कर्मचारी राज्य बीमा योजना
कर्मचारी राज्य बीमा योजना (ई.एस.आई.एस.) की शुरुआत 1948 के कर्मचारी राज्य बीमा (ई.एस.आई.) अधिनियम के तहत हुई थी। कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ई.एस.आई.सी.) द्वारा स्वीकृत राज्य ई.एस.आई. सोसाइटी के ढाँचे के मुताबिक़ राज्यों के लिए अपने-अपने राज्य-स्तरीय संस्थाओं का पंजीकरण करना अनिवार्य कर दिया गया। बेहतर और प्रभावी वित्तीय प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए ईएसआईसी सीधे सोसायटी के बैंक खाते में धनराशि जारी करता है। यह योजना 1952 से एक समतामूलक, समावेशी और ज़िम्मेदार सामाजिक सुरक्षा प्रणाली का बुनियादी अंग रही है।
ई.एस.आई.एस. को एक सुरक्षा योजना के रूप में तैयार किया गया है, जो बीमारी, मातृत्व, विकलांगता या काम से जुड़ी चोट की स्थिति में चिकित्सा सुविधाएँ और नकद लाभ प्रदान करती है। इसमें नियोक्ता वेतन के 3.25% का और कर्मचारी 0.75% का योगदान करते हैं।
स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सामाजिक ज़िम्मेदारी का स्पष्ट प्रतीक मानी जाने वाली इस योजना को बहुत सारी अपेक्षाओं के साथ शुरू किया गया था। समय के साथ इसका विस्तार हुआ और आज यह औपचारिक क्षेत्र के 3.4 करोड़ से अधिक कामगारों को सुरक्षा प्रदान करती है। इसे एक व्यापक अंशदायी बीमा के रूप में लाया गया था, लेकिन यह योजना आज भी अपने वादों को पूरी तरह साकार नहीं कर पाई है।
अनुसंधान ट्रस्ट के साथी केंद्र ने महाराष्ट्र में ई.एस.आई. अस्पतालों और डिस्पेंसरी के कामकाज और प्रदर्शन को समझने के लिए एक अध्ययन किया है। ई.एस.आई.एस. के पंजीकृत लाभार्थियों की सबसे अधिक संख्या इसी राज्य में है।
साथी, अनुसंधान ट्रस्ट ने ईएसआई अस्पतालों और औषधालयों के कामकाज और प्रदर्शन को समझने के लिए एक अध्ययन किया है। यह अध्ययन महाराष्ट्र में किया गया, जो ईएसआईएस के तहत पंजीकृत लाभार्थियों की सबसे अधिक संख्या वाला राज्य है।
सत्तर सालों से ज़्यादा पुरानी यह योजना वर्तमान में अनिश्चितताओं के घेरे में है। इस पर निजीकरण, बढ़ते केंद्रीकरण और डिजिटलीकरण का दबाव है। इस संदर्भ में साथी के अध्ययन से उभरने वाली अलग-अलग आवाज़ें हमारे सामने कुछ महत्त्वपूर्ण वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं, जो न सिर्फ़ महाराष्ट्र के लिए बल्कि पूरे देश के लिए प्रासंगिक हैं।
साथी द्वारा किए गए शोध के उद्देश्य इस प्रकार हैं : (1) स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता का मूल्यांकन करना, (2) योजना से जुड़ी चुनौतियों का आकलन करना, और (3) योजना के उपयोगकर्ताओं के अनुभवों में सुधार के लिए नीतिगत समाधानों की पहचान करना। इसके तहत राज्यभर के ई.एस.आई. अस्पतालों और डिस्पेंसरी के कामकाज का निम्न बातों के संदर्भ में मूल्यांकन किया गया : (1) मरीज़ों के अनुभवों का अन्वेषण, (2) राज्य में ई.एस.आई.एस. के तहत स्वास्थ्य देखभाल आपूर्ति का आकलन, (3) वेतन की सीमा से जुड़ी समस्याएँ, (4) बुनियादी ढाँचे (इंफ़्रास्ट्रक्चर) की ख़ामियाँ, (5) पैनल में शामिल अस्पतालों की चुनौतियाँ, और (6) प्रणालीगत कमियाँ।
राज्य स्तर पर ई.एस.आई.एस. के उपयोग, कामकाज और सुलभता से जुड़े दूसरे स्तर के आँकड़ों (सेकंडरी डेटा) का अध्ययन किया गया। जहाँ आँकड़े उपलब्ध थे, वहाँ कुछ पहलुओं की जाँच राष्ट्रीय स्तर पर भी की गई। ई.एस.आई.सी. वेबसाइट से प्राप्त पिछले पाँच-दस वर्षों की राष्ट्रीय ई.एस.आई.एस. वार्षिक रिपोर्टें अध्ययन के प्रमुख स्रोतों में से एक थीं।
इसके अतिरिक्त, प्रमुख हितधारकों के साथ 81 गहन साक्षात्कार किए गए। श्रमिकों के साथ कुल 42 व्यक्तिगत साक्षात्कार किए गए; साथ ही 117 श्रमिकों के साथ 13 सामूहिक साक्षात्कार भी किए गए। महाराष्ट्र के सात ज़िलों में ई.एस.आई.एस./ई.एस.आई.सी. द्वारा संचालित 11 अस्पतालों में सुविधाओं का अवलोकन किया गया। अध्ययन में पाया गया कि महाराष्ट्र की ई.एस.आई.एस. प्रणाली में नीति और संचालन दोनों ही स्तरों पर अनेक कमियाँ हैं।
शासन व्यवस्था : यह योजना केंद्रीय ई.एस.आई. निगम और राज्य-स्तरीय ई.एस.आई. सोसाइटी द्वारा संयुक्त रूप से चलाई जाती है। कर्मचारियों की नियुक्ति और बुनियादी ढाँचे में सुधार सरीखे बड़े फ़ैसले बहुस्तरीय, केंद्रीकृत मंज़ूरियों में अटके रहते हैं।
इससे प्रक्रिया में देरी होती है, सवालों के जवाब नहीं मिलते, और जवाबदेही की कमी होती है। स्थानीय सहभागिता को बढ़ावा देने के लिए जिन शासन समितियों का गठन किया गया था (जैसे कि स्थानीय समितियाँ, एच.डी.सी. और क्षेत्रीय बोर्ड), वे बहुत प्रभावी नहीं हैं।
“ई.एस.आई.एस. प्रणाली के भीतर ख़ासी अव्यवस्था है, क्योंकि इसमें राज्य और केंद्र सरकारें दोनों शामिल हैं, जो स्पष्ट अधिकार के अभाव में ‘दोहरी नियंत्रणकारी संस्थाओं’ की तरह पेश आते हुए एक-दूसरे पर जिम्मेदारियों डालती रहती हैं। राज्य सरकार केंद्र सरकार से धनराशि का अनुरोध करती है, लेकिन उस राशि के ख़र्च पर राज्य का बहुत कम नियंत्रण होता है।” (ई20, ए.एम.ओ. अधिकारी)
वित्तीय आवंटन : हालाँकि ई.एस.आई.सी. के पास ₹74,348 करोड़ का सरप्लस जमा है, फिर भी इसका बहुत ही कम हिस्सा सुविधाओं की बेहतरी में लगाया जाता है। साल 2020 से इन निधियों के निवेश के तरीक़े में एक बड़ा बदलाव आया है – अब ये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बजाय से कॉरपोरेट पोर्टफ़ोलियो में निवेश की जा रही हैं।
“यदि राज्य को ₹100 प्राप्त हुए, तो केवल ₹20–30 ही ई.एस.आई. अस्पतालों को आवंटित किए गए; बाक़ी धनराशि अन्य विभागों की ओर मोड़ दी गई।” (ई31, चिकित्सा अधीक्षक)
ख़ासकर वित्त वर्ष 2022–23 में महाराष्ट्र से अंशदान के रूप में ₹2,752 करोड़ इकट्ठा किए जाने के बावजूद, राज्य में केवल ₹997 करोड़ ही ख़र्च किए गए। महाराष्ट्र में प्रति व्यक्ति ई.एस.आई.एस. ख़र्च सिर्फ़ ₹1,727 है, जबकि पूरे देश का औसत ₹3,557 है।
पहुँच : ई.एस.आई. को लेकर एक गंभीर शिकायत यह है कि वह अपने कई संभावित हक़दारों तक पहुँचती ही नहीं है। उसके सुरक्षा दायरे में केवल औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी ही आते हैं। दुर्भाग्य से इससे भारत का लगभग 90% श्रमबल, जो अनौपचारिक क्षेत्र में है, बाहर रह जाता है।
इसके अलावा ₹21,000 प्रति महीने की वेतन सीमा, ख़ास तौर पर शहरों में, पुरानी और अप्रासंगिक हो चुकी है।
“उनका वेतन ₹21,000 से बढ़कर ₹21,200 हो गया, नतीजतन ठेकेदार ने उनसे कह दिया कि वे अब ई.एस.आई. कवरेज की हक़दार नहीं रहीं। उन्हें उच्च रक्तचाप और मधुमेह है और वे अपनी दवाइयों के लिए ई.एस.आई. पर निर्भर करती हैं।” (एक कचरा बीनने वाली महिला का अनुभव)
महाराष्ट्र में प्रॉविडेंट फ़ंड का भुगतान करने वाले 88 लाख श्रमिक ई.एस.आई.एस. के लिए पंजीकृत नहीं हैं। इस फ़ासले की कई वजहें हैं।
- योजना के फ़ायदों के बारे में कम जागरूकता का होना
- नियोक्ताओं द्वारा हक़दारों की संख्या कम बताया जाना
- संविदा श्रमिकों और आउटसोर्स किए गए कर्मचारियों को शामिल न करना
- डिजिटलीकरण और दस्तावेज़ीकरण से जुड़ी समस्याएँ
बुनियादी ढाँचा और मानव संसाधन : महाराष्ट्र के 36 ज़िलों में से केवल सात ज़िलों में ही ई.एस.आई. अस्पताल मौजूद हैं। इन अस्पतालों की कुल संख्या केवल 15 है, जिनमें से आठ मुंबई के आसपास केंद्रित हैं।
इन अस्पतालों में लगभग 19,200 बिस्तरों की ज़रूरत है, लेकिन सिर्फ़ 2,980 बिस्तर ही स्वीकृत हुए हैं, और इनमें से भी केवल 1,580 बिस्तर बनवाए गए हैं। और इन 1,580 बिस्तरों में से लगभग 40% बिस्तर चालू हालत में नहीं हैं। कई इमारतें और बिस्तर मरम्मत की राह देख रहे हैं। महाराष्ट्र के ई.एस.आई. अस्पतालों में एक भी चालू आई.सी.यू. बिस्तर नहीं हैं।
ई.एस.आई. अस्पतालों से जुड़ी ज़्यादातर सुविधाएँ बुरे हाल में हैं, चाहे वह उनका पुराना बुनियादी ढाँचा हो या उनके इस्तेमाल न होने वाले पुराने चिकित्सकीय उपकरण। बहुत से पुराने ई.एस.आई. केंद्र जर्जर और ख़राब रखरखाव वाली इमारतों में हैं। इन अस्पतालों में कुशल कर्मचारियों की भी कमी है।
“यहाँ के बिस्तर तक इतने पुराने और घटिया गुणवत्ता के हैं कि मरीज़ों की सुविधा के लिए हम उन्हें ईंटें लगाकर ऊँचा करते हैं।” (ई31, चिकित्सा अधीक्षक)
हक़दार श्रमिकों में जागरूकता की कमी : नियोक्ता जानकारी का पहला स्रोत होता है; उसके स्तर पर संसाधनों की कमी, कम उपस्थिति और समय पर जानकारी देने की अपर्याप्त क्षमता चुनौतियाँ पैदा करती हैं।
“असली मुद्दा नियोक्ता का नज़रिया है। नियोक्ताओं के सहयोग के बिना हम जागरूकता शिविर आयोजित नहीं कर सकते।” (ई42, ई.एस.आई. स्थानीय कार्यालय सहायक)
पंजीकरण और दस्तावेज़ीकरण : श्रमिकों के पास ई.एस.आई. संख्या का होना काफ़ी नहीं होता; एक्टिवेशन के लिए अतिरिक्त प्रक्रियाएँ पूरी करनी पड़ती हैं। कई श्रमिकों को इन समस्याओं का तब तक पता नहीं चलता, जब तक वे बीमार नहीं पड़ते।
“श्रमिक जब काग़ज़ात जमा करते हैं या दावा करने आते हैं, उन्हें पता चलता है कि उनके दस्तावेज़ अपडेटड नहीं हैं या उनका आधार नहीं जुड़ा है।” (ई25, ए.एम.ओ. कार्यालय के कर्मचारी)
साल 2000 के बाद डिजिटलीकरण और उसके बाद ऑनलाइन पंजीकरण शुरू किए गए थे। इसके फ़ायदे तो हैं मगर यह प्रक्रिया श्रमिकों के लिए चुनौतीपूर्ण है, ख़ासकर इसलिए कि ज़्यादातर श्रमिक कम पढ़े-लिखे हैं। ओ.टी.पी. प्रणाली में श्रमिकों के पास चालू स्मार्टफ़ोन का होना ज़रूरी होता है, जिसके न होने पर उनकी पहुँच और कम हो जाती है।
“अगर काग़ज़ी काम पूरा न हो और आधार कार्ड न जुड़ा हो, तो सहायक अस्पताल को भुगतान नहीं किया जाएगा।” (ई26, डिस्पेंसरी में चिकित्सा अधिकारी)
नियोक्ताओं की सहभागिता : नियोक्ताओं द्वारा संभावित और वास्तविक कवरेज में अंतर होता है। इस वजह से श्रमिक बड़े पैमाने पर इस योजना से बाहर रह जाते हैं। हालाँकि नियोक्ताओं द्वारा नियम का पालन न किए जाने के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सकती है, फिर भी श्रमिक या उनकी यूनियनें ऐसा करने में दिलचस्पी नहीं दिखातीं, क्योंकि अगर कोई मामला दायर किया जाता है तो उसके निपटारे में सालों साल लग जाते हैं।
“नए जी.आर. के मुताबिक़ अगर कोई शिकायत है, तो उसे ‘केंद्रीय निरीक्षण प्रणाली’ (सी.आई.एस.) में दर्ज करना होगा। फिर उसे राष्ट्रीय स्तर पर भेजा जाएगा। राष्ट्रीय स्तर से मंज़ूरी मिलने के बाद ही मामले का निरीक्षण किया जा सकता है।” (ई18, श्रमिक अधिवक्ता, मुंबई)
उपलब्ध स्वास्थ्य देखभाल : महाराष्ट्र में ई.एस.आई. से जुड़ी कई चुनौतियों को देखते हुए अब मरीज़ों को ज़िला अस्पतालों या दूसरे सामान्य सरकारी अस्पतालों में भेजा जा रहा है। बिबवेवाड़ी अस्पताल को छोड़कर, जिसने 96% बिस्तर इस्तेमाल में होने की सूचना दी है, महाराष्ट्र के ई.एस.आई. अस्पतालों में बिस्तरों के इस्तेमाल की दर 0% से 64% के बीच है, जो 70–80% के वांछनीय मानक से बहुत नीचे है। पंद्रह में से नौ अस्पतालों में बिस्तर उपयोग 40% से भी कम था।
महाराष्ट्र में ई.एस.आई.एस. अस्पतालों में इलाज करवाने गए श्रमिकों ने देरी, जाँच के लिए लंबा इंतज़ार, अस्पताल के कई चक्कर काटने, और नैदानिक व विशिष्टीकृत सेवाओं के अभाव की सूचना दी, जिसके चलते उनका बार-बार रेफ़रल होता रहा। उन्होंने यह भी बताया :
“अगर उनके पास दवाएँ नहीं होतीं तो वे एक पर्ची दे देते हैं, लेकिन जो लोग केवल आठ से दस हज़ार रुपये कमाते हैं उनके लिए इससे बहुत मुश्किल हो जाती है। वे उन दवाओं का ख़र्च नहीं उठा सकते।” (ई45, ट्रेड यूनियन प्रतिनिधि, कोल्हापुर)
परिवर्तन के लिए अनुशंसाएँ
- महाराष्ट्र में ई.एस.आई. में सुधार के लिए राज्य सरकार को और अधिक प्रतिबद्ध और जवाबदेह होने की ज़रूरत है।
- ई.एस.आई.सी. द्वारा ई.एस.आई. को दिए जा रहे वित्त पोषण के पैमाने और निरंतरता में बढ़ोतरी करने की ज़रूरत है।
- ई.एस.आई. का विस्तार करके छूटे हुए हक़दार श्रमिकों को उसमें शामिल किया जाना चाहिए।
- बुनियादी ढाँचे में सुधार और नियमित कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोतरी ज़रूरी है।
- निजी अस्पतालों में रेफ़रल और शुल्क-वापसी से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए।
- दस्तावेज़ीकरण की प्रक्रिया को सरल बनाना और प्रक्रियागत या पंजीकरण से जुड़ी बाधाओं को हटाना ज़रूरी है।
- श्रमिक जागरूकता, पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- शासन से जुड़ी प्रमुख समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए।
- ई.एस.आई. को धीरे-धीरे अनौपचारिक श्रमिकों तक ले जाने की ज़रूरत है।
निष्कर्ष : अगर कंपनियों की तरफ़ से कर्मचारी कल्याण को लेकर पक्की प्रतिबद्धता हो, और साथ ही ई.एस.आई.एस. सभी श्रमिकों तक समान रूप से पहुँचकर उन्हें सेवाएँ प्रदान करे, तो श्रमिकों के लिए एक कहीं बेहतर स्वास्थ्य मंच और विकल्प खड़ा किया जा सकता है।
