भारत आज एक शांत लेकिन गहरे संकट का सामना कर रहा है। लगभग 20 करोड़ लोग मानसिक बीमारी के साथ जी रहे हैं, जिनमें उपचार की दर इतनी कम है कि प्रत्येक 5 मरीजों में से एक को भी सही समय पर डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाती। जैसे-जैसे शहरों का विस्तार हो रहा है और पारंपरिक सामुदायिक सहारे कमजोर पड़ते जा रहे हैं। आने वाले समय में यह समस्या और भी गंभीर होने वाली है। केवल मनोचिकित्सकों या मनोवैज्ञानिकों पर निर्भर रहकर इस संकट का सामना नहीं किया जा सकता है। देश में मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों की संख्या बहुत कम है और इन्हें तैयार करने में कई वर्ष लगते हैं। लोगों के गंभीर रूप से बीमार हो जाने के बाद ही हस्तक्षेप करना भी सही रणनीति नहीं है। भारत को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जो बीमारी की रोकथाम और पुनर्वास (रिकवरी) – दोनों को समान महत्व दे।
कुछ समूहों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा जोखिम अधिक होता है, जैसे सैनिक, स्वास्थ्य-कर्मी, एयरलाइन कर्मचारी, प्रवासी, और वे लोग जिनके परिवार में मानसिक बीमारी का इतिहास रहा है। इन समूहों के लिए विशेष देखभाल की जरूरत होती है।
रोकथाम की शुरुआत मानसिक लचीलेपन (रिज़िलिएंस) से होती है। बच्चों और युवाओं को ऐसे कौशल दिए जा सकते हैं जो जीवन भर उनके मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करें। शिशु को शुरुआती उम्र में अच्छी देखभाल और सीखने-समझने के अवसर (अर्ली स्टीम्यूलेशन) देने से उसका मानसिक स्वास्थ्य और विकास बेहतर होता है। स्कूलों में सामाजिक और भावनात्मक कौशल विकसित करने वाले कार्यक्रम आगे चलकर अवसाद जैसी समस्याओं के जोखिम को कम करते हैं। मार्गदर्शन (मेंटरिंग) और इंटर्नशिप युवाओं को जीवन के एक संवेदनशील चरण में सहारा प्रदान करती हैं।
लेकिन केवल मानसिक लचीलापन काफी नहीं है। हमें पर्यावरण से जुड़े जोखिमों को भी कम करना होगा। आर्थिक असुरक्षा, असुरक्षित आवास, स्कूलों में परेशान करना (बुलिंग), और पेंट में मौजूद सीसा जैसे विषैले तत्व- दीर्घकालिक नुकसान पहुँचाते हैं। ग्रामीण रोज़गार गारंटी जैसी योजनाएँ, शहरों में लचीले रोज़गार के अवसर, अधिक सुरक्षित विद्यालय, और पेंट से जुड़े सख़्त नियम- इन दबावों को कम कर सकते हैं।
मजबूत रोकथाम के बावजूद भी कई लोग मानसिक रूप से बीमार पड़ेंगे। यदि उबरने और संभलने की प्रभावी व्यवस्थाएँ न हों, तो बीमारी के दोबारा लौटने की संभावना बढ़ जाती है और पहले किए गए प्रयासों के लाभ भी खत्म हो जाते है। लेकिन भारत केवल मनोचिकित्सकों पर निर्भर नहीं रह सकता। सामुदायिक स्वास्थ्य-कर्मी इस काम में मदद कर सकते हैं, पर उन्हें बहुत कम प्रशिक्षण देकर चिकित्सकीय भूमिकाएँ सौंपना असुरक्षित है। अध्ययनों से पता चलता है कि इससे गलत निदान और नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।
‘होम अगेन’ जैसी सहायता प्राप्त जीवन-व्यवस्थाएँ1, यह दिखाती हैं कि लोग संस्थानों (मनोचिकित्सालय) के बाहर भी सफलतापूर्वक और गरिमापूर्ण जीवन जी सकते हैं।
इसका बेहतर समाधान एक स्तरीय (टियर्ड) मॉडल है। इसमें सामुदायिक स्वास्थ्य-कर्मी (कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स) केवल लक्षणों की पहचानने और मरीजों को खुद की देखभाल से जुड़ी जरूरी सामग्री देने का कार्य करते हैं। वहीं, एक छोटा और प्रमाणित समूह- व्यवहारिक स्वास्थ्य सहायक (बिहेवियरल हेल्थ एड्स)- छह महीने का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करता है, जो विशेषज्ञों की देखरेख में अधिक जटिल मामलों को संभालता है। देखरेख (सुपरविजन) को केवल इस समूह तक सीमित रखने से जोखिम कम होते हैं, लागत नियंत्रित रहती है और इस मॉडल को बड़े स्तर पर लागू करना आसान हो जाता है।
इस मॉडल में उबरने की प्रक्रिया लचीली होती है। हल्की मानसिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए स्व-सहायता वीडियो और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के समूह कार्यक्रम मददगार हो सकते हैं। व्यवहारिक स्वास्थ्य सहायक (बिहेवियरल हेल्थ एड्स), स्थानीय डॉक्टरों और दूरस्थ विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में, सामान्य मानसिक विकारों के लिए मानक (स्टैन्डर्ड) स्तर का उपचार प्रदान कर सकते हैं।
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गंभीर मामलों का उपचार उन अस्पतालों में किया जाये, जो टेलीमेडिसिन के माध्यम से मनोचिकित्सकों से जुड़े हों। दीर्घकालिक मानसिक बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए उबरने का अर्थ केवल इलाज नहीं, बल्कि समुदाय में सम्मान के साथ जीवन जीना भी होना चाहिए। होम अगेन, जैसी सहायता प्राप्त जीवन-व्यवस्थाएँ इसके उदाहरण हैं। भारत का मानसिक स्वास्थ्य संकट केवल संसाधनों की कमी का मामला नहीं है, बल्कि रणनीति का प्रश्न है। यदि स्कूलों, कार्यस्थलों और सामाजिक नीतियों के माध्यम से रोकथाम में निवेश किया जाए, और प्रमाणित कैडर तथा दीर्घकालिक सहयोग के साथ पुनर्वास कार्यक्रम को समुदायों तक ले जाया जाए, तो भारत मानसिक बीमारी को एक असहनीय संकट के बजाय आशा और गरिमा के साथ संभाली जा सकने वाली चुनौती में बदल सकता है।
