पर मरीज़ को इलाज के लिए किसी बड़े अस्पताल भेजने से संबंधित हैं।
रबी और खरीफ की फ़सलों के बीच के मौसम में खाने-पीने की मात्रा और खाने की विविधता में कमी हो जाती है। इस वजह से इस दौरान ज़्यादातर घरों में सिर्फ़ एक बार ही खाना बनता।
हमारी सबसे बड़ी चुनौती हद से ज़्यादा कुपोषण दर है। कुपोषण अपने आप में बीमारी की वजह भी है और बीमारी का नतीजा भी है। मलेरिया, गैस्ट्रोएन्टेराइटिस और निमोनिया जैसी बार-बार होने वाली बीमारियाँ इन हालातों को और बिगाड़ देती हैं। ख़ासकर, छोटे बच्चों के मामले में यह हालात और गंभीर हो जाते हैं। ओडिशा के विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के बीच किए गए अध्ययन से पता चलता है कि पाँच साल से कम उम्र के लगभग 75% बच्चे कम वज़न के शिकार हैं और लगभग 55% बच्चों का विकास रुका हुआ (स्टंटेड) है। इसमें लड़कियों में इसकी दर और भी अधिक पाई जाती है। आदिवासी समुदायों के लगभग 38-44% वयस्कों का भी कम वज़न है। इससे पता चलता है कि पोषण की कमी सभी आयु वर्ग के लोगों में बराबर रूप ही दिखाई देती है।
इसके कई कारण हैं और ये संरचना की वजह से आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यहाँ सभी मौसमों में खाने-पीने की वस्तुओं में विविधता की कमी साफ़ दिखाई देती है। यहाँ के ज़्यादातर घरों में चावल के साथ बहुत थोड़ी मात्रा में कुछ ख़ास किस्म की दालें और सब्ज़ियाँ (आमतौर पर मिर्च, प्याज़, बैंगन और फूलगोभी) खाई जाती हैं। साग जैसी हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ हफ़्ते में एक बार से भी कम खाई जाती हैं। इसके साथ ही यहाँ खाना पकाने के लिए तेल का इस्तेमाल भी न के बराबर होता है।
रबी और खरीफ की फ़सलों के बीच के मौसम में खाने-पीने की मात्रा और खाने की विविधता में कमी हो जाती है। इस दौरान ज़्यादातर घरों में लोग दिन में सिर्फ़ एक बार का ही खाना खा पाते हैं। इसका वजह काफ़ी हद तक रोज़गार के अवसरों की कमी या अपने गांव-घर छोड़कर दूसरी जगह जाकर रहने से जुड़ी कठिनाइयाँ, वन उत्पादों की दिन-ब-दिन होती जा रही कमी और आर्थिक तंगी है।
इन तमाम वजहों से मां को ज़रूरी पोषण नहीं मिल पाता है और जन्म के समय शिशु का वज़न बहुत कम होता है। इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुपोषण की समस्या बनी रहती है।
यहाँ प्रोटीन की कमी की समस्या बहुत आम है। इसकी प्रमुख वजह दालों और फलियों की विविधता में कमी हो सकती है। हालाँकि, कई किस्मों की दालें (जैसे कंदुला, कोलथा और उड़द) पहाड़ी ढलानों पर उगाई जाती हैं, लेकिन, ये आदिवासी परिवार इन्हें ख़ुद खाने के बजाय, बेच देते हैं। मांस सिर्फ़ त्योहारों और शादियों जैसे ख़ास मौकों पर खाया जाता है। कभी-कभी तो साल में सिर्फ़ एक या दो बार ही मांस खाया जाता है, जब गाँव वाले साथ मिलकर मटन या सूअर का मांस खाते हैं। मुर्गी और अंडे महीने में एक या दो बार खाया जाता है। सूखी मछली भी कुछ ख़ास मौकों पर ही खाई जाती है।

लगभग सभी उम्र की औरतों में बड़े पैमाने पर कुपोषण देखा जा सकता है। इसे कई तरह के कारकों से समझा जा सकता है। इन कारकों में पारिवारिक दबाव (छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने के लिए मजबूर होना, खेतों में काम करने के लिए मजबूर होना) काफ़ी बड़ा कारण है। इस पारिवारिक दबाव की वजह से लड़कियाँ कम ही स्कूल जाती हैं। दूसरे कारक के रूप में लड़कियों पर कम ध्यान दिया जाना और कई तरह की सामाजिक प्रथाओं को बताया जा सकता है। सामाजिक प्रथाओं में लड़कों और पुरुषों को खिलाने के बाद महिलाओं का खाना आदि शामिल हैं। इस वजह से मांओं में कुपोषण बढ़ता है, जिससे कम वज़न का बच्चा पैदा होता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुपोषण की समस्या बनी रहती है।
यहाँ कैल्शियम की कमी भी बड़े पैमाने पर पाई जाती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुटिया-कोंध समुदाय के लोगों की संस्कृति में दूध पीना मना है। इस वजह से बहुत कम घरों में दूध से बनी हुई चीज़ें खायी जाती हैं। रागी (मडुआ) में बड़े पैमाने पर कैल्शियम होता है। लेकिन वक्त के साथ मडुआ मिलना कम होता जा रहा है, क्योंकि यहाँ की खेती में एक ही फसल ली जाती है और चावल की फ़सल लेना ज़्यादा ज़रूरत होता है।
अब यहाँ तक ज़्यादा उपज वाली चावल की किस्में और खेती-किसानी के आधुनिक तरीके पहुँच चुके हैं। इससे यहाँ के पारंपरिक बीजों और फसल की पैदावार में मौजूद विविधता को बहुत नुकसान हुआ है।
सरकारी चावल वितरण योजना की वजह से कैलोरी के हालातों में कुछ सुधार ज़रूर हुआ है। इसके बावजूद, महिलाओं और बच्चों में अभी भी कैलोरी की कमी बनी हुई है। इसके अलावा, चूँकि चावल मुख्य रूप से आजीविका के लिए उगाया जाता है, इसलिए ये आदिवासी परिवार अक्सर अपनी सबसे अच्छी उपज बेच देते हैं। इस वजह से उनके पास कम गुणवत्ता वाले अनाज बचते हैं, जो कुपोषण का कारण बनते हैं।
सार्वजनिक वितरण सिस्टम पर बढ़ती निर्भरता और सरकार द्वारा धान की उच्च ख़रीद दर की नीति की वजह से चावल ज़्यादा खाया जा रहा है। बाजरा के सेवन में कमी आई है। इससे मधुमेह जैसे असंक्रामक रोग बढ़ सकते हैं।
अनौपचारिक ऋण नेटवर्क (जो कि अक्सर शोषण करते हैं) की मौजूदगी, ज़्यादातर लोगों के पास ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों का होना, ऐसी खेती पर सिंचाई की व्यवस्था नहीं होती है। इस तरह की दिक्कतें मिलकर खाद्य असुरक्षा से जुड़ी समस्याओं को और बढ़ा देती हैं।
चावल की कई किस्में लगातार विलुप्त होती जा रही हैं। इन पारंपरिक किस्मों को बचाना बेहद ज़रूरी है। आदिवासी कई देसी किस्मों की खेती करते हैं। इनमें से ज़्यादातर पारंपरिक देसी किस्मों की फसलों में रोगों, कीटों और अजैविक बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता वाले जीन पाए जाते हैं। इन फसलों में पोषक तत्त्व और स्वाद से भरपूर जीन भी मौजूद होते हैं। ज़्यादा उपज वाले चावल की किस्मों और आधुनिक कृषि पद्धतियों के आने से स्थानीय परंपरागत बीजों और फसल की पैदावार में मौजूद विविधता को बहुत नुकसान पहुँचा है। यहाँ ज्यादातर एक ही फसल उपजाई जाती हैं। इससे पारंपरिक किस्म की फसलें धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही हैं। इन सभी की वजह से फसल ख़राब या बर्बाद होने की संभावना और बढ़ गयी है।

हम उन्हें उनकी ज़रूरत के मुताबिक हल के बारे में जानने में मदद करते हैं, जिससे वे अपने परिवारों के पोषण के स्तर को बेहतर-से-बेहतर बनाने के लिए लागू कर सकते हैं।
एक और ज़रूरी बात यह है कि जंगल आजीविका सुरक्षा का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यह जंगल भोजन, चारा, ईंधन, घर बनाने की सामग्री, औषधीय पौधे और हर्बल उत्पाद देते हैं। यहाँ महुआ के पेड़ भी हैं। महुआ के फलों से खाना पकाने का तेल निकाला जाता है और जिनके फूलों से शराब बनाई जाती है। तेज़ी से औद्योगीकरण और लकड़ी की बढ़ती मांग की वजह से इन जंगलों की बड़े पैमाने पर अवैध कटाई की जा रहा है। इससे जैव-विविधता को नुकसान पहुँचा है और जंगल से निकलने वाली चीज़ों पर निर्भर आदिवासी समाज की अर्थव्यवस्था पर इसका बेहद बुरी असर हुआ है।
हमारी कोशिशों की वजह से समुदाय के पोषण के स्तर में काफ़ी सुधार आया है। इन कोशिशों में से एक ग्रामीण शिशु घर (क्रेच) कार्यक्रम है। क्रेच कार्यक्रम के तहत लगभग 60 गाँवों में शिशु घर बेहतरीन ढंग से काम कर रहे हैं। इन शिशु घरों में हम 7 महीने से लेकर 3 साल तक की उम्र के एक हज़ार से ज़्यादा बच्चों की देखभाल कर रहे हैं। यह शिशु घर सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक खुले रहते हैं। इन शिशु घरों की वजह से माताएँ जंगल और अपने पहाड़ी खेतों में बिना चिंता के अपना काम कर सकती हैं। इन शिशु घरों को समुदाय के साथ मिलकर चलाया जाता है। इनमें आने वाले बच्चों को पौष्टिक भोजन दिया जाता है, साफ़ सुथरे ढंग से उनकी देखभाल की जाती है, बच्चों के लिए ज़रूरी आराम और खेल-कूद के ज़रिए बौद्धिक विकास को बढ़ावा दिया जाता है। इससे शिशुओं के शारीरिक और बौद्धिक विकास के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक विकास को भी बढ़ावा मिलता है। इसके अलावा, उनके शारीरिक वृद्धि की नियमित निगरानी रखी जाती है। गंभीर और कम गंभीर कुपोषित बच्चों पर ख़ासतौर पर ध्यान दिया जाता है। इन बच्चों की देखभाल करने वाले लोगों को प्राथमिक चिकित्सा करने और ज़रूरत पड़ने पर बीमार बच्चों को नज़दीकी क्लिनिक में रेफ़र करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।

पोषण को बेहतर बनाने की हमारी कोशिशों के तहत 5 साल से कम उम्र के बच्चों और गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है। हम बहुत ज़्यादा कुपोषित बच्चों (SAM) और कुपोषित माताओं (MAM) के लिए विशेष मासिक पोषण क्लिनिक चलाकर, देखभाल करते हैं। हमारे ग्राम-स्तरीय वॉलेन्टीयर कुपोषण से प्रभावित बच्चों की पहचान करते हैं और उन्हें हमारे क्लिनिकों में रेफ़र करते हैं। इन क्लिनिकों में हम माता-पिता को पोषण के महत्व के बारे में जानकारी देते हैं। हम उन्हें बेहतरीन उपायों के बारे में बताते हैं, जिन्हें वे अपने परिवारों के पोषण स्तर को सुधारने के लिए अपना सकते हैं। बीमार बच्चों की मलेरिया और निमोनिया जैसी बीमारियों की जांच की जाती है। ऐसे बच्चों की शुरुआती और स्वस्थ बने रहने तथा बीमारी के वापस न लौटने के नज़रिए देखभाल की जाती है। इसके अलावा, हम गाँवों में प्रसव से पहले और प्रसव के बाद की ज़रूरी देखभाल भी उपलब्ध कराते हैं। हम एनीमिया और कुपोषण के मामलों की जांच करते हैं और ज़रूरत के मुताबिक उचित आहार भी उपलब्ध कराते हैं।
हम मानते हैं कि सदियों से जंगलों में रहने वाले लोगों को भूमि अधिकार दिए जाने चाहिए, ताकि वन संसाधनों को बचाया और बनाए रखा जा सके। इससे वे जंगलों की रक्षा व मैनेजमेंट करना सिखाया और इस तरह उन्हें सशक्त बनाया जाना चाहिए।
हम अपने स्वास्थ्य और पोषण संवर्धन विद्यालय कार्यक्रम (HNPS) के ज़रिए 15 सरकारी स्कूलों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। हम दोपहर का भोजन भी सुनिश्चित करते हैं। उनमें नियमित रूप से हाथ धोने जैसी स्वच्छता संबंधी आदतों को बढ़ावा देते हैं और विद्यार्थियों में पोषण से जुड़ी जागरूकता फैलाने की कोशिश करते हैं। हमने इन सरकारी स्कूलों में किचन गार्डन बनाकर भोजन में बढ़ाने की भी कोशिश की है। हम प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं, जो स्थानीय मौसमी सब्ज़ियों की खेती को बढ़ावा देते हैं।

इनमें से कुछ कोशिशों का समुदाय पर काफ़ी अच्छा असर देखा जा सकता है, लेकिन अभी भी बड़े पैमाने पर संरचनात्मक बदलाव की ज़रूरत बनी हुई है। इस बारे में और भी कुछ उपाय को लागू किया जाना चाहिए। इनमें पारंपरिक रूप से उगाए जाने वाले बाजरा, दाल, फलियों और देसी किस्म की फसलों को बढ़ावा देने के लिए और भी कोशिशें की जा सकती हैं। इससे तहत पोषक तत्त्व की विविधता को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। इसके लिए सामुदायिक बीज बैंक स्थापित करके पारंपरिक कृषि को बढ़ावा देना ज़रूरी है।
सरकार को चाहिए कि वह ग्रामीण रोज़गार को बढ़ावा और (पोषण संबंधी कमियों को ध्यान में रखते हुए) खाद्य सब्सिडी मुहैया कराए। साथ ही सरकार काम की तलाश में दूर तक जाने वाले मजदूरों को उनके अपने गाँवों में रोज़गार या कमाई के कुछ संसाधन उपलब्ध कराए। मौसम की मार झेलते इन आदिवासी समुदायों की बुरे वक्त में मदद करने की ज़िम्मेदारी भी सरकार उठाए।
पारंपरिक या कई पीढ़ियों से वनों में रहने वालों को भूमि अधिकार देकर और उन्हें वन संसाधनों की रक्षा एवं प्रबंधन से लैस करके सशक्त बनाया जाना चाहिए। सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देना और उसके बाद सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समितियाँ बनाना, वन मैनेजमेंट को बेहतर बनाने की दिशा में एक अच्छी कोशिश हो सकती है। इससे वनों की हालातों और स्थानीय लोगों की खाद्य सुरक्षा एवं आजीविका में सुधार होगा।
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आख़िर में, इस क्षेत्र के सभी गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की मलेरिया जैसी बीमारियों की नियमित जांच की जानी चाहिए। इस क्षेत्र की प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा वितरण सिस्टम को मज़बूत करने के साथ-साथ पोषण व्यवस्था को फिर स्थापित करने के लिए मज़बूत रेफ़रल लिंक बनाया जाना चाहिए। इससे स्वास्थ्य से जुड़े बेहतर नतीजों की उम्मीद की जा सकती है।
अगर हम कुटिया-कोंध समुदाय के पोषण स्तर में सुधार करने की कोशिशें करते हैं, तो हम इस प्रक्रिया के दौरान कई और चीज़ें भी हासिल कर सकते हैं। जिससे बच्चों और माताओं का स्वास्थ्य से जुड़े बेहतर नतीजे निकल सकते हैं, आजीविका सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा सकता है, जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीलापन और पारिस्थितिक संसाधनों का बेहतर मैनेजमेंट शामिल है।
