भारत के दूर-दराज इलाकों से विभिन्न परिवार और लोग रोजी-रोटी की तलाश में बैंगलोर आते हैं। यह सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है। उनके अपने गाँव में न कोई रोजगार है और न ही परिवार चलाने लायक कमाई हो पाती है। बेहतर भविष्य की उम्मीद में वे लंबी यात्राएं करके शहर आते हैं।
जब वे पहली बार शहर में कदम रखते हैं, तो सब कुछ अनजाना लगता है। शहर उनके सामने कई मुश्किलें लेकर आता है; जैसे- अजनबी भाषा और दरवाजे के सामने कचरे का ढेर। रहने के लिए कोई स्थाई घर न होने के चलते परिवार टिन की झुग्गियों में रहने लगते हैं। हर परिवार एक छोटे से कमरे में किसी तरह से अपना गुजर बसर करता है। 3 ड्रम पानी में परिवार को हफ्ते भर काम चलाना पड़ता है। आस-पास के लगभग पंद्रह घरों के लिए केवल एक साझा शौचालय होता है। उन्हें जल निकासी के अभाव में गन्दगी और बदबू भरे माहौल में रहना पड़ता है।
इन अमानवीय परिस्थितियों के बावजूद, वे जिंदा रहने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। वे कई तरह के काम करते हैं; जैसे कि कचरा बीनना, भवन-निर्माण, डिलीवरी बॉय के रूप काम करना। महिलाएं घरेलू नौकरानी (मेड) के रूप में काम करती हैं या नजदीकी घरों में सौन्दर्य संबंधी सेवाएं प्रदान करती हैं। उनकी कमाई से घर का चूल्हा जलता है, लेकिन आमदनी अनिश्चित होती है और जिंदगी रोज कमाओ और रोज खाओ तक सिमट जाती है।
स्वास्थ्य संबधी देखभाल एक और बड़ी चुनौती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित जानकारी, अस्पताल का दूर होना, भाषा संबंधी बाधाओं और राज्य सरकार द्वारा जारी पहचान पत्र न होने के कारण लोग महंगे प्राइवेट क्लीनिकों या झोलाछाप डॉक्टरों के चंगुल में फंस जाते हैं। कई लोग इसके लिए स्थानीय मेडिकल स्टोर या छोटे-मोटे क्लीनिकों पर निर्भर रहते हैं। जहाँ पैसा ज्यादा लगता है और इलाज का भरोसा नहीं होता।
हर परिवार एक छोटे से कमरे में किसी तरह से अपना गुजर बसर करता है। 3 ड्रम पानी में परिवार को हफ्ते भर काम चलाना पड़ता है।
मैंने जिन बातों का ज़िक्र ऊपर किया है, वे शहर के विभिन्न हिस्सों में बसने वाले बहुत से प्रवासियों के जीवन का सच हैं। ऐसी ही एक बस्ती बैंगलोर के थुबराहल्ली में है। थानल संस्था (एक गैर-लाभकारी संगठन) ने हाल ही में, यहाँ की समस्याओं को हल करने के लिए कुछ काम शुरू किया है। सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों की मदद से, वे इन समस्याओं से निपटने का प्रयास कर रहे हैं।
हस्तक्षेप
उन्हीं बस्तियों में सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी भी रहते हैं और वे स्वास्थ्य सेवा में प्रशिक्षित होते हैं। वे घर-घर जाकर अलग-अलग परिवारों से मिलते हैं और उन्हें आसान ढंग से स्वास्थ्य के बारे में जागरुक करते हैं। वे उन्हें शहर की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने में मदद करते हैं। संस्था द्वारा नियुक्त और प्रशिक्षित इन स्वास्थ्य कर्मियों का समुदाय के लोगों के साथ गहरा संबंध होता है। उनकी उपस्थिति एक महत्त्वपूर्ण कमी को पूरा करती है। वे लोगों को आश्वस्त करते हैं और व्यावहारिक मदद भी देते हैं।

ये सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी परिवारों को क्लिनिक तक पहुँचाने से लेकर जाँच करवाने और दवाएं दिलाने तक में लोगों की मदद करते हैं। इस प्रकार, इन स्वास्थ्य कर्मियों ने स्वास्थ्य सेवाओं से थुबराहल्ली के निवासियों की दूरी को घटाया है।
सुरक्षित मातृत्व की ओर बबिता का सफर
ये सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी परिवारों को क्लिनिक तक पहुँचाने से लेकर जाँच करवाने और दवाएं दिलाने तक में लोगों की मदद करते हैं। इस प्रकार, इन स्वास्थ्य कर्मियों ने स्वास्थ्य सेवाओं से थुबराहल्ली के निवासियों की दूरी को घटाया है।
पश्चिम बंगाल की बबिता एक 26 वर्षीय महिला है, जो अपने पति और तीन छोटे बच्चों के साथ थुबराहल्ली बस्ती में रहती है। बबिता का परिवार लगभग पाँच साल से बैंगलोर में ही रह रहा है। बबिता का पति कचरा छांटने का काम करता है। कभी-कभी उसे खाना अथवा किराने के सामान की डिलीवरी का काम भी मिल जाता है। बबिता आस-पास के अपार्टमेंट्स में घरेलू मेड के रूप में काम करती है।
कबिता ने उसे बताया कि बैंगलोर में गर्भावस्था का पंजीकरण होता है। फिर थायी कार्ड बनता है (मदर एंड चाइल्ड प्रोटेक्शन कार्ड – MCP card) और सरकारी अस्पतालों में डिलीवरी संबंधी सभी सेवाएं मुफ्त में प्राप्त की जा सकती हैं।
जब बबिता को दूसरा बच्चा होने वाला था, तब वह डिलीवरी के लिए पश्चिम बंगाल में अपने मायके वापस चली गई। उस समय उसे इस बात का भरोसा नहीं था कि उसे बैंगलोर में स्वास्थ्य-सेवाएं मिल पाएंगी या नहीं। इसलिए, उसने अपने गाँव की परिचित व्यवस्था और परिवार के सहारे पर भरोसा करना ज़्यादा सुरक्षित समझा।
जब वह तीसरी बार गर्भवती हुई, तब तक परिस्थितियाँ बदल चुकी थीं। उस समय कबिता कुमारी नाम की सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी उसकी बस्ती में नियमित रूप से आने लगी थी। कबिता ने उसे बताया कि बैंगलोर में गर्भावस्था का पंजीकरण होता है। फिर थायी कार्ड बनता है (मदर एंड चाइल्ड प्रोटेक्शन कार्ड – MCP card) और सरकारी अस्पतालों में डिलीवरी संबंधी सभी सेवाएं मुफ्त में प्राप्त की जा सकती हैं।
Subscribe to stay connected
We will send you a monthly newsletter listing all the articles that were published in the month.
इस आश्वासन ने बबिता को अपना बच्चा पैदा करने के लिए गाँव लौटने की बजाय शहर में रहने की हिम्मत दी। कबिता ने हर कदम पर बबिता का मार्गदर्शन किया। उसने बबिता का गर्भावस्था पंजीकरण करवाने, थायी कार्ड प्राप्त करने और उसके चिकित्सा इतिहास को दर्ज कराने में मदद की। कबिता ने बबिता को प्रसव पूर्व होने वाली सभी जरुरी जांच करवाने के लिए प्रोत्साहित किया। आहार, आयरन और कैल्शियम की गोलियों के बारे में बताया। साथ ही खतरे के संकेतों को पहचानने के महत्त्व के बारे में समझाया।
जैसे-जैसे गर्भावस्था के दिन आगे बढ़े, कबिता ने बबिता और उसके परिवार को प्रसव की तैयारी से जुड़े जरुरी परामर्श दिए। कबिता ने उन्हें ट्रांसपोर्ट और जरूरी सामानों के लिए कुछ बचत करने की भी सलाह दी। उसने समय से अस्पताल पहुँचने के लिए पहले से इंतजाम करने की सलाह दी। इसके अलावा डिलीवरी के बाद परिवार नियोजन के विकल्पों के बारे में बताया। कबिता ने बबिता को पास के सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) से भी जोड़ा। वहाँ बबिता ने प्रसव से पहले होने वाले सभी जरुरी जांच करवाई और अपना थायी कार्ड अपडेट करवाती रही।
बबिता की कहानी ये दर्शाती है कि ऐसी शहरी गरीब बस्तियों में एक सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी का होना कितना बड़ा अंतर पैदा कर देता है। वह गर्भवती स्त्री एवं शिशु तक स्वास्थ्य सेवाओं को पहुँचने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। एक सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी के सहयोग के कारण, बबिता बैंगलोर में अपनी डिलीवरी कर पायी। साथ ही, मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग कर पायी और अपने बच्चे का सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित कर पायी।
गर्भावस्था के आखिरी महीने में कबिता बबिता से और जल्दी-जल्दी मिलने लगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बबिता प्रसव के लिए तैयार है। इस निरंतर सहयोग के कारण बबीता ने प्रसवपूर्व सभी जांचें पूरी की और अपने स्वास्थ्य को लेकर आत्मविश्वास बनाए रखा। जब डिलीवरी का उचित समय आया, तो बबिता ने बैंगलोर के वाणी विलास अस्पताल (एक सरकारी अस्पताल) में सुरक्षित तरीके से अपने बच्चे को जन्म दिया। डिलीवरी के बाद भी कबिता नवजात शिशु की देखभाल, टीकाकरण कार्यक्रम और परिवार नियोजन के तरीकों पर सलाह देकर बबिता को सहयोग देती रही।
बबिता की कहानी ये दर्शाती है कि ऐसी शहरी गरीब बस्तियों में एक सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी का होना कितना बड़ा अंतर पैदा कर देता है। वह गर्भवती स्त्री एवं शिशु तक स्वास्थ्य सेवाओं को पहुँचने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। एक सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी के सहयोग के कारण, बबिता बैंगलोर में अपनी डिलीवरी कर पायी। साथ ही, मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग कर पायी और अपने बच्चे का सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित कर पायी।
