अस्पतालों, चिकित्सालयों एवं संदेशवाहकों से आगे 

मज़बूत समुदाय-आधारित प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल पर आधारित स्वास्थ्य सिस्टम कम लागत में बेहतर परिणाम कैसे दे पाते हैं।

अस्पतालों, चिकित्सालयों एवं संदेशवाहकों से आगे 

भारत में यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (UHC) की परिकल्पना अधिक से अधिक अस्पतालों और चिकित्सालयों के निर्माण कार्य के रूप में की जाती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से साफ है कि स्वास्थ्य प्रणालियाँ तब बेहतर ढ़ंग से और कम लागत पर काम करती हैं, जब सामुदाय-आधारित प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा सुदृढ़ हो। भारत के कई हिस्सों में जहाँ हाई ब्‍लड प्रेशर, शुगर और प्रसव संबंधी काफी जटिल मामले मिलते हैं, वहाँ अक्सर देखा जाता है कि आस-पास में अस्पताल की सुविधा उपलब्ध नहीं होती है। केवल अस्पतालों और चिकित्सालयों की इमारतें खड़ी करके यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता है।

प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को मजबूत करने को आम तौर पर आउट पेशेंट क्लीनिक की संख्या बढ़ाने या स्वास्थ्य केंद्रों को बेहतर करने से जोड़ा जाता है। बेशक, ये सुविधाएँ महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन ये सुविधाएं अपने आप में जल्‍दी से रोग का पता लगाने और उपचार की प्रक्रियाओं का पालन करने या डॉक्‍टरी सलाह के लिए नाकाफ़ी हैं। प्रभावी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के लिए घर-घर जाकर सेवा पहुँचाना और परिवारों के साथ नियमित संपर्क रखना जरुरी है। साथ ही फॉलो-अप की जरूरत भी होती है ताकि, यह सुनिश्चित किया जा सके कि रोगी नियमित रूप से दवाएँ ले रहे हैं। इनके बिना विभिन्न क्लीनिक इस टूटी हुई शृंखला की मात्र एक और कड़ी बनकर रह जाते हैं।

समुदाय स्वास्थ्य कार्यकर्ता लंबे समय से स्वास्थ्य सेवाओं की अगली कतार का हिस्सा रहे हैं। शुरू-शुरू में वे संदेश पहुँचाने का काम करते थे, जैसे आशा कार्यकर्ता, या डॉक्टरों की मदद करने वाले के रूप में। बाद में उन्हें ग्रामीण महाराष्ट्र में नवजात शिशुओं में होने वाले संक्रमण का इलाज करना या नेपाल में मानसिक स्वास्थ्य में सहायता देने जैसी कुछ विशेष ज़िम्मेदारियाँ दी गईं । ये योगदान महत्त्वपूर्ण थे, लेकिन अधूरे रहे। ये जनसंख्या नियंत्रण संबंधी जिम्‍मेदारियों, अन्य व्यापक सेवाएँ उपलब्ध कराने, उनकी निरंतरता और सुलभता सुनिश्चित करने जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के मूल लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नाकाफ़ी थे।

अक्सर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने का मतलब केवल नए बाह्य रोगी क्लीनिक जोड़ने या स्वास्थ्य केंद्रों को बेहतर बनाने तक ही सीमित समझ लिया जाता है।

अब स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की एक नई “चौथी श्रेणी” संभव हो गई है। अलास्का और ईरान के अनुभव बताते हैं कि अच्छी तरह प्रशिक्षित और स्थानीय रूप से चुने गए कार्यकर्ता कई तरह की बीमारियों का प्रबंधन कर सकते हैं। वे उचित रेफ़रल की व्यवस्था कर सकते हैं और उपचार का पालन सुनिश्चित कर सकते हैं। भारत में कालाहांडी की स्वास्थ्य स्वराज पहल और सतारा में द्वारा हेल्थ की “सखियाँ” भी इसी दिशा में काम कर रही हैं। सफलता के लिए कड़ी निगरानी, स्पष्ट रेफ़रल व्यवस्था, सक्रिय रूप से मरीजों की निगरानी (फ़ॉलो-अप) और समुदाय आधारित पंजीकरण बहुत जरूरी है। यह सब स्पष्ट चिकित्सीय दिशानिर्देशों के आधार पर होना चाहिए और स्थानीय संस्कृति के अनुसार ढाला जाना चाहिए।

फिर भी, केवल स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका में बदलाव कर देना ही काफ़ी नहीं है। हमें स्वास्थ्य सेवा संबंधी विभिन्न प्रकार की जटिलताओं को भी समझना होगा। स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के मुफ़्त होने के बावजूद आधे से भी कम मरीज़ क्लीनिक जाते हैं। दवाइयों की दुकानों पर लोग सबसे पहले जाते हैं। ज़्यादातर परिवार ही लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में देखभाल करते हैं। खासकर, मानसिक स्वास्थ्य या फिर जीवन के अंतिम समय में पुजारी और ओझाओं पर ज्‍यादा भरोसा किया जाता है। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का कोई भी मॉडल इन पुजारियों अथवा ओझाओं को नजरअंदाज कर कामयाब नहीं हो सकता है।

सफलता के लिए कड़ी निगरानी, रेफरल संबंधी स्पष्ट परामर्श, सक्रिय फॉलो-अप और समुदाय को पैनल में शामिल करना बेहद जरूरी है। यह सब स्पष्ट चिकित्सा दिशानिर्देशों के साथ होना चाहिए और स्थानीय संस्कृति के अनुसार ढाला जाना चाहिए।

समन्वित सेवा का दृष्टिकोण (circle of care approach) इस समस्या का एक हल हो सकता है। यह दृष्टिकोण एक ऐसी प्रणाली की परिकल्पना करता है, जहाँ स्वास्थ्य कार्यकर्ता मुख्‍य भूमिका में होते हैं, लेकिन वे फार्मासिस्टों, परिवारों और ओझाओं/फ़ेथ हीलर के साथ मिलकर काम करते हैं। इनमें से प्रत्येक की एक ख़ास भूमिका है। कोई भी एक दूसरे की जगह नहीं ले सकता। तकनीक इस एकीकरण को संभव बनाती है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म मरीज़ों का डेटा एक जगह रख सकते हैं, उपचार के नियम शामिल कर सकते हैं और प्रशिक्षण में मदद कर सकते हैं। फार्मासिस्टों को जिम्मेदारी से दवा देने के लिए कहा जा सकता है। पुजारियों को अपनी आध्यात्मिक भूमिका जारी रखते हुए, खतरे के संकेतों को पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। परिवारों को घर पर देखभाल के लिए सहयोग मिल सकता है। इस प्रणाली में, स्वास्थ्य कार्यकर्ता केवल सेवा प्रदान करने का माध्यम नहीं रह जाता। बल्कि, एक समन्वयक के रूप में अहम भूमिका निभाता है।

यह केवल एक सैद्धांतिक बात नहीं है, बल्कि इससे कहीं अधिक है। इस समझ ने ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, जहाँ गाँव ज़िलों के अस्पतालों से दूर होते हैं, इस तरीके ने पहले ही अच्छे परिणाम दिखाए हैं। किसी दूरदराज के इलाके में एक नया क्लीनिक कुछ फायदा पहुँचा सकता है, लेकिन अगर गाँव में ही प्रशिक्षित समुदाय स्वास्थ्य कार्यकर्ता मौजूद हो, जिसे प्रोटोकॉल, डिजिटल उपकरणों और फार्मेसी व परिवारों से जुड़ाव का सहयोग मिले तो ज्‍यादातर स्‍वास्‍थ्‍य जरूरतें बिना देर किये और बिना यात्रा के पूरी की जा सकती हैं। अगले चरण में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ाने का आधार केवल नए केंद्र खोलना नहीं, बल्कि लोगों तक पहुँचकर उनकी देखभाल करना होना चाहिए।

सर्कल ऑफ़ केयर (circle of care) इस वास्तविकता को समझकर समाधान देता है। इसमें स्वास्थ्य कार्यकर्ता केंद्र में होते हैं, लेकिन वे दवा दुकानदारों, परिवारों और आध्यात्मिक उपचारकर्ताओं/ फेथ हीलर के साथ मिलकर काम करते हैं।

भारत का सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का रास्ता यही है कि प्राथमिक स्वास्थ्य को सिर्फ़ अस्पतालों और क्लीनिकों तक सीमित न समझा जाए और न ही स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को केवल संदेशवाहक माना जाए। हमें ऐसे स्वास्थ्य कार्यकर्ता चाहिए जो पूरी सेवाएँ दें और देखभाल के इस वृत्त का समन्वय भी कर सकें। यह दिखाता है कि लोगों को वास्तव में किस प्रकार की सेवा चाहिए। आधुनिक चिकित्सा दिशानिर्देशों और डिजिटल साधनों को स्थानीय संस्कृति और पारिवारिक देखभाल के साथ जोड़कर भारत एक ऐसी प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली बना सकता है जो वैज्ञानिक हो, भरोसेमंद हो और लंबे समय तक टिकाऊ हो।