प्रासंगिक बने रहने की कोशिश: अस्पताल में बदलाव लाने के मिशन की कहानी

एक तरफ़ लगातार मज़बूत होता सरकारी स्वास्थ्य सेवा सिस्टम और दूसरी ओर चकाचौंध से भरे निजी अस्पतालों शृंखलाएँ हैं। इन दोनों के बीच कई मिशन अस्पताल फँसे हुए हैं, जो आर्थिक तंगी और पहचान के संकट का सामना कर रहे हैं। इस केस स्टडी में एक ऐसे मिशन अस्पताल की कहानी बयान की गयी है, जिसने अपने बुनियादी सिद्धांतों को अपनाकर इन चुनौतियों को सफलतापूर्वक पार किया।

प्रासंगिक बने रहने की कोशिश: अस्पताल में बदलाव लाने के मिशन की कहानी

पुरानी इमारतों की छतें टपकती थीं। ज़ंग लगे उपकरण कहीं कोने में पड़े थे। अपने ज़माने का एक मशहूर मिशन अस्पताल अब यादों का हिस्सा बनकर रह गया था, जो लोगों के भरोसे और दुआओं के सहारे चल रहा था।

भारत भर में और ख़ासकर दक्षिण भारत में कई मिशन अस्पतालों के यही हालात हैं।

इसके पीछे के कारण काफ़ी मिलते-जुलते हैं। इस बारे में लोग बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। मेडिकल क्षेत्र बहुत तेज़ी से बदला है। स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हो गया है, जो अब महंगी टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएँ लेना अब आसान नहीं है। फ़ंडिंग अनिश्चित और अस्थिर है। युवा डॉक्टर शहरों में काम करना पसंद करते हैं। अस्पताल प्रशासन को विरासत में अक्सर काफ़ी गिरावट आ चुकी व्यवस्था मिलती है। वक्त के साथ, कई मिशन अस्पताल धीरे-धीरे समुदायिक केंद्र नहीं रह गए और ग़रीबों व ज़रूरतमंदों की देखभाल तथा सेवा के अपने असल मकसद से दूर होते चले गए।

लेकिन कभी-कभी कोई अलग ही कहानी भी सामने आ जाती है।

यह ऐसी ही एक दस्ताँ है।

यह सीएसआई लोम्बार्ड मेमोरियल मिशन अस्पताल की कहानी है। इस मिशन अस्पताल ने ठान ली कि वह बस पुरानी यादों में खोकर नहीं रह जाएगा। इसकी जगह उसने ज़्यादा मुश्किल रास्ता चुना: वक्त के मुताबिक अपने आप में बदलाव लाने का रास्ता।

इस अस्पताल की स्थापना 1923 में मिस ईवा लोम्बार्ड ने की थी। उनकी कहानी सीएमसी वेल्लोर की फ़ाउंडर डॉ. इडा स्कडर की कहानी से काफ़ी मिलती-जुलती है। सेवा, त्याग और स्थानीय समुदाय के साथ मज़बूत रिश्तों की वजह से यह अस्पताल आगे बढ़ा। उडुपी में पुरानी पीढ़ी के किसी भी व्यक्ति से पूछिए, तो बहुत मुमकिन है कि या तो उनका जन्म मिशन अस्पताल में हुआ हो, उन्होंने वहाँ अपना इलाज कराया हो, या उन्होंने वहाँ काम किया हो, या फिर वे किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हों जिसका वहाँ इलाज हुआ हो या जिसने वहाँ काम किया हो।

इस अस्पताल के काम करने का तरीक़ा हैरानी की हद तक बहुत पुराना था: व्यवस्था को ठीक करना, लोगों को उसमें शामिल करना, नैतिक बने रहना और आगे दूर की सोचना।

लेकिन आज उडुपी में किसी द्वितीयक देखभाल (secondary-care) मिशन अस्पताल का टिके रहना आसान नहीं है।

लोम्बार्ड मेमोरियल मिशन अस्पताल (LMH) भारत के सबसे अधिक स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं वाले इलाके में से एक में काम करता है। इस इलाके में पहले से ही बहुत सारे मेडिकल कॉलेज, तृतीयक देखभाल (tertiary-care) केंद्र और निजी अस्पताल मौजूद हैं। यह अस्पताल बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों, पुरानी बीमारियों और मरीज़ों की सुविधा के अनुसार उनकी अन्य बीमारियों का इलाज करता है।

कोई पुराना मिशन अस्पताल अपना अस्तित्व बनाए रख सके, उस लिहाज़ से यह जगह बहुत अनुकूल नहीं है।

इन सब के बावजूद, जो कुछ हुआ वह आम बात नहीं थी।

डॉ. सुशील जथन्ना के नेतृत्व में इस अस्पताल ने कॉर्पोरेट अस्पतालों से “कॉर्पोरेट तौर-तरीक़ों” में मुक़ाबला करने की कोशिश नहीं की। इसके बजाय, उनका तरीक़ा हैरानी भरा और पुराने ज़माने का था: व्यवस्था को ठीक करना, लोगों को शामिल करना, नैतिक बने रहना और लम्बी अवधि के बारे में सोचना।

डॉ. सुशील ने 2014 में जब निदेशक का पद संभाला, तब यह संस्थान आर्थिक और ढाँचागत (स्ट्रक्चरल) तौर पर मुश्किलों से जूझ रहा था। कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज, मणिपाल से पढ़ाई करने के बाद वे इंग्लैंड चले गए और वहाँ इंटरनल मेडिसिन, पब्लिक हेल्थ और अस्पताल प्रशासन जैसे क्षेत्रों में काम किया। वहाँ से वे अपने साथ सिर्फ़ अनुभव ही नहीं, बल्कि एक नया नज़रिया भी लेकर आए। वे एक ऐसी बात का महत्व समझते थे जिसे बहुत से लोग भूल जाते हैं—अस्पताल सिर्फ़ ऐसी इमारत नहीं है जहाँ स्वास्थ्य सेवा की सुविधा मिलती है; वे एक पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystems) होते हैं।

इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए कुछ बदलाव किए गए।

सबसे शुरुआती और अहम बदलावों में से एक था – कामकाज का तरीक़ा या गवर्नेंस।

साफ़ और पक्के दृष्टिकोण वाले नेतृत्व को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जबकि यही वह चीज़ है जो पूरे संस्थान को आगे बढ़ने में मदद करती है।

कई मिशन अस्पताल बहुत अच्छा काम करते हैं, लेकिन अक्सर वे कुछ ऐसे लोगों पर बहुत ज़्यादा निर्भर होते हैं जिन पर काम का बोझ बहुत ज़्यादा होता है और जिन्हें अकेले ही फ़ैसला भी लेना होता है। अक्सर ऐसा होता है कि जो युवा एमबीबीएस डॉक्टर सेवा के मकसद से आते हैं, उन्हें अचानक से मरीज़ों को देखने के अलावा सामान की ख़रीद-फ़रोख़्त, मानव संसाधन, बिजली की समस्याओं और कभी-कभी टपकती छत को ठीक करवाने जैसे कामों की ज़िम्मेदारी भी लेनी पड़ती है।

अच्छे डॉक्टर या मेडिकल एक्सपर्ट अपने-आप अच्छे प्रशासक नहीं बन जाते, उन्हें ट्रेनिंग की ज़रूरत होती है।

लोम्बार्ड मेमोरियल मिशन अस्पताल में, सबसे पहले एक प्रभावी कार्यकारी बोर्ड बनाने पर ज़ोर दिया गया। इसमें अस्पताल और अस्पताल के बाहर के सदस्य भी शामिल थे। इससे जवाबदेही और पारदर्शिता आई, और सबसे ज़रूरी बात यह हुई कि असहमतियों का भी स्वागत किया गया। ऐसी असहमति के स्वर को सुनने का फ़ायदा यह होता है कि संस्थाएँ ऐसी महंगी पड़ने वाली ग़लतियाँ कम करती हैं, और उनका ख़र्च मासिक बिजली बिल तक सीमित हो जाता है।

पहले बोर्ड मीटिंग्स में सिर्फ़ चाय-बिस्कुट के साथ रस्मी तौर पर कुछ चर्चाएँ-प्रार्थनाएँ होती थीं, मगर अब असल रणनीतिक चर्चाएँ होने लगीं। साफ़ और पक्के दृष्टिकोण वाले नेतृत्व को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जबकि असल में इसी की वजह से पूरी संस्था को आगे बढ़ने और तरक़्क़ी करने में मदद मिलती है।

मिशन अस्पताल आम तौर पर अपने वफ़ादार और पूरे लगन से काम करने वाले कर्मचारियों की वजह से ही चल पाते हैं। लेकिन बिना भागीदारी के वफ़ादारी का नतीजा आख़िर में निराशा ही पैदा करता है। स्टाफ़ के साथ लगातार मीटिंग और बातचीत से प्रशासन को समस्या सुलझाने में मदद मिली। समय रहते समस्याओं पर चर्चा हो जाती थी और उनका समाधान हो जाता था। साथ ही, जब स्टाफ़ अपने नेतृत्व के नज़रिए को अच्छी तरह समझता है, तो वह ख़ुद को सिर्फ़ कर्मचारी नहीं, बल्कि एक साझा सफ़र का हमसफ़र समझने लगता है।

अस्पताल के भीतर प्रयोगशाला और फ़ार्मेसी सेवाओं को मज़बूत करने से लागत कम करने और देखभाल को बेहतर बनाने में मदद मिली।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में अच्छा प्रशासन अक्सर परदे के पीछे होता है, वह ऑक्सीजन की तरह दिखाई नहीं देता है। जब तक इसकी कमी न हो जाए, किसी को इसका एहसास नहीं होता है। डॉ. जथन्ना ने जल्द ही यह समझ लिया था कि मज़बूत व्यवस्था के बिना अकेले डॉक्टर संस्थान को नहीं चला सकते, इसलिए एक प्रशासनिक टीम बनाई गई। समय के साथ होने वाले इन व्यवस्थित सुधारों की वजह से संस्थान को NABH प्रमाण-पत्र भी हासिल हुआ।

शिक्षा विकास का एक और मुख्य आधार बन गया।

आख़िरकार, ज्ञान बाँटने से बढ़ने वाला ख़ज़ाना है। नर्सिंग कॉलेज, अलाइड हेल्थ प्रोग्राम और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों के साथ-साथ नर्सिंग कॉलेज विकसित हुआ। इस कॉलेज ने स्थानीय समुदाय के स्वास्थ्य सेवा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने में मदद की। इससे संस्थान में काम करने वाले लोगों को बेहतर बनाने, उनकी संख्या बढ़ाकर मज़बूती देने तथा समुदाय के साथ उसका जुड़ाव को और गहरा करने में मदद की।

इसके बाद बहुत ज़रूरी व्यावहारिक फ़ैसले लिए गए, हालाँकि यह फैसले कम आकर्षक या धीमे थे और जिनका सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्य था।

अस्पताल के भीतर प्रयोगशाला और फ़ार्मेसी सेवाओं को मज़बूत करने से लागत कम करने और देखभाल को बेहतर बनाने में मदद मिली। बाहरी विशेषज्ञों पर निर्भर रहने के बजाय अस्पताल के भीतर अपने कंसल्टेंट्स तैयार करने से मरीज़ों का भरोसा बढ़ा और सेवाओं में मज़बूती आयी।

सबसे ज़रूरी बात यह थी कि प्रशासन ने धैर्य या सब्र की अहमियत को समझा।

स्टॉक मार्केट में निवेश की तरह, हर पहल से मुनाफ़ा होने की उम्मीद नहीं की जाती थी। कभी-कभी किसी सेवा के शुरू होने के बाद समुदाय को उस पर भरोसा होने में दो साल का वक्त लग जाता था।

आँख बंद करके तृतीयक देखभाल (tertiary-care) केंद्र की नकल करने के बजाय, अस्पताल ने अपने मरीज़ों के लिए ज़रूरी सेवाओं पर ध्यान दिया।

ज़ोरदार मार्केटिंग के नज़रिए को अपनाया गया। मिशन द्वारा चलाए जाने वाले संस्थान अक्सर मार्केटिंग को लेकर हिचकिचाते हैं, जैसे कि लोगों को सेवाओं के बार में जानकारी देना नैतिक रूप से कोई ग़लत काम हो। लेकिन असलियत साफ़ है: अगर समुदाय के लोगों को सेवाओं की जानकारी ही न हो, तो वे उनका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। अपनी ख़ूबियों के बारे में बताना और संवाद करना सीखना ज़रूरी था। धीरे-धीरे एक मार्केटिंग टीम बनाई गई। इस टीम ने लोगों से सीधे संपर्क किया, पैम्फ़लेट बाँटे, सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया, स्थानीय अख़बारों में ख़बर प्रकाशित कराई गई, स्थानीय न्यूज़ चैनलों के साथ टाई-अप हुआ और यहाँ तक कि रिसेप्शन और OPD एरिया में एक बड़ा डिजिटल सूचना बोर्ड भी लगाया गया।

मरीज़ एक टूटी-फूटी, रंग उड़ी हुई इमारत के आस-पास भी नहीं जाते थे, जिसे देखकर भरोसा न हो कि कब गिर जाए। अब, वे साफ़-सुथरे और चमचमाते कैंपस में आने लगे, जहाँ इमारतें ठीक-ठाक हालत में हैं, साफ़ साइनबोर्ड लगे हैं और सुनहरे अक्षरों की लिखावट है। अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा किए गए इन बाहरी बदलावों ने अस्पताल आने वाले लोगों का भरोसा जीत लिया। इससे आने वालों के दिल-ओ-दिमाग़ पर अच्छा असर हुआ।

हालाँकि, शायद सबसे दिलचस्प बात इसकी प्रासंगिकता रही है।

तृतीयक देखभाल (tertiary-care) केंद्रों की आँख मूँदकर नक़ल करने के बजाय अस्पताल ने अपने मरीज़ों के लिए ज़रूरी सेवाओं पर ध्यान दिया। जीवन-शैली से जुड़ी बीमारियों के बढ़ने और बुज़ुर्गों की संख्या में इज़ाफ़ा होने से उसी के अनुसार स्वास्थ्य सेवाएँ देने के तरीक़े में भी बदलाव किया जाना ज़रूरी है।

बुज़ुर्गों और गंभीर रूप से बीमार लोगों की देखभाल के लिए ख़ास घरों (Geriatric and Palliative Care Homes) की शुरुआत किया जाना भी एक ख़ास तरह का बदलाव था। इनसे समुदाय की बढ़ती ज़रूरतें पूरी हुईं और साथ ही देखभाल का एक ऐसा टिकाऊ मॉडल बना, जिसमें नर्सिंग सेवाओं का बेहतर इस्तेमाल हो सका। आज ये केंद्र पूरी तरह भरे हुए हैं और इनमें लम्बी वेटिंग लिस्ट है।

इसी तरह, कई तरह की विशेषज्ञ सेवाओं को मिलाकर ‘ओबेसिटी क्लिनिक’ (मोटापे के इलाज का केंद्र) शुरू किया गया। स्वास्थ्य से जुड़ी किसी ख़ास ज़रूरत के लिए कई सेवाओं को एक पैकेज के तौर पर एक साथ देने से अक्सर ज़्यादा मरीज़ आकर्षित होने लगे।

आगे बढ़ते हुए हर एक अस्पताल को कभी-न-कभी मुश्किल फ़ैसले लेने पड़ते हैं, जहाँ समझौता करना आसान, बेहतर या ज़्यादा फ़ायदेमंद लगता है।

हालाँकि, सबसे नये और भविष्योन्मुखी सोच रखने वाले कामों में से एक है ‘INSPIRE प्रोजेक्ट’।

भारत में लगभग 80% स्वास्थ्य सेवाएँ छोटे अस्पतालों द्वारा दी जाती हैं। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन (climate change) का ख़तरा बढ़ रहा है, स्वास्थ्य सेवाओं में सस्टेनेब्लिटी को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन होता जा रहा है। INSPIRE प्रोजेक्ट इसी मक़सद से शुरू किया गया था। इसका मुख्य लक्ष्य कचरा प्रबंधन, पानी बचाने, अक्षय ऊर्जा और सतत परिसर विकास पर था। अलग-अलग तौर पर देखें तो इनमें से कई उपाय छोटे लग सकते हैं, लेकिन इनके एक साथ मिल जाने से बड़े बदलाव हुए हैं।

सोलर पावर, हीट-पंप टेक्नोलॉजी और कम बिजली खपत वाले उपकरणों की मदद से यह सुनिश्चित किया गया कि अस्पताल के ज़रूरत की लगभग आधी ऊर्जा अक्षय स्रोतों से मिले और इसमें किए गए निवेश की भरपाई लगभग 3 साल में हो जाए। बारिश के पानी को इकट्ठा करने, पानी की रीसाइक्लिंग और कम पानी की खपत वाली व्यवस्था की वजह से पिछले तीन वर्षों में बाहर से पानी का टैंकर मँगाने की ज़रूरत नहीं पड़ी है। ये सुधार लोम्बार्ड परिवार के उदार सहयोग से मुमकिन हो पाए। उनकी ओर से लगातार मिलने वाला सहयोग अस्पताल के संस्थापक की स्थायी विरासत को दिखाती है।

दिलचस्प बात यह है कि लंबे समय टिके रहने का इरादा भी आर्थिक रूप से भी फ़ायदेमंद साबित हुआ है। इस प्रोजेक्ट का दायरा और बढ़ाया गया, ताकि समुदाय को सस्टेनेब्लिटी के बारे में जागरूक किया जा सके। कई मायनों में, यह स्वास्थ्य सेवा ढाँचा के मामले में “सोच ग्लोबल, काम लोकल” (Think Global, Act Local) का एक बेहतरीन उदाहरण बन गया। इन पहलों की वजह से अस्पताल को राष्ट्रीय पुरस्कारों और कमेटियों में पहचान मिली।

“मैथ्यू इफ़ेक्ट” (जिसका सम्बंध अक्सर पारेटो सिद्धांत से जोड़ा जाता है) हमें याद दिलाता है कि सीमित संसाधनों और सहयोग के साथ शुरुआत करके लगातार विकास करना कितना मुश्किल है। फिर भी, लगातार कोशिश, लगातार विस्तार और स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ विकास का सिलसिला लगातार बढ़ता जाता है।

और इन सबके बीच, एक सिद्धांत हमेशा बना रहा, वह है ‘नैतिकता’।

हर बढ़ते हुए अस्पताल को कभी-न-कभी मुश्किल फ़ैसले लेने पड़ते हैं, जबकि समझौता करना आसान, बेहतर या अधिक लाभदायक होता है। लगातार नैतिक तरीक़े से काम करना आसान नहीं होता है। लेकिन मिशन अस्पतालों की ज़िम्मेदारी बैलेंस शीट से कहीं बड़ी होती है। बड़े निजी अस्पताल लोगों की माँगों को पूरा करते हैं, जबकि हम समुदाय की ज़रूरतों पर ध्यान देते हैं। यह सफ़र दिखाता है कि नैतिकता और सस्टेनेब्लिटी को एक-दूसरे का दुश्मन होने की ज़रूरत नहीं है। असल में, लंबे समय में नैतिकता के साथ काम करने का फायदा मिशन अस्पतालों को मिलता है।

ये आँकड़े बदलाव की एक शानदार कहानी बयान करते हैं। 2014 के बाद से, अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीज़ों की सालाना संख्या दोगुनी से ज़्यादा हो गई है (1,723 से बढ़कर 4,019 मरीज़), जबकि लैब टेस्टिंग की संख्या लगभग तीन गुनी और माइक्रोबायोलॉजी टेस्टिंग की संख्या बीस गुनी बढ़ गई है। इन सुधारों का लाभ यह हुआ कि जो एडवांस्ड डायग्नोस्टिक सेवाएँ पहले सिर्फ़ बड़े सेंटरों में मिलती थीं, वे अब समुदाय के नज़दीक उपलब्ध हैं। इस वजह से अब अस्पताल में हर साल 10,000 से ज़्यादा नये मरीज़ आ पा रहे हैं।

“मैथ्यू इफ़ेक्ट” (जिसका संबंध अक्सर पारेटो सिद्धांत से जोड़ा जाता है) हमें याद दिलाता है कि सीमित संसाधनों और सहयोग के साथ शुरुआत करके लगातार विकास करना कितना मुश्किल है। फिर भी, लगातार कोशिश, लगातार विस्तार और स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ विकास का सिलसिला लगातार बढ़ता जाता है। अगर फंडिंग देने वालों की बात करें तो शुरुआत में वे सतर्क थे, लेकिन जैसे-जैसे साफ़ सुधार और सार्थक बदलाव दिखने लगे, उनका सहयोग लगातार बढ़ता गया।

लेकिन धीरे-धीरे, हमें उस मूल दृष्टिकोण की ओर लौटना होगा, जिसकी वजह से मिशनरियों ने मिशन अस्पताल शुरू किया था: वे इलाज करते हैं, हम देखभाल करते हैं।

यह कोई आदर्श स्थिति नहीं है। अभी भी राजनीति हो रही है। प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। हर व्यवस्था में कमियाँ होती हैं, काम के बीच निराशा हाथ लगती है, देरी और मुश्किल का सामना करना पड़ता है।

लेकिन शायद असल बात यही है।

यह कहानी उत्कृष्टता के बारे में नहीं है, लेकिन हमें उत्कृष्टता को प्रगति का शत्रु नहीं बनने देना चाहिए दें।

आज, अस्पताल सिर्फ़ अपने इतिहास के कंधों पर सवार होकर ही नहीं चल रहा है। यह आज के समय में अपनी प्रासंगिकता व ज़रूरत को बनाए हुए है। साथ ही उस भावना को भी आगे बढ़ा रहा है, जिसके साथ इसे लगभग एक सदी पहले शुरू किया गया था। यह कहानी किसी अस्पताल के सबसे बड़ा अस्पताल बनने की कहानी नहीं है। यह उस अस्पताल के फिर से ज़रूरी हो जाने की कहानी है।

शायद भारत में मिशन स्वास्थ्य सेवा का असली भविष्य यही है — हर बड़ी कॉर्पोरेट कम्पनी से आँख बंद करके मुक़ाबला करने के बजाये समुदायों को इतनी गहराई से समझना कि वे आपके बिना अपनी ज़िंदगी की कल्पना भी न कर सकें।