नन्ही अनुरागी ने बताया कि “मेरी बेटी रूबी सिर्फ़ 13 महीने की है। वह अक्सर बीमार पड़ जाती है। वह घर में बनने वाला आम खाना खाने के लिहाज़ से अभी बहुत छोटी है। मैं उसे स्तनपान कराती हूँ और वह स्थानीय दुकान से कुछ स्नैक्स जैसे पाइप फ्राइम्स (पोंगा), मिक्सचर, चिप्स, कुरकुरे जैसी चीज़ें खा लेती है। आंगनवाड़ी दीदी ने मुझे कई बार रूबी को सरकारी पोषण रिहाबिलिटेशन सेंटर (एनआरसी) ले जाने के लिए कहा है। वह कहती हैं कि मेरी बेटी रूबी का वज़न बहुत कम है। लेकिन, मैं अपने घर का काम छोड़कर दो सप्ताह के लिए एनआरसी नहीं जा सकती हूँ।”
नन्ही अनुरागी मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले की बचपन से ही कुपोषण से जूझ रहे बच्चों की माताओं में से एक हैं। POSHAN की ज़िला पोषण प्रोफ़ाइल के मुताबिक छतरपुर ज़िला, मध्य प्रदेश के सबसे ज़्यादा कुपोषित जिलों में से एक है। सन 2020-21 में पांच साल से कम उम्र वाले 34.6% बच्चों का वज़न कम था, जो कुल मध्य प्रदेश राज्य के औसत 33.0% से भी बढ़कर है। पूरे भारत में कुपोषण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों में शारीरिक विकास की कमी, धीमा बौद्धिक विकास, संक्रामक रोग और दूसरी तरह की बीमारियों के लक्षण बड़े पैमाने में पाए जाते हैं।

इस बारे में बारीकी से देखने पर पता चलता है कि कुपोषण की गंभीर समस्या से लड़ने के लिए सामुदायिक स्तर पर की गई कोशिशें काफ़ी कारगर साबित होती हैं। गंभीर रूप से कुपोषण (SAM) से जूझ रहे लगभग 80% बच्चों का इलाज घर पर ही किया जा सकता है। इन बच्चों की घर पर देखभाल करने के लिए समय पर देखभाल, सही मशविरा और इनके स्वास्थ्य की लगातार निगरानी करना ज़रूरी होता है।
एनईआरएस: एक सामुदाय-आधारित समाधान
बेथेस्डा हॉस्पिटल सोसाइटी की व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा परियोजना (सीपीएचसीपी) छतरपुर ज़िले के नौगांव ब्लॉक में चलती है। यह परियोजना पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवा गुणवत्ता और पोषण परिणामों को बेहतर बनाने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सिस्टम के साथ मिलकर काम करती है। इस परियोजना के तहत, कुपोषण से निपटने के लिए छह गांवों में पोषण शिक्षा रिहाबिलिटेशन सत्र (एनईआरएस) आयोजित किए गए। इसके आयोजन के लिए गाँव के अलग-अलग समुदायों को प्रेरित किया गया। यहाँ इस पहल को “बाल सुपोषण शिविर” नाम से जाना जाता है।

NERS का मकसद बच्चों के खान-पान, साफ़-सफ़ाई और देखभाल का ध्यान रखने वाली माताओं या देखभाल करने वालों के ज्ञान, दृष्टिकोण, अभ्यास और कौशल (KAPS) को विकसित करना है। ताकि, कुपोषण के शिकार बच्चों की पोषण के हालातों को बेहतर बनाया जा सके। इमैनुएल हॉस्पिटल एसोसिएशन (EHA) के सामुदायिक स्वास्थ्य विभाग द्वारा विकसित किया गया यह मॉड्यूल एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) के स्नेह शिविर के मॉडल से मिलता-जुलता है।
स्नेह शिविर भारत में आईसीडीएस मिशन के तहत एक समुदाय-आधारित इनेशिएटिव है। इसे बच्चों में मौजूद मध्यम और गंभीर स्तर के कुपोषण को दूर करने के लिए बनाया गया है। ये शिविर पोषण, स्वच्छता और भोजन से जुड़ी आदतों के बारे में माताओं को “करते हुए सीखने” के लिए प्रेरित करता है। इसके तहत ज़्यादा कुपोषण दर वाले आंगनवाड़ी केंद्रों (AWC) में 12 दिनों के शिविर आयोजित किए जाते हैं। इसके लिए अक्सर “सामूहिक दृष्टिकोण” (cluster approach) अपनाया जाता है, जहाँ एक आंगनवाड़ी केंद्र के आसपास के 4-5 केंद्रों में यह सेवा पहुँचाई जाती है। स्नेह शिविर के तहत व्यवहारिक स्तर पर भोजन और स्वच्छता की आदतों का सकारात्मक विकास करने के लिए मॉड्यूल और गतिविधियाँ तैयार की गई। इसके तहत “सुपोषण कुंजी” (पोषण हैण्डबुक) और पोषण-स्वास्थ्य शिक्षा सत्रों की एक शृंखला आयोजित की जाती है। इसका मकसद माता-पिता, बच्चों और देखभाल करने वाले लोगों को समुदाय-आधारित पोषण रिहाबिलिटेशन कार्यक्रम में शामिल करना है।

संरचना और प्रशिक्षण का डिज़ाइन
NERS पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों की माताओं या देखभाल करने वाले लोगों के लिए किया जाने वाला 12 दिनों का कार्यक्रम है।यह सत्र हर दिन लगभग तीन घंटे (सुबह 11:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक) आयोजित किए जाते हैं। इस कार्यक्रम की समयावधि प्रतिभागियों की घरेलू ज़िम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए तय की जाती है। इसमें ज़्यादा-से-ज़्यादा भागीदारी करवाकर लोगों को प्रशिक्षित किया जाता है। जिसके तहत कई तरह के उदाहरण देते हुए, तरह-तरह के व्यावहारिक अभ्यासों द्वारा लोगों को प्रशिक्षित किया जाता है।
स्थानीय ज़रूरतों को ध्यान में रखकर प्रशिक्षण का डिज़ाइन तैयार किया जाता है:
- समूह-आधारित की जगह ग्राम-आधारित बनाया गया है।
- स्थानीय स्तर की बाल स्वास्थ्य की परिस्थितियों पर आधारित तैयार किया गया है।
- केंद्र-आधारित देखभाल की जगह हर दो सप्ताह पर घर-आधारित लगातार देखभाल (fortnightly follow-up) पर ज़ोर दिया गया है।
यह प्रशिक्षण शिविर तीन स्तरों पर आयोजित किया गया था:
- CPHCP टीम और सामुदायिक कॉर्डिनेटर्स के लिए प्रशिक्षकों को तीन दिनों तक प्रशिक्षण दिया गया।
- इस शिविर से सफल आयोजन के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं (AWWs) की दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।
- शिविर में ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों की भागीदारी और आगे काम करते रहने के लिए ग्राम प्रेरकों के लिए दो दिनों की प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कार्यान्वयन और परिणाम
महाराजपुर और कुर्राहा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में वज़न मापने के अभियान के तहत ऐसे छह गाँवों की पहचान की गई, जहाँ बच्चों में कुपोषण की उच्च दर थी। दीवारों पर संदेश लिखकर और घर-घर जागरूकता अभियान चलाकर समुदाय में जागरूकता पैदा की गई। यह सत्र अगस्त-सितंबर, सन 2025 में पंचायत राज संस्था (पीआरआई) सदस्यों की भागीदारी के साथ आयोजित किया गया।

ANM ने पहले और बारहवें दिन पर बच्चों की फिर से जांच की गई। उनके शुरूआती वज़न को दर्ज किया और स्वास्थ्य जांच की। गहरे कुपोषण के शिकार छह बच्चों को आगे के ऊपरी के स्वास्थ्य केंद्रों में भेजा गया। चार बच्चों को छतरपुर ज़िला अस्पताल के पोषण रिहाबिलिटेशन केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया गया और एक को महाराजपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा गया। दूसरे बच्चों को विटामिन ए और कृमिनाशक (deworming) दवा दी गई। दो सप्ताह बाद कृमिनाशक दवा फिर से दी गई।

इस प्रक्रिया में कुल 115 बच्चों ने हिस्सा लिया। इनमें से 86% (यानी 100) बच्चों की देखभाल करने वाले लोग सभी बारह दिन मौजूद रहें। माताओं ने प्रोटीन मिक्स तैयार करने के लिए अपने ही इलाके में मिलने वाली चीज़ें ले आईं। इन चीज़ों में बड़ी मात्रा प्रोटीन वाली खाने-पीने की चीज़ें पदार्थ शामिल थी। इस शिविर में हिस्सा लेने वाले लोगों को खाने-पीने का तरीका, साफ़-सफ़ाई और हाथ धोने का सही तरीके बताए गए और उसका हर दिन अभ्यास कराया गया।

बारहवें दिन तक हर एक बच्चे का वज़न औसतन 278 ग्राम बढ़ गया। अगले तीन महीनों में हर 15 दिन पर हर एक घर का जाकर निरीक्षण किया गया। इससे यह पता चला कि हर बच्चे का वज़न औसतन 845 ग्राम बढ़ गया था।
ध्यान देने योग्य मुख्य बिंदु
- देखभाल करने वालों के ज्ञान, दृष्टिकोण और खान-पान संबंधी आदतों में सुधार
- स्थानीय रूप से तैयार पौष्टिक खाद्य पदार्थों का ज़्यादा इस्तेमाल
- जंक फूड का सेवन कम होना
- स्वच्छता एवं हाथ धोने जैसी आदतों में सुधार
- आंगनवाड़ी पोषण आपूर्ति का बेहतर इस्तेमाल
- आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा कुपोषण की पहचान करने की सक्रियता में बढ़ोतरी
- 12 दिनों के भीतर कम वज़न वाले 24% बच्चों में सुधार और कुपोषण (वेस्टिंग) में 36% तक का सुधार हुआ
इन नतीजों ने आईसीडीएस अधिकारियों का काफ़ी हौसला बढ़ाया, जिससे उन्होंने एनईआरएस को दूसरे भी कई गांवों में इसे लागू करने की सिफारिश की।
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भविष्य की योजना
NERS का अनुभव यह दिखाता है कि अगर सरकार और गैर-सरकारी संगठनों की मिली-जुली कोशिशों से सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जाए और देखभाल करने वालों की क्षमता बढ़ाई जाए, तो बाल्यावस्था में होने वाली कुपोषण की समस्या को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है। इस सफल प्रयास को आगे बढ़ाते हुए, इस कार्यक्रम को ज़्यादा-से-ज़्यादा गांवों में लागू करने की योजना बनाई जा रही है, ताकि कई और बच्चों को कुपोषण से बचाया जा सके और इसके आगे लंबे वक्त तक बेहतरीन नतीजे निकल कर आए।

नन्ही अनुरागी ने कहा कि “मेरी बेटी रूबी ने घर का बना खाना खाना शुरू कर दिया है और मैंने उसे जंक फूड देना बंद कर दिया है। यह मेरे लिए बेहद ख़ुशी की बात है कि सिर्फ 12 दिनों में उसका वज़न 300 ग्राम बढ़ गया। हम पूरी टीम के शुक्रगुज़ार हैं, जिन्होंने हमारे गाँव में ही हमें अपने कुपोषित बच्चों की देखभाल करने के लिए, हमें प्रशिक्षण दिया और इस दिशा में लगातार कोशिशें की।”
