दूर-दराज़ के इलाकों तक पहुँच: सुंदरबन में एसएसडीसी द्वारा सामुदायिक स्वास्थ्य बेहतर बनाने की कोशिशें

यह शानदार कहानी ‘सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र’ (SSDC) की है। यह बताती है कि किस तरह सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र, यहाँ के बिखरे और अलग-थलग रह रहे समुदायों तक स्वास्थ्य सेवा पहुँचाने की लगातार और पूरे समर्पण के साथ कोशिश कर रहा है।।

दूर-दराज़ के इलाकों तक पहुँच: सुंदरबन में एसएसडीसी द्वारा सामुदायिक स्वास्थ्य बेहतर बनाने की कोशिशें

पृष्ठभूमि

सुंदरबन, पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना ज़िले में है। यह भारत के भौगोलिक रूप से सबसे पेचीदा और जलवायु के नज़रिए से बेहद संवेदनशील इलाकों में से एक है। इसे यूनेस्को ने ‘विश्व धरोहर स्थल’ के रूप में मान्यता दी है। यह क्षेत्र ज्वारीय नदियों और मुहानों वाला मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र क्षेत्र माना जाता है। इस वजह से यहाँ कई बस्तियाँ भौगोलिक रूप से अलग-थलग इलाकों में बसी हुई हैं। यहाँ भूमि के बुनियादी ढाँचे की कमी की वजह से लोगों को बड़े पैमाने पर नावों और नौकाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। यहाँ मानसून में बाढ़ की वजह से ज़रूरी सेवाओं, ख़ासतौर पर स्वास्थ्य सेवा तक लोगों का पहुँचना बेहद मुश्किल हो जाता है।

चक्रवात और खारा पानी घुस जाने के पर्यावरणीय ख़तरे की वजह से खेती करना और पीने का साफ़ पानी मिलना मुश्किल हो जाता है। ये भौगोलिक दिक्कतें गहरी सामाजिक-आर्थिक अस्थिरता से जुड़ी हुई हैं। यहाँ रहने वाली लगभग 40% आबादी हाशिए के तबके से आती है और आधे से ज़्यादा लोग बेहद गरीब हैं। नतीजतन, इस इलाके में रहने वाले लोगों को पानी की वजह से होने वाली बीमारियाँ, कुपोषण और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के साथ-साथ, कई सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र (SSDC)

इन भौगोलिक एवं जनसांख्यिकीय चुनौतियों से उत्पन्न गंभीर समस्याओं के निपटने के लिए ‘सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र’ (SSDC) की स्थापना की गई। इसकी शुरुआत ज़मीनी स्तर के एक आंदोलन से हुई थी। वह साल सन् 1986 था, जब भीषण बाढ़ भी आई थी। जब बचपन के दोस्त भक्त प्रसाद पुरकैत और गोपाल चंद्र प्रमाणिक ने पाथरप्रतिमा ब्लॉक में राहत के काम शुरु किए। इन दोस्तों की यह कोशिश एक सामूहिक पहल यानी इनिशिएटिव में बदल गई। इसी के नतीजे में साल 1989 में सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र (SSDC) की स्थापना हुई।

उनके मिशन की एक नायाब विशेषता चिकित्सीय नाव सेवा है। यह नाव सेवा, नदियों से घिरे द्वीपों के लिए एक चलती-फिरती लाइफ़लाइन का काम करती है। यह डॉक्टरों, चिकित्सीय उपकरणों एवं दवाइयों को सीधे तौर पर दूर-दराज़ के घाटों तक पहुँचाती है। इस तरह ‘सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र’ (SSDC) इन सुदूर इलाकों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को हल करने की कोशिश करता है। ‘सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र’ की शुरुआत एक मामूली किराए के कमरे से हुई थी। सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र (SSDC) ने सन 1991 में सीएपीएआरटी (CAPART) से जल, स्वच्छता एवं स्वास्थ्य (WASH) संबंधी पहल के लिए अनुदान हासिल किया, जो एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। तीन दशकों में, ‘सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र’ (SSDC) का काफ़ी फैलाव व विस्तार हुआ है। ‘सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र’ इस इलाके की सबसे गरीब आबादी को आँखों के इलाज, किशोर कल्याण तथा मातृ स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाता है।

कई मुश्किलों के बावजूद

इन द्वीपों से निकलने वाली कहानियाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य में हो रहे उस सौम्य सुधार की बात करती हैं, जिसका नेतृत्व भीतर से ही हो रहा है।

कहानी 1: जब देबिका गिरी ने सिजेरियन ऑपरेशन से अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया, तो उनकी ख़ुशी डर से घिरी हुई थी। उनकी पहली गर्भावस्था का गर्भपात हो गया था और उसे अपने दूसरे बच्चे को स्तनपान कराने में काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। उन्होंने इसके लिए सिजेरियन ऑपरेशन को दोषी माना और पिछले अनुभवों से बेहद दुखी होकर, बच्चे को फॉर्मूला दूध पिलाना शुरू कर दिया। सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र (SSDC) के कर्मचारियों ने इस मामले में बेहद सब्र से लगातार अपना सहयोग दिया। उन्होंने बार-बार उस महिला के घर जाकर उनकी चिंताओं को दूर करने की कोशिश की। केंद्र के लोगों ने उन्हें तनाव का, स्तनपान पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में समझाया और भरोसा दिलाया कि सब कुछ बेहतर होगा। कर्मचारियों के इस लगातार सहयोग की वजह से देबिका ने फिर से अपना आत्मविश्वास हासिल किया और बच्चे को पूरी तरह से स्तनपान कराना शुरू किया। इस कहानी से हमें पता चलता है कि मानसिक स्वास्थ्य और प्रसव के बाद का चिकित्सीय मशविरा कितनी अहमियत रखता है।

कहानी 2: इन इलाकों में स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचने के लिए नाव से आना-जाना पड़ता है। इस वजह से स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचना भी अपने-आप में एक मुश्किल काम बन जाता है। सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र (SSDC) ने इस समस्या को हल किया। वे स्वास्थ्य केंद्र को ही लोगों तक ले गए। सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र (SSDC) ने अपने हेल्थ क्लिनिक बोट कैंप के ज़रिए द्वीप पंचायतों में डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिक्स और दवाइयों को पहुँचाया। ये अपने हेल्थ क्लिनिक बोट कैंप के ज़रिए शिविर लगाकर प्रसव से पहले की देखभाल, बच्चों से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाएँ, गैर-संचारी रोगों की जाँच, त्वचा रोगों का उपचार और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी देते हैं। कई लोगों के लिए तो अपनी बस्ती में डॉक्टर को देखने का पहला अनुभव था। यह तैरते क्लीनिक की लगातार इस इलाकों में काम करने लगे, इसलिए वे विश्वसनीयता और भरोसे का दूसरा नाम बन गए। अब लोगों को स्वास्थ्य सेवाएँ हासिल करने के लिए नदियों को पार नहीं करना पड़ता है, बल्कि अब स्वास्थ्य सेवाएँ उनके लिए ख़ुद नदियाँ पार करती है।

कहानी 3: स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच का असर बीमारी के इलाज से कहीं आगे तक जाता है। क्षेत्रमोहनपुर गाँव में रहने वाली किशोरियाँ लंबे समय से मासिक धर्म में कपड़े का इस्तेमाल करती थीं। यह कपड़ा अक्सर बहुत साफ़ नहीं होता था। सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र (SSDC) ने सहपाठी समूह बनाए। इनमें मासिक धर्म से जुड़े स्वच्छता, अपनी देखभाल आप करने और बाल विवाह जैसे विषयों पर चर्चा होती थी। इन सत्रों में आने वाली लड़कियों ने सेनेटरी नैपकिन के बारे में जाना और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से सेनेटरी नैपकिन माँगना शुरू किया। व्यक्तिगत जागरूकता से शुरू हुआ यह बदलाव, अब सामुदायिक स्तर पर पहुँच गया है। अब समुदाय की लड़कियाँ अपनी सहेलियों के लिए आवाज़ उठाती हैं और सार्वजनिक सिस्टम्स को जवाबदेह बनाती हैं।

A group of schoolgirls seated in a circle on a mat, engaged in a discussion with a teacher in a casual indoor setting. The walls are made of exposed brick, and a couple of plastic chairs are visible in the background.
किशोरी समूह बैठक
A classroom scene with several schoolgirls in uniforms engaging with a teacher or facilitator, who is wearing a pink top, while another girl in a traditional attire observes.
स्वास्थ्य कार्यकर्ता की बैठक
An elderly woman in a purple outfit engages in conversation with a group of schoolgirls wearing blue and white uniforms near a rural setting.
आशा कार्यकर्ता के साथ चर्चा

कहानी 4: जनजातीय समुदायों तक पहुँचने के लिए उनके भरोसे को जीतना और भी ज़्यादा ज़रूरी था। सत्य दासपुर गाँव में रहने वाले 100 आदिवासी परिवारों ने कभी भी औपचारिक स्वास्थ्य सेवा का लाभ नहीं उठाया था। पुरुष, महिलाएँ और यहाँ तक कि गर्भवती माताएँ शहद के लिए जंगलों में जाती थीं या नदी में मछली पकड़ती थीं। वे अक्सर बहुत दिनों तक घर के दूर रहते थे। उन्हें नशे की लत थी और वे कुपोषण के भी शिकार थे। इस मामले में सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र (SSDC) की साफ़ समझ थी: हमें लगातार समुदाय के बीच जाते रहना है, गाँव में शिविर लगाना है और धीमी गति से ही सही, लेकिन भरोसे का रिश्ता कायम करना है। बीतते समय के साथ, इन परिवारों ने जाँच प्रक्रिया में भाग लेना शुरू किया, ख़ासतौर पर गर्भवती महिलाओं ने अपनी मेडिकल जांच करवानी शुरु कर दी। अब तो चिकित्सा शिविर के दिन पूरा परिवार डॉक्टर का इंतज़ार करते हुए घर पर ही रहता है। यह बदलाव सिर्फ़ बेहतरीन ढंग से की गई और पहुँचाई गई सेवाओं को ही नहीं दिखाता है, बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली के लिए बढ़ती विश्वसनीयता को भी सामने लाता है।

A group of women in colorful traditional attire seated on the ground, engaged in conversation. One woman in a white outfit is speaking to the others, who are wearing vibrant headscarves and dresses.
माताओं की बैठक

कहानी 5: बुनियादी ढाँचे या सुविधाओं की कमी भी इस उपेक्षा और अनदेखी की कहानी को बयाँ करती है। सन 1979 में ब्रजबल्लभपुर में एक उप-केंद्र की शुरूआत की गई। यह उप-केंद्र एक टूटे-फूटे क्लबरूम में चलता था। यह जगह बाद में एक चार दीवारी के रूप में सिमट गई। इस क्लबरूम में न तो शौचालय था, न तो पीने का पानी थी और न ही रैंप बना था। काम करने के लिए स्वास्थ्य कर्मचारियों के होने के बावजूद, इसकी हालत बहुत ही ज़्यादा ख़राब थी। सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र (SSDC) ने यहाँ काम करना शुरु किया और इसे नया जीवन मिला: इसकी रंगाई की गई, इसमें बैठने की व्यवस्था की गई, इसमें बुजुर्गों को ध्यान में रखते हुए शौचालय बनाए गए, पीने के पानी की व्यवस्था की गई और बेहतर रैंप बनाए गए। आज, यह एक जाता-जागता और सम्मानित उप-केंद्र बन चुका है। यह कहानी इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि, कैसे बुनियादी ढाँचे में मामूली निवेश करके सेवा की गुणवत्ता और समुदाय की सोच को बदला जा सकता है।

An outdoor scene showcasing two men working with piles of sand and bricks in front of a building labeled as a health and wellness center. Bicycles are parked to the side, and greenery is visible in the background under a partly cloudy sky.
पहले 
A view of a healthcare center building featuring a blue and white exterior, with several emblems on the walls. Two people, a woman carrying an umbrella and a child, are walking towards the entrance on a cement pathway. A motorcycle is parked nearby.
बाद में

कहानी 6: छोटो बनश्यामनगर में सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र ने के कुपोषित बच्चे, श्री कृष्ण गिरि, के साथ काम किया जो सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र के अथक प्रयासों को दिखाता है। उन्होंने पाया कि लगभग तीन साल की उम्र वाले इस बच्चे का वजन सिर्फ़ 8.7 किलोग्राम था, यानी वह बच्चा गंभीर कुपोषण (Severe Acute Malnutrition) का शिकार था। उसकी माँ इस बात को जानती ही नहीं थी कि इस उम्र के बच्चे को क्या खिलाना चाहिए। गरीबी से मजबूर होकर वह अपने बच्चे को बड़ों वाला ही खाना खिला दिया करती थी। इस हालातों में सुधार के लिए खाना पकाने का सही तरीका बताया गया तथा माताओं के साथ समूह में लगातार बैठकें की गई। इन सब कोशिशों के चलते, तीन महीनों में बच्चे का वज़न बढ़कर 10.2 किलोग्राम हो गया। जिससे वह बच्चा मध्यम कुपोषण श्रेणी में आ गया। उसकी माँ अब साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखती है। बताए गए वक्त पर बच्चे के विकास की जांच करवाती है और सीखी गई बातें दूसरों को भी बताती हैं।

Two women and a child seated on a bench in an outdoor setting, discussing while one woman holds a notebook.
स्वास्थ्य कार्यकर्ता का घर पर दौरा

यहाँ बताई गई हर एक कहानी ये दिखाती है कि जब लगातार रूप से एवं सम्मानजंक ढंग से ज़रूरी सन्दर्भों के साथ स्वास्थ्य सेवाएँ दी जाए, तो बदलाव संभव होता है। सुंदरबन में ‘सुंदरबन सामाजिक विकास केंद्र’ (SSDC) का मॉडल सिर्फ़ कमियों को दूर करने की कोशिश नहीं करता, बल्कि यह लोगों और उनके स्वास्थ्य के अधिकार के बीच के एक पुल बनाता है।