उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्थाओं से निपटने के लिए स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों की तैयारी

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में ममता हेल्थ इंस्टीट्यूट फॉर मदर एंड चाइल्ड द्वारा किया गया एक अध्ययन।

उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्थाओं से निपटने के लिए स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों की तैयारी

सारांश 

भारत में गर्भावस्था और प्रसव महिलाओं के स्वास्थ्य पर अब भी गहरा असर डालते हैं, खासकर सीमित संसाधनों वाली स्थितियों में। हालाँकि मातृ स्वास्थ्य संकेतकों में समय के साथ सुधार हुआ है, फिर भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रसंग में मातृ मृत्यु दर एक गंभीर चिंता का विषय है। राज्यों के बीच भी इसमें काफ़ी असमानताएँ हैं। उदाहरण के लिए केरल में प्रति 1,00,000 जिन्दा पैदाइश पर मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) 19 है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह अनुपात 167 है, जो देश में सबसे अधिक है। उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्था (HRP) के मामले कुल गर्भावस्थाओं की तुलना में अनुमानतः 20–30% होते हैं, लेकिन प्रसव-पूर्व बीमारियों और मृत्यु के लगभग 75% मामलों के लिए यही ज़िम्मेदार होते हैं। इसलिए ऐसी गर्भावस्था को समय से पहचानना और प्रसव से पहले गुणवत्तायुक्त देखभाल के जरिये नियमित देखरेख (फॉलो-अप) बहुत जरूरी है।

प्रसव-पूर्व देखभाल को बेहतर बनाने के लिए भारत सरकार ने आयुष्मान आरोग्य मंदिर तथा प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA) जैसी योजनाएँ शुरू की हैं। ये योजनाएं गर्भवती महिलाओं को विशिष्ट देखभाल प्रदान करती हैं। हालांकि सामुदायिक स्तर पर उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्था को पहचानने और उनकी नियमित देखरेख करने के लिए स्वास्थ्य एवं कल्याण केन्द्रों की तैयारी से सम्बंधित साक्ष्य बहुत कम हैं। 

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में ममता हेल्थ इंस्टिट्यूट फॉर मदर एंड चाइल्ड ने अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सहयोग से इस विषय पर एक अध्ययन किया। उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्थाओं को पहचानने और उनकी नियमित देखरेख में मौजूद कमियों का आकलन करना तथा मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए व्यावहारिक सुझाव देना इस अध्ययन का उद्देश्य था। 

अध्ययन के उद्देश्य  

इस अध्ययन का लक्ष्य था:

  • PMSMA के अंतर्गत उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्था को पहचानने और उनकी नियमित देखभाल करने के प्रसंग में स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों की तैयारियों का आकलन करना 
  • जमीनी स्तर (फ्रन्ट लाइन) के स्वास्थ्य कर्मियों की जानकारी, तौर-तरीकों और चुनौतियों की जाँच करना 
  • गर्भवती महिलाओं की जागरूकता, जोखिम का बोध और देखभाल को लेकर उनकी प्रवृत्ति को समझना।  
  • ज़िला स्तर पर मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए व्यावहारिक सुझाव देना।  
A woman in a gray saree stands in a grassy area, with a partially blurred pink building in the background. She has her head covered with the saree, looking towards the ground.

अधिकांश आशा कार्यकर्ताओं ने उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्था को मुख्यतः उम्र और उच्च-रक्तचाप से जोड़ा। जोखिम के दूसरे कारणों – वजन में कम बढ़ोत्तरी, पिछली गर्भावस्था की समस्याएं या लंबे प्रसव – के बारे में उनकी जानकारी बहुत सीमित थी। 

कार्यपपद्धति 

यह एक समुदाय-आधारित क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन था, जो जनवरी से दिसंबर 2024 के बीच उत्तर प्रदेश में गोंडा ज़िले के नवाबगंज और वज़ीरगंज विकासखंडों में किया गया। अध्ययन में एक मिश्रित विधि अपनाई गई।

मात्रात्मक घटक: 

  • सभी तिमाहियों की कुल 402 गर्भवती महिलाएँ
  • 114 आशा कार्यकर्ता और 36 दाइयां (ANMs)
  • 37 स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों, 23 ग्राम स्वास्थ्य एवं पोषण दिवस (VHND) सत्रों और PMSMA सत्रों का निरीक्षण

गुणात्मक घटक: 

  • 12 सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (CHO), 2 चिकित्सा अधिकारियों और 3 ज़िला-स्तरीय अधिकारियों के साथ गहन साक्षात्कार 

आँकड़े राष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुसार तैयार की गई प्रश्नावली, निरीक्षण चेकलिस्ट और साक्षात्कार निर्देशिकाओं का इस्तेमाल करते हुए इकट्ठे किये गए। 

प्रमुख निष्कर्ष 

1. जमीनी स्तर के स्वास्थ्य कर्मियों में जानकारी की कमी 
प्रसव-पूर्व देखभाल में जमीनी स्तर के स्वास्थ्यकर्मी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्था के बारे में उनकी समझ में कई बड़ी कमियाँ देखी गईं। 

अधिकांश आशा कार्यकर्ताओं ने उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्था को मुख्यतः उम्र और उच्च-रक्तचाप से जोड़ा। जोखिम के दूसरे कारणों – वजन में कम बढ़ोत्तरी, पिछली गर्भावस्था की समस्याएं या लंबे प्रसव – के बारे में उनकी जानकारी बहुत सीमित थी। केवल 0.8% आशा कार्यकर्ताओं ने गर्भावस्था के शुरुआती पंजीकरण को जोखिम की जल्दी पहचान से जोड़कर देखा। 

आशा कार्यकर्ताओं की तुलना में दाइयों में ज्यादा जागरूकता दिखी, लेकिन जोखिम के विभिन्न पहलुओं के बारे में उनकी समझ भी सीमित थी। किसी ने वजन की कम बढ़ोत्तरी या पिछली गर्भावस्था के लंबे प्रसव को उच्च-जोखिम के संकेतक के रूप में नहीं देखा। 

CHO अक्सर उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्था को एनीमिया या कुपोषण की समस्या की तरह देखते थे और उनमें समग्र जोखिम के आकलन को लेकर स्पष्टता की कमी थी। कई CHO ने बताया कि उन्हें PMSMA दिशानिर्देशों पर पूरा या नियमित प्रशिक्षण नहीं मिला। 

ये कमियाँ मुख्यतः अपर्याप्त प्रशिक्षण, पुनश्चर्या सत्रों की कमी और अपर्याप्त मार्गदर्शन का परिणाम थीं। 

अधूरे दस्तावेज़ीकरण और गायब MCTS नंबरों के कारण निगरानी और नियमित देखरेख कठिन हो गई। इसलिए विशेष देखरेख के लिहाज से जरूरतमंद महिलाओं को पहचानने में देरी हुई। 

2. मातृ देखभाल प्रोटोकॉल का अपर्याप्त उपयोग 
मातृ एवं शिशु सुरक्षा (MCP) कार्ड उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं को पहचानने और निगरानी करने का एक मुख्य साधन है हालांकि इसके उपयोग में असंगति थी। 

हालाँकि वजन और रक्तचाप आमतौर पर दर्ज किया जाता था, लेकिन कई जरूरी संकेतक – जैसे ऊँचाई, गर्भाशय (fundal) की ऊँचाई, भ्रूण की हलचल, पीलिया तथा HIV और सिफ़िलिस – अक्सर गायब थे। जोखिम की स्थिति केवल 0.5% MCP कार्डों पर ही दर्ज की गई थी। 

अधूरे दस्तावेज़ीकरण और गायब MCTS नंबरों के कारण निगरानी और नियमित देखरेख कठिन हो गई। इसलिए विशेष देखरेख के लिहाज से जरूरतमंद महिलाओं को पहचानने में देरी हुई। 

A woman wearing a turquoise saree holds a pink document with printed details, standing in an indoor setting with colorful fabrics and bags in the background.

3. VHND और स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों में प्रसव-पूर्व सेवाओं की कमी 
प्रसव से पहले सम्पूर्ण देखभाल प्रदान करना ग्राम स्वास्थ्य एवं पोषण दिवस (VHND) तथा स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों का उद्देश्य है। लेकिन जिन VHND सत्रों का निरीक्षण किया गया उनमें से केवल 17% में ही सभी आवश्यक सेवाएँ प्रदान की गईं।

पेट सम्बन्धी (abdominal) जाँच और परामर्श अक्सर छोड़ दिए जाते थे। इसके अलावा हीमोग्लोबिन जाँचने की स्ट्रिप्स और रक्तचाप नापने की मशीनों की बैटरी जैसी आवश्यक सामग्रियों की कमी ने सेवाओं को और मुश्किल बना दिया।

इन कमियों के कारण गर्भावस्था से जुड़े जोखिमों को सामुदायिक स्तर पर समय से पहचानने की सम्भावना और घट गई।

उच्च-जोखिम वाले पहचाने गए मामलों में भी विशेषज्ञ डॉक्टर के पास भेजने (रेफरल) और नियमित देखभाल मुहैया कराने की प्रणाली कमज़ोर थी। इसलिए विशिष्ट देखभाल के मौके नहीं मिले। 

4. गर्भवती महिलाओं में जागरूकता की कमी 
उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्थाओं के बारे में गर्भवती महिलाओं की जानकारी सीमित थी। 

केवल 57% महिलाएं इसे माँ और बच्चे के लिए जोखिम के रूप में देखती थीं। प्रसव-पूर्व सेवाओं के बारे में जागरूकता बहुत कम थी और सिर्फ 24% महिलाओं को पता था कि MCP कार्ड में खतरे के संकेत शामिल होते हैं। 

कम शिक्षा और कम पारिवारिक आय का सीधा संबंध कम जागरूकता से पाया गया। कई मामलों में महिलाओं की स्वायत्तता को सीमित करते हुए परिवार के सदस्य – खासकर पति और सास – यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि इलाज कब और कहाँ कराया जाए।  

5. PMSMA के प्रति कम जागरूकता और उपयोग 
PMSMA सेवाओं के प्रति जागरूकता और उनके उपयोग में कमी पाई गई। कई महिलाएँ PMSMA के लाभों से अनजान थीं और जमीनी स्तर के स्वास्थ्य कर्मियों ने बताया कि उन्हें इस कार्यक्रम का विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला। 

उच्च-जोखिम वाले पहचाने गए मामलों में भी विशेषज्ञ डॉक्टर के पास भेजने (रेफरल) और नियमित देखभाल मुहैया कराने की प्रणाली कमज़ोर थी। इसलिए विशिष्ट देखभाल के मौके नहीं मिले। 

A woman in a light blue sari joyfully embraces a small child wearing an orange shirt, both showing affection in a natural setting.

सिफ़ारिशें

अध्ययन में दो-स्तरीय (दोहरा) दृष्टिकोण अपनाने की सिफ़ारिश की गई है:

1. स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करना 

  • आशा, दाइयों और CHO के लिए नियमित, योग्यता-आधारित प्रशिक्षण और मार्गदर्शन प्रदान करना
  • प्रसवपूर्व सम्पूर्ण देखभाल सुनिश्चित करने के लिए VHND, स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र तथा सामुदायिक मंचों को बेहतर बनाना।
  • उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्थाओं के लिए दस्तावेज़ीकरण, MCTS ट्रैकिंग और नियमित देखभाल को बेहतर बनाना
  • आवश्यक उपकरणों और सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना

2. समुदायों को सशक्त बनाना 

  • परिवार में निर्णय लेने वालों और गर्भवती महिलाओं के लिए परामर्श की गुणवत्ता में सुधार करना
  • PMSMA और PMMVY जैसी सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता को बढ़ाना
  • लाभों को सुलभ बनाकर वित्तीय बाधाओं को घटाना

निष्कर्ष: उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्था को पहचानने और नियमित देखभाल करने के प्रसंग में गोंडा ज़िले के स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों का यह अध्ययन कुछ बड़ी कमियों को उजागर करता है। अच्छे प्रशिक्षण, मजबूत प्रणाली और बेहतर सामुदायिक जागरूकता के जरिये इन कमियों को दूर करना मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य परिणामों में उल्लेखनीय सुधार ला सकता है। ये नतीजे व्यवहारिक अंतर्दृष्टियां प्रदान करते हैं, जिन्हें दूसरे ज़िलों और राज्यों के लिहाज से रूपांतरित और विस्तारित किया जा सकता है।