समुदाय में गैर-संचारी रोगों की जाँच: एक सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी का अनुभव

एक सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (CHO) ने बांसवाड़ा ज़िले के दूर-दराज़, पहाड़ी इलाक़ों में फैले छोटे-छोटे गाँवों में स्वास्थ्य कैम्प आयोजित किया। यहाँ उन्होंने इसी स्वास्थ्य कैम्प के बारे में अपने अनुभव साझा किए हैं। यहाँ वे बताती हैं कि किस तरह इन कैम्पों ने स्वास्थ्य के प्रति लोगों के नज़रिए को बदला है और गैर-संचारी रोगों (NCDs) की शुरुआती पहचान और उनके प्रबंधन में अहम भूमिका निभाई है।

समुदाय में गैर-संचारी रोगों की जाँच: एक सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी का अनुभव

परिचय

घाटे की नाल नाम की खामोश पहाड़ियाँ। इन दूर-दराज़ की पहाड़ियों में स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। यहाँ परिवार ऐसे गाँवों में रहते हैं, जो एक-दूसरे से काफ़ी दूरी पर बसे हुए हैं। इन्हीं में से एक गाँव में रहने वाले 65 साल के किसान मावजी को लगता था कि उनकी थकान की वजह उनकी बढ़ती उम्र है। ठीक ऐसे ही मावजी के 36 साल के बेटे देवीलाल भी अपने सिरदर्द को मामूली बात मानकर नज़रअंदाज़ कर देते थे। यहाँ किए गए गैर-संचारी रोगों से जुड़े एक कैम्प ने एक नयी सच्चाई सामने लाई। इन दोनों को पता चला कि वे उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) और मधुमेह (डायबिटीज़) से पीड़ित हैं। किसी ने भी कभी नहीं सोचा था कि इन्हें इन बीमारियों घेर लिया होगा। परामर्श के बाद उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (PHC) में रेफ़र किया गया, जहाँ उनका इलाज शुरू हुआ। इसके साथ ही उन्हें जिंदगी जीने के तरीकों में कई बदलाव करने पड़े। पिता-पुत्र की यह घटना हमें बताती है कि दूर-दराज़ के गाँवों में पुरानी बीमारियाँ अक्सर तब तक छिपी रहती हैं, जब तक कि किसी जाँच में उनका पता न चले। इससे हमें यह भी पता चलता है कि जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच किसी परिवार के भविष्य की दिशा बदल सकती है।

ऐसी घटनाएँ बांसवाड़ा ज़िले की एक बड़ी सच्चाई को दिखाती हैं, जहाँ उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे गैर-संचारी रोग (NCD’s) सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चिंता का विषय बनती जा रही हैं। नेशनल NFHS-5 के मुताबिक, बांसवाड़ा ज़िले में 15 साल से अधिक उम्र के लोगों में से 19.4% पुरुषों और 17.1% महिलाओं का रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) बढ़ा हुआ है या वे रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए दवा ले रहे हैं। यहाँ यह भी जतलाया गया है कि 10.8% पुरुषों और 8.9% महिलाओं के रक्त में शुगर का स्तर बढ़ा हुआ है या वे ब्लड-शुगर पर काबू पाने के लिए दवा ले रहे हैं। ये आँकड़े गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ और शुरुआती पहचान, नियमित जाँच और सामुदायिक जागरूकता की तत्काल ज़रूरत को सामने लाते हैं।

इन पुरानी बीमारियों के मामले में बढ़ोतरी होने के बावजूद, समुदाय में इनके बारे में जागरूकता कमी है और कई लोग उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह को गंभीर तथा लंबे समय तक चलने वाली स्वास्थ्य समस्या नहीं मानते। जागरूकता की कमी, बीमारी का देर से पता चलना और स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ न उठा पाने की वजह से बहुत से लोग अनियंत्रित रक्तचाप और मधुमेह के साथ ही जीवन जीते रहते हैं।

इसलिए, समुदाय-स्तर पर गैर-संचारी रोगों की जाँच की अहमियत काफ़ी बढ़ गयी है। छोटे गाँवों-बस्तियों में कैम्प लगाने से लोगों तक पहुँचना और जाँच-पड़ताल करना मुमकिन हो पाता है। इससे उन मामलों का पता लगाने में मदद मिलती है, जिनकी पहचान पहले नहीं हो पाई थी। साथ ही इससे पुरानी बीमारियों की रोकथाम और प्रबंधन के बारे में जागरूकता भी बढ़ती है। बांसवाड़ा ज़िले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भुंगारा में समुदाय-आधारित गैर-संचारी रोगों की जाँच की योजना कैसे बनाई गई? इस योजना को कैसे लागू किया गया? इसे लागू करने का अनुभव कैसा रहा? इस दौरान किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? इसके लिए कौन-सी रणनीति अपनाई गई तथा इससे क्या सीखने को मिला? यह लेख इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द लिखा गया है।

गैर-संचारी रोग क्या है?

जो बीमारियाँ एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती (लगती) हैं, उन्हें गैर-संचारी रोग कहा जाता है। इनमें मुख्य रूप से उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक आदि शामिल हैं।

सभी सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए 30 साल या उससे ज़्यादा उम्र के लोगों की गैर-संचारी रोगों से जुड़ी जाँच सामुदायिक स्तर पर करना ज़रूरी है। इसके लिए यह जानना ज़रूरी है कि गाँव के कितने निवासी इस उम्र-वर्ग में आते हैं। इस काम के लिए आशा (ASHA) कार्यकर्ता समुदाय आधारित मूल्यांकन सूची (कम्युनिटी बेस्ड असेसमेंट चेक लिस्ट) फॉर्म भरती हैं। इस फार्म में हर व्यक्ति की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दर्ज की जाती है। इससे ज़्यादा जोखिम वाले लोगों की पहचान हो पाती है और उनकी जाँच करने को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए, समुदाय को एकजुट करने और यह सुनिश्चित करने में आशा कार्यकर्ता अहम भूमिका निभाती हैं कि ज़्यादा जोखिम वाले लोग जाँच से बचे न रह जाएँ।

गैर-संचारी रोगों के जाँच की योजना

कई समुदायों में, स्वास्थ्य व्यवस्था की तुलना में भोपा (पारंपरिक भजन-कीर्तन करने वाले पुजारी) या देवी-देवताओं पर ज़्यादा भरोसा किया जाता है। इस सोच को बदलना उतना ही ज़रूरी है, जितना कि जाँच करना।

मैं सोमपुर के हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर (HWC) में सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी हूँ। इसी वजह से मेरे पास 30 साल से अधिक उम्र के लोगों का डेटा मौजूद है। हमने इस उम्र के ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों के रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर की जाँच करने की योजना बनाई। हमें एहसास हुआ कि इस योजना को पूरा करने के लिए सिर्फ़ हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर आने वाले लोगों की जाँच करना काफ़ी नहीं होगा, क्योंकि कई लोग दूर-दराज़ इलाक़ों में रहते हैं और सेंटर तक नहीं आ पाते। इसलिए, हमने मोहल्ले के स्तर पर जाँच के लिए कैम्प लगाने का फ़ैसला किया।

उस दोपहर मैंने 24 लोगों को इकट्ठा किया, हालाँकि जाँच के लिए उन्हें तैयार करना एक चुनौती भरा काम था। कई लोगों का कहना था, “हम पूरी तरह ठीक हैं, हमें दवाओं या जाँच की कोई ज़रूरत नहीं है।”

मरीज़ों को समझाने-बुझाने और बार-बार बातचीत करने के बाद आख़िरकार ज़्यादातर लोग रक्तचाप और मधुमेह की जाँच करवाने के लिए तैयार हो गए। चार लोग इस बात पर अड़े रहे कि उनके लिए पारंपरिक इलाज या ईश्वरीय आशीर्वाद ही काफ़ी है। इससे एक कड़वी सच्चाई सामने आई: कई समुदायों में, अक्सर भोपा (पारंपरिक गीत-गाकर इलाज करने वाले पुजारी) या देवी-देवताओं पर स्वास्थ्य व्यवस्था से अधिक भरोसा किया जाता है — इस अंतर को मिटाना जाँच करने जितना ही ज़रूरी है।

हर कैम्प के बाद हमने आशा कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग की समीक्षा की, ताकि यह पता चल सके कि कौन छूट गया और ऐसी जगहों की पहचान की जा सके जहाँ लोगों तक आसानी से पहुँचा जा सके। इन समीक्षाओं के दौरान हमें पता चला कि समुदाय के कई लोग मनरेगा में पर काम कर रहे थे। इसलिए हमने वहाँ भी गैर-संचारी रोग जाँच कैम्प लगाकर अपनी कोशिशें और तेज़ कीं।

कैम्प लगाने की प्रक्रिया

हमने गाँव के छोटे-छोटे इलाक़ों और बस्तियों में गैर-संचारी रोग जाँच कैम्प लगाना शुरू किया। इस प्रक्रिया में सबसे ज़रूरी क़दम लोगों को इकट्ठा करना था, जिसमें आशा कार्यकर्ताओं ने बहुत अहम भूमिका निभाई। कैम्प लगने से एक दिन पहले वे घर-घर जाकर लोगों को जानकारी देती थीं और उन्हें कैम्प में आने के लिए प्रोत्साहित करती थीं। इस तरह से तैयारी करने की वजह से समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित हो पाई।

कैम्प वाले दिन, मैं बीपी मशीन, ग्लूकोमीटर, वज़न नापने की मशीन और कुछ बुनियादी दवाइयाँ लेकर पहुँची। आशा कार्यकर्ता ने जिन लोगों को बुलाया था, वे पहले से ही वहाँ मौजूद थे। सभी ज़रूरी चीज़ें व्यवस्थित करने के बाद, मैं एक जगह बैठ गई और जाँच करनी शुरू की। इस दौरान आशा कार्यकर्ता लोगों को एक-एक करके बुलाती रहीं। सूची में शामिल कोई भी व्यक्ति अगर जाँच के लिए नहीं आता, तो वह उन्हें वापस बुलाने जातीं, ताकि गाँव के ज़्यादातर लोग इस प्रक्रिया में शामिल हो सकें।

महिलाओं पर ख़ास ध्यान दिया गया। उन्हें ब्रेस्ट कैंसर और सर्वाइकल कैंसर के बारे में सलाह दी गई। इनके लक्षण तथा जोखिम के बारे में बताया गया और ख़ुद से ब्रेस्ट की जाँच करने के तरीक़े की जानकारी दी गई।

जाँच की प्रक्रिया

जाँच के दौरान मैंने हर व्यक्ति से बात की। उनकी सेहत के बारे में जानकारी ली। उनसे पूछा कि क्या उन्हें पहले से कोई बीमारी है, जिसकी दवा ले रहे हैं। उनके रक्तचाप और मधुमेह के स्तर को मापा गया। इन नतीजों के आधार पर मैंने उन्हें उनकी स्थिति के बारे में बताया और सेहत से जुड़ी जानकारी दी। अगर किसी का रक्तचाप ज़्यादा पाया गया तो उसे आराम करने को कहा गया और दोबारा उसकी जाँच की गयी। जिनके रक्तचाप का स्तर सामान्य हो गया, उन्हें सलाह-मशविरा दिया गया, जबकि जिनका स्तर लगातार ज़्यादा बना रहा, उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भेज दिया गया। इसी तरह, जिन लोगों के ब्लड-शुगर का स्तर अधिक पाया गया उनसे अगले दिन ख़ाली पेट जाँच कराने के लिए हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर में आने को कहा गया। ख़ाली पेट जाँच करने पर जिनके ब्लड-शुगर का स्तर सामान्य था उन्हें सलाह-मशविरा देकर विदा दी गई और जिनका स्तर अधिक था उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भेज दिया गया।

महिलाओं पर ख़ास ध्यान दिया गया। उन्हें ब्रेस्ट कैंसर और सर्वाइकल कैंसर के बारे में सलाह दी गई। इनके लक्षण तथा जोखिम के बारे में बताया गया और ख़ुद से ब्रेस्ट की जाँच करने के तरीक़े की जानकारी दी गई। बाद में मैंने सोचा कि उन्होंने कितनी ध्यान से बातें सुनीं, जिससे पक्के तौर पर पता चला कि शायद ये बातें उनके लिए नयी थीं। मैंने तय किया कि अगली बार जाने पर मैं उनसे पूछूँगी कि क्या उन्होंने घर पर ख़ुद जाँच करने की कोशिश की थी।

जो लोग पहले से ही उच्च रक्तचाप या मधुमेह की दवा ले रहे थे और फ़ॉलो-अप के लिए आए थे, उन्हें दवाओं के साथ परामर्श दिया गया; वहीं, जिन लोगों की पहली बार जाँच हुई और जिनकी रिपोर्ट सामान्य आई, उन्हें सेहत से जुड़ी सलाह देकर घर भेज दिया गया। इस तरह, कैम्प के ज़रिए न सिर्फ़ बीमारी का पता चला और आगे की इलाज के लिए रेफ़र किया गया, बल्कि समुदाय में जागरूकता बढ़ाने और बचाव के तरीक़ों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने में भी काफ़ी मदद मिली।

मेरा मानना ​​है कि बदलाव रातों-रात नहीं आता, बल्कि लगातार कोशिशों से ही आता है। गाँव के सभी लोगों की जाँच करने की यह मेरी पहली कोशिश थी। हालाँकि मैं काफ़ी हद तक सफल रही, लेकिन मुझे पता है कि लगातार कोशिश करते रहने और बार-बार लोगों तक पहुँचने की कोशिश से उन लोगों तक भी पहुँचा जा सकता है, जिन्होंने पहले मना किया था।

साप्ताहिक कैम्प और कवरेज

इन कोशिशों के ज़रिए हमने अपने इस इलाके के 30 साल और उससे अधिक उम्र की लगभग 80% आबादी की जाँच की। नए मरीज़ों को ऑनलाइन पोर्टल पर रजिस्टर किया गया। साथ ही हर मरीज़ को एक गैर-संचारी रोग कार्ड दिया गया, जिस पर अगली बार फिर से मिलने की तारीख़ लिखी थी। इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित करने में मदद मिली कि रोगी अपना इलाज जारी रख सकें और नियमित रूप से इलाज के लिए आ सकें।

मुख्य चुनौतियाँ और समाधान

लोगों को इकट्ठा करना एक बड़ी चुनौती थी। हर एक कैम्प के बाद बार-बार समीक्षा की गई और इसका समाधान निकालने की कोशिशें की गईं। हमें उन लोगों तक पहुँचने में अब भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था जो काम के लिए जल्दी शहर निकल जाते थे या दूसरी जगह चले गए थे। इन इलाक़ों में लोगों का दूसरी जगहों पर जाना आम बात है। साथ ही, जागरूकता की कमी, सामाजिक मान्यताएँ और गलतफ़हमियाँ ऐसी चुनौतियाँ थीं, जो दिखाई नहीं पड़ती थीं, लेकिन जिनसे हमें कैम्प के दौरान निपटना पड़ा। मेरा मानना ​​है कि बदलाव रातों-रात नहीं आता, बल्कि लगातार कोशिशों से ही आता है। गाँव के सभी लोगों की जाँच करने की यह मेरी पहली कोशिश थी। हालाँकि मैं काफ़ी हद तक सफल रही, लेकिन मुझे पता है कि लगातार कोशिश करते रहने और बार-बार लोगों तक पहुँचने की कोशिश से उन लोगों तक भी पहुँचा जा सकता है, जिन्होंने पहले मना किया था।

समीक्षा और दोबारा योजना बनाने का महत्व

हर कैम्प के बाद, हमने आशा कार्यकर्ताओं के साथ काम की समीक्षा की। हमने देखा कि कितने लोगों की जाँच हुई, कितने नए मरीज़ों की पहचान हुई, किन लोगों की फिर से जाँच करनी ज़रूरी थी, किन इलाक़ों से कम लोगों की जाँच हो पाई और इसकी क्या वजहें हो सकती हैं। समीक्षा करने की वजह से हमें अपने काम के तरीक़े को बेहतर बनाने, छूटे हुए समूहों की पहचान करने और लोगों तक बेहतर ढंग से पहुँचने के लिए रणनीतियाँ बनाने में मदद मिली। हमने काम की जगहों और समुदाय के इकट्ठा होने की अन्य जगहों पर भी जाँच शुरू की।

जो नतीजे हासिल हुए

मैं जिस इलाके में काम करती हूँ, वहाँ बस्तियाँ दूर-दूर तक फैली हुई हैं। छोटी बस्तियों में कैम्प लगाने से बहुत अच्छे नतीजे मिले। इस रणनीति से हम ज़्यादा लोगों तक पहुँच पाए। उनसे जुड़ पाए और उनकी जाँच कर पाए। लगातार बातचीत से गैर-संचारी रोगों के बारे में जागरूकता बढ़ी। नए मरीज़ नियमित रूप से इलाज के लिए आने लगे, जबकि दूसरे लोग भी अपनी मर्ज़ी से आने लगे। मरीज़ों को दोबारा मिलने वाली सेवाओं में काफ़ी सुधार हुआ।

सीख और आगे की राह

इस अनुभव से पता चला कि सही योजना, समुदाय आधारित दृष्टिकोण, आशा कार्यकर्ताओं का सहयोग, लगातार समीक्षा और ज़रूरत के मुताबिक बदलाव लाते हुए काम करने से गैर-संचारी रोग की जाँच को सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है। इसकी प्रक्रिया को प्रभावी बनाए रखने के लिए हर साल दोबारा जाँच करना ज़रूरी है। हर साल कम-से-कम एक बार पूरे गाँव में कैम्प लगाया जाना चाहिए। फ़ील्ड विज़िट और सामुदायिक आयोजनों के दौरान भी जाँच जारी रहनी चाहिए। जिन मरीज़ों में गैर-संचारी रोगों का पता चलता है, उनके मामले में लगातार फ़ॉलो-अप और निगरानी की ज़रूरत होती है। भविष्य में, मैं समुदाय के साथ जुड़ने, नए इलाक़ों तक पहुँचने, जागरूकता फैलाने और गैर-संचारी रोगों की जाँच व फ़ॉलो-अप सेवाओं को और बेहतर बनाने का प्रयास जारी रखूँगी।

हर एक कैम्प का मकसद सिर्फ़ बीमारी का पता लगाना नहीं था; बल्कि इसका उद्देश्य भरोसा बनाना और स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में लोगों के नज़रिए में बदलाव लाना भी था। समय के साथ, लगातार लोगों तक पहुँचने की कोशिशों से मूक संघर्षों को शक्तिशाली कहानियों में बदला जा सकता है।