आपने देखा होगा कि बड़े-बड़े निजी अस्पताल, जो अब निजी इक्विटी (स्टॉक निवेश) से लबालब हैं, कितने भव्य हो गए हैं। पिछले दिनों ऐसे ही एक अस्पताल में एक ‘ग्राहक अनुभव अधिकारी’ ने मेरा स्वागत किया और मुझे एक प्रतीक्षा कक्ष में बिठाया। ज़ाहिर है यह चमक-दमक और मेहमाननवाज़ी केवल ऊपर-ऊपर की होती है। मैं बचपन से ही अस्पतालों के चक्कर लगाता आया हूँ। एक बात जो इतने बरसों में भी नहीं बदली है, वह है अस्पतालों की अमानवीयता और अपारदर्शिता।
जैसे-जैसे मैंने स्वास्थ्य क्षेत्र को और बेहतर तरीके से समझना शुरू किया, वैसे-वैसे मेरी यह समझ और पुख़्ता होती गई कि मेरे बुरे अनुभव उस बीमारी के महज़ लक्षण भर हैं जिसने कई अस्पतालों को अपनी गिरफ़्त में लिया हुआ है। उस बीमारी का नाम है ईमान का नष्ट होना।
शिक्षण की ही तरह, पहले चिकित्सा भी सेवा का काम हुआ करती थी। सत्तर के दशक में, बंबई के एक उपनगर में स्थित हमारे पारिवारिक डॉक्टर के क्लिनिक में समाज के हर तबक़े के मरीज़ आया करते थे। वे उनमें से बहुतों का मुफ़्त इलाज करते थे। कावेरी के किनारे बसे मेरे गाँव के डॉक्टर की कोई तयशुदा फ़ीस नहीं थी, बावजूद इसके कि वहाँ मीलों तक कोई दूसरा डॉक्टर नहीं था। प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमतानुसार नक़द या किसी वस्तु के रूप में भुगतान करता था।
चिकित्सा के उद्देश्य में विचलन का पहला संकेत मैंने नब्बे के दशक की शुरुआत में देखा, जब मेरे एक सहपाठी को एक निजी कॉलेज में मेडिकल सीट पाने के लिए एक मोटी रक़म चुकानी पड़ी। वह अब अमेरिका का एक संपन्न न्यूरोसर्जन है, तो स्पष्ट रूप से उसका निवेश सफल रहा।
जैसे-जैसे मैंने स्वास्थ्य क्षेत्र को और बेहतर तरीके से समझना शुरू किया, वैसे-वैसे मेरी यह समझ और पुख़्ता होती गई कि मेरे बुरे अनुभव उस बीमारी के महज़ लक्षण भर हैं जिसने कई अस्पतालों को अपनी गिरफ़्त में लिया हुआ है। उस बीमारी का नाम है ईमान का नष्ट होना।
पिछले तीस वर्षों में निजी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है। इनमें से अधिकांश व्यावसायिक प्रकृति के हैं। वे आमदनी व मुनाफ़े से प्रेरित होते हैं। मध्यवर्ग की बढ़ती हुई माँग पर खड़े इन उद्यमों ने हमारे देश की चिकित्सकीय क्षमता को काफ़ी बढ़ाया है और उपचार की नई प्रणालियाँ उपलब्ध कराई हैं।
मैं ऐसे ही एक बड़े अस्पतालों की चेन के प्रमोटर को जनता हूँ। वे स्वयं एक सम्मानित डॉक्टर हैं और देश में अत्याधुनिक चिकित्सा सेवाओं को लाना चाहते थे। उन्होंने कभी केवल अमीरों की पहुँच में आने वाली जीवन-रक्षक सर्जरियों को बहुतों के लिए किफ़ायती और सुलभ बनाने में सफलता हासिल की है।
लेकिन आपका शुरुआती मकसद जो भी हो, जब आप कोई कारोबार चलाते हैं तो अंततः कारोबार का अपना मकसद आपके दूसरे मकसदों पर हावी हो जाता है। लगातार बढ़त दिखाने के दबाव वाले बाजार में मैंने इस अस्पतालों की चेन को भी धीरे-धीरे बदलते हुए देखा है। ‘मरीज के लिए जो सही है, वह करो’ की शुरुआती सोच धीरे-धीरे भर्ती दर, आमदनी और मुनाफ़ा जैसे व्यावसायिक संकेतकों में तब्दील हो गई।
और यह किसी अकेले की कहानी नहीं है। भारत के ज्यादातर मशहूर अस्पताल ब्रांड आज निजी पूँजी के नियंत्रण में हैं। उनकी पहली प्राथमिकता व्यापार में वृद्धि और मुनाफ़ाखोरी हैं, जिससे कि वे अपने निवेश को कहीं ज़्यादा क़ीमत पर भुना सकें।
‘मरीज के लिए जो सही है, वह करो’ की शुरुआती सोच धीरे-धीरे भर्ती दर, आमदनी और मुनाफ़ा जैसे व्यावसायिक संकेतकों में तब्दील हो गई।
इसी तरह, यह भी अब किसी से छिपा नहीं है कि ज़्यादातर निजी मेडिकल कॉलेज पैसे कमाने वाली मशीनें हैं। आज की तारीख़ में अगर किसी को सरकारी कॉलेज में सीट नहीं मिलती, तो उसे पीजी डॉक्टर बनने में कई करोड़ रुपए ख़र्च करने पड़ जाते हैं। ऐसे डॉक्टरों के पास इसके सिवा कोई चारा नहीं बचता कि वे ऊँची आमदनी के अवसरों की तलाश करके इस ख़र्च को वापस वसूलें।
फिर ये डॉक्टर उन्हीं व्यावसायिक अस्पतालों से जुड़ जाते हैं, जहाँ उनकी आय इस बात पर निर्भर करती है कि वे जाँच, स्कैन, दवा और सर्जरी के ज़रिए अस्पताल के लिए कितनी आमदनी पैदा करते हैं। अब जब मैं ऐसे किसी अस्पताल में दाख़िल होता हूँ तो मुझे भलीभाँति पता होता है कि मैं सिर्फ़ एक मरीज़ नहीं, बल्कि आमदनी का स्रोत हूँ। इसलिए मैं वहाँ अपनी ज़िम्मेदारी पर प्रवेश करता हूँ।
इस पूरे तंत्र ने चिकित्सा को एक सामाजिक सेवा से व्यवसाय में बदल दिया है, और स्वास्थ्य सेवा में बहुत सी परतें बना दी हैं। किसी व्यक्ति को कैसी स्वास्थ्य सेवा मिलेगी, यह बहुत हद तक एक इस बात पर निर्भर करता है कि उसका परिवार कितना ख़र्च उठा सकता है। ग़रीब तबक़ा इलाज के लिए निदान और दवाई वितरण करने वाले दवाखानों, स्थानीय झोलाछाप डॉक्टरों और ऐसे छोटे निजी क्लिनिकों पर निर्भर है जहाँ दर्द-निवारक और स्टेरॉयड इंजेक्शन और आईवी ही हर बीमारी का प्राथमिक इलाज हैं। जबकि जो लोग अधिक साधन-संपन्न हैं, वे किसी महँगी निजी प्रैक्टिस या व्यावसायिक अस्पताल में चले जाते हैं।
अब जब मैं ऐसे किसी अस्पताल में दाख़िल होता हूँ तो मुझे भलीभाँति पता होता है कि मैं सिर्फ़ एक मरीज़ नहीं, बल्कि आमदनी का स्रोत हूँ। इसलिए मैं वहाँ अपनी ज़िम्मेदारी पर प्रवेश करता हूँ।
जब स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवा व्यवसाय बन जाती है तो वह नैतिक रूप से भी भ्रष्ट होती है। इस बदलाव को ही मैं ईमान का नष्ट होना कहता हूँ।
निश्चित रूप से अब भी कुछ ऐसे मेडिकल कॉलेज और निजी अस्पताल मौजूद हैं जो इन परस्पर-विरोधी उद्देश्यों और दबावों के बीच संतुलन बनाकर चलते हैं। लेकिन वे अब मुख्यधारा के रुझान का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
क्या इस बीमारी का कोई इलाज है? कुछ का मानना है कि कायदे-कानून से इसमें कुछ मदद मिल सकती है। आख़िरकार राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (नेशनल मेडिकल कमीशन) का गठन भारतीय चिकित्सा परिषद (मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया) की ज्यादतियों के चलते ही किया गया था। लेकिन लोगों का मानना है कि इससे कुछ ख़ास बदलाव नहीं आया है। नियमों में तो बहुत सारे बना दिये गये हैं, लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों की समस्याग्रस्त प्रथाएँ पहले की तरह ही जारी हैं। फिर भी यदि हमारे देश की नीतियाँ सुस्पष्ट हों और सार्वजनिक वस्तुओं व सेवाओं के ‘कारोबारीकरण’ के विरुद्ध हों तो इससे कुछ मदद तो ज़रूर मिलेगी।
वहीं कुछ दूसरे लोग मानते हैं कि कारोबारी होड़ से हमें फायदा होगा। लेकिन हम पहले ही देख चुके हैं कि बाज़ार का क्या प्रभाव पड़ा है। हालाँकि सार्वजनिक और सेवा की भावना से प्रेरित संस्थाओं के बीच सकारात्मक होड़ हो तो कुछ उम्मीद जरूर जगती है।
जब हमने बंगलुरु की वंचित बस्तियों में स्वास्थ्य सेवाएँ शुरू कीं तो समुदाय के लोगों को अपने केंद्रों पर आने के लिए राज़ी करना ख़ासा मुश्किल था। वे मानते थे कि हम मुफ़्त में इलाज कर रहे हैं तो हम खराब इलाज ही करेंगे। लेकिन समय, प्रयास और मौखिक प्रचार के साथ हमने उन्हीं लोगों के बीच हमारी सेवाओं की माँग को बढ़ते हुए देखा। आज वे परिवार किसी निजी क्लिनिक या अस्पताल में तभी जाते हैं जब हम उनका इलाज करने में असमर्थ होते हैं।
हाल ही में अपनी माँ के घुटने के प्रत्यारोपण के लिए हमने शहर के एक सेवाभाव से प्रेरित ‘मिशन’ अस्पताल को चुना। उनकी सर्जरी की गुणवत्ता और देखभाल के स्तर से हम वाक़ई ख़ुश थे। हम यह भी जानते हैं कि उस सर्जरी से हुई आमदनी उसी अस्पताल में किसी ऐसे मरीज़ के इलाज में मदद करेगी जो उसका ख़र्च नहीं उठा सकता।
हम जिन ग्रामीण ज़िलों में काम करते हैं, वहाँ के सरकारी अस्पतालों में माँ-बच्चे की देखभाल में साफ़-साफ़ बेहतरी दिखाई पड़ रही है। कई समुदाय अब प्रसव के लिए निजी क्लीनिकों के बजाय इन्हीं अस्पतालों को चुनते हैं।
इन दिनों बहुत से मेडिकल उम्मीदवार सरकारी मेडिकल कॉलेज को सिर्फ़ कम फीस की वजह से ही तरजीह नहीं देते हैं, बल्कि वे ऐसे कॉलेज इसलिए भी चुनते हैं कि उनसे जुड़े शिक्षण अस्पतालों में उन्हें मरीज़ों का बहुत तरह-तरह का केस लोड मिलता है। इसके कारण वहाँ की चिकित्सकीय शिक्षा कहीं अधिक व्यापक होती है। चिकित्सा बुनियादी तौर पर एक सेवा-उन्मुख पेशा है। जब वह सस्ती और अच्छी गुणवत्ता की होती है और उसे सही मूल्यों से प्रेरित होकर किया जाता है, तो छात्र भी उससे जुड़ी नैतिकता को आत्मसात करते हैं। तब वे पैसे के लिए नहीं बल्कि सेवा के लिए चिकित्सा के पेशे को चुनते हैं।
हम जिन ग्रामीण ज़िलों में काम करते हैं, वहाँ के सरकारी अस्पतालों में माँ-बच्चे की देखभाल में साफ़-साफ़ बेहतरी दिखाई पड़ रही है।
नियम-कानून बनाने का अपना महत्व है लेकिन स्वास्थ्य सेवा के बढ़ते व्यावसायीकरण को असल चुनौती शायद तब मिलेगी जब आम आदमी को बेहतर विकल्प नज़र आएँगे। ऐसी कोशिश सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और सेवाभाव वाले स्वास्थ्य संगठन, दोनों की ओर से हो रही है। आज हम भले ही सार्वजनिक स्वास्थ्य के मूल आदर्शों से दूर हो गये हों, लेकिन मुझे उम्मीद और विश्वास है कि हम फिर से उन्हीं जड़ों की ओर लौटेंगे।
