वह हाल में ही दो साल की हुई थी। उसका बुखार कम ही नहीं हो रहा था। जब उसे दौरे पड़ने शुरू हुए, तो स्थानीय डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए। डॉक्टर ने उसके आदिवासी मां-बाप से कहा कि वह अब उसका इलाज नहीं कर सकता।
फिर उनकी असली परीक्षा शुरू हुई। एक बड़े सरकारी अस्पताल के आईसीयू में एक हफ्ते बिताने के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया क्योंकि, वहाँ वेंटिलेटर वाले बेड उपलब्ध नहीं थे। एक निजी अस्पताल उस बच्ची को भर्ती करने के लिए राज़ी हो गया। वहाँ उसे फिर दो हफ्ते आईसीयू में रखा गया लेकिन, लेकिन वहाँ भी डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए। फिर तीसरा अस्पताल – ब्रेन सर्जरी, दो हफ्ते और आईसीयू, और आखिरकार बच्ची हार गई।
कल्पना कीजिए उस नन्हीं बच्ची की जो हफ़्तों तक दवाओं और ट्यूब्स के साथ आईसीयू में बेहोश पड़ी रही। उसके माता-पिता के बारे में सोचिए, वे किन कठिनाइयों को झेलते हुए, अपने आदिवासी गांव से शहर आए होंगे। आख़िरी दिनों में वे अपनी बच्ची को गले भी नहीं लगा पाए, हमेशा इलाज के पैसों के लिए भागते-दौड़ते रहे – और आखिरकार अपनी बच्ची को खो बैठे और जिंदगी भर के लिए कर्जदार हो गए।
शुरूआत में हमें लगता था कि इस बच्ची का मामला अस्पतालों की कमी और उदासीनता को दर्शाता है। लेकिन, जैसे-जैसे हम इसकी गहराई में गए, हमें एहसास हुआ कि इस त्रासदी को जन्म देने वाली असली नाकामी तो बहुत पहले ही हो चुकी थी।
उस बच्ची को ट्यूबरकुलर मेनिन्जाइटिस था, यानी टीबी उसके दिमाग तक फैल गई थी। छोटे बच्चों में देर से पहचान होने पर यह बीमारी जानलेवा हो जाती है। हमें पता चला कि उसे काफी पहले से निमोनिया भी था। वह बहुत कमजोर और कुपोषित बच्ची थी। अगर उसकी मां गर्भावस्था के दौरान खून की कमी (एनीमिया) से पीड़ित न रही होती; अगर वह स्वस्थ वजन के साथ पैदा हुई होती; अगर उसे सही पोषण मिला होता; अगर उसकी बीमारी की पहचान समय रहते हो गई होती और उसे सही इलाज मिला होता – तो शायद उसे कभी अस्पताल में दाखिल होने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
ऐसी ही घटनाओं से दुखी होकर कुछ साल पहले हमने स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने का फैसला किया था। हम मानते हैं कि स्वास्थ्य हमारे लोगों की बेहतरी का सबसे मुख्य हिस्सा है। हर व्यक्ति का अधिकार है कि उसे अच्छा स्वास्थ्य मिले। जिसके सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं : शिक्षा, रोकथाम (जैसे सुरक्षित गर्भावस्था, पोषण, स्वच्छता, टीकाकरण), बीमारियों की समय पर जांच और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का उपलब्ध होना।
सार्वजनिक (सरकारी) स्वास्थ्य प्रणाली इसी ढांचे पर आधारित है – आशा (सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता), आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और एएनएम (नर्स) की एक फ्रंटलाइन टीम, जो गांवों तक सेवाएँ पहुँचाती है। और फिर यह ढांचा धीरे-धीरे उप-केंद्रों और प्राथमिक केंद्रों से ब्लॉक और जिला अस्पतालों तक फैलता है।

जब यह प्रणाली अच्छे ढंग से काम करती है, तो उसके महत्वपूर्ण असर दिखाई देते हैं। मैंने इस हफ्ते ऐसा ही एक उदाहरण देखा – हमें एक केंद्रीय आदिवासी ब्लॉक में एक भी ऐसा बच्चा नहीं मिला, जिसका टीकाकरण न हुआ हो। अगर आप इस देश की विशालता और जटिलता को ध्यान में रखकर इस घटना के बारे सोचें – तो यह वाकई आश्चर्यजनक उपलब्धि है।
अगर यह लेख सीरीज (column) के रूप में प्रकाशित हुआ, तो मैं आपको मैदानी अनुभवों से जुड़ी कहानियाँ सुनाऊंगा – असंगठित शहरी झुग्गियों से लेकर दूरदराज के आदिवासी इलाकों तक की कहानियां। ये कहानियाँ भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौतियों, सफलताओं और जटिलताओं को समाने लाती हैं। हालांकि, हम आगे इस विषय पर और गहराई से विचार करेंगे, लेकिन उसके पहले मैं पाठकों के सामने अपनी कुछ धारणाएँ स्पष्ट करना चाहूँगा :
हम मानते हैं कि स्वास्थ्य हमारे लोगों की बेहतरी का सबसे मुख्य हिस्सा है।
निजी अस्पतालों को जरूरत से ज्यादा महत्व क्यों दिया जाता है
आज के अखबार में, मेरे शहर के एक बड़े निजी अस्पताल में एक दुर्लभ बाल-हृदय-रोग के इलाज के लिए की गई अत्याधुनिक रोबोटिक सर्जरी की खबर छपी है। इसमें आगे बताया गया है कि कैसे भारत मेडिकल टूरिज्म का केंद्र बनता जा रहा है। चिकित्सा से जुड़ी इस तरह की ज्यादातर चर्चाएँ अस्पतालों, खासकर निजी व्यावसायिक अस्पतालों के इर्द-गिर्द घूमती है।
यह रवैया दो कारणों से गलत है : पहला, यह सही है कि अस्पताल गैर-जरूरी नहीं हैं, लेकिन ज्यादातर जरुरी काम तो जमीनी स्तर पर करना है। दूसरा, स्वास्थ्य एक सार्वजनिक सुविधा (public good) है, जबकि निजी अस्पतालों का उद्देश्य व्यवसाय करना है। वे स्वभावतः ही उन वंचित समुदायों से आने वाले लोगों की सेवा नहीं करेंगे, जो उनकी महंगी सेवाओं का ख़र्च नहीं उठा सकते।
इसलिए, हमारे देश के सबसे अहम स्वास्थ्य सवालों के हल में व्यावसायिक अस्पतालों की भूमिका बहुत ही सीमित है।
चिकित्सा से जुड़ी इस तरह की ज्यादातर चर्चाएँ अस्पतालों, खासकर निजी व्यावसायिक अस्पतालों के इर्द-गिर्द घूमती है।
सेवा के करियर
जरूरत और हकीकत में एक बड़ा गैप यह है कि जहाँ स्वास्थ्य कर्मियों की सबसे ज्यादा जरुरत हैं, वहाँ वे पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं।
कुछ पेशे मूलतः लोगों की सेवा से जुड़े होते हैं, जैसे – शिक्षक, वकील और डॉक्टर। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई लोगों के लिए चिकित्सा मुनाफा कमाने का साधन बन गई है। इस घटना का सीधा संबंध इसकी व्यावसायिक जड़ों से है – जहां मेडिकल कॉलेज और निजी अस्पताल केवल मुनाफा कमाने के लिए चलाए जाते हैं।
इसलिए, हमारे देश के सबसे अहम स्वास्थ्य सवालों के हल में व्यावसायिक अस्पतालों की भूमिका बहुत ही सीमित है।

भारत में चिकित्सा शिक्षा में क्रांति की ज़रूरत है – ताकि इसे व्यवसायिकता से हटाकर सेवा और मूल्यों की भावना की ओर मोड़ा जा सके।
उभरती शहरी सीमाएँ
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली सीमाओं की कमियां देखने के लिए दूर-दराज के इलाकों में जाने की जरूरत नहीं है। हमारे महानगर देश भर से आए प्रवासी मजदूरों के असंगठित श्रम पर टिके हुए हैं। ये मजदूर अपना घर छोड़कर रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों में आते हैं। यहाँ आकर वे सुरक्षा गार्ड, घरेलू कामगार, कंस्ट्रक्शन वर्कर और गिग वर्कर बन जाते हैं।
ये लोग हमारे शहरों को चलाते हैं, फिर भी आंगनवाड़ी, राशन की दुकान या स्वास्थ्य केंद्र जैसी बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं तक इनकी पहुँच बहुत ही कम है।
भारत में चिकित्सा शिक्षा में क्रांति की ज़रूरत है – ताकि इसे व्यवसायिकता से हटाकर सेवा और मूल्यों की भावना की ओर मोड़ा जा सके।
नए बदलावों की जरूरत
वर्तमान समय में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) का बोलबाला है: रिमोट एप्लिकेशन, रोबोट, जीन थेरेपी, ए-आई इत्यादि का चलन बढ़ गया है। लेकिन, ये बात याद रखनी चाहिए कि तकनीकी बदलाव सबसे महत्त्वपूर्ण बदलाव नहीं हैं। उदहारण के लिए, आशा कार्यकर्ताओं (ASHAs) को ही लें। ये जमीनी स्वास्थ्यकर्मी होती हैं जिन्हें समुदाय से ही चुना जाता है। ये कार्यकर्ता स्वास्थ्य सेवाओं को देश के हर कोने तक पहुंचा रही हैं।
भारत ने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं – जैसे, अस्पतालों में प्रसव में वृद्धि होना और शिशु एवं मातृ मृत्यु दर में तेज़ी से गिरावट आना। ये सब इसलिए संभव हो पाया है, क्योंकि आशा कार्यकर्ताओं ने देश के हर छोटे-बड़े इलाके में घर-घर जाकर अपनी जिम्मेदारी निभाई है।
सार्वजनिक क्षेत्र पर व्यय में कमी
अगर आप सोचें कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, तो आप यह देखकर हैरान रह जाएंगे कि इस काम के लिए उन्हें कितना कम मेहनताना मिलता है। भारत प्रति व्यक्ति के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक है। यह खर्च कई अन्य विकासशील देशों से भी कम है। इसका सीधा असर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ता है।
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अब तक मेरा दृष्टिकोण आप लोगों की समझ में आ गया होगा। इन सब बातों के साथ, मैं उस लड़की की ओर लौटना चाहूँगा, जिससे हमारी कहानी शुरू हुई थी। इस दिशा में पहला कदम यह है कि हम इस बात को मानें कि उस बच्ची ने जो पीड़ा झेली, वह कतई स्वीकार्य नहीं है। हम अपने लोगों को इतनी बुरी हालत में नहीं रहने दे सकते। अगला कदम है यह समझना कि इस समस्या का हल एक मजबूत जमीनी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से ही संभव है।
हमने एक देश के तौर पर बड़ी प्रगति की है, लेकिन अब भी दृष्टिकोण और संसाधनों – दोनों में – डरावनी खाईयाँ मौजूद हैं। अगर हम यह चाहते हैं कि, जो उस बच्ची के साथ हुआ, वह दुबारा किसी दूसरे बच्चे के साथ न हो, तो भारत को अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में बड़ा बदलाव लाना होगा – और यह अगले कुछ वर्षों में ही हो जाना चाहिए।
बीज शब्द : स्वास्थ्य, सार्वजनिक, स्वास्थ्य प्रणाली, आदिवासी, निजी अस्पताल, व्यवसाय, मुनाफा, आशा कर्मी, परिवर्तन।
सारांश
यह एक महत्त्वपूर्ण लेख है जो कि एक बीमार बच्ची और उसके आदिवासी माता-पिता की कहानी के माध्यम से भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली की सीमाओं को उजागर करता है। इस लेख में भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को पुख्ता करने के सुझावों पर चर्चा की गई है। इसके साथ ही स्वास्थ्य को व्यवसाय का साधन बनाने के कारण उपजी समस्याओं विचार किया गया है और आशा कर्मी जैसे जमीनी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के महत्त्व को स्थापित किया गया है।
