द फर्स्ट 1000 डेज

इस शोध परियोजना का उद्देश्य किशोरियों और युवा महिलाओं में पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और साथ ही, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को बच्चे की जिंदगी के शुरुआती 1000 दिनों (यानी गर्भधारण से लेकर बच्चे के दो साल का होने) के दौरान पोषण के महत्व के प्रति जागरूक करना भी था।

द फर्स्ट 1000 डेज

पृष्ठभूमि

जीवन के शुरुआती 1000 दिनों में खराब पोषण का किसी बच्चे की सेहत और बेहतरी पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए कुपोषण मौत का कारण भी बन सकता है। बचपन के शुरुआती दिनों में पोषण की कमी से बच्चों की लंबाई बढ़ना रुक जाती है और वे कमजोर हो जाते हैं, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा असर पड़ता है। इसका मस्तिष्क के विकास पर स्थायी प्रभाव पड़ता है; बच्चे की सीखने और पढ़ाई-लिखाई की क्षमता कमजोर पड़ जाती है, शारीरिक कार्य करने की क्षमता घट जाती है और उसके विकास के लगभग सभी पहलुओं पर नकारात्मक असर पड़ता है। अध्ययनों से पता चलता है कि इसके कारण वयस्क होने पर आय में लगभग 20 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है, इस तरह गरीबी का दुष्चक्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता रहता है।

शोध से पता चलता हैं कि गर्भावस्था के दौरान माँ को सही पोषण न मिलने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं:

  • बच्चे गर्भकालीन उम्र की तुलना में छोटे (SGA) पैदा हो सकते हैं।

जीवन के पहले दो वर्षों में पोषण की कमी से:

  • बच्चों में बौनापन (Stunting), दुबलापन (wasting) और अंडरवेट (उम्र की तुलना में कम वजन) जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
  • बौद्धिक विकास प्रभावित होता है।
  • शारीरिक विकास बाधित होता है।
  • शैक्षणिक प्रदर्शन में कमी आती है।
  • जीवन भर काम करने और कमाने की क्षमता कम हो जाती है।
  • मातृ प्रजनन स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है जिससे नवजात शिशुओं की मृत्यु दर बढ़ जाती है (प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 17 बच्चों की मौत)।
  • वयस्क होने पर डायबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी लंबी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
  • जीवन प्रत्याशा (औसत आयु) कम हो सकती है।
  • गरीबी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती जाती है।

भारत आज भी बाल कुपोषण की गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 5 साल से कम उम्र के कई बच्चे बौनेपन, दुबलेपन या वजन की कमी के शिकार हैं। दूसरी ओर, शहरीकरण और वैश्वीकरण के कारण सस्ते पैकेटबंद खाद्य पदार्थों (अल्ट्रा प्रोसेस्ड फ़ूड UPF) की उपलब्धता और खपत कम आय वाली बस्तियों में भी बढ़ गई है। इनका अधिक सेवन करने से बच्चों में कुपोषण का दोहरा बोझ बढ़ रहा है। यानी एक ओर बच्चों को सही पोषण नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर वे अस्वास्थ्यकर प्रोसेस्ड फ़ूड भी अधिक खा रहे हैं। कुछ अध्ययनों से संकेत मिलता है कि ऐसे आहार पैटर्न के कारण कैंसर का जोखिम लगभग 15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।

प्रोजेक्ट का उद्देश्य और कार्यप्रणाली

‘द फर्स्ट 1000 डेज’ प्रोजेक्ट को पुकार (PUKAR) नाम की संस्था ने मुंबई के मंडाला (एम-ईस्ट वार्ड) की एक अनौपचारिक बस्ती में शुरू किया था। माँ और बच्चों में कुपोषण की समस्या को समझना और उसका समाधान करना इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य था। इस प्रोजेक्ट में समुदाय की भागीदारी पर आधारित शोध पद्धति (CBPAR) अपनाई गई, जिसमें स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें इस अभियान का सक्रिय हिस्सा बनाया गया।

इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य युवा महिलाओं में पोषण के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। साथ इसका उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को गर्भधारण से लेकर बच्चे के दो वर्ष की आयु तक के शुरुआती 1,000 दिनों के बारे में जागरूक बनाना भी था – ताकि बच्चों के जीवित रहने की संभावना बढ़े, उनका संज्ञानात्मक और शारीरिक विकास बेहतर हो तथा भविष्य में उनकी आय अर्जित करने की क्षमता में सुधार हो सके।

वैश्विक दक्षिण (Global South) में स्थित पार्टनर्स फॉर अर्बन नॉलेज, एक्शन एंड रिसर्च (PUKAR) एक स्वतंत्र शोध संस्था है। यह वैश्विक स्तर पर शहरों और समुदायों से जुड़े ज्ञान, नए विचारों और नवाचारों को विकसित करने वाला एक विश्वस्तरीय मंच है। PUKAR का मानना है कि भारत जैसे युवा, विविधतापूर्ण और बहुलतावादी देश में बड़ी आबादी आज भी बहुआयामी गरीबी का सामना कर रही है। ऐसे में ज्ञान के विभिन्न स्रोतों और दृष्टिकोणों को स्वीकार करना, प्रोत्साहित करना और उनका सम्मान करना शहरी विकास और सुशासन की प्रक्रिया और बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। यह संस्था समुदाय की भागीदारी पर आधारित शोध पद्धति (CBPAR) की अवधारणा पर आधारित है। यह दृष्टिकोण वंचित युवाओं को ज्ञान-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाता है, ताकि वे साक्ष्य आधारित पहल केमाध्यम से खुद में और अपने समुदायों में सकारात्मक बदलाव ला सकें।

मंडाला में एक दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान ‘पुकार’ ने देखा कि छोटे बच्चों में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों का सेवन लगातार बढ़ रहा है, जबकि कुपोषण के स्पष्ट संकेत भी मौजूद थे। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई।

यह प्रोजेक्ट मंडाला की झुग्गी बस्तियों (स्लम) में रहने वाले लोगों, विशेषकर प्रवासी परिवारों के बीच चलाया गया। इस समुदाय में स्वच्छ पानी और स्वच्छता सुविधाओं की कमी है, साक्षरता कम है, आर्थिक स्थिति कमजोर है। इसके साथ-साथ यहां जेंडर आधारित ऐसी सामाजिक मान्यताएं मौजूद हैं, जो महिलाओं के स्वतंत्र निर्णय को प्रभावित करती हैं ।

प्रारंभिक योजना के तहत अध्ययन में निम्न लोगों को शामिल किया गया :

  • 100 से अधिक गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएं, जो 24 महीनों तक भाग लेने के लिए इच्छुक थीं।
  • 0 से 24 महीने की आयु के 100 शिशु।
  • 2 से 6 वर्ष की आयु के 200 बच्चे।
  • 16 वर्ष से अधिक आयु की 100 युवतियां।

हालांकि, जैसे-जैसे अध्ययन आगे बढ़ा और इसकी जानकारी समुदाय में फैलने लगी, हमें और बच्चों को शामिल करना पड़ा, क्योंकि उन्हें मना करना नैतिक रूप से सही नहीं होता। आख़िरकार अध्ययन में शामिल बच्चों की संख्या 507 तक पहुंच गई, जो हमारी प्रारंभिक योजना से कहीं ज्यादा थी।

समुदाय की तीन युवा महिलाओं को जमीनी शोधकर्ता (Barefoot Researchers) के रूप में प्रशिक्षित किया गया। उन्हें परियोजना के सभी प्रमुख पहलुओं का प्रशिक्षण दिया गया।

समुदाय का एक सर्वेक्षण करके उपयुक्त भागीदारों की पहचान की गई, जो मंडाला के रहने वाले थे और उनकी पूरी सहमति के बाद उन्हें अध्ययन में शामिल किया गया। अध्ययन की शुरुआत और अंत में माताओं का सर्वेक्षण किया गया।

अध्ययन में गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों की माताओं, बच्चों और किशोर लड़कियों को शामिल किया गया। बच्चों को 10–15 बच्चों वाले कुल 24 समूहों में बांटा गया। माताएं हर दो महीने में अपने पंजीकृत बच्चों की माप और जांच के लिए केंद्र लेकर आती थीं। इस दौरान वे शैक्षणिक सत्रों में भाग लेती थीं।

विकास की निगरानी

बच्चों के विकास पर नज़र रखने के लिए 18 महीनों तक हर दो महीने में (कुल 9 बार) उनके शारीरिक माप (एंथ्रोपोमेट्रिक मेज़रमेंट) लिए गए। इन आंकड़ों को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ग्रोथ चार्ट पर दर्ज किया गया। इन ग्रोथ चार्ट की प्रतियां माताओं को भी दी गईं। इस निम्न मापें शामिल थीं :

  • लंबाई
  • वजन
  • सिर की परिधि (2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की)

प्रारंभिक और अंतिम सर्वेक्षण

परियोजना के अंतर्गत की गई गतिविधियां

  • सर्वे में भोजन की आदतों, स्तनपान के तरीकों, सामाजिक-आर्थिक स्थिति तथा पैकेटबंद खाद्य पदार्थों (UPF) पर होने वाले खर्च का आकलन किया गया ।
  • विषय केंद्रित समूह चर्चा
  • वीडियो और डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया
  • “पोषण आहार” दिखाने वाले चित्रों के माध्यम से चर्चा

इन सत्रों में शामिल प्रमुख विषय

  • स्तनपान की सही तकनीक और उसका समय (आवृत्ति)
  • 6 महीने की उम्र से शुरू होने वाला पूरक आहार
  • पोषण आहार
  • भोजन में विविधता और संतुलित पोषण।
  • पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के नुकसान
  • मासिक धर्म स्वास्थ्य, प्रजनन स्वास्थ्य (Reproductive health) और एनीमिया संबंधित मुद्दे

हालांकि, समूह चर्चाओं (FGDs) में महिलाओं की उपस्थिति अक्सर नियमित नहीं रहती थी।

शुरुआती (बेसलाइन) निष्कर्ष

A. युवा महिलाएं / किशोर लड़कियां: सर्वे में शामिल 120 किशोर लड़कियों में से:

  • 92.5% सेनेटरी पैड का इस्तेमाल करती थीं।
  • 84.2% बाहर का खाना भी खाती थीं।
  • केवल 53.3% को ही एनीमिया के बारे में जानकारी थी।
  • 50.8% रोजाना फल खाती थीं।

85.8% के पास स्मार्टफोन था।

कई महिलाओं ने बताया कि उन्हें गर्भावस्था के दौरान अधिक वजन न बढ़ाने की सलाह दी जाती थी, ताकि बच्चा छोटा रहे और सामान्य प्रसव हो सके। ऐसा इसलिए कहा जाता था ताकि सिजेरियन प्रसव की ज़रूरत न पड़े, क्योंकि उसका खर्च उठाना उनके लिए संभव नहीं था।

B. गर्भवती महिलाएं: सर्वेक्षण में शामिल 43 गर्भवती महिलाओं में से:

  • 20.9% ने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी।
  • 83.7% का अस्पताल में पंजीकरण हुआ था।
  • 86% नियमित रूप से प्रसव-पूर्व जांच के लिए जाती थीं।
  • 97.3% को डॉक्टर द्वारा दवाइयां लिखी गई थीं, जिनमें से 91.7% ने उन्हें नियमित रूप से लेने की बात कही।
  • 95.3% ने गर्भावस्था के दौरान अच्छे पोषण के महत्व को स्वीकार किया। लेकिन यह समझ उनके लिए बेहतर पोषण के रूप में साकार नहीं हो सकी।

संस्थागत स्वास्थ्य संस्थानों (अस्पताल इत्यादि) से जुड़ाव अपेक्षाकृत अधिक होने के बावजूद, गर्भावस्था और उसके दौरान भोजन तथा प्रसव के बाद देखभाल से जुड़े पारंपरिक विश्वास तथा वर्जनाएँ मजबूती से बनी हुईं थीं।

C. 0–6 वर्ष के बच्चों की माताएं: सभी 9 चरणों में शामिल रहने वाली 54 माताओं के अंतिम (एंडलाइन) सर्वेक्षण में पाया गया कि –

  • 73.3% माताओं ने बच्चे के जन्म के दो घंटे के भीतर स्तनपान कराना शुरू किया।
  • 29% माताओं ने सलाह मिलने पर पहले छह महीनों के दौरान बच्चे को बाहर का दूध भी दिया।
  • 85.1% माताओं ने पूरक आहार का महत्व समझने के बाद उसे शुरू किया।
  • 78.5% माताएं बच्चों को बाजार से खरीदे गए खाद्य पदार्थ खिलाती थीं।
  • 45.6% ने बताया कि पिछले एक महीने में उनका बच्चा बीमार हुआ था।
  • 90.3% ने बच्चों के पूर्ण टीकाकरण की सूचना दी।

बच्चों के विकास सबंधी परिणाम

अध्ययन में कुल 507 बच्चों को शामिल किया गया। लेकिन, प्रवास (माइग्रेशन) और नियमित रूप से न आने के कारण –

  • 41% बच्चे अध्ययन का हिस्सा नहीं रह पाए
  • 59% बच्चे अध्ययन में बने रहे।
  • केवल 54 बच्चे सभी 9 चरणों में शामिल हुए।

इन कमियों के बावजूद बच्चों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले।  

सभी 9 चरणों में शामिल बच्चे (कुल=54) 

  • बौनेपन की समस्या 35.2% से घटकर 31.5% हो गई।
  • दुबलेपन की समस्या 13% से घटकर 5.6% रह गई।
  • वजन में कमी की समस्या 26% से घटकर 20.4% हो गई।

2–6 वर्ष आयु के बच्चे (कुल =180, पहले और नवें चरण के बीच अंतर)

  • गंभीर बौनापन10.6% से घटकर 3.9% रह गया।
  • गंभीर दुबलापन 1.1% से घटकर शून्य (0%) हो गया।
  • गंभीर अंडरवेट 6.7% से घटकर 5% रह गया।

इससे पता चलता है कि 2–6 वर्ष के बच्चों में गंभीर कुपोषण की समस्या में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

0–2 वर्ष आयु के बच्चे (कुल =118)

  • गंभीर बौनेपन की समस्या 4.3% से बढ़कर 12.9% हो गयई।
  • दुबलापन 6.8% से घटकर 0.9% रह गया।
  • अंडरवेट में कोई बदलाव नहीं आया।

शिशुओं में बौनापन बढ़ने का कारण बार-बार होने वाले संक्रमण, दस्त की बीमारियां और दवाएं हो सकती हैं जो जीवन के शुरुआती दौर में पोषक तत्वों के अवशोषण को प्रभावित करती हैं। कई शोधों में भी यह पाया गया है कि जीवन के पहले दो वर्षों में लंबाई में वृद्धि कम रह सकती है, लेकिन अगले तीन वर्षों में इसमें सुधार देखने को मिलता है।

आहार विविधता और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर खर्च

  • आहार विविधता का स्कोर (Dietary Diversity Score) 2.76 से बढ़कर 3.67 हो गया।
  • पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर औसत खर्च ₹30.17 से घटकर ₹9.85 रह गया।

इससे पता चलता हैं कि नियमित परामर्श और निगरानी से भोजन की गुणवत्ता में सुधार हुआ तथा पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर निर्भरता कम हुई।

प्रारंभिक सर्वेक्षण से प्राप्त संकेतक

  • मां की लंबाई कम होना बच्चों के छोटे कद का एक महत्वपूर्ण संकेतक था ।
  • जेंडर वजन और लंबाई को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक था।
  • पूरक आहार शुरू करने में देरी से बच्चों के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

अंतिम सर्वेक्षण से प्राप्त संकेतक

  • माताओं की उम्र और बच्चों की लंबाई में वृद्धि का सकारात्मक सबंध था।
  • समय पर पूरक आहार शुरू करने से बच्चों के उम्र और वजन के अनुपात में सुधार देखा गया।

माताओं की लंबाई का नियमित प्रभाव यह दर्शाता है कि कुपोषण का असर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचता रहता है।

पैकेटबंद खाद्य पदार्थों को लेकर तुलनात्मक अध्ययन (RCT)

अध्ययन में हर जमीनी शोधकर्ता को 6–7 परिवारों की जिम्मेदारी दी गई। वे हर तीसरे दिन इन परिवारों के घर जाकर माताओं को पोषण संबंधी परामर्श देती थीं और पिछले दिन पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर हुए खर्च की जानकारी दर्ज करती थीं।

पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर होने वाले खर्च के पैटर्न को जांचने के लिए 2–5 वर्ष आयु के 40 बच्चों पर दो महीने तक एक रैंडम तुलनात्मक अध्ययन किया गया। इनमें से 20 बच्चे हस्तक्षेप समूह (intervention group) और 20 बच्चे सामान्य समूह (control group) में शामिल थे।

हर 3 दिन पर हस्तक्षेप समूह के बच्चों के घरों में दौरा किया गया, उन्हें पोषण संबंधी सलाह दी गई, पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर रोजाना होने वाले खर्च का रिकॉर्ड रखा गया, घर के बने खाने को बढ़ावा दिया गया और इस 2 महीने की अवधि की शुरुआत और अंत में अंडे उपलब्ध कराए गए।

हस्तक्षेप समूह में वाले परिवारों में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों (UPF) पर होने वाला खर्च काफी कम हो गया, जबकि सामान्य समूह में इसमें लगभग कोई बदलाव नहीं आया। हस्तक्षेप समूह में बच्चों के भोजन करने की आवृत्ति में भी थोड़ी वृद्धि हुई। इससे पता चलता है कि नियमित परामर्श और लगातार निगरानी से लोगों की भोजन संबंधी खर्च से जुड़े व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

किशोर लड़कियों से जुड़े परिणाम

यौवनावस्था, मासिक धर्म एवं प्रजनन स्वास्थ्य, पोषण और शारीरिक व्यायाम के महत्व पर आयोजित नौ सत्रों के बाद निम्नलिखित परिवर्तन देखने को मिले:

  • सैनिटरी पैड का उपयोग 92.21% से बढ़कर 96.10% हो गया।
  • एनीमिया के प्रति जागरूकता 54.55% से बढ़कर 90.91% हो गई और खान-पान में भी सुधार देखा गया।
  • अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन काफी कम हुआ।
  • अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों पर औसत खर्च ₹228.51 से घटकर ₹108.12 रह गया।

किशोरियों ने बताया कि अब वे प्रजनन स्वास्थ्य पर खुलकर बात कर पाती हैं और कम उम्र में गर्भधारण से बचने के महत्व को बेहतर ढंग से समझती हैं। हालांकि, आहार विविधता के स्कोर में हल्की कमी दर्ज की गई, जिससे पता चलता है कि केवल जागरूकता बढ़ने से भोजन की गुणवत्ता में तुरंत सुधार नहीं आता।

चुनौतियां

परियोजना के दौरान कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जैसे :

  • 41% बच्चों का अध्ययन के दौरान बाहर हो जाना।
  • सत्रों में अनियमित उपस्थिति।
  • त्योहारों के दौरान परिवारों का अन्य स्थानों पर चले जाना (प्रवासन)।
  • स्तनपान से जुड़े जवाबों में सामाजिक स्वीकार्यता का दबाव दिखना।
  • जन्म के समय अस्पतालों द्वारा वजन की सटीक जानकारी न दर्ज करना
  • बच्चों के पिताओं की सीमित भागीदारी।
  • तुलनात्मक अध्ययन की अवधि का केवल दो महीने तक सीमित रह जाना।

समग्र निष्कर्ष

परियोजना से निम्नलिखित परिणाम सामने आए:

  • दुबलेपन और कम वजन की दर में कमी आई।
  • 2–6 वर्ष के बच्चों में गंभीर बौनेपन की समस्या में कमी दर्ज की गई।
  • आहार विविधता में सुधार हुआ।
  • अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों पर होने वाला खर्च काफी कम हुआ।
  • किशोरियों और माताओं में पोषण एवं स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी।

फिर भी कुछ चुनौतियां बनी रहीं:

  • दो वर्ष से कम आयु के बच्चों में बौनेपन की समस्या बढ़ी।
  • व्यवहार में स्थायी बदलाव लाने के लिए लंबे समय तक प्रयास की जरूरत थी।
  • गरीबी, खराब आवास, स्वच्छ पानी और स्वच्छता की कमी, सस्ते पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की आकर्षक मार्केटिंग, समाजिक स्वीकार्यता का दबाव और लैंगिक असमानता जैसी सामाजिक वजहें अभी भी स्वास्थ्य पर गहरा असर डालने वाले कारक बने हुए हैं।

निष्कर्ष

‘द फर्स्ट 1000 डेज़’ परियोजना से यह स्पष्ट हुआ कि समुदाय आधारित जागरूकता, बच्चों के विकास की नियमित निगरानी और लगातार परामर्श के जरिए शहरी वंचित बस्तियों के बच्चों के पोषण स्तर में सुधार लाया जा सकता है।

अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि कुपोषण पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली समस्या है। माताओं की लंबाई और उनका स्वास्थ्य बच्चों के विकास पर अहम प्रभाव डालते हैं। यह तथ्य किशोरियों और माताओं के पोषण में निवेश की जरूरत को बताता है।

हालांकि दुबलेपन और गंभीर कुपोषण में कमी जैसे सकारात्मक परिणाम मिले, लेकिन दो वर्ष से कम आयु के बच्चों की स्थिति अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। शुरुआती संक्रमण और पर्यावरणीय कारण उनकी लंबाई को प्रभावित करते हैं।

नियमित परामर्श के माध्यम से पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर होने वाले खर्च में कमी से यह पता चलता है कि लगातार सहयोग और मार्गदर्शन मिलने पर लोगों की खान-पान संबंधी आदतों में बदलाव लाया जा सकता है।

कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि बच्चे के जीवन के पहले 1000 दिन काफी अहम होते हैं। लेकिन कुपोषण के दुष्चक्र को तोड़ने और लंबे समय तक बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए शैशवावस्था के बाद भी लगातार सहयोग और प्रयास आवश्यक हैं।