सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य दूर का और जटिल ढाँचा बनना नहीं है। उन्हें तो बुनियादी स्वास्थ्य जरूरतों के लिए प्राथमिक उपचार का मुख्य केंद्र होना चाहिए। फिर भी ग्रामीण समुदायों के साथ करीब से काम करने वाले लोग अक्सर एक अलग हकीकत देखते हैं। जिनके लिए ये व्यवस्थाएँ बनाई गई हैं, वे ही इनका लाभ उठाने में संकोच करते हैं।
क्या लोगों के पास सही जानकारी होने, बीमारी के खतरों को जल्दी पहचानने और भरोसेमंद स्वास्थ्य कार्यकर्ता के कारण नतीजे बेहतर हो सकते हैं?
इस हिचकिचाहट के पीछे कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ी खामी जानकारी का अभाव है। यदि हम शिक्षा प्रणाली को देखें, तो वहाँ आगे बढ़ने के रास्ते बहुत स्पष्ट हैं। लोग जानते हैं कि प्राथमिक स्कूल क्या है, उसके बाद कौन सी कक्षाएँ आती हैं और कॉलेज तक कैसे पहुँचा जाता है। यदि गाँव का स्कूल बिना सूचना के बंद हो जाए या मिड-डे मील न मिले, तो माता-पिता तुरंत उस पर ध्यान देते हैं।
इसके उलट, आयुष्मान आरोग्य मंदिर (स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को लेकर अक्सर लोगों में स्पष्टता नहीं होती। नतीजतन, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और इलाज का मतलब केवल जिला अस्पताल या बड़े निजी अस्पताल ही समझ लिया जाता है। यह गलतफहमी सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य, उनकी जेब और इलाज की तलाश में बर्बाद होने वाले समय पर असर डालती है।
यह एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है: क्या स्वास्थ्य के नतीजों में तब सुधार हो सकता है जब लोगों के पास सही जानकारी हो, वे बीमारी के खतरों की समय रहते पहचान कर सकें और उनके पास भरोसेमंद स्वास्थ्य कार्यकर्ता हों? इसका जवाब जमीन से जुड़ी उन कहानियों में छिपा है जो बदलाव की असली गवाह हैं।
अनिमा कुजूर की कहानी: जाँच में देरी पड़ सकती थी भारी
अनिमा कुजूर (नाम परिवर्तित) की उम्र करीब 26 वर्ष थी। उनकी गर्भावस्था की दूसरी तिमाही चल रही थी, जब पहली बार एक आशा (ASHA) कार्यकर्ता को उनकी स्थिति के बारे में पता चला। उनकी पहले से ही तीन बेटियाँ थीं, जिनकी उम्र 11, 7 और 4 साल थी। शुरुआती तीन-चार महीनों तक उनके परिवार ने गर्भावस्था की खबर किसी से साझा नहीं की थी, क्योंकि वहाँ की स्थानीय परंपरा के अनुसार महिलाएँ तब तक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से सलाह नहीं लेतीं जब तक कि गर्भावस्था शारीरिक रूप से दिखने न लगे।
अक्सर कई गंभीर बीमारियों के कोई बाहरी लक्षण दिखाई नहीं देते और जाँच ही उन्हें पहचानने का एकमात्र तरीका है।
जब आशा कार्यकर्ता को इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने अनिमा के घर के कई चक्कर लगाए और परिवार के साथ बड़े धैर्य से बात की। आखिरकार, उन्होंने परिवार को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे अनिमा को ‘ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण दिवस’ (VHSND) के दौरान नजदीकी आँगनवाड़ी केंद्र लेकर आएँ। इस खास दिन पर गर्भवती महिलाओं और बच्चों की नियमित जाँच की जाती है और उन्हें हर महीने लगभग 17 प्रकार की स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिलता है।

नियमित जाँच के दौरान, एएनएम (ANM) ने कुछ सामान्य टेस्ट किए। उनके परिणाम चिंताजनक थे। अनिमा का हीमोग्लोबिन स्तर केवल 4 g/dL था, जो गंभीर एनीमिया (खून की कमी) की ओर इशारा कर रहा था। ऐसे में, अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह स्थिति माँ और होने वाले बच्चे, दोनों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि अनिमा खुद पैदल चलकर आँगनवाड़ी आई थीं और बिना किसी मदद के घर भी लौट गईं। अक्सर गंभीर स्थितियों के कोई बाहरी लक्षण नहीं दिखते। समय पर की गई जाँच ही उन्हें पहचानने का एकमात्र जरिया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए, आशा और एएनएम ने तुरंत अनिमा को ब्लड ट्रांसफ्यूजन (खून चढ़ाने) के लिए रांची के जिला अस्पताल रेफर कर दिया। परिवार का घबरा जाना स्वाभाविक था। उनकी पिछली गर्भवास्थाओं में कभी कोई समस्या नहीं आई थी, और शहर जाने का मतलब था- आर्थिक बोझ और बड़े अस्पताल का डर। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने शांत रहकर बार-बार बातचीत की और आसान भाषा में उन्हें पूरी स्थिति समझाई। आखिरकार, परिवार मान गया।
आज, अनिमा का इलाज चल रहा है। सही समय पर हुई बीमारी की पहचान और सही जगह भेजे जाने (रेफरल) के फैसले ने उनकी और उनके बच्चे की जान बचने की संभावना को काफी बढ़ा दिया है।
शालू तिर्की: समय पर निगरानी से बचा बड़ा नुकसान
शालू तिर्की की उम्र अभी केवल तीन साल है। उसके माता-पिता साल में कई बार दूसरे राज्यों में ईंट भट्टों पर काम करने के लिए पलायन करते हैं। कभी-कभी शालू भी उनके साथ जाती है, तो कभी वह गाँव में अपने दादा-दादी के पास ही रुक जाती है।
सामुदायिक (फ्रन्टलाइन) स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और परिवारों के लिए ‘पोषण पुनर्वास केंद्र’ (NRC) में बच्चों को रेफर करना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। ये केंद्र अक्सर गाँवों से बहुत दूर होते हैं और यहाँ बच्चे को दो से तीन सप्ताह तक भर्ती रखना पड़ता है।
शालू अपनी उम्र के बाकी बच्चों की तुलना में काफी शांत रहती थी। उसके माता-पिता ने गौर किया कि वह अक्सर सुस्त रहती है, बहुत रोती है और बार-बार बीमार पड़ जाती है। हालाँकि उसका नाम आँगनवाड़ी में दर्ज था, लेकिन लगातार बीमारी के कारण वह वहाँ नियमित रूप से नहीं जा पाती थी।
एक बार ‘ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता और पोषण दिवस’ (VHSND) के दौरान, जब बच्चों की लंबाई और वजन मापा गया, तो स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने पाया कि शालू में ‘गंभीर तीव्र कुपोषण’ (SAM) के लक्षण हैं। उसे तुरंत पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में रखकर देखभाल की जरूरत थी।

आज, शालू डॉक्टरों की कड़ी निगरानी में है। उसकी स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है और उम्मीद है कि निरंतर देखभाल से वह जल्द ही आँगनवाड़ी लौटेगी और एक स्वस्थ जीवन का आनंद ले सकेगी।
परिवारों और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए, पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में बच्चों को रेफर करना एक बड़ी चुनौती होती है। ये केंद्र अक्सर गाँवों से बहुत दूर होते हैं और यहाँ बच्चे को दो से तीन सप्ताह तक भर्ती रखना पड़ता है। इसका सीधा मतलब है- मजदूरी का नुकसान और परिवार के एक सदस्य का लंबे समय तक घर से बाहर रहना। शालू के पिता भी शुरुआत में इन्हीं कारणों से हिचकिचा रहे थे।
आशा (ASHA) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने बड़े धैर्य के साथ परिवार से बात की। उन्होंने इलाज की पूरी प्रक्रिया समझाई और भरोसा दिलाया कि शालू को वहाँ विशेष देखभाल और सही पोषण मिलेगा। आखिरकार, परिवार मान गया और शालू को उसकी माँ के साथ एनआरसी (NRC) में भर्ती कराया गया।
आज, शालू डॉक्टरों की कड़ी निगरानी में है। उसकी स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है और उम्मीद है कि निरंतर देखभाल से वह जल्द ही आँगनवाड़ी लौटेगी और एक स्वस्थ जीवन का आनंद ले सकेगी।
सूचना से बढ़ता विश्वास, विश्वास से बचती जान

अनिमा और शालू की कहानियाँ एक सच्चाई को उजागर करती हैं कि सही जानकारी और आपसी जुड़ाव ही जीवन बचाते हैं। जब समुदाय यह समझ जाता है कि उनके लिए कौन सी सेवाएँ उपलब्ध हैं और वे सेवा देने वालों पर भरोसा करने लगते हैं, तब सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली केवल ‘आखिरी रास्ता’ न रहकर एक मज़बूत सहारा बन जाती है।
एक पुरानी कहावत है: “स्वास्थ्य केंद्र न केवल गाँव में होना चाहिए, बल्कि वह गाँव का अपना होना चाहिए।” जब तक स्वास्थ्य केंद्र वास्तव में उन समुदायों के साथ नहीं जुड़ेंगे जिनकी वे सेवा करते हैं, तब तक लोग उनके लाभों से वंचित ही रहेंगे।
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