परिचय
भारत में लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा और उसे बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी सरकार की है। सर्वोच्च न्यायालय के समय-समय पर दिए गए फैसलों के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का दायरा बढ़ाया गया और इसमें समय पर, सस्ती एवम् आसानी से मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार को भी शामिल किया है। सरकार द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में ज़रूरत के मुताबिक निवेश करने और दिए जाने वाले धन का सही इस्तेमाल होने पर ही इस अधिकार की सार्थकता साबित होती है। स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च का असर पूरे स्वास्थ्य सिस्टम पर पड़ता है। सरकारी खर्च का असर रोग नियंत्रण, दवाओं और जांच सुविधाओं की उपलब्धता से लेकर स्वास्थ्य कर्मियों की व्यवस्था जैसे आधारभूत ढाँचे तक होता है। नवीनतम राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (National Health Accounts) के मुताबिक, सरकारी खर्च बढ़ने से लोगों के अपने जेब से होने वाले निजी स्वास्थ्य खर्च में कमी आयी है। यह खर्च 2013-14 में 64% था, जो 2022-23 में घटकर 43% रह गया। इसलिए यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि उपलब्ध संसाधनों को किस प्रकार और किन क्षेत्रों में खर्च किया जा रहा है। इससे सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं का पता चलता है।
व्यवहार में केंद्र सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र की नीतिगत प्राथमिकताएं तय करती है और इसके लिए वित्तीय संसाधन भी उपलब्ध कराती है। ज़्यादातर स्वास्थ्य कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किए जाते हैं, जबकि उन्हें लागू करने का काम राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है।
चार भागों की इस शृंखला में यह विश्लेषण किया गया है कि संक्रामक और गैर-संक्रामक रोगों से निपटने के लिए केंद्र सरकार किस प्रकार संसाधनों का आवंटन करती है। साथ ही इस शृंखला में यह भी समझने की कोशिश की गई है कि इस आवंटन से स्वास्थ्य क्षेत्र की बदलती प्राथमिकताओं के बारे में हम कैसे किस तरह के निष्कर्ष निकाल सकते हैं। इस शृंखला का यह पहला आलेख है और यह भारत की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए धन उपलब्ध कराने की व्यवस्था, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) की भूमिका तथा केंद्र सरकार के स्वास्थ्य पर खर्च के प्रमुख रुझानों के बारे में है। इसके साथ ही इसमें भारत की स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत बनाने वाले एक अहम कार्यक्रम, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) का भी परिचय दिया गया है। इस शृंखला के अगले आलेख में इस मिशन की गहराई से चर्चा की जाएगी।
हालाँकि स्वास्थ्य राज्य का विषय है, लेकिन केंद्रीय बजट बेहद ज़रूरी होता है
भारत की संघीय व्यवस्था में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच ज़िम्मेदारियों का विषयों के मुताबिक बांटा गया है। संविधान के अनुसार “सार्वजनिक स्वास्थ्य, अस्पताल और औषधालय” राज्य सूची में शामिल हैं। इसलिए स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की मुख्य ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। हालाँकि, स्वास्थ्य से जुड़े कई अन्य विषय समवर्ती सूची1 और केंद्र सूची2 में भी शामिल हैं। असल में केंद्र सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र की नीतिगत प्राथमिकताएं तय करती है और इसके लिए वित्तीय संसाधन या फंड भी उपलब्ध कराती है। ज़्यादातर स्वास्थ्य कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किए जाते हैं, जबकि उन्हें लागू करने का काम राज्य सरकारें करती हैं।
केंद्र सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं में स्वास्थ्य क्षेत्र की काफ़ी अहमियत है। केंद्रीय बजट 2026-27 में वित्त मंत्री की कई घोषणाएं देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों और मानसिक स्वास्थ्य के आधारभूत ढाँचे को मज़बूत करने पर केंद्रित थीं। इसके तहत सहायक स्वास्थ्यकर्मियों (Allied Health Professionals) के प्रशिक्षण के लिए संस्थानों को बेहतर बनाने या नए संस्थान स्थापित करने तथा राष्ट्रीय स्तर पर नए मानसिक स्वास्थ्य संस्थान (NIMHANS) विकसित करने की घोषणा की गई। इस तरह, स्वास्थ्य भले ही राज्य सूची का विषय हो, लेकिन केंद्र सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र को विशेष महत्व देती है। यही वजह है कि वह स्वास्थ्य कार्यक्रमों की रूपरेखा तय करने और उनके लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
स्वास्थ्य के लिए केंद्रीय बजट का प्रबंधन कौन करता है?
केंद्र सरकार के स्तर पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) स्वास्थ्य से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण कामों को अंजाम देने की ज़िम्मेदारी उठाता है। वह स्वास्थ्य नीति बनाने, प्रमुख स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए पैसा उपलब्ध कराने, राज्य सरकारों के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने और कई राष्ट्रीय संस्थानों के कामकाज पर नज़र बनाए रखने वाला प्रमुख मंत्रालय है। हालांकि स्वास्थ्य सेवाएं राज्य सरकारें उपलब्ध कराती हैं, लेकिन प्राथमिकताएं तो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तय करता है। वह राज्य सरकारों तक संसाधन पहुंचाने का महत्त्वपूर्ण काम करता है। मंत्रालय के कार्य मुख्य रूप से दो विभागों के ज़रिए किए जाते हैं: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग।
- मंत्रालय के कुल खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग (DoHFW) खर्च करता है। प्रमुख स्वास्थ्य योजनाओं और कार्यक्रमों को चलाने, रोगों की रोकथाम करने, लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी गतिविधियों को जारी रखने में मदद करना इस विभाग की ज़िम्मेदारी है। साथ ही, यह विभाग स्वास्थ्य सेवाओं का न्यूनतम मानक सुनिश्चित करने के लिए स्वायत्त संस्थानों/नियामक निकायों पर भी नज़र बनाए रखता है।
- स्वास्थ्य नीति और स्वास्थ्य कार्यक्रमों को बेहतर बनाने में मदद पहुँचाने के उद्देश्य से स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR) सारे देश से सूचनाएं और ज़रूरी जानकारी जुटाता है। इससे देश में चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुसंधान को मज़बूती मिलती है।
ये दोनों विभाग मिलकर स्वास्थ्य क्षेत्र में केंद्र सरकार की दोहरी भूमिका को निभाते हैं: एक ओर जहाँ वे स्वास्थ्य सेवाओं के लिए वित्त और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराते हैं और उन्हें लागू करने में मदद करते हैं; वहीं दूसरी तरफ वे स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी जानकारी जुटाते हैं और शोध करते हैं।
केंद्रीय बजट में हालिया रुझानों से क्या पता चलता है?
केंद्रीय बजट के सरकारी खर्च को समझने के लिए तीन महत्त्वपूर्ण पैमाने हैं:
- बजट अनुमान: वित्तीय वर्ष की शुरुआत में तय की गई राशि।
- संशोधित अनुमान: वर्ष के दौरान ज़रूरत के अनुसार किया गया बदलाव।
- असल खर्च: वास्तव में किया गया अंतिम खर्च।
इन तीनों पैमानों से सरकार की प्राथमिकताओं और खर्च करने के तौर-तरीकों का पता चलता हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि पिछले पाँच वर्षों में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का खर्च, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मुकाबले में लगभग स्थिर रहा है। यह 0.28% से मामूली घटकर 0.27% रह गया है।
- अ. स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च बढ़ा है, लेकिन वह अब भी नीति में तय किए गए लक्ष्य से कम है
पिछले दशक में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च बढ़ा है। लेकिन, हालिया आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 के संशोधित अनुमानों (REs) के आधार पर स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का सिर्फ़ 1.7% हुआ है। यह 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तय किए गए लक्ष्य से काफ़ी कम है, जिसमें 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च को जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाने का प्रस्ताव था।
इसके अलावा, अगर सिर्फ़ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के बजट पर नजर डालें, तो पता चलता है कि जहां मंत्रालय का खर्च वित्तीय वर्ष 2022-23 के ₹75,731 करोड़ से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024-25 में ₹90,684 करोड़ हो गया था, वहीं वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह घटकर ₹85,493 करोड़ रह गया। इस गिरावट को सावधानीपूर्वक समझना चाहिए, क्योंकि वित्तीय वर्ष 2025-26 का यह खर्च सिर्फ 8 मार्च 2026 तक का अस्थायी अनुमान है। फिर भी यह संकेत देता है कि वित्तीय वर्ष के ख़त्म होने में बस कुछ सप्ताह बचे रहने के बावजूद, यह खर्च पिछले साल के खर्च के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया था।
हालांकि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बजट अनुमान (BE) अधिक हैं, लेकिन पिछले रुझानों को देखते हुए इनके विश्लेषण में सावधानी बरतना ज़रूरी है, क्योंकि पहले भी कई बार संशोधित अनुमान में काफ़ी कटौती की गई है।
गौर करने वाली बात यह है कि पिछले पाँच वर्षों में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मुकाबले में लगभग एक जैसा ही बना रहा। यह 0.28% से मामूली घटकर 0.27% रह गया है। इससे पता चलता है कि भले ही स्वास्थ्य बजट असल में बढ़ा हो, लेकिन अर्थव्यवस्था के बढ़ने के मुकाबले इसमें कोई ख़ास बढ़ोतरी नहीं हुई है।

- आ. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को लगातार उसकी मांग से कम बजट मिलता है
पिछले पाँच वर्षों में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को उसके द्वारा अनुमानित आवश्यकता के मुकाबले काफ़ी कम बजट दिया गया है। उदाहरण के लिए, वित्तीय वर्ष 2026-27 में मंत्रालय को उसकी अनुमानित मांग का सिर्फ 83% ही हिस्सा दिया गया। संसाधनों की इस कमी की वजह से स्वास्थ्य कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने और उन्हें मज़बूत करने की मंत्रालय अपने क्षमता कम हो सकती है।
8 मार्च 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, संशोधित अनुमान का लगभग 88% खर्च किया जा चुका था। इसका मतलब है कि कुल आवंटन का लगभग 1/8 हिस्सा (₹11,360 करोड़) वित्तीय वर्ष के अंतिम बीस दिनों में खर्च किया जा सकता है।

- इ. फंड का ज़्यादा-से-ज़्यादा इस्तेमाल, खर्च करने की क्षमता को बताता है
हालांकि मंत्रालय को उसकी मांग के मुकाबले कम बजट मिलता है, फिर भी उसने आमतौर पर मिले हुए पूरे धन का इस्तेमाल किया है। वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 दोनों में खर्च बदले हुए अंदाज़ों से ज़्यादा रहा है।
फंड के पूरे या ज़्यादा-से-ज़्यादा इस्तेमाल से पता चलता है कि मंत्रालय अपने पास उपलब्ध संसाधनों को प्रभावी रूप से खर्च कर रहा है। साथ ही, अनुमानित मांग और वास्तविक आवंटन के बीच लगातार बने रहने वाले अंतर को अगर देखा जाए, तो पता चलता है कि मंत्रालय को कम बजट का मिलना एक बड़ी दिक्कत है।
हालांकि, यह भी देखा गया है कि खर्च पूरे साल एक जैसा ही नहीं होता है। 8 मार्च 2026 तक संशोधित अनुमान का लगभग 88% खर्च किया जा चुका था। इसका मतलब है कि कुल आवंटन का लगभग 1/8 हिस्सा (₹11,360 करोड़) वित्तीय वर्ष के आखिरी बीस दिनों में खर्च किया जा सकता है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के बजट पर एक नज़र: पैसा कहाँ जाता है?
जैसा कि पहले बताया गया है, मंत्रालय का बजट दो विभागों में बंटा होता है – स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग। दिए गए कुल आवंटन का लगभग 95% हिस्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को मिलता है, इसलिए स्वास्थ्य पर होने वाला ज़्यादातर सरकारी खर्च इसी विभाग के ज़रिए होता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग का खर्च मुख्य रूप से चार बड़े हिस्सों में बाँटा जा सकता है, जिससे यह पता चलता हैं कि केंद्र सरकार स्वास्थ्य के लिए किस तरह से वित्तीय सहायता करती है:
- स्थापना व्यय (Establishment Expenditure) में सरकारी कार्यालयों और संस्थानों के रखरखाव और संचालन का खर्च शामिल होता है।
- केंद्रीय क्षेत्र योजनाएँ (Central Sector Schemes) पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा तैयार की जाती है, केंद्र सरकार द्वारा ही इन्हें फंड दिया जाता है और लागू किया जाता हैं। ये मुख्यतः केंद्रीय सूची के विषयों पर आधारित होती हैं।
- केंद्र प्रायोजित योजनाएँ (Centrally Sponsored Schemes – CSSs), जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) का संचालन राज्य सरकारें करती हैं, लेकिन इनमें ज़्यादातर फंडिंग भारत सरकार द्वारा दी जाती है और राज्यों का भी एक निश्चित हिस्सा होता है। बड़े राज्यों में इसमें 60:40 का अनुपात होता है, जबकि पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों में यह 90:10 का होता है।
- अन्य केंद्रीय क्षेत्र व्यय (Other Central Sector Expenditure) में केंद्र द्वारा सीधे वित्तपोषित और संचालित परियोजनाएँ शामिल होती हैं, जैसे स्वायत्त संस्थानों, केंद्रीय एजेंसियों, वैधानिक निकायों और सार्वजनिक उपक्रमों का खर्च।
- अ. केंद्र प्रायोजित योजनाओं का दबदबा, लेकिन सीधे केंद्रीय खर्च बढ़ोतरी हुई
इन सभी घटकों में केंद्र प्रायोजित योजनाएँ लगातार स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के बजट का सबसे अहम हिस्सा बनी हुई हैं। ये योजनाएँ राज्यों द्वारा लागू की जाती हैं, लेकिन इसके लिए पैसा केंद्र सरकार द्वारा मुहैया करवाया जाता है, वित्तीय वर्ष 2022-23 से हर साल लगभग 54% से 58% तक का हिस्सा दिया जाता रहा है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट अनुमानों में यह लगभग 54% पर बनी हुई हैं। दूसरी ओर, अन्य केंद्रीय क्षेत्र व्यय (Other Central Sector Expenditure) दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है, जो वित्तीय वर्ष 2022-23 में लगभग 21% से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2026-27 में लगभग 29% तक पहुँच गया है। बाकी बची हुई हिस्सेदारी केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं (Central Sector Schemes) और स्थापना व्यय (Establishment Expenditure) की है, जो नवीनतम वर्ष में लगभग 8% के आसपास हैं। नीचे दिए गए चित्र से पता चलता है कि समय के साथ इनकी हिस्सेदारी में कैसे बदलाव आया है।

केंद्र प्रायोजित योजनाओं में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन सबसे बड़ी योजना है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में इस योजना के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के कुल बजट का लगभग 41% फंड दिया गया है। यह केंद्र सरकार की प्रमुख स्वास्थ्य योजना है, जिसका मकसद स्वास्थ्य सिस्टम और उसकी क्षमता को बेहतर बनाना, सभी नागरिकों को समान, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।
- आ. पूरी तरह से वित्तपोषित केंद्रीय योजनाओं की ओर बढ़ता झुकाव
अगर पिछले लंबे वक्त के नज़रिए से देखा जाए, तो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के बजट में धीरे-धीरे बदलाव दिखाई देता है। केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं (Central Sector Schemes) और दूसरे केंद्रीय क्षेत्रों पर संयुक्त व्यय (Other Central Sector Expenditure) का हिस्सा बढ़ा है। ये वे हिस्से हैं, जिन्हें सीखे केंद्र सरकार से फंडिंग मिलती है और यहाँ नीतियों को लागू करने का काम भी केंद्र सरकार सीधे करती है। इसके विपरीत, कुछ ऐसी केंद्र प्रायोजित योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes) हैं, जिन्हें राज्य सरकारों द्वारा चलाया जाता है और जिनमें केंद्र व राज्य दोनों की भागीदारी होती है, उनका हिस्सा कुछ कम हुआ है।
इस बदलाव से स्वास्थ्य संसाधनों के इस्तेमाल पर केंद्र सरकार का सीधे नियंत्रण में बढ़ोतरी आई है। लेकिन इसका यह भी मतलब है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के बजट का अपेक्षाकृत कम हिस्सा अब उन कार्यक्रमों में जा रहा है, जिन्हें राज्य सरकारें ख़ुद बना रही है और चला रही हैं।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि:
- संविधान के मुताबिक स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है, लेकिन राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को तय और ज़्यादातर प्रमुख स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए वित्तीय व्यवस्था केंद्र सरकार करती है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा और स्वरूप तय करने में केंद्रीय बजट की भूमिका सबसे अहम होती है।
- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय स्वास्थ्य क्षेत्र का प्रमुख मंत्रालय है। इसमें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ज़्यादातर खर्च और कार्यक्रमों के संचालन की ज़िम्मेदारी निभाता है, जबकि स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग मुख्य रूप से अनुसंधान पर केंद्रित है।
- पिछले दशक में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च काफ़ी बढ़ा है, लेकिन यह अभी भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के अनुसार जीडीपी के 2.5% के लक्ष्य से काफ़ी कम है। वित्तीय वर्ष 2024-25 के संशोधित अनुमान के मुताबिक, यह जीडीपी का लगभग 1.7% है। वहीं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का खर्च भी जीडीपी के लगभग 0.27% के स्तर पर आकर ठहरा हुआ है।
- मंत्रालय को लगातार उसकी मांग से कम बजट मिलता है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में उसे अपनी अनुमानित मांग का केवल 83% हिस्सा मिला, जबकि वह आवंटित धन का लगभग पूरा इस्तेमाल कर लेता है। इससे पता चलता है कि मुख्य समस्या फंड खर्च न कर पाने की नहीं, बल्कि बजट का कम मिलना है।
- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के बजट में केंद्र प्रायोजित योजनाओं की अभी भी सबसे बड़ी हिस्सेदारी हैं, लेकिन बजट धीरे-धीरे उन योजनाओं की ओर बढ़ रहा है, जिन्हें केंद्र सरकार सीधे पैसा देती है और लागू करती और चलाती करती है।
- इन केंद्र प्रायोजित योजनाओं में सबसे बड़ी योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन है। भारत की प्रमुख स्वास्थ्य योजना होने की वजह से केंद्र सरकार का स्वास्थ्य पर ज़्यादा खर्च इसी माध्यम से राज्यों और नागरिकों तक पहुँचता है।
यह ब्लॉग स्वास्थ्य क्षेत्र की वित्तीय व्यवस्था और खर्च के प्रमुख रुझानों का एक व्यापक नज़रिए से पेश करता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के बजट के गहराई से किए गए विश्लेषण के लिए, कृपया हमारा विस्तृत ‘बजट इनसाइट’ देखें। अगले ब्लॉग में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की संरचना, वित्त की व्यवस्था और हाल के बजटीय रुझानों का व्यापक विश्लेषण किया जाएगा, जिससे भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य कार्यक्रम को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
