गलाबेरी का सुलभ जीवन

राजस्थान के एक दूरदराज़ गाँव में स्थित एक नए उप स्वास्थ्य-केंद्र की झलकियाँ और इसके बरअक्स बैंगलोर की एक झुग्गी बस्ती में अस्थायी घरों के विध्वंस का दृश्य, भारत में मौजूद विरोधाभासी परिस्थितियों को दर्शाता है।

गलाबेरी का सुलभ जीवन

गलाबेरी पहुँचने में हमें एक घंटे का समय लगा। आखिरी कुछ किलोमीटर का रास्ता सालों पहले मेरी बाड़मेर की पिछली यात्रा के समय नहीं बना था। वहाँ एक विशाल पंचायत भवन परिसर के एक कोने में एक चमचमाता नया स्वास्थ्य उप-केंद्र स्थित है। हम अपने जूते उतारते हैं, और चैनी-दीदी अर्थात एएनएम हमें गर्व से एक के बाद एक बंद कमरे खोलकर दिखाती हैं। वह बताती हैं कि: यह दवाखाना होगा, वह प्रयोगशाला है, यह प्रसूति कक्ष है, इत्यादि। यह सब दिखाते हुए, वह अपनी खुशी नहीं छुपा पा रही थीं। जिसका कारण था कि उनके 17 साल के कार्यकाल में उनके पास काम करने के लिए कोई ‘कार्यालय’ तक नहीं था।

अब यहाँ सड़कें हैं। मोबाइल फोन से काम होता हैं। गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच होती है। उनका मुफ्त अल्ट्रासाउंड होता है। हर बच्चे का टीकाकरण होता है। पिछले सात साल में सिर्फ एक शिशु की मृत्यु हुई है और किसी भी मां की मौत नहीं हुई है।

इसके बाद, वह सुबह की धूप में बैठकर बताने लगीं कि अब सब कुछ कितना आसान हो गया है। चैनी-दीदी 600 घरों की जिम्मेदारी संभालती हैं। ये घर छोटी-छोटी ढाणियों में हैं, जो कि एक-दूसरे से ठीक-ठाक दूरी पर हैं। ये घर लगभग 7 किमी के दायरे में फैले हुए हैं। इन बीते सालों में, उन्होंने अपने समुदायों को स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए पैदल ही, हर घर का कई बाद दौरा किया है। टीकों और आधुनिक दवाओं एवं आधुनिक मेडिकल पद्धतियों में लोगों के अविश्वास के कारण उन्हें कई बार निराशा भी मिली है, लोग कहते थे कि : “हम आपको क्यों बताएं कि हमारी बहू गर्भवती है? ये हमारा पारिवारिक मामला है।”

“अब सड़कें बन गई हैं। मोबाइल फोन भी काम करता है। गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच होती है। उनका मुफ्त अल्ट्रासाउंड भी होता है। प्रत्येक बच्चे का टीकाकरण होता है। पिछले सात सालों में सिर्फ एक शिशु की मृत्यु हुई है और किसी माँ की मृत्यु नहीं हुई है। (उन्होंने संतुष्टि भरे भाव से कहा,) मेरे कार्यालय को देखिए, मुझे इससे ज्यादा और क्या ही चाहिए?”

यह सब सुनकर, उन पर विश्वास करना आसान है। यह ठीक उसके बाद की घटना है, जब मेरे सहकर्मी ने बाड़मेर में जीवन की मुश्किलों पर एक मार्मिक कॉलम लिखा। यह उस तरह का रेगिस्तान नहीं है, जो अपने आकर्षक रेत के टीलों और पहाड़ी किलों के लिए पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहाँ के सूखे भू-विस्तार, उसकी दुर्गमता, सूखे मौसम और इलाके का अनुभव किए बिना यहाँ के जीवन की कठिनता को समझना असंभव है। इन सब के बावजूद, जब बच्चों को अपने गाँव की सुंदरता के गाने गाते सुनते हैं, बच्चों के साथ खेलती और उनकी देखभाल करती हुए, आंगनवाड़ी शिक्षिकाओं का उत्साह और उनकी जीवंतता को देखते हैं, तब चैनी-दीदी की इस बात पर विश्वास करना ही पड़ता है, जब वह कहती हैं, कि यहाँ सब मजे में है।

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वही व्यवस्था जो बाड़मेर के सबसे दूरदराज़ हिस्सों तक पहुँचती है, एक आधुनिक महानगर के किनारे बसे समुदाय की सेवा करने में असमर्थ जान पड़ती है।

बाड़मेर लौटते हुए जब मेरे फोन में इंटरनेट वापस आया। तब मैंने बैंगलोर के एक सहकर्मी द्वारा भेजी गई तस्वीरें देखी। ये तस्वीरें उस जगह की हैं, जहाँ हम कोविड लॉकडाउन लागू होने पर पहली बार भोजन और अन्य ज़रूरी सामान लेकर गए थे। ये फकीरों का एक समूह था जो पूजा स्थलों के बाहर और सड़कों पर भीख माँगते थे। वे शहर के बाहर एक पत्थरीली पहाड़ी के खतरनाक ढाल पर रहते थे। मैं कई बार वहाँ गया हूँ, मुझे उसकी फिसलन भरी और संकरी ढलान पर चढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ा है और अक्सर संतुलन बनाने के लिए टिन और तिरपाल के घरों को पकड़कर जाना पड़ता है। उनके रोज़मर्रा के जीवन की अत्यधिक गरीबी और अपमानजनक परिस्थिति पर मुझे ताज्जुब हुआ कि ये आज भी हमारे देश में कैसी बदहाली है।

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कुछ दिन पहले उनके घरों को गिरा दिया गया था। मैं वही तस्वीरें मैं देख रहा था। अगर कोई पिछली दो सदियों का इतिहास देखे तो पाएगा कि बंगलूरु प्रवासियों का नगर है। ये प्रवासी ही इस शहर की जीवन रेखा हैं। ये कचरा बीनते हैं, घरेलू काम करते हैं, सेक्योरिटी गार्ड के रूप में काम करते हैं, छोटे-मोटे काम करते हैं, भवन निर्माण में मजदूरी करते हैं। इनमें से अधिकतर लोग पूर्वी भारत से हैं और शहर की सरहदों पर अनियोजित बस्तियों में रहते हैं, और इनकी संख्या बढ़ रही है। सरकारी व्यवस्था इन तक नहीं पहुँच सकी है और अंगनवाड़ियों, प्राथमिक स्कूलों, स्वास्थ्य केन्द्रों और राशन दुकानों तक इनकी पहुँच लगभग न के बराबर है। ऐसा लगता है कि शहर को इनकी सेवाओं की तो ज़रूरत है लेकिन इन्हें नागरिक के रूप में स्वीकार करने से इंकार करता है, जिन्हें खुद भी सुविधाओं की ज़रूरत है। जो व्यवस्था बाड़मेर के सबसे दूरदराज़ हिस्सों तक पहुँचती है, वह एक आधुनिक महानगर की सीमा पर बसे समुदाय तक नहीं पहुँच पाती हैं।

अचानक खराब सड़क के हिचकोलों ने हमारा ध्यान वापस बाड़मेर की ओर खींचा। हम गलाबेरी से वापस लौट रहे थे। चूंकि, यह दोपहर के भोजन में अभी समय था, तो हम पूनियों की बस्ती की ओर चल पड़े, जहाँ एक ग्राम स्वास्थ्य शिविर चल रहा था। तुलसी-दीदी 23 साल से इसी गाँवों के समूह में एएनएम के रूप में काम कर रही हैं। वह हमें गर्व से बताती हैं कि यहाँ पैदा हुए लगभग हर बच्चे की डिलेवरी उन्होंने ही करवाई है। जब मैंने पूछा, कितने? तो उन्होंने जवाब दिया- “हज़ारों”। जब हम बाहर निकल रहे थे, तब मैंने देखा कि एक ख़राब टैंक ढक्कन खुला हुआ था। मैंने तुलसी-दीदी से कहा कि यह सुरक्षित नहीं है, इसमें कोई बच्चा गिर सकता है। तब वह कहती हैं, ‘अंदर देखो, पानी नहीं है और इसमें एक कबूतर ने घोंसला बना लिया है, आप चूज़ों की आवाज़ सुन सकते हो? सभी बच्चे जानते हैं और इसलिए वे सावधान रहते हैं। जब चूज़े उड़ जाएँगे तो इसे ढक देंगे।’

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वहाँ से बाहर निकलते हुए, मैं मानवता के उस विस्तृत फलक के बारे में सोचने लगा , जो एक रेगिस्तान में भी खुश रहने की वजह ढूंढ लेती है लेकिन वही मानवीयता एक आधुनिक मेट्रो शहर में जूझती नज़र आती है।