सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कभी भी अच्छे विचारों की कमी नहीं रही है। हम जानते हैं कि क्या प्रभावी है चाहे वह ओआरएस (ओरल रेहाईड्रेशन थेरेपी) से लेकर टीकाकरण तक का मामला हो या फिर सुरक्षित प्रसव प्रथाओं से लेकर तंबाकू नियंत्रण तक। फिर भी अलग-अलग देशों और समुदायों में एक ही तरह के हस्तक्षेप के परिणाम बहुत अलग दिखाई देते हैं। कुछ बदलाव समाज में जड़ें जमा लेते हैं और पीढ़ियों तक बने रहते हैं, जबकि कुछ बदलाव थोड़े समय बाद समाप्त हो जाते हैं। सवाल यह नहीं है कि हमारे पास प्रभावी स्वास्थ्य तकनीकें हैं या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि उनमें से केवल कुछ ही हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा क्यों बन पाती हैं।
स्वास्थ्य का सांस्कृतिक विकास (CEH) का ढाँचा एक आसान सी बात से शुरू होता है कि स्वास्थ्य में स्थायी सुधार तभी होता है जब व्यवहार केवल ‘नियमों के पालन’ से आगे बढ़कर संस्कृति में रच-बस जाते हैं। स्वास्थ्य संबंधी आदतें, भाषाओं या सामाजिक मान्यताओं की तरह विकसित होती हैं। वे सीखे जाते हैं, साझा किए जाते हैं, प्रतीकों में बदलते हैं और धीरे-धीरे स्वाभाविक लगने लगते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम तब सफल होते हैं, जब वे इस सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया के साथ काम करते हैं, न कि उसे नज़रअंदाज़ करके बदलाव थोपने की कोशिश करते हैं।
दस्त (डायरिया) के लिए नमक-चीनी का घोल सिर्फ इसलिए सफल नहीं हुआ कि वह वैज्ञानिक रूप से बहुत सटीक या उत्कृष्ट था, बल्कि इसलिए सफल हुआ क्योंकि उसे सिखाने, नाम देने और प्रदर्शित करने का तरीका घरेलू प्रथाओं और माताओं के पारंपरिक ज्ञान के अनुकूल था।
स्वास्थ्य का सांस्कृतिक विकास (CEH) इस यात्रा को विभिन्न चरणों में समझाता है। पहला चरण है सांस्कृतिक असंगति1 का। यह वह स्थिति है जब लोगों की पुरानी मान्यताएँ उनके अनुभवों को समझाने में असफल होने लगती हैं। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश में बच्चों की व्यापक मृत्यु ने ऐसी ही स्थिति पैदा की, जिसने नए समाधान स्वीकार करने की जगह बनाई। जब तक लोगों को भीतर से यह महसूस न हो कि पुरानी पद्धति पर्याप्त नहीं है, तब तक स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता। व्यवहार परिवर्तन के कई अभियान इसी महत्वपूर्ण चरण की अनदेखी कर देते हैं।
परिवर्तन को स्थायी बनाने के लिए, व्यवहारों का ’सामाजिक मानदंडों में शामिल होना’ (नॉर्म इनकॉर्पोरेशन) जरूरी है। वह व्यवहार हमारी सामूहिक पहचान का हिस्सा बन जाना चाहिए, ताकि लोग यह महसूस करें कि हमारे जैसे लोग तो इसी तरीके को अपनाते हैं (हमारे समाज में तो ऐसा ही किया जाता है)। ऐसे में, उस आदत को छोड़ने पर किसी कानूनी कार्रवाई का डर नहीं, बल्कि समाज की टोका-टाकी या बिरादरी से अलग-थलग पड़ जाने का डर होता है।

लेकिन केवल सांस्कृतिक विसंगति (डीसोनेन्स) उत्पन्न होना ही पर्याप्त नहीं है। इसके बाद सांस्कृतिक नवाचार का होना जरूरी है: यानी केवल एक बायोमेडिकल (जैव-चिकित्सा) समाधान प्रस्तुत कर देना ही काफी नहीं है, बल्कि उस समाधान को स्थानीय श्रेणियों, रूपकों और दिनचर्या के अनुरूप ढालना भी ज़रूरी है।
दस्त (डायरिआ) के उपचार के लिए नमक-चीनी का घोल इसलिए सफल नहीं हुआ क्योंकि वह वैज्ञानिक रूप से सटीक था, बल्कि इसलिए सफल हुआ क्योंकि उसे सिखाने, नाम देने और प्रदर्शित करने का तरीका घरेलू प्रथाओं और माताओं के पारंपरिक ज्ञान के अनुकूल था।
एक बार जब सांस्कृतिक विसंगति (डिसोनेन्स) महसूस होने लगती है और उसका उत्तर देने वाला सांस्कृतिक नवाचार सामने आता है, तब व्यवहार का प्रसार सामाजिक संचार 2 (सोशल ट्रांसमिशन) के जरिये होने लगता है। लोग मुख्य रूप से पोस्टरों या नियमों (प्रोटोकॉल) से नहीं सीखते, बल्कि वे अपने पड़ोसियों, बुजुर्गों, साथियों और विश्वसनीय मध्यस्थों से सीखते हैं। यही कारण है कि ‘नॉर्थ कारेलिया’ की हृदय रोग क्रांति से लेकर ज़िम्बाब्वे के ‘फ्रेंडशिप बेंच’ तक, हर सफल हस्तक्षेप में सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, महिला समूह और पीयर काउंसलर (साथी सलाहकार) महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभरते हैं। इसके बावजूद केवल सामाजिक शिक्षण ही निरंतरता की गारंटी नहीं है। परिवर्तन को स्थायी बनाने के लिए, व्यवहारों का ’सामाजिक मानदंडों में शामिल होना’ (नॉर्म इनकॉर्पोरेशन) आवश्यक है। वह व्यवहार हमारी सामूहिक पहचान का हिस्सा बन जाना चाहिए, ताकि लोग यह महसूस करें कि- हमारे जैसे लोग तो इसी तरीके को अपनाते हैं (हमारे समाज में ऐसा ही किया जाता है)। ऐसे में, उस आदत को छोड़ने पर किसी कानूनी कार्रवाई का डर नहीं, बल्कि समाज की टोका-टाकी या बिरादरी से अलग-थलग पड़ जाने का डर होता है।
स्वास्थ्य का सांस्कृतिक विकास यह समझने में मदद करता है कि कई बेहतर ढंग से तैयार किए गए कार्यक्रम क्यों विफल हो जाते हैं। वे केवल जानकारी देने, सुविधाएँ पहुँचाने या कुछ समय के लिए लोगों को उस आदत से जोड़ने तक जाकर रुक जाते हैं। वे उन गहरी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं पर ध्यान नहीं देते जो समय के साथ किसी व्यवहार को टिकाऊ बनाए रखती हैं।
किसी भी बदलाव का आखिरी और सबसे ज़रूरी हिस्सा उसे ’रिवाज़’ (नॉर्म) बना देना है। अक्सर इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। कोई भी अच्छी स्वास्थ्य आदत सिर्फ एक ‘डॉक्टरी सलाह’ बनकर कभी कामयाब नहीं होती। वह लोगों की भावनाओं, सही-गलत की समझ और उनकी पहचान से जुड़ जाती है। मिसाल के तौर पर, ’कंगारू मदर केयर’ (बच्चे को छाती से चिपकाकर रखना) अब सिर्फ एक इलाज की तकनीक नहीं रह गई है, बल्कि इसे एक ’अच्छी माँ’ की पहचान मान लिया गया है। इसी तरह, ’ग्रीन बेल्ट मूवमेंट’ ने पेड़ लगाने को सिर्फ पर्यावरण का काम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और देश प्रेम से जोड़ दिया। जब सेहत से जुड़ी आदतें इस तरह भावनाओं और प्रतीकों से जुड़ जाती हैं, तो वे सिर्फ समकालीनों के बीच (दोस्तों के बीच याने कि क्षैतिज रूप से) ही नहीं फैलतीं, बल्कि बुजुर्गों से बच्चों तक (लंबवत रूप से) एक ‘सांस्कृतिक विरासत’ के रूप में पहुँचने लगती हैं।

स्वास्थ्य का सांस्कृतिक विकास यह समझने में मदद करता है कि कई बेहतर ढंग से तैयार किए गए कार्यक्रम क्यों विफल हो जाते हैं। वे केवल जानकारी देने, सुविधाएँ पहुँचाने या कुछ समय के लिए लोगों को उस आदत से जोड़ने तक जाकर रुक जाते हैं। वे उन गहरी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं पर ध्यान नहीं देते जो समय के साथ किसी व्यवहार को टिकाऊ बनाए रखती हैं। इसके विपरीत, स्वास्थ्य का सांस्कृतिक विकास यह भी स्पष्ट करता है कि सीमित संसाधनों में भी सफलता कैसे संभव है: जब वैज्ञानिक तथ्यों को सामाजिक मूल्यों का आधार मिलता है तो व्यवहार व्यक्तिगत पहचान बन जाता है और सरकारी नीतियाँ कागजों से निकलकर लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बन जाती हैं। बीमारियों के बदलते स्वरूप, जनसंख्या के बदलाव और तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण जैसी जटिल चुनौतियों का सामना कर रहे भारत जैसे देशों के लिए ’स्वास्थ्य के सांस्कृतिक विकास’ का सिद्धांत विनम्रता भी पैदा करता है और आशा भी जगाता है। ‘विनम्रता’ इसलिए, क्योंकि संस्कृति को रातों-रात या मशीनी ढंग से नहीं बदला जा सकता और ‘आशा’ इसलिए, क्योंकि जब सार्वजनिक स्वास्थ्य गंभीरता से संस्कृति के साथ जुड़ता है, तो बदलाव केवल ऊपरी स्तर पर ही नहीं, बल्कि स्थायी होता है।
