डॉ. संजना ब्रह्मवर मोहन और डॉ. पवित्र मोहन ने उदयपुर के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विशेषज्ञ की स्थायी नौकरी से अपने करियर की शुरुआत की थी। हालाँकि उन्हें लगा कि हाशिए पर मौजूद समुदायों का स्वास्थ्य उन्हें बहुत बेचैन करता है। इस बेचैनी ने उन्हें बीएचएस की स्थापना के लिए प्रेरित किया। बीएचएस एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो राजस्थान के दूरदराज और वंचित इलाकों तक उच्च गुणवत्ता और कम लागत वाली प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुंचाने के लिए समर्पित है।
पारंपरिक भूमिकाओं से परे
जिन समुदायों की वे मदद करना चाहते थे, उन्हें सबसे बेहतर सेवा देने के लिए 2012 में बीएचएस की स्थापना करने से पहले दोनों डॉक्टरों ने एडवांस स्टडीज में दाखिला लिया। डॉ. पवित्र मोहन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और डॉ. संजना ने महामारी विज्ञान (एपिडेमियोलॉजी) में विशेषज्ञता हासिल की।
यूनिसेफ के साथ डॉ. पवित्र के काम और पोषण पर डॉ. संजना के शोध जैसे अपने विविध अनुभवों के चलते उन्होंने पाया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन अब भी “अंतिम छोर” पर मौजूद समुदायों तक नहीं पहुँच पा रहा है। उन्होंने महसूस किया कि इस कटी हुई आबादी तक पहुँचने के लिए केवल चिकित्सकीय विशेषज्ञता से काम नहीं चलेगा। इसके लिए बुनियादी ढाँचे की सीमाओं को पार करने और सामाजिक दूरियों को घटाने की जरूरत है।
स्वास्थ्य सेवा का नया मॉडल
डॉक्टरों ने अपने अमृत क्लीनिक के लिए एक अनोखा बॉटम-अप (पहले निचले स्तर पर ध्यान देने वाला) मॉडल विकसित किया। उनके इस दृष्टिकोण की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:
- नर्स-केन्द्रित देखभाल: देखभाल केंद्र पर नर्सों को रखना, जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टरों की मदद मिलती है। कारण यह कि नर्सें जिस समुदाय को सेवा प्रदान करती हैं, उसके साथ अक्सर उनके ज्यादा मजबूत सामाजिक संबंध बनते हैं।
- अंदरूनी क्षेत्रों तक पहुँच: ऐसे इलाकों में जहाँ कई पुरुष काम के लिए गाँव से बाहर चले जाते हैं, वहाँ महिलाओं और बुजुर्गों की सीमित आवाजाही को ध्यान में रखते हुए आबादी के करीब क्लीनिक स्थापित करना।
- सम्पूर्ण सेवाएँ: जीवन के सभी चरणों पर स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध करना। इसमें मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से लेकर मलेरिया और टीबी जैसे संक्रामक रोगों समेत मधुमेह और उच्च रक्तचाप की गंभीर स्थितियों का इलाज शामिल है। यहाँ तक कि गंभीर कुपोषण के अधिकांश मामलों को उन्होंने स्थानीय स्तर पर हल कर लिया।
समुदाय आधारित सफलता
दीर्घकालीन संपर्क और बातचीत के जरिये भरोसा पैदा करना उनके काम का एक केंद्रीय तत्व है। उन्होंने सामुदायिक सलाहकार समूहों की स्थापना की। ये सलाहकार समूह निवासियों को क्लीनिकों की निगरानी करने, स्वास्थ्य शिक्षा को बढ़ावा देने और स्वास्थ्य प्रणाली को जवाबदेह बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। चिकित्सीय देखभाल के अलावा उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के मूल कारणों को भी हल करने की कोशिश की। छह महीने से लेकर पाँच साल तक के बच्चों की देखभाल के लिए उन्होंने डे-केयर सेंटर (फुलवाड़ियाँ) की शुरुआत की। बच्चों में कुपोषण को रोकने के लिहाज़ से यह एक महत्त्वपूर्ण अवधि (उम्र) होती है, जिसे पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणालियाँ अक्सर नज़रंदाज़ कर देती हैं। डॉ. संजना और डॉ. पवित्र ने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से यह दिखा दिया कि प्रभावी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा एक साझी कोशिश है, जिसकी जड़ें समुदाय की गरिमा में होती हैं।
हम डॉ. संजना और डॉ. पवित्र का साक्षात्कार साझा कर रहे हैं।
