व्यवस्था की जटिल समस्याओं को हल करने के लिए गहराई में उतरकर काम करना ज़रूरी है

भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में पिछले कुछ वर्षों में काफी सुधार आया है। लेकिन, अब भी कई बड़ी समस्याएँ मौजूद हैं। इन पर एक गहरी नज़र।

व्यवस्था की जटिल समस्याओं को हल करने के लिए गहराई में उतरकर काम करना ज़रूरी है

मैंने अपने पेशेवर करियर के शुरुआती आठ सालों तक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम किया है। मेरा मुख्य काम स्वास्थ्य सेवा देने वालों को वित्तीय सहायता यानी loans उपलब्ध कराना था। ये काम छोटे कस्बों में काम कर रहे छोटे-से-छोटे स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर देश के बड़े-बड़े अस्पतालों तक फैला हुआ था। उन दिनों मैंने जो कुछ सीखा, वही आगे चलकर मेरे करियर की बुनियाद बनी। 

यह काम करते हुए मैंने इस बात को करीब से देखा कि हमसे वित्तीय मदद की उम्मीद रखने वाले लोग उत्सुकतावश पैसे कमाने के अपने तरीके और गहरे रहस्यों को भी हमें बता दिया करते थे। ऐसा कर वे हमारे समाने यह साबित करना चाहते थे कि उनके पास हमारा पैसा सुरक्षित रहेगा और हमारा भी फ़ायदा होगा। पैसा कमाने के लिए लोग कई गलत तरीकों को अपना लेते थे। इसमें गैर-ज़रूरी डायग्नोस्टिक टेस्ट और इलाज का खर्च, दवाएं और अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए पैसा लेना शामिल था। इन कामों को करवाने के लिए हद से ज़्यादा पैसा लेना आम बात थी। यह मरीजों और उनके परिवारों पर एक तरह का अन्याय था । इलाज करवाने के लिए अपनी जिंदगी की बागडोर जिनके हाथ में थी, वही अपने पेशे का अक्सर गलत इस्तेमाल करते हुए देखे जा सकते थे। इस तरह के अनैतिक काम ‘पेशेगत निर्णय’ (professional judgement) के नाम पर कई बार चुपके तो अक्सर खुलेआम चलाए जाते रहे हैं।  

इसमें गैर-ज़रूरी डायग्नोस्टिक टेस्ट और इलाज का खर्च, दवाएं और अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए पैसा लेना शामिल था।

इन सबके बावजूद, मैं कुछ नैतिक और बेहद कुशल लोगों से भी मिला और ऐसे कई अस्पताल देखे। अफ़सोस की बात यह है कि ऐसे लोग और अस्पताल गिने-चुने ही थे। उनकी मौजूदगी शायद 20% ही हो। जबकि, चुपके से लेकर खुलेआम पैसा वसूलने वाले लोगों का बाज़ार में बोलबाला है। 

कुछ समय बाद मैंने केनेथ एरो का एक शानदार लेख ‘अनसर्टेंटी एंड द वेलफेयर इकोनॉमिक्स ऑफ़ मेडिकल केयर’ पढ़ा। एरो के विचारों ने मेरे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आए अनुभवों को सैद्धांतिक रूप दिया। इस लेख के कई ज़रूरी पहलुओं में पहले बिंदु में एरो का कहना था कि, यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि स्वास्थ्य सेवाओं की कब ज़रूरत आन पड़ेगी; यानी आप यह नहीं जानते कि कब और कौन-सी बीमारी होगी या फैलेगी। उनके मुताबिक यह स्पष्ट नहीं है कि कोई डायग्नोस्टिक टेस्ट या थेरेपी स्थायी रूप से किसी सकारात्मक नतीजे या इलाज कर देगी। आप साबुन की तरह डॉक्टरों को लगातार खोजते और बदलते नहीं रह सकते। डॉक्टरों के पास मरीजों से बहुत ज़्यादा ज्ञान होता है। इसलिए, मरीज़ और डॉक्टर के रिश्ते में दोनों पलड़े बिलकुल बराबर नहीं होते हैं, यानी यहाँ शक्ति का संतुलन नहीं होता है। इससे भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी बढ़ती है। 

हमारे फ़ाउण्डेशन ने चार साल पहले स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करना शुरु किया। उसी दौरान फैली कोरोना महामारी ने हमारी पूरी योजना को तहस-नहस कर दिया। हम बेहद मुश्किल हालात में फंस गए। अपने करियर के शुरुआती में काम करने के दो दशक बाद में मैं स्वास्थ्य क्षेत्र में लौट रहा था और हमारे स्वास्थ्य सिस्टम की कमजोर नींव अब भी कमज़ोर ही थी। इस बात से बिलकुल साफ़ हो जाता है कि पिछले दो दशकों में भारत में भले जितने भी बदलाव हुए हो, लेकिन बुनियादी हालत अभी भी जैसे-के-तैसे बने हुए थे। 

इस बारे में पहली और बुनियादी रूप से गलत धारणा हमारे दृष्टिकोण के मूल में ही मौजूद है। अक्सर हम मानते हैं कि बीमारियों को ठीक करने के लिए क्लिनिकल हस्तक्षेप और दवाएं, लोगों और समुदायों के स्वास्थ्य को प्रेरित कर बढ़ावा देने वाली संस्था के रूप में काम नहीं करती हैं। चिकित्सा सेवाएं एक मज़बूत स्वास्थ्य सिस्टम का सिर्फ़ एक हिस्सा हो सकती हैं, वे सर्वेसर्वा नहीं हो सकती हैं।  पिछले कुछ दशकों में हमने अपने देश में चिकित्सा संबंधी स्वास्थ्य सेवा और स्वास्थ्य सिस्टम को एक ही मान लिया गया है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में चिकित्सा और दवाओं पर हद से ज़्यादा निर्भरता ने हमारे पूरे समाज की अर्थव्यवस्था और कल्याणकारी चेतना पर गहरा प्रभाव डाला है। 

दूसरा, चिकित्सा पर हद से ज़्यादा निर्भरता का सीधा प्रभाव यह हुआ कि पोषण, इलाज, सामुदायिक स्वास्थ्य व प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा पर कम ध्यान दिया जाने लगा और उसमें निवेश भी कम किया जाने लगा। उस पर भी, कुछ बड़े अस्पतालों पर गैर-ज़रूरी ढंग से बहुत गर्व किया जाता है। इस पूरी व्यवस्था का सिर्फ़ यही मतलब रह जाता है कि यह व्यवस्था लोगों को स्वस्थ रखने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं करती। जब लोग बीमार पड़ते हैं, तो यह व्यवस्था उन्हें तुरंत और सही समय पर स्वास्थ्य सेवा मुहैय्या करवाने में नाकाफ़ी साबित होती है। इन सब का नतीजा यह होता है कि हालत बहुत ख़राब हो जाने पर इनमें से कुछ लोग जब बड़े अस्पतालों का दरवाज़ा खटखटाते हैं, तब इनमें से ज़्यादातर लोगों की किस्मत हमेशा साथ नहीं देती है। ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था संरचनात्मक रूप से महँगी और मानवीय दृष्टि से अप्रभावी होती है। 

तीसरी, हम सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से लेकर डॉक्टर तक, फ्रंट-लाइन स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता का विकास करने और उसे सशक्त बनाने में नाकामयाब रहे हैं। ये एक गंभीर मामला है, जिसका प्रभाव दूसरी कई बातों पर होता है। फ्रंट-लाइन कार्यकर्ताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका और उनके काम की जगह की हालातों को बहुत कम करके आँका जाता है। उन्हें तैयार करने वाले प्रशिक्षण सिस्टम में गुणवत्ता और क्षमता की कमी झलकती है। वे बहुत मुश्किल हालातों में संसाधनों की कमी से जूझते हुए काम करते हैं। क्योंकि, उन्हें व्यवस्था से बहुत कम समर्थन मिलता है और कई मामलों में उदासीनता का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, लाइसेंसिंग में भी कई कमियाँ-ख़ामियां और अवास्तविक पेशेवर लाइसेंसिंग का चलन हैं, जो कि कामकाज के वास्तविक दायरे को कुंद कर देता है। जैसे; पैरासिटामोल की एक गोली भी सिर्फ़ एमबीबीएस डॉक्टरों द्वारा ही लिखी जा सकती है। 

हम सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से लेकर डॉक्टर तक, फ्रंट-लाइन स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता का विकास करने और उसे सशक्त बनाने में नाकामयाब रहे हैं।

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चौथा बिंदु निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत ज़्यादा निर्भरता से जुड़ा हुआ है। आम लोग सिर्फ़ बड़े चमकदार महंगे अस्पतालों पर निर्भर नहीं होते हैं, बल्कि वे तो छोटे-मोटे अस्पतालों, गली-नुक्कड़ में खुले घटिया स्तर के क्लीनिकों और उन झोला-छाप डॉक्टरों पर ये निर्भर होते हैं। इस स्थिति का प्रमुख कारण स्वास्थ्य क्षेत्र में लंबे समय से ज़रूरत से कम निवेश करना और हमारा सार्वजनिक स्वास्थ्य सिस्टम पर कम ध्यान देना है। हालाँकि, कुछ राज्यों में इसके अपवाद भी मौजूद हैं, जहाँ ऐसी स्थिति नहीं है। 

पाँचवां बिंदु है, कमजोर सार्वजनिक सेवाओं और निजी क्षेत्र पर बहुत ज़्यादा निर्भरता के परिणाम के रूप में समाने आता है। इसका परिणाम यह है कि कमज़ोर आर्थिक वर्गों और जटिल भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में एक समान स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं पहुँच पाती हैं। जैसे, ग्रामीण बनाम शहरी और पूर्वी बनाम दक्षिणी राज्य की तुलना कर इसे समझा जा सकता है।

पाँचवां बिंदु है, कमजोर सार्वजनिक सेवाओं और निजी क्षेत्र पर बहुत ज़्यादा निर्भरता के परिणाम के रूप में समाने आता है। इसका परिणाम यह है कि कमज़ोर आर्थिक वर्गों और जटिल भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में एक समान स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं पहुँच पाती हैं। जैसे, ग्रामीण बनाम शहरी और पूर्वी बनाम दक्षिणी राज्य की तुलना कर इसे समझा जा सकता है।  

छठा बिंदु, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं की कमी के कारण स्वास्थ्य बीमा भी स्वास्थ्य सेवा की समस्याओं का हल करने में नाकाम साबित होना है, सम्पूर्ण स्वास्थ्य की तो बात ही छोड़ दें। अगर आपके आस-पास अस्पताल या डॉक्टर उपलब्ध नहीं है, तो स्वास्थ्य बीमा कैसे मदद करेगा? ख़ासतौर पर, जब निजी क्षेत्रों के एक बड़े हिस्से के धोखाधड़ी भरे तौर-तरीके जगजाहिर हैं। ऐसी स्थिति में कौन-सा बीमा सिस्टम उनके दावों पर भरोसा करेगा, जब तक कि उनमें मिलीभगत न हो? 

सातवां बिंदु, जैसे कि हमने पहले भी कहा, इस क्षेत्र में फैले व्यवसायिक भ्रष्टाचार की व्यापक सड़ांध है। 

इसमें कोई शक नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में स्वास्थ्य सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए कई प्रयास किए गए हैं। लेकिन, हमें आम जनता के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए, इन बुनियादी बिन्दुओं को ध्यान में रखकर बदलाव लाने की आवश्यकता है। इससे हम अच्छी शिक्षा और उच्च-गुणवत्तापूर्ण वाली नौकरियों के साथ-साथ सामाजिक कल्याण की नींव रख सकते हैं। 

यह लेख मूल रूप से लाइव-मिंट में प्रकाशित हो चुका है। यहाँ पढ़ें :
https://www.livemint.com/opinion/online-views/health-band-aids-will-not-heal-a-system-that-needs-deep-attention-11706702216548.html