जब लोग बीमार पड़ते हैं, तो वे कई बार अस्पताल या डॉक्टर के पास नहीं जाना चाहते हैं। बीमार पड़ने पर अक्सर लोग अपनी नज़दीकी दवाई की दुकान चले जाते हैं।
यह बात भारत के हर हिस्से पर बराबर लागू होती है। जब बच्चे को बुख़ार होता है, तब भी माता-पिता दवाई की दुकान से दवाई लेने पहुँच जाते हैं। बूढ़े-बड़े लोग भी अपनी कमज़ोरी या चक्कर आने की वजहों को जानने-समझने के लिए इसी फ़ार्मासिस्ट के पास जाते हैं। मधुमेह या उच्च रक्तचाप यानी ब्लड प्रेशर से जुझ रही व्यक्ति भी दवाई ख़रीदने और अपने छोटे-मोटे सवाल लेकर फ़ार्मासिस्ट के पास चले जाते हैं। कई लोगों के लिए फ़ार्मासिस्ट अक्सर जान पहचान के और घर के आस पास होते हैं। यह दवाई की दुकान अक्सर सस्ती और देर-रात तक खुली रहने वाली भी होती है।
इसका कतई यह मतलब नहीं है कि यह फ़ार्मासिस्ट ही डॉक्टर होते हैं। इसका यह भी मतलब नहीं है कि फ़ार्मासिस्ट को हर तरह की बीमारी का इलाज करने की अनुमति दे दी जाए। यह काफ़ी ख़तरनाक हो सकता है। गलत दवाई देने, हद से ज़्यादा एंटिबायोटिक्स देने और डॉक्टर के पास पहुँचने में देरी से काफ़ी बड़ा नुकसान हो सकता है।
फ़ार्मासिस्ट समाज में रचे-बसे होते हैं, उसके नज़दीक होते हैं और लोगों का उन पर भरोसा होता है। इसके बावजूद, इस व्यवस्था को और बेहतर बनाने की कोशिश की जा सकती है। प्राथमिक देखभाल सुविधाओं में फ़ार्मासिस्ट की भूमिका बेहतर बनाने और ज़रूरत को पूरा करने लिए उन्हें बेहतर प्रशिक्षण देकर आसानी से इस्तेमाल किए जाने लायक टूल्स मुहैया कराने होंगे। इसके साथ ही, हमें फ़ार्मासिस्ट के बारे में न सिर्फ़ स्पष्ट नियम बनाने होंगे, बल्कि उन्हें डॉक्टरों से जोड़ने और ज़रूरत के मुताबिक डॉक्टर के पास रेफर करने को लेकर जानकारी में भी उनकी में बढ़ोतरी करनी होगी।
इसके साथ ही हमें व्यवहार में जो हो रहा है, उसे भी ध्यान में रखना होगा। यह फ़ार्मासिस्ट पहले से ही लोगों की ज़िंदगी में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल का अहम हिस्सा हैं। अब सवाल यह है कि, क्या हमें इसे ऐसे ही अनौपचारिक रूप से और बगैर किसी देखरेख के होते रहने देना चाहिए, या फिर हमें आगे चलकर ज़्यादा सुरक्षित, बेहतर प्रशिक्षित, एक-दूसरे की मदद करने लिए आपस में जुड़ा हुआ बेहतर स्वास्थ्य सिस्टम बनाने की कोशिश करनी चाहिए।
एक लेख (https://doi.org/10.3389/fpubh.2023.1221439) में भारत और बांग्लादेश में जारी फ़ार्मेसी से जुड़े स्वास्थ्य कार्यक्रमों की जांच-पड़ताल की गई है। इस जांच-पड़ताल में पाया गया कि पहले संपर्क बिंदु यानी सबसे पहले पहुँच सकने वाली जगह के रूप में यह फ़ार्मेसी बिलकुल सही जगहों पर बनी हुई हैं। फ़ार्मासिस्ट समाज में रचे-बसे होते हैं, उसके नज़दीक होते हैं और लोगों का उन पर भरोसा होता है। इसके बावजूद, इस व्यवस्था को और बेहतर बनाने की कोशिश की जा सकती है। प्राथमिक देखभाल सुविधाओं में फ़ार्मासिस्ट की भूमिका बेहतर बनाने और ज़रूरत को पूरा करने लिए उन्हें बेहतर प्रशिक्षण देकर आसानी से इस्तेमाल किए जाने लायक टूल्स मुहैया कराने होंगे। इसके साथ ही, हमें फ़ार्मासिस्ट के बारे में न सिर्फ़ स्पष्ट नियम बनाने होंगे, बल्कि उन्हें डॉक्टरों से जोड़ने और ज़रूरत के मुताबिक डॉक्टर के पास रेफर करने को लेकर जानकारी में भी उनकी में बढ़ोतरी करनी होगी।
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यह कोई नामुमकिन या नया विचार नहीं है। आज कई देशों में फ़ार्मासिस्टों को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। फ्रांस कई बड़े व व्यापक काम फ़ार्मासिस्टों से करवाता है। इन ज़िम्मेदारियों में प्रोटोकॉल आधारित सेवाएँ भी शामिल हैं। ब्राज़ील, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, ब्रिटेन, अर्जेंटीना और ईरान जैसे देश भी फ़ार्मासिस्टों को कुछ महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ देने के लिए चुनते हैं। इन सेवाओं में ब्लड प्रेशर और मधुमेह की जांच करना, दवाइयों जांच-परख करना, बीमारियों पर नज़र बनाए रखना जैसी ज़िम्मेदारियाँ शामिल हैं। ध्यान रहे कि इन देशों में डॉक्टरों की जगह फ़ार्मासिस्टों को नहीं दे दी गई है, बल्कि यहाँ फ़ार्मासिस्टों को सिर्फ़ वही ज़िम्मेदारियाँ सौंपी गई है, जिन्हें वे सुरक्षित तरीके से कर सकते हैं।
भारत को इसी तरह के व्यावहारिक नज़रिए की ज़रूरत है।
यह प्लैटफॉर्म ख़ासतौर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और झारखण्ड जैसे कम आमदनी वाले राज्यों के 200 से ज़्यादा ज़िलों के 1,500 से भी ज़्यादा फ़ार्मेसियों में सफलतापूर्वक काम कर चुका है।
एक फ़ार्मेसी स्वास्थ्य सेवाओं को पहुँचाने में आसान, लेकिन बेहद ज़रूरी काम कर सकती है। यहाँ ब्लड प्रेशर की जांच की जा सकती है। यहाँ लोगों को दवाई लेने-खाने-पीने से जुड़ी मदद भी की जा सकती है। यहाँ से मधुमेह या हाइपरटेंशन से जूझ रहे लोगों को इलाज और दवाइयाँ जारी रखने के लिए याद दिलाया जा सकता है। यहाँ लोगों की बीमारी की गंभीरता तथा उसके लक्षणों पर नज़र रखी जा सकती है और उन्हें समय पर डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी जा सकती है। जहाँ नज़दीक डॉक्टर मौजूद या उपलब्ध नहीं है, ऐसी जगहों पर टेलीफोन कॉल के ज़रिए मदद करने का भी ज़रिया बन सकते हैं।
ऐसी जगहों पर डिजिटल हेल्थ (https://ssir.org/articles/entry/speciality-health-care-pharmacies-india) काफ़ी मददगार साबित हो सकता है। यह प्लैटफ़ॉर्म स्थानीय फ़ार्मेसियों व बाकी सभी तरह के स्वास्थ्य पार्टनर से डॉक्टरों व विशेषज्ञों से जोड़ता है। इसके रहते, लोगों को विशेषज्ञ डॉक्टरों को ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है। वे अपने नज़दीकी स्थानीय फ़ार्मासिस्ट के पास जा सकते हैं, जो उन्हें विशेषज्ञ से जुड़ने में मदद करेगा। यह प्लैटफॉर्म ख़ासतौर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और झारखण्ड जैसे कम आमदनी वाले राज्यों के 200 से ज़्यादा ज़िलों के 1,500 से भी ज़्यादा फ़ार्मेसियों में सफलतापूर्वक काम कर चुका है।

भारत को अपने सार्वजनिक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल क्लिनिकों को बेहतर-से-बेहतर बनाते रहना होगा। इसके साथ ही हमें पहले से इस्तेमाल हो रहे देखभाल के माध्यमों के साथ मिलकर भी काम करना होगा। आस पास बनी फ़ार्मेसी या दवाई की दुकानें भी इनमें शामिल हैं।
सिर्फ़ फ़ार्मेसी को ही खड़ा और मज़बूत नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें ‘देखभाल के व्यापक घेरे’ (https://doi.org/10.1007/978-3-031-96286-8_112) का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसके तहत अलग-अलग लोग कई तरह से बीमार व्यक्तियों की मदद करते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता राह दिखाने और सभी में समन्वय साधने में मदद करते हैं। फ़ार्मासिस्ट दवाइयाँ पहुँचाने और बीमार की समय-समय पर स्थिति जानने व इलाज जारी रखने में मददगार साबित हो सकते हैं। डॉक्टर बीमारी को समझने, इलाज करने और दवाइयाँ सुझाने का काम करते हैं। घर पर रोज़मर्रा की देखभाल करने का काम परिवार के सदस्य करते है। सभी का अपना काम व भूमिकाएँ बंटी हुई हैं, लेकिन कोई भी सभी-के-सभी काम नहीं करते हैं।
यह ख़ासतौर पर उन बीमारियों के बारे में सही है, जो बीमारियाँ लंबे समय तक रहती हैं और जिनका लंबे समय तक इलाज जारी रखना ज़रूरी होता है। जैसे, जिन लोगों को मधुमेह, ब्लड प्रेशर, दमा, डिप्रेशन या बुढ़ापे की वजह से लंबे समय तक देखभाल के लिए एक ही डॉक्टर से एक ही बार इलाज करवाने के लिए मिलना ज़्यादा मददगार नहीं होगा। उनके लिए घर के आस पास ही लगातार इलाज की व्यवस्था होना ज़रूरी है।
भारत को अपने सार्वजनिक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल क्लिनिकों को बेहतर-से-बेहतर बनाते रहना होगा। इसके साथ ही हमें पहले से इस्तेमाल हो रहे देखभाल के माध्यमों के साथ मिलकर भी काम करना होगा। आस पास बनी फ़ार्मेसी या दवाई की दुकानें भी इनमें शामिल हैं।
यहां हर एक फ़ार्मेसी को क्लीनिक में तब्दील करने के लिए नहीं कहा जा रहा है। यहां हम कहना चाहते हैं कि इन फ़ार्मेसियों को प्राथमिक स्वास्थ्य समूह के एक बेहतरीन सदस्य के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। यह अच्छे प्रशिक्षण, डिजिटल रूप से जोड़ने, बेहतर देखभाल से हो सकता है, जिसके तहत फ़ार्मेसी भारत प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल का अहम हिस्सा बनकर उभरेंगी।
