उन्होंने भारत के एक बेहतरीन चिकित्सा संस्थान से स्नातक और स्नातकोत्तर की शिक्षा पूरी की। उनके रिकॉर्ड इतने अच्छे थे कि देश में उनके लिए सचमुच सारे विकल्प खुले थे – वे किसी प्रतिष्ठित अस्पताल में, फल-फूल रही शहरी प्रैक्टिस में या फिर अकादमिक जगत में प्रभावशाली करियर बना सकते थे। बावजूद इसके उन्होंने एक बहुत अलग रास्ता चुना। लगभग तीन दशकों के लिए उन्होंने ओडिशा के एक आदिवासी गाँव को अपना घर बना लिया और बिस्समकटक के द क्रिश्चियन हॉस्पिटल में काम किया।
यह प्रेरणादायी कहानी है डॉ. जॉन (जॉनी) चेरियन ओम्मन और मर्सी जॉन की।
उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जो अक्सर बहुत दुखद होती थीं : दुर्गम इलाके, सीमित संसाधन, पेशागत एकाकीपन। साथ ही एक ऐसे माहौल में काम करने का भावनात्मक बोझ जहाँ रोकथाम करने लायक बीमारियाँ और मौतें रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा थीं।
जॉनी ने क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (CMC), वेल्लोर से एमबीबीएस और सामुदायिक चिकित्सा में एमडी की उपाधि प्राप्त की। मर्सी ने उसी संस्थान से नर्सिंग में स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उनकी पेशेवर बुनियाद इतनी मजबूत थी, जितना कोई चाह सकता है। फिर भी उन्होंने ऐशो आराम और शोहरत की ज़िन्दगी को नहीं चुना। उन्होंने खुद को ऐसे इलाके के लिए समर्पित कर दिया, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं की कमी थी, संसाधन सीमित थे और ज़रूरतें बहुत ज्यादा थीं।
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मैं खुशकिस्मत हूँ कि मुझे जॉनी और मर्सी से इंटरव्यू लेने का मौका मिला। उन्होंने अपने इस सफ़र के बारे में विस्तार से बताया – एक ऐसा सफ़र जिसके रास्ते साहस, करुणा और उद्देश्य की गहरी भावनाओं ने तय किये। उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जो अक्सर बहुत दुखद होती थीं : दुर्गम इलाके, सीमित संसाधन, पेशागत एकाकीपन। साथ ही एक ऐसे माहौल में काम करने का भावनात्मक बोझ जहाँ रोकथाम करने लायक बीमारियाँ और मौतें रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा थीं। इन कठिनाइयों को पार करने में उनका साथ दिया उनके पक्के संकल्प, अचल साहस और उस आस्था ने जिसने विश्वास को कर्म में बदल दिया।
उनके काम के केंद्र में एक शक्तिशाली अंतर्दृष्टि थी : यानी कि सार्थक स्वास्थ्य सेवाएँ उस समुदाय की ज़रूरतों और आवाजों पर आधारित होना चाहिए जिसके लिए उन्हें काम करना है। गहराई और सम्मान के साथ सुनना उस हर चीज का केन्द्रीय हिस्सा बन गया, जिसे उन्होंने बनाया। इस दृष्टिकोण ने समय के साथ लोगों में विश्वास पैदा किया, स्थानीय क्षमता को बढ़ाया और अस्पताल को एक असली सामुदायिक संस्थान में बदल दिया।
2024 में जब वे सेवानिवृत्त हुए तो वे एक चलते हुए अस्पताल से बहुत ज्यादा छोड़कर गए। उन्होंने एक विरासत छोड़ी – सहकर्मियों की एक समर्पित टीम तथा सम्मान, कृतज्ञता और प्यार के रिश्ते से बंधा एक समुदाय।
क्या बिस्समकटक में जिंदगी कठिन थी? बेशक़।
क्या यह इस लायक था? निस्संदेह।
