नौजवान अरुण के लिए एक शारीरिक चोट उसकी ज़िंदगी का बड़ा मोड़ साबित हुई। उसी की वजह से वह मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँचा। इसकी उसे ज़रूरत तो बहुत थी, लेकिन पहले उसकी पहुँच से बाहर थी।
अट्ठाईस वर्ष का यह युवक एक दुर्घटना के बाद मरहम-पट्टी करवाने फ़ाउंडेशन के बेंगलुरु के स्वास्थ्य केंद्रों में से एक में आया था। नर्स और डॉक्टर जब उसकी पट्टी कर रहे थे तो उन्होंने कुछ असामान्य-सा दिखाई पड़ा। बहुत गहरी और दर्दनाक चोट खाने के बावजूद अरुण बिल्कुल भी तड़प नहीं रहा था। उन्हें लगा कि कुछ तो गड़बड़ है। उन्होंने केंद्र पर मौजूद मानसिक स्वास्थ्य काउंसलर को सूचित किया।
माँ की मृत्यु के बाद से अरुण गहरे भावनात्मक संकट से गुज़र रहा है।
काउंसलर द्वारा बातचीत के कई प्रयासों के बाद अंततः अरुण खुला।
वह पाँच साल पहले मुंबई से हेब्बाल (बेंगलुरु) आया था। पहले वह अपने माता-पिता और भाई के साथ रहता था। अब वह अपने चाचा की कंपनी में सेल्समैन की नौकरी कर रहा है। इससे उसको बहुत मामूली आमदनी होती है। उसके माता और पिता लंबे समय से शराब का सेवन कर रहे थे। उसकी माँ शराब पीने से पैदा हुई बीमारी से हाल ही में चल बसी थी। पिता के साथ उसका रिश्ता अच्छा नहीं है, और उसका भाई दूसरे रिश्तेदारों के साथ अलग रहता है। माँ की मृत्यु के बाद से अरुण गहरे भावनात्मक संकट से गुज़र रहा है। इसके कारण उसने कई बार आत्महत्या का प्रयास किया। उसने इस सबको लेकर कभी किसी से मदद नहीं माँगी, क्योंकि उसे मदद तक पहुँचने का रास्ता नहीं मालूम था। उसके मदद के लिए कोई इंतजाम नहीं था और उसे लगता था कि डॉक्टर से मिलने के लिए एक दिन की मज़दूरी गँवाना उसके लिए संभव नहीं था।
उसके परिवार को उसकी हालत के बारे में बताया गया। वे शुरू में उसके इलाज में मदद करने से कतरा रहे थे। वे कुछ हद तक तो मानसिक स्वास्थ्य और दवाओं से जुड़ी अपनी धारणाओं के कारण कतरा रहे थे और कुछ तो इसलिए कि इलाज के दौरान अरुण काम पर नहीं जायेगा तो आर्थिक संकट खड़ा हो जायेगा।
अकेले संघर्ष करते हुए वह अपने दर्द को चुपचाप सहता रहा। तभी सौभाग्य से एक शारीरिक चोट उसे हमारे स्वास्थ्य केंद्र तक ले आई।
काउंसलर समझ गया कि अरुण गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है। उसने उसे एक विशेष अस्पताल में भेजा। वहाँ जाकर पता चला कि उसे एक पर्सनॅलिटी डिसऑर्डर है। उसके परिवार को उसकी हालत के बारे में बताया गया। वे शुरू में उसके इलाज में मदद करने से कतरा रहे थे। वे कुछ हद तक तो मानसिक स्वास्थ्य और दवाओं से जुड़ी अपनी धारणाओं के कारण कतरा रहे थे और कुछ तो इसलिए कि इलाज के दौरान अरुण काम पर नहीं जायेगा तो आर्थिक संकट खड़ा हो जायेगा।
काउंसलर ने अरुण के परिवार के साथ कई बार चर्चा की और उन्हें उसकी हालत और उपचार के महत्त्व को समझने में मदद की। धीरे-धीरे वे तैयार हो गए और अस्पताल में अरुण की नियमित थेरेपी शुरू हो गई। तब से उसके परिवार ने उसके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव होते देखे हैं।
बहुत से लोगों को नहीं पता होता कि वे कहाँ जाएँ, कैसे मदद माँगे और मदद उपलब्ध भी है या नहीं। यह इस बात को रेखांकित करता है कि हमें मानसिक स्वास्थ्य को दूसरे या तीसरे दर्जे की सेवा मानने के बजाय प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का एक अनिवार्य अंग मानना चाहिए।
अरुण स्वास्थ्य केंद्र में नियमित काउंसलिंग के लिए आता है और अपनी कुछ दवाएँ वहीं से ले जाता है। वह जानता है कि ज़रूरत पड़ने पर मदद के लिए कहाँ और कैसे संपर्क करना है। घर के नज़दीक ही स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध होने से, अब उसे अपनी स्वास्थ्य-संबंधी ज़रूरतों के लिए काम से पूरे दिन की छुट्टी नहीं लेनी पड़ती।
अरुण की कहानी एक बड़ी सच्चाई को उजागर करती है : जहाँ शारीरिक बीमारियों पर तुरंत ध्यान दिया जाता है, वहीं मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दिक़्क़तें अक्सर अदृश्य बनी रहती हैं। बहुत से लोगों को नहीं पता होता कि वे कहाँ जाएँ, कैसे मदद माँगे और मदद उपलब्ध भी है या नहीं। यह इस बात को रेखांकित करता है कि हमें मानसिक स्वास्थ्य को दूसरे या तीसरे दर्जे की सेवा मानने के बजाय प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का एक अनिवार्य अंग मानना चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) को मज़बूत बनाना लोगों की देखभाल तक पहुँच के तरीके को बदल सकता है। ये केन्द्र पहले से ही ज़्यादातर इलाक़ों में मौजूद हैं और लंबे समय से सस्ती, सुलभ और परिचित स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसेमंद केंद्र रहे हैं। इन केंद्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को जोड़ने से उनके बारे में लोगों को पता चलता है, लोगों की हिचक कम होती है और इलाज के रास्ते में आड़े आने वाला आर्थिक व व्यावहारिक बोझ घटता है।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्वाभाविक रूप से सामुदायिक भागीदारी के लिए भरोसेमंद जगहें हैं। आशा कार्यकर्ताओं को बुनियादी मानसिक स्वास्थ्य का प्रशिक्षण देना ताकि वे मानसिक अस्वस्थता के लक्षणों को पहचान सकें। गर्भावस्था देखभाल या ग़ैर-संक्रामक रोगों पर समुदाय के साथ की जाने वाली नियमित बातचीत में मानसिक स्वास्थ्य-संबंधी संदेशों को भी शामिल करने से भावनात्मक ख़ुशहाली पर चर्चा आम बन सकती है। जब भरोसेमंद स्वास्थ्यकर्मी तनाव, नींद या मनोदशा के बारे में पूछते हैं, तो लोगों को इससे यह संकेत मिलता है कि ये चिंताएँ जायज़ हैं और इनका इलाज किया जाना चाहिए। इससे मानसिक स्वास्थ्य पर लगे शर्म के धब्बे को दूर करने में मदद मिलती है।
केंद्र के प्रशिक्षित कर्मचारी मरीज़ों के साथ छोटे और व्यवस्थित परामर्श सत्र कर सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर बुनियादी दवाएँ शुरू कर सकते हैं। विशेष अस्पतालों में ले जाने के लिए स्पष्ट रेफ़रल मिलने से, अधिक गंभीर लक्षणों वाले व्यक्तियों का समय पर इलाज सुनिश्चित हो पाता है।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ जागरूकता तक सीमित न रहते हुए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को ठोस और व्यावहारिक चिकित्सीय उपायों के जरिये मज़बूत कर सकते हैं। नियमित ओ.पी.डी. विजिट के दौरान सरल प्रश्नों की मदद से मानसिक अस्वस्थता की शुरुआती पहचान की जा सकती है। केंद्र के प्रशिक्षित कर्मचारी मरीज़ों के साथ छोटे और व्यवस्थित परामर्श सत्र कर सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर बुनियादी दवाएँ शुरू कर सकते हैं। विशेष अस्पतालों में ले जाने के लिए स्पष्ट रेफ़रल मिलने से, अधिक गंभीर लक्षणों वाले व्यक्तियों का समय पर इलाज सुनिश्चित हो पाता है। फ़ॉलो-अप और दवाओं की फिर से उपलब्ध कराने का काम भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संभाल सकते हैं। इससे मरीज़ों को बार-बार यात्रा करने की जरूरत नहीं पड़ती और वे अपने उपचार में निरंतरता बनाए रख पाते हैं।
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लेकिन ज़्यादातर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मानसिक स्वास्थ्य की ज़रूरतों को पूरी तरह से पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था में जोड़ने की लगातार कोशिशों के बावजूद, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी, मानकीकृत प्रोटोकॉल के अभाव और समर्पित सेवाओं की कमी के कारण प्राथमिक स्तर की मानसिक स्वास्थ्य सेवा अब भी अपनी पहुँच और प्रभावशीलता में बहुत सीमित है। इन कमियों के चलते अरुण जैसे लोगों को समय पर मदद नहीं मिल पाती और अक्सर मदद तब लेनी पड़ती है, जब स्थिति संकट में बदल जाती है।
अरुण की कहानी को देखते हुए हमारा पक्का विश्वास है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा ही मानसिक स्वास्थ्य सेवा की धुरी है। प्रशिक्षित और संवेदनशील कर्मचारियों, स्पष्ट प्रोटोकॉल व सामुदाय से संवाद की व्यवस्थाओं और जरूरी स्क्रीनिंग उपकरणों व दवाओं से लैस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मानसिक स्वास्थ्य-संबंधी परेशानियों के लिए सबसे अहम सहारा बन सकते हैं। रूटीन स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक स्वास्थ्य को शामिल करने से समस्याओं की समय पर पहचान संभव हो पाती है, उससे जुड़ी बेजा शर्म कम होती है और सुलभ व निरंतर देखभाल सुनिश्चित होती है। जब मानसिक स्वास्थ्य प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का अभिन्न अंग बन जाता है, तब मदद लोगों के और क़रीब पहुंचती है। इससे अरुण जैसे अनेक लोगों का जीवन सचमुच बदल सकता है।
