किसी भी बच्चे का टीकाकरण न छूटे : बेल्लंदुर की एक कहानी

ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी कच्ची बस्तियों में सभी बच्चों का टीकाकरण कराना आश्चर्यजनक रूप से अधिक कठिन है। लेख में इस कठिनाई के पीछे के कारणों की जाँच की गई है। साथ ही, ये समझने का प्रयास किया गया है कि एक सफल एवं व्यवस्थित सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम द्वारा इन बाधाओं को कैसे दूर किया जा सकता है।

किसी भी बच्चे का टीकाकरण न छूटे : बेल्लंदुर की एक कहानी

टीकाकरण महज एक स्वास्थ्य सेवा नहीं– बल्कि, हर बच्चे से किया गया हमारा एक वादा है। भारत ने पिछली सदी के उत्तरार्ध में सन् 1985 में यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम (सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम) की शुरुआत करके इस वादे को निभाया। जो अब विश्व स्तर पर सबसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलकदमियों में से एक माना जाता है। हमारे देश ने इस कार्यक्रम के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति की है। जिसके तहत स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार सन् 2026 में पूर्ण टीकाकरण अभियान 98.4% तक सफल रहा।

इस कार्यक्रम के तहत पोलियो, मातृ एवं नवजात टेटनस, और यॉव्स (yaws) रोग को सफलतापूर्वक समाप्त किया गया। साथ ही, हर साल 2.9 करोड़ गर्भवती महिलाओं और 2.54 करोड़ शिशुओं को 12 प्रकार के रोकथाम योग्य रोगों से बचाया है।

एक शहर जो लगातार बढ़ता और बदलता रहता है, वहाँ स्वास्थ्य प्रणालियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जब बच्चे पलायन करते हैं, तो उनका रिकार्ड कैसे रखा जाए। ताकि, यह सुनिश्चित किया जा सके कि उन्हें समय पर ज़रूरी टीके लगते रहें। बार-बार एक स्थान से दूसरे स्थान आना-जाना, बस्तियों का बदलना और आवश्यक दस्तावेज़ों की कमी अक्सर उन्हें नियमित रूप से मिलने वाली स्वास्थ्य सेवा के रास्ते में रूकावट पैदा करती है। जिसके कारण शहरी अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले कई बच्चे नियमित ट्रैकिंग प्रणाली से बाहर हो जाते हैं, जिससे टीकाकरण छूटने या टीकाकरण में देरी का खतरा बढ़ जाता है।

इन बस्तियों में रहने वाले परिवार मुख्य रूप से युवा होते हैं, जिनमें कई के नवजात बच्चे भी होते हैं और वे अपनी गुजर-बसर के लिए लगातार एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते हैं। इस पलायन और गीजर बसर के चक्कर में, बच्चों का टीकाकरण अनजाने में छूट जाता है।

बैंगलोर के बेल्लंदुर में रहने वाले समुदायों के साथ हमारे (आज़िम प्रेमजी फाउंडेशन) कामकाज की यात्रा सन् 2022 में, COVID-19 महामारी के दौरान शुरू हुई। यह एक ऐसा दौर था जब स्वास्थ्य सेवा को देखने का नजारिया बदला और उसे पहले के किसी भी दौर की अपेक्षा ज्यादा ज़रूरी सेवा माना गया। हमने बैंगलोर के शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत की। ताकि, शहरों की कमजोर बस्तियों में उभरती तात्कालिक ज़रूरतों को पूरा किया जा सके। यह कार्यक्रम बेल्लंदुर क्षेत्र में गुब्बाची संगठन के साथ साझेदारी में चलाया गया। गुब्बाची एक संगठन है, जो सामुदायिक कार्यों, विशेषकर शिक्षा और सामाजिक अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में लंबे समय से अपना योगदान दे रहा है।

बैंगलोर के बेल्लंदुर में रहने वाले समुदायों के साथ हमारे (आज़िम प्रेमजी फाउंडेशन) कामकाज की यात्रा सन् 2022 में, COVID-19 महामारी के दौरान शुरू हुई। यह एक ऐसा दौर था जब स्वास्थ्य सेवा को देखने का नजारिया बदला और उसे पहले के किसी भी दौर की अपेक्षा ज्यादा ज़रूरी सेवा माना गया। हमने बैंगलोर के शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत की। ताकि, शहरों की कमजोर बस्तियों में उभरती तात्कालिक ज़रूरतों को पूरा किया जा सके। यह कार्यक्रम बेल्लंदुर क्षेत्र में गुब्बाची संगठन के साथ साझेदारी में चलाया गया। गुब्बाची एक संगठन है, जो सामुदायिक कार्यों, विशेषकर शिक्षा और सामाजिक अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में लंबे समय से अपना योगदान दे रहा है।

हाशिए पर जीवन 

विभिन्न परिवारों द्वारा बार-बार स्थान बदलने और बस्तियों के तेज़ी से बदलते स्वरूप के कारण, स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के सामने अक्सर लाभार्थियों की सही सूची को लगातार अपडेट करते रहने की चुनौती बनी रहती है।

बेल्लंदुर की बस्तियों में हज़ारों प्रवासी परिवार रहते हैं, जो कि मुख्यतः देश के पूर्वी भागों से आकर यहाँ बसे हैं। इसमें से अधिकांश लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। वे ऐसी घनी आबादी वाली बस्तियों में रहते हैं जिनकी सरकारी आंकड़ों में कोई गिनती नहीं है। उनके घर अक्सर टीन से बनी छोटी झुग्गियां होती हैं, जहाँ बुनियादी सुविधाएँ भी मुश्किल से ही पहुँच पाती है। यहाँ जो परिवार रहते हैं, उनमें अधिकतर युवा हैं और उनमें कई के नवजात शिशु हैं और गुजर-बसर के लिए वे लगातार एक जगह से दूसरी जगह पलायन करते रहते हैं। पलायन और जीवनयापन के इस चक्र में फंसकर एक आवश्यक चीज़ अक्सर अनजाने नज़रअंदाज़ रह जाती ती है : वह है उनके बच्चों का टीकाकरण।

यह बार-बार होने वाला पलायन नियमित टीकाकरण के रस्ते में सबसे बड़ी बाधा है। कई परिवार अपने मूल स्थानों से या तो अधूरे रिकॉर्ड लाते हैं या उनके पास वर्तमान स्थान पर टीकाकरण जारी रखने के लिए कोई दस्तावेज़ नहीं होता। परिवारों के बार-बार स्थान बदलने और बस्तियों के तेज़ी से बदलते स्वरूप के कारण, स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के सामने अक्सर यह चुनौती बनी रहती है कि वे लाभार्थियों की सही सूची को लगातार आपडेट करते रहें। इन प्रयासों के बावजूद, प्रवासी समुदायों के कई बच्चों का नाम सूची में दर्ज नहीं हो पाता है। जिस कारण उनका टीकाकरण भी देर से होता है।

किसी (प्रवासी) समुदाय के लिए ये चुनौतियाँ और बढ़ जाती हैं, जब टीकाकरण के बारे में उनकी समझ सीमित होती है, वे अपरिचित भाषा माहौल में रहते हैं और स्थानीय स्वास्थ्य प्रणाली के बारे में उनकी जानकारी भी सीमित होती है। यहाँ तक कि अगर माता-पिता अपने बच्चों को टीका लगवाना भी चाहें, तो बहुतेरों को ये भी पता नहीं होता कि जाएँ कहाँ? या उपलब्ध सेवाओं तक पहुँचा कैसे जाए?

बबली दास, इस क्षेत्र में सामुदायिक स्वास्थ्य सहयोगी के रूप में काम करती हैं। उन्होंने हमें बताया, “जब मैं पहली बार COVID-19 महामारी के दौरान बेल्लंदुर की बस्तियों में गई, तो मुझे एक बेहद ज़रूरी बात समझ में आई- टीकाकरण कार्यक्रम मौजूद तो है, लेकिन यह हर बच्चे तक पहुँच नहीं पाता है।”

हमारी यात्रा: समस्या-समाधान से निरंतरता की ओर 

यहाँ एक बात तो बिलकुल स्पष्ट थी कि इन परिवारों तक लगातार अपनी पहुँच बनाए रखने के लिए सार्वजनिक प्रणाली को सहायता की जरूरत थी। हमारी समझ और समुदायों के बीच निरन्तर उपस्थिति से इस खाई को पाटा का सकता था।

समुदाय की बीच विश्वास जमाना इस प्रयास का मुख्य आधार था। परिवारों को आश्वस्त किया गया कि टीके में मुफ्त लगेंगे और ये सेवाएँ उनके लिए उपलब्ध हैं। लगातार फॉलो-अप के ज़रिए स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में निरंतरता बनाए रखी गई। यहाँ तक कि जब परिवार किसी दूसरे स्थान पर चले जाते तब भी उनको स्वास्थ्य सेवाएँ प्रददन की जाती रहीं।

A healthcare setting where women are participating in a medical or vaccination process. One woman is sitting at a table with medical supplies, while another woman is standing and filling out paperwork. Behind them, there is a wall with writing in a local language.

इस समझ के साथ, हमने व्यापक स्तर पर हस्तक्षेप करते हुए सहायता प्रदान की ताकि, यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी बच्चा इस टीकाकरण प्रणाली से छूट न जाए। समुदाय और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के साथ मिलकर काम करते हुए, हमने गर्भवती महिला और बच्चे की पहचान करने के लिए प्रत्येक घर की मैपिंग शुरू की। इस मैपिंग द्वारा हमने सरकारी रिकॉर्ड से छूट गये परिवारों की सामुदाय स्तर की सूचियाँ तैयार कीं और इस डेटा को नियमित रूप से एएनएम (सहायक नर्स दाई) और पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) के साथ साझा किया, ताकि सभी बच्चों को टीकाकरण के माइक्रो-प्लान में शामिल किया जा सके। इस प्रकार, निरंतर निगरानी और फॉलो-अप से टीकाकरण से छूट गए बच्चों की सूची अपडेट करने और उनको बाकी बचे टीके लगवाना सुनिश्चित करने में मदद मिली।

समुदाय की बीच विश्वास जमाना इस प्रयास का मुख्य आधार था। परिवारों को आश्वस्त किया गया कि टीके में मुफ्त लगेंगे और ये सेवाएँ उनके लिए उपलब्ध हैं। टीकाकरण के दिन, हमारे फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ता – सामुदायिक स्वास्थ्य सहयोगी – टीकाकरण के लिए परिवारों को पुनः याद दिलाकर और मौके पर सुविधा प्रदान करके परिवारों की सहायता करते थे। जिससे समुदायों और सेवा प्रदाताओं के बीच दूरी को कम करने में मदद मिलती है। इस प्रकार, जब परिवार स्थान बदलते थे, तब भी लगातार फॉलो-अप के ज़रिए स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में निरंतरता बनाए रखी गई।

बदलाव की बयार कैसी लगती है

संयुक्त रूप से योजना बनाने, सामुदायिक जागरूकता, सूचीकरण, फॉलो-अप दौरे और टीकाकरण सत्रों के दौरान टीकाकरण स्थलों पर समन्वय के माध्यम से, यह सुनिश्चित किया गया कि आवश्यक टीके उन बच्चों तक पहुँचें, जिन्हें तेज़ी से बदलते इन शहरी क्षेत्रों में खोजना बेहद मुश्किल है।

समय के साथ, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के दलों, एएनएम और अन्य फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के साथ निरंतर समन्वय और संबंध विकसित करने के कारण विश्वास मज़बूत हुआ है, संवाद में सुधार हुआ है, और टीकाकरण गतिविधियों का अधिक नियमित रूप से आयोजन हो सका। परिणामस्वरूप, इन बस्तियों में आयोजित टीकाकरण सत्रों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है और अब प्रति माह इसके चार से अधिक सत्र आयोजित होते हैं। प्रत्येक सत्र अब लगभग 40-50 बच्चे भाग लेते हैं। इससे बड़ी संख्या में बच्चों – विशेष रूप से प्रवासी और वंचित परिवारों के लिए अपने समुदायों के करीब ही नियमित टीकाकरण सेवाओं का लाभ उठा पाना सुनिश्चित पाता है।

A healthcare worker administers a vaccination to a young child, while a caregiver holds the child. The setting appears to be a clinic or healthcare facility.

ये सुधार सामुदायिक स्तर के प्रयासों और स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के बीच के समन्वय को भी दर्शाते हैं, जिससे नियामित रूप से स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने और फॉलो-अप करने में सहायता मिलती है। इस सहयोगी दृष्टिकोण ने स्वास्थ्य सेवा को अंतिम छोर तक पहुँचाने में काफी मदद की है। इससे विशेष रूप से प्रवासी और वंचित बस्तियों में काफी मदद मिली है, जहाँ बच्चे अक्सर नियमित रूप से स्वास्थ्य सेवा नहीं प्राप्त कर पाते। संयुक्त रूप से योजना बनाने, सामुदायिक जागरूकता, सूचीकरण, फॉलो-अप दौरे और टीकाकरण सत्रों के दौरान टीकाकरण स्थलों पर समन्वय के माध्यम से, यह सुनिश्चित किया गया कि आवश्यक टीके उन बच्चों तक पहुँचें, जिन्हें तेज़ी से बदलते इन शहरी क्षेत्रों में खोजना बेहद मुश्किल है।

समुदाय अब पहले से ज्यादा एक दूसरे से जुड़ाव महसूस करते हैं और अब वे टीकाकरण प्रक्रिया से भी परिचित हैं। एएनएम और सीएचए (सामुदायिक स्वास्थ्य सहयोगी) पात्र बच्चों की पहचान करने, परिवारों को लामबंद करने और नए आए परिवारों को इस प्रणाली में शामिल करने के लिए मिलकर काम करते हैं। बेल्लंदुर के आंगनवाड़ी केंद्र में अब नियमित रूप से टीकाकरण के लिए शिविर लगते हैं, जहाँ बच्चे हर महीने टीके लगवाने आते हैं। उनकी मौजूदा स्थिति थायी कार्ड (कर्नाटक में मातृ एवं शिशु संरक्षण कार्ड के रूप में जाना जाता है) और हमारे रिकॉर्ड में नियमित रूप से दर्ज की जाती है, जिससे आगे की खुराक के लिए समय पर फॉलो-अप करना संभव हो पाता है। इससे माता-पिता का टीकाकरण के प्रति रवैये में भी स्पष्ट बदलाव आया है। जैसा कि एक सामुदायिक स्वास्थ्य सहयोगी ने बताया, “जब हम घर-घर जाते हैं, तो माता-पिता राहत महसूस करते हैं। अब वे बिना किसी डर के टीकाकरण के लिए आते हैं।”