असुंता दीदी: स्वास्थ्य सेवाओं में भरोसे को बनाए रखने वाली दीदी (सिस्टर)

असुंता दीदी के अटूट लगन ने कई मुश्किलों के बावजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को गाँव वासियों के लिए विश्वसनीय बनाया।

असुंता दीदी: स्वास्थ्य सेवाओं में भरोसे को बनाए रखने वाली दीदी (सिस्टर)

देश के दूर-दराज़ के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएँ संसाधनों से बढ़कर यहाँ के स्वास्थ्य-कर्मियों के अथक प्रयासों एवं विश्वसनीयता के चलते सक्रिय हैं। यह कहानी ऐसे ही विश्वासों को बनाए रखते घटनाओं के साक्ष्य प्रस्तुत करती है।

आज भी हमारे देश के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जो विकास की राह देख रहे हैं। ऐसे दूर-दराज़ के इलाकों में गरीबी फैली हुई है। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की बहुत कमी है। लोगों के पास महंगी और निजी चिकित्सा के लिए न तो पैसा है और न सुविधाएँ। ऐसे में उनके पास सरकारी स्वास्थ्य सुविधा का ही विकल्प बच जाता है। इन सबके बीच अच्छी बात यह है की इसी व्यवस्था में कई ऐसे स्वास्थ्य कर्मी हैं, जो अपनी ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभा रहे हैं। अपना काम करते हुए वे सुकून और संतोष भी पाते हैं।

ऐसे स्वास्थ्य कर्मी अपने काम की वजह से कइयों के लिए मिसाल कायम करते हैं। यहाँ हमने ऐसी ही कुछ महिला स्वास्थ्य कर्मियों से मुलाकात दर्ज की है। इन महिला स्वास्थ्य कर्मियों ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर काम किया है और कई ज़िंदगियों को बचाने में कामयाब हुई हैं। इस बात की उन्हें आज भी काफ़ी संतुष्टि महसूस करती हैं।

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संजीवनी और उसकी की माँ विमला राठिया से जब हम मिलने गए तब वह हमें गाँव के पास ही किसी के खेत में धान की रोपाई करते मिलीं। वह खेतिहर मजदूर हैं।

जब हम छत्तीसगढ़ राज्य के रायगढ़ ज़िले के धरमजयगढ़ विकासखंड के मिरिगूड़ा गाँव में बने शासकीय उप-स्वास्थ्य केंद्र यानी आयुष्मान आरोग्य मंदिर गए, तो हमारी मुलाक़ात ऐसी ही एक जीवनदायीनी से हुई। उनका नाम असुंता  टोप्पो है। वे उप-स्वास्थ्य केंद्र में ग्रामीण स्वास्थ्य संयोजिका (RHO) हैं।

हम जब उप-स्वास्थ्य केंद्र पहुँचे, तब वहाँ मितानिन दीदियों (आशा कर्मियों) की बैठक चल रही थी। उनके साथ सीएचओ नेहा खलखो और असुंता टोप्पो बैठी हुई थीं।

बैठक ख़त्म होने के बाद वह हमसे मिलीं। उसके बाद नेहा खलखो और असुंता टोप्पो ने हमें अपने क्षेत्र के लोगों और यहाँ आने वाले मरीज़ों के बारे में जानकारी दी। सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी नेहा ने कहा –“यह बहुत पिछड़ा इलाका है। इस इलाके में ज़्यादातर आदिवासी रहते हैं। यहाँ यातायात एक बहुत बड़ी समस्या है। इस उप-स्वास्थ्य केंद्र पर मिरिगूड़ा, नकना, भांवरखोल और सिमिपाली खुर्ज के लोग निर्भर हैं। इन चारों गाँव की तकरीबन चार हज़ार आबादी है। इनमें ज़्यादातर संख्या राठिया यानि कंवर आदिवासियों की है। यहाँ उरांव आदिवासियों के करीब 20 घर हैं। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) बैगाओं के भी 25 से ज़्यादा घर हैं। यहाँ एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह बिरहोरों के भी तीन परिवार हैं। इनके अलावा सतनामी और बसोंड समुदाय के लोग भी यहाँ हैं। यहाँ के लोगों की आजीविका का साधन खेती-किसानी के अलावा जंगल पर भी निर्भरता है।”

“यह बहुत पिछड़ा इलाका है। इस इलाके में ज़्यादातर आदिवासी रहते हैं। यहाँ यातायात एक बहुत बड़ी समस्या है। इस उप-स्वास्थ्य केंद्र पर मिरिगूड़ा, नकना, भांवरखोल और सिमिपाली खुर्ज के लोग निर्भर हैं।

हमने पूछा, यहाँ किस तरह के मरीज़़ आते हैं? इसके जवाब में नेहा ने जानकारी दी- “यहाँ कम्युनिकेबल (संचारी) बीमारी में मलेरिया, डेंगू, डाइरिया और नॉन कम्युनिकेबल (गैर-संचारी) बीमारी में डायबेटिक, हाइपरटेंशन, के अलावा बुख़ार, सर्दी ज़ुकाम का भी इलाज करते हैं। यहाँ ब्लड टेस्ट नहीं होता, लेकिन हम यहाँ आरडी किट स्लाइड बनाते हैं। हम मलेरिया, एचआयीवी, सिकल सेल, एचबी टेस्ट इत्यादि भी करवाते हैं।”

“इन सबसे ज़्यादा, इस स्वास्थ्य केंद्र में लोग प्रसव करवाने के लिए भी आते हैं।”  नेहा ने हमें इस बारे में जानकारी देते हुए बताया, “इस माह अब तक 5 प्रसव हुए हैं। आमतौर पर यहाँ 10 से ज़्यादा प्रसव किए जाते हैं। जनवरी से अब तक कुल 65 प्रसव कराए जा चुके हैं। हम गर्भ धारण के बाद से नियमित जांच-परख करते रहते हैं। यहाँ सब सामान्य प्रसव करवाए जाते हैं। अगर जटिल या भारी जोखिम वाले केस होते हैं, तो उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, धरमजयगढ़ या ज़िला अस्पताल रायगढ़ रेफ़र कर दिया जाता है।”

“यहाँ कम्युनिकेबल (संचारी) बीमारी में मलेरिया, डेंगू, डाइरिया और नॉन कम्युनिकेबल (गैर-संचारी) बीमारी में डायबेटिक, हाइपरटेंशन, के अलावा बुख़ार, सर्दी ज़ुकाम का भी इलाज करते हैं।

इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पहले और ज़्यादा प्रसव होते थे, लेकिन पास में ही और एक उप-स्वास्थ्य केंद्र शुरु होने से यहाँ संख्या थोड़ी कम हुई है।  नेहा खलखो इस सामुदायिक स्वास्थ्य में बतौर अधिकारी 4 साल से सेवाएँ दे रही हैं। जबकि आरएचओ असुंता टोप्पो यहाँ पिछले 19 साल से हैं और उनके रहते अब तक यहाँ तकरीबन तीन हज़ार प्रसव हो चुके हैं

सीएचओ नेहा खलखो ने कहा- “असुंता दीदी पर भरोसा करके यहाँ प्रसव के लिए ज़्यादातर लोग आते हैं।”

 नेहा ने हमें इस बारे में जानकारी देते हुए बताया, “इस माह अब तक 5 प्रसव हुए हैं। आमतौर पर यहाँ 10 से ज़्यादा प्रसव किए जाते हैं। जनवरी से अब तक कुल 65 प्रसव कराए जा चुके हैं। हम गर्भ धारण के बाद से नियमित जांच-परख करते रहते हैं। यहाँ सब सामान्य प्रसव करवाए जाते हैं। अगर जटिल या भारी जोखिम वाले केस होते हैं, तो उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, धरमजयगढ़ या ज़िला अस्पताल रायगढ़ रेफ़र कर दिया जाता है।”

असुंता दीदी से हमने सवाल किया कि वे यहाँ कब से हैं? उन्होंने बताया, “मैं 2005 से यानी पिछले 19 साल से यहीं हूँ। अब तो यहीं की निवासी हो गयी हूँ। तब और अब में यहाँ काफ़ी बदलाव आ गया है। पहले यहाँ से आना-जाना और भी मुश्किल था। मैं 15 से 20 किमी तक पैदल मरीज़ों के गाँव आती-जाती थी। काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। पहले उल्टी-दस्त, मौसमी बीमारी ज़्यादा होती थी। अब कम हो गयी हैं। बीपी और शुगर से होने वाली मृत्यु में भी कमी आयी है।”

असुंता दीदी से हमने सवाल किया कि वे यहाँ कब से हैं? उन्होंने बताया, “मैं 2005 से यानी पिछले 19 साल से यहीं हूँ। अब तो यहीं की निवासी हो गयी हूँ। तब और अब में यहाँ काफ़ी बदलाव आ गया है। पहले यहाँ से आना-जाना और भी मुश्किल था। मैं 15 से 20 किमी तक पैदल मरीज़ों के गाँव आती-जाती थी। काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। पहले उल्टी-दस्त, मौसमी बीमारी ज़्यादा होती थी। अब कम हो गयी हैं। बीपी और शुगर से होने वाली मृत्यु में भी कमी आयी है।”

सीएचओ नेहा खलखो ने कहा- “असुंता दीदी पर भरोसा करके यहाँ प्रसव के लिए ज़्यादातर लोग आते हैं।”

अब मलेरिया जैसे बुख़ार के मरीज़ कम आ रहे हैं, क्योंकि अब लोगों में जागरूकता आने लगी है। लगातार सर्वे किए जा रहे हैं, मेडिकटेड मच्छरदानी दी जा रही है, जिसका लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। साँप, मच्छर और खटमल आदि के बारे में जानकारी दी जा रही है। कई तरह का टीकाकरण किया जा रहा है।

“पहले ज़्यादा समस्या थी, पहले ज़्यादा गंदगी भी होती थी। अब थोड़ी बहुत जागरूकता आयी है। पहले विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह के लोग (जैसे बिरहोर समुदाय) हॉस्पिटल नहीं आते थे। गाँव के बाहर ही प्रसव कराते थे। वह बच्चे के नाल को पत्थर से काटते थे। लेकिन अब बदलाव आ रहा है।”

मैं 2005 से यानी पिछले 19 साल से यहीं हूँ। अब तो यहीं की निवासी हो गयी हूँ। तब और अब में यहाँ काफ़ी बदलाव आ गया है। पहले यहाँ से आना-जाना और भी मुश्किल था। मैं 15 से 20 किमी तक पैदल मरीज़ों के गाँव आती-जाती थी। काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। पहले उल्टी-दस्त, मौसमी बीमारी ज़्यादा होती थी। अब कम हो गयी हैं। बीपी और शुगर से होने वाली मृत्यु में भी कमी आयी है।

VHSND (यानी विल्लेज हैल्थ सेनिटेशन एण्ड न्यूट्रिशन डे) के तहत गाँव में जाकर लोगों के स्वास्थ्य की जांच की जाती है। मंगलवार और शुक्रवार को यह जांच की जाती है। इसके अलावा ANC (एंटी नटाल टेस्ट) भी किए जाते हैं।

उनके मुताबिक, “इस काम में हमें अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन का भी सहयोग मिल रहा है। उनसे हमारी मितानिन दीदियों को प्रशिक्षण भी मिल रहा है। एएनसी चेकअप के लिए वहाँ से डॉक्टर आए थे और हाई-रिस्क स्क्रीनिंग के बारे में भी जानकारी दी थीं।”

अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन स्वास्थ्य के क्षेत्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की क्षमतावर्धन के लिए भी काम कर रहा है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ काम करने के लिए धरमजयगढ़ के कुछ क्षेत्रों को चुना गया है। इन क्षेत्रों में VHSND में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका और बच्चे के विकास की देखभाल करने के कौशल के साथ-साथ स्वास्थ्य के क्षेत्र में अन्य महत्त्वपूर्ण काम करने के लिए कौशल विकास में भी उनकी मदद की जा रही है। इसके तहत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को समूह में या व्यक्तिगत रूप से कौशल विकास के मौके उपलब्ध कराए जा रहे है।

हमने आरएचओ असुंता टोप्पो से पूछा कि, आप इतने वर्षों से काम कर रही हैं, और आपने करीब 3 हज़ार प्रसव कराए हैं। इन 19 सालों में कोई एक घटना बताइये जो आज भी आपको याद है। आपको मुश्किलों का सामना करना पड़ा हो, पर आख़िरकार काफ़ी संतुष्टि दी हो?

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Sanjeevani and his mother Vimla Rathia with Rural Health Coordinator Asunta Toppo, who is also known as Asunta Didi ​
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Asunta Toppo with Sanjeevani, a child whose life she saved in 2018. She named the boy after the ambulance service that transported his bleeding mother and him to the government hospital in Raigarh ​

“यूँ तो कई घटनाएँ हैं, लेकिन मैं आपको एक घटना के बारे में ज़रूर बताना चाहूँगी। यह बात 1 मई, 2018 की है। यहाँ हमारे उप-केंद्र में एक मां का हाई-रिस्क प्रसव हुआ। उनका बीपी भी बहुत ज़्यादा बढ़ा हुआ था। हीमोग्लोबिन भी बहुत कम था, 7 ग्राम से भी कम था। वह जिस स्थिति में हमारे सब-सेंटर पर आयी, उनका लेबर पेन (प्रसव पीड़ा) शुरू हो चुका था। हम उसे टेबल पर लिटा ही नहीं सके थे कि डिलिवरी हो गयी।

उनके मुताबिक, “इस काम में हमें अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन का भी सहयोग मिल रहा है। उनसे हमारी मितानिन दीदियों को प्रशिक्षण भी मिल रहा है। एएनसी चेकअप के लिए वहाँ से डॉक्टर आए थे और हाई-रिस्क स्क्रीनिंग के बारे में भी जानकारी दी थीं।

प्रसव के बाद शिशु के हालात नाज़ुक थे। बहुत देर के बाद सांस आने लगी। और मेरे पास ऑक्सीजन की सुविधा नहीं थी। माँ की स्थिति भी अच्छी नहीं थी, उनका बीपी बढ़ा हुआ था। काफ़ी ख़ून बह चुका था। मेरी मुश्किल थी कि मैं मां को संभालूं या शिशु को। फिर भी मुझसे जो बन पड़ा, मैंने बीपी और ख़ून के बहने को कंट्रोल करते चली और बच्चे को भी माउथ-टु-माउथ सांस देकर उसे भी ज़िंदा रखा। इसके बाद 108 (ऍम्बुलंस) के सहयोग से रेफ़र करने की कोशिश की। 108 आने के बाद उसमें जो डॉक्टर थे, उन्होंने माँ को संभाला। उसके बाद मैंने बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया। उसके बाद हम मिरिगूड़ा से सीधे रायगढ़ मेडिकल कॉलेज के लिए रवाना हुए। और रास्ते में भी हमारे लिए ऑक्सीजन सिलिंडर की व्यवस्था नहीं हो पाई। लेकिन मैं बच्चे को माउथ-टु-माउथ सांस देते हुए रायगढ़ मेडिकल कॉलेज तक पहुँची। वहाँ मुझे संतुष्टि हुई कि मैं बच्चे को सही जगह पर पहुँचा सकी। लेकिन वहाँ भी डॉक्टर ने जवाब दे दिया कि बच्चा नहीं बच सकता।

“लेकिन मेरी ज़िद थी कि जो बच्चा 70/80 किमी दूरी तय करके यहाँ आया है, उसे बचाया जाना चाहिए। अगर उसे जाना होता तो इतनी दूर नहीं आता। अंततः दोनों माँ और बच्चे सुरक्षित हैं। इस बात से मुझे बहुत संतोष होता है।”

हमने पूछा, अभी बच्चा कैसा है?

प्रसव के बाद शिशु के हालात नाज़ुक थे। बहुत देर के बाद सांस आने लगी। और मेरे पास ऑक्सीजन की सुविधा नहीं थी। माँ की स्थिति भी अच्छी नहीं थी, उनका बीपी बढ़ा हुआ था। काफ़ी ख़ून बह चुका था। मेरी मुश्किल थी कि मैं मां को संभालूं या शिशु को। फिर भी मुझसे जो बन पड़ा, मैंने बीपी और ख़ून के बहने को कंट्रोल करते चली और बच्चे को भी माउथ-टु-माउथ सांस देकर उसे भी ज़िंदा रखा।

“वह यहीं मिरिगूड़ा गाँव में है। मैंने उसका नाम संजीवनी राठीया रखा है। मुझे पहली बार 108 संजीवनी सेवा मिली थी, इसलिए बच्चे का नाम संजीवनी रखा।” – असुंता दीदी ने कहा।

क्या बच्चे के माँ-बाप उस घटना को याद करते हैं?

लेकिन मेरी ज़िद थी कि जो बच्चा 70/80 किमी दूरी तय करके यहाँ आया है, उसे बचाया जाना चाहिए। अगर उसे जाना होता तो इतनी दूर नहीं आता। अंततः दोनों माँ और बच्चे सुरक्षित हैं। इस बात से मुझे बहुत संतोष होता है।

“करते हैं सर बहुत याद करते हैं। वह बच्चा मुझे माँ कहता है।” वह बहुत खुशी और गर्व के साथ बताती हैं। वह कहती हैं, “उनके घरवाले हताश हो चुके थे। बाल विशेषज्ञ ने भी कह दिया था कि उम्मीद नहीं है। पर मैं ज़िद कर रही थी कि, जब मैं मिरिगूड़ा से रायगढ़ तक उसे ले आयी, तो बच्चे को कुछ नहीं होगा। अब पांच साल हो गए, और वह ठीक है।”

वह यहीं मिरिगूड़ा गाँव में है। मैंने उसका नाम संजीवनी राठीया रखा है। मुझे पहली बार 108 संजीवनी सेवा मिली थी, इसलिए बच्चे का नाम संजीवनी रखा।

जब हमने पूछा कि आपको क्यों लगा कि आप बच्चे को बचा पाएंगी। यहाँ से रायगढ़ तक कैसे लेकर गए? तो उनका जवाब था, “यहाँ से पहले हम धरमजयगढ़ ले कर गए। वहाँ एक महिला डॉक्टर थीं, नाम लेना नहीं चाहूंगी। उन्होंने नाराज़गी दिखाते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में हम मां और बच्चे को लेकर क्यों आ गए। मुझे को मुझे तो / मुझ को मां और बच्चे को बचाना था, इसलिए मैं डॉक्टर से लड़ गयी। मैंने उनसे कहा, आप नहीं कर पा रही हैं, तो छोड़ दीजिये। आप मुझे थोड़ी मदद कर दीजिए। लेकिन वह नाराज़ हो गईं। मुझे कुछ समझ में नहीं आया मैं बच्चे को उसी स्थिति में उठाकर ले गयी। मैंने उनसे आग्रह किया कि मुझे सिर्फ़ ऍम्बुलेंस की ज़रूरत है। मुझे ऍम्बुलेंस दे दीजिए। इसके बाद मैडम ने बच्चे को एक इंजेक्शन दिया और एक दवाई पिलाई। उसके बाद मैं माउथ-टू-माउथ सांस देते हुए उन्हें रायगढ़ मेडिकल कॉलेज ले गए। मेरे साथ एक मितानिन भी थी। अच्छा लगा सर उस समय।” यह बताते हुए वह काफ़ी भावुक हो गयी थीं।

हमने उनसे पूछा, ‘क्या हम उस बच्चे से और उसकी माँ से मिल सकते हैं?’ उन्होंने कहा ‘चलिये’। हम उनके घर गए, पता चला वह धान के रोपाई के लिए गए हैं। हम उनके खेत में गए। माँ खेत में धान रोपने में लगी थी और संजीवनी अपने दोस्तों के साथ खेलने में। असुंता दीदी को देखकर संजीवनी की माँ विमला खेत से बाहर आ गयी। असुंता दीदी ने जब पुकारा तो संजीवनी भी वहाँ आ गया। दीदी को देखकर माँ बहुत ख़ुश हुई।

वह बच्चा मुझे माँ कहता है।” वह बहुत खुशी और गर्व के साथ बताती हैं। वह कहती हैं, “उनके घरवाले हताश हो चुके थे। बाल विशेषज्ञ ने भी कह दिया था कि उम्मीद नहीं है। पर मैं ज़िद कर रही थी कि, जब मैं मिरिगूड़ा से रायगढ़ तक उसे ले आयी, तो बच्चे को कुछ नहीं होगा। अब पांच साल हो गए, और वह ठीक है।

मैंने उनसे पूछा, ‘इसके अलावा और कोई घटना?’ उन्होंने बताया, “ऐसी बहुत-सी घटनाएँ हैं सर। एक ऐसी ही घटना बिरहोर की महिला के साथ हुई थी, (बिरहोर समुदाय छत्तीसगढ़ के विशेष रूप से पिछड़ी जन जातियों में से एक हैं।) उसका यह सातवां बच्चा था। उसकी डिलिवरी हुई, तो उसका पूरा युटेरस बाहर आ गया। ऐसी स्थिति में हम लोगों को जैसे भी समझ में आया, हमने युटेरस को अंदर डाल दिया। हम उसे रेफ़र कर रहे थे, तो वह जाना नहीं चाहती थी। हमने जैसे-तैसे वह केस संभाल लिया। उसके बाद उसका दूसरा प्रसव भी हुआ है।”

उन्होंने आगे बताया, “ऐसी और भी बहुत-सी घटनाएँ हैं। 2019 की बात है। एक महिला को “एक्लामप्सिया”(Eclampsia) आ गया। एक्लेमसी एकलामप्सिया मतलब? इसमें गर्भवती महिला का बीपी बढ़ जाता है, यूरिन में एल्बिमीन बढ़ जाता है।  हीमोग्लोबिन भी कम रहता है, तो एक प्रकार का झटका आता है।” झटका आने से गर्भवती महिला की जीभ कटने का डर रहता है। हाथ-पैर सब अकड़ जाते हैं। उसे ख़ुद को कुछ मालूम नहीं रहता है कि शिशु को कैसे बाहर आना है।  हम जैसे-तैसे उसे उप-स्वास्थ्य केंद्र तक लेकर आए…

एक ऐसी ही 2015 की एक घटना है। पहले यहाँ गाड़ी की सुविधा नहीं थी। हमारे यहाँ पथरीडाँड गाँव से एक गर्भवती महिला को एक्लेमसी आ गया, तो हम उसे खाट पर बांध कर मुश्किल से यहाँ लेकर लाए और उसका प्रसव कराया।

ऐसी और भी बहुत-सी घटनाएँ हैं। 2019 की बात है। एक महिला को “एक्लामप्सिया”(Eclampsia) आ गया। एक्लेमसी एकलामप्सिया मतलब? इसमें गर्भवती महिला का बीपी बढ़ जाता है, यूरिन में एल्बिमीन बढ़ जाता है।  हीमोग्लोबिन भी कम रहता है, तो एक प्रकार का झटका आता है।

ज़ाहिर है, ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं और होती रहती है। इसके बावजूद वे बहुत कम संसाधनों के होते हुए भी लगातार स्वास्थ्य सेवा मुहैया करा रही हैं। इसीलिए गाँव वालों का उन पर भरोसा है। ये ग्रामीण स्वास्थ्य कर्मी ही हैं, जो हमारी सरकारी स्वास्थ्य सेवा की मौजूदगी का एहसास दिला रही हैं और साथ ही ग्रामीण क्षेत्र में बिना थके-बिना रुके स्वास्थ्य सेवा मुहैया करा रहे हैं।

यह लेख मूलतः यहां प्रकाशित हुआ था https://azimpremjifoundation.org/hi/असुंता-दीदी-स्वास्थ्य-से

एक ऐसी ही 2015 की एक घटना है। पहले यहाँ गाड़ी की सुविधा नहीं थी। हमारे यहाँ पथरीडाँड गाँव से एक गर्भवती महिला को एक्लेमसी आ गया, तो हम उसे खाट पर बांध कर मुश्किल से यहाँ लेकर लाए और उसका प्रसव कराया।