प्रौढ़ावस्था में महिलाओं में स्वास्थ्य संबंधी परिवर्तन – सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की आवश्यकता

जैसे-जैसे महिलाओं की औसतन उम्र बढ़ी है, वैसे-वैसे पीरियड्स आना बंद हो चुकी महिलाओं की संख्या भी बढ़ रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस आयु वर्ग की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं अथवा इससे संबंधित मामलों को किसी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है।

प्रौढ़ावस्था में महिलाओं में स्वास्थ्य संबंधी परिवर्तन – सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की आवश्यकता
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व्यवस्था की कमियों पर एक नज़रिया

कुछ समय पहले, जब मैं हर रोज़ बेचैनी की समस्या से जूझ रही थी, तो मेरी एक सहेली ने मुझे अपनी बेचैनी और दिल की धड़कन बढ़ने की वजह से सीने में होने वाली तकलीफ़ के बारे में बताया था। हम दोनों अपने शरीर में पेरि-मेनोपॉज़ल (पीरियड्स से पहले के) बदलावों की वजह से हार्मोनल उतार-चढ़ाव का सामना कर रहे थे। जिसने हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को कई तरह से प्रभावित किया।

मैं पिछले 25 वर्षों से चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में काम कर रही हूँ। काम करते हुए मिले पिछले सारे अनुभव ने चिकित्सक और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में सुनी गई कई कहानियों की यादें ताज़ा हो गई। मैंने ये कहानियाँ क्लिनिक और सामुदायिक बैठकों में, अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में तथा विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाली सैकड़ों महिलाओं से सुनी थी।

जब चिकित्सा प्रशिक्षण ज़रूरत से कम महसूस हुई

एक चिकित्सक के रूप में मेरे प्रशिक्षण ने मुझे उन कई समस्याओं से निपटने के लिए तैयार किया था। इनमें मातृत्व और प्रसव से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने का प्रशिक्षण शामिल है। इन समस्याओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था द्वारा महिलाओं की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ माना जाता है। लेकिन, प्रौढ़ावस्था की महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं को हल करने की कोशिश करते हुए, मैंने ख़ुद को असमर्थ पाया। जिससे मुझे गहरी निराशा हुई।

ये महिलाएं अक्सर अजीब और अनजान-सी लगने वाले लक्षणों के साथ क्लीनिक में आती थीं। वे बार-बार होने वाली ‘घबराहट’ का ज़िक्र करती थी। हड्डियों में लगातार उठने वाले दर्द, जोड़ों के दर्द, थकान, मानसिक सुस्ती या बार-बार पेशाब के रास्ते में होने वाले इन्फेक्शन की समस्याएँ उन्हें परेशान किए रहती थीं। मैं उनकी बीमारियों के लक्षण के मुताबिक उनका इलाज करती थी। साथ ही मैं उन्हें यह सलाह देती थी कि ये बीमारियाँ बढ़ती उम्र के साथ होने वाली ‘सामान्य’ समस्याएँ हैं, इसलिए मैं उन्हें इन समस्याओं के साथ तालमेल बिठाने की सलाह देती थी।

इसके काफ़ी समय बाद, पिछले 5-6 वर्षों में जब रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) के बारे में वैश्विक स्तर पर चर्चा शुरू हुई। इसके साथ ही मैंने भी इसके बारे में पढ़ना शुरू किया। तब मुझे इन सभी समस्याओं के बारे में विस्तार से समझ में आया। ये अजीब से लक्षण काल्पनिक नहीं थे, वे पेरि-मेनोपॉज़ (रजोनिवृत्ति से पहले का चरण) और मेनोपॉज़ (रजोनिवृत्ति) से संबंधित थे।

रजोनिवृत्ति से संबंधित लक्षण मुख्य रूप से एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के प्राकृतिक रूप से घटने की वजह से उत्पन्न होते हैं। क्योंकि, बच्चेदानी में अंडे बनना बंद हो जाते हैं और ये बदलाव पेरि-मेनोपॉज़ कहलाता है। आमतौर पर, यह 40 से 50 साल के बीच की उम्र में होता है। ये हार्मोनल बदलाव शरीर के तापमान, टिशु और मनोदशा पर गहरा असर डालते हैं। कुछ मामलों में काफ़ी गर्मी लगने लगती है (हॉट फ्लैशेस), रात को पसीना आने लगता है, बार-बार नींद टूटती है, मनोदशा में बदलाव होता है (बेचैनी और चिड़चिड़ापन), संज्ञानात्मक समस्याएँ आती है (जैसे, खोया-खोया महसूस करना/भूलना), वज़न बढ़ता है, शरीर में दर्द होता है, पेशाब के रास्ते में इन्फेक्शन होता है और बाल झड़ने जैसी समस्याएँ आती हैं।

हालांकि, इस बारे में मैं अकेले निराश नहीं थी। अगर भारत से ज़्यादा बेहतर विकसित स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के बारे में बात करे, तो कई सर्वेक्षणों से पता चलता है कि आज भी अमेरिका में सिर्फ़ 30% चिकित्सक ही मेनोपॉज़ के लक्षणों को पहचानने और उससे जुड़ी दिक्कतों को हल करने में प्रशिक्षित हैं (द मेनोपॉज़ सोसाइटी, वर्ष 2023)।

प्रौढ़ावस्था के लक्षणों का नज़र न आने वाला बोझ

इस मुद्दे से निपटने के लिए अपने सिस्टम और समुदायों को तैयार करने का यही सही वक्त है। इस साल भारत में 14 करोड़ महिलाएं मेनोपॉज़ के हालातों से गुज़रेंगी। जैसे-जैसे औसत उम्र बढ़कर 73.6 साल हो गई है, भारतीय महिलाएं अपने जीवन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बच्चा पैदा करने के बाद वाले चरण में जीती हैं। अपनी ज़िंदगी के इस हिस्से में वे अपने परिवार की देखभाल करती हैं, नौकरी करती है और मुफ़्त में घर के काम करते हुए अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देती हैं।

मेनोपॉज़ की अवस्था से गुज़र रही और मेनोपॉज़ के बाद की अवस्था में जीवन जी रही महिलाओं की संख्या काफ़ी बड़ी है। इसके बावजूद, उनकी स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतें काफ़ी हद तक अनदेखी रह जाती हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मुताबिक, घर के कामकाज की 76% से ज़्यादा ज़िम्मेदारी महिलाओं के कंधे पर पड़ती है। वे अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बावजूद परिवार वालों की देखभाल करती रहती हैं।

नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि वेतन या मेहनताने पर काम करने वाली महिलाएं भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कुल 18% का योगदान देती हैं। रजोनिवृत्त (मोनोपॉज़ल) महिलाएं इस समूह का एक बड़ा हिस्सा है, जो लगातार बढ़ रहा है। इन महिलाओं के पास स्वास्थ्य और कल्याण से लेकर फ़ैशन, सौंदर्य और यात्रा जैसे उद्योगों में ख़र्च करने की काफ़ी शक्ति है। जबकि, अर्थव्यवस्था में अवैतनिक (मुफ़्त में काम करने वाली) महिलाओं के श्रम योगदान के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है।

मेनोपॉज़ की अवस्था से गुज़र रही और मेनोपॉज़ के बाद की अवस्था में जीवन जी रही महिलाओं की संख्या काफ़ी बड़ी है। इसके बावजूद, उनकी स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतें काफ़ी हद तक अनदेखी रह जाती हैं। भारत के गाँवों में रहने वाले गरीब लोग सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर बहुत अधिक निर्भर हैं। यह लोग सिर्फ़ इलाज के लिए ही नहीं, बल्कि देश भर में फैले लाखों क्षेत्रीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से मिलने वाली जानकारी और मार्गदर्शन के लिए भी सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर निर्भर हैं। लेकिन, प्रौढ़ावस्था की महिलाएं अभी नीतिगत कमियों (पॉलिसी गैप) का शिकार हैं।

स्वास्थ्य व्यवस्था से बाहर होती महिलाएं (उम्र बढ़ने के साथ)

महिलाओं के स्वास्थ्य को आमतौर पर गर्भावस्था और बच्चे पैदा करने से ही जोड़कर देखा जाता है। इसलिए, महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को हल करने वाले कार्यक्रम 15 से 49 साल के बीच के उम्र की महिलाओं को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। यह कार्यक्रम गर्भावस्था, प्रसव और परिवार नियोजन से संबंधित होते हैं। महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति पर एक नज़र डालने पर ये बात सही साबित होती है।

जब कोई महिला प्रजनन (बच्चे पैदा करने की) उम्र को पार कर लेती है, तो उसे मिलने वाली स्वास्थ्य संबंधित सेवाएं कम हो जाती हैं। इस तरह, 45 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाओं की स्वास्थ्य से जुड़ी ज़रूरतें तेज़ी से बदलती जाती हैं, इसके बावजूद यह महिलाएँ ख़ुद को काफ़ी हद तक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बाहर पाती हैं। एक व्यवस्थित स्वास्थ्य सिस्टम की समझ न होने की वजह से, इस उम्र की महिलाओं का जीवन नीचे बताए गए तरीकों से प्रभावित होता हैं।

Infographic illustrating the consequences of insufficient information and access to health services, highlighting factors like misinformation, lack of preparation, and their impact on health systems and social outcomes.

मेनोपॉज़ के बारे में हाल के 5 से 10 वर्षों में वैश्विक स्तर चर्चा शुरू हुई है। इस विषय पर अभी भी भारत में उतनी चर्चा नहीं हुई है।

भारत में पुख़्ता जानकारी की कमी

मेरे पास जोड़ों के दर्द और मेनोपॉज़ से जुड़े दूसरे भी लक्षणों के कई मामले आते हैं। इन स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के तरीकों का अध्ययन करते समय, मुझे आंकड़ों में भारी कमियाँ मिली। भारत में इस आयु चरण के दौरान शरीर में होने वाले बदलावों के लक्षणों या शारीरिक मापदंडों में होने वाले बदलावों के पैटर्न पर कोई भरोसेमंद तथा बड़े पैमाने पर डेटा उपलब्ध नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बात पर बहुत कम चर्चा हुई है कि महिलाएं इन बदलावों से कैसे निपटती हैं।

मेनोपॉज़ के बारे में एक खुली चर्चा की जानी चाहिए और उस चर्चा से निकलने वाली सार्वजनिक मांगों पर आगे काम किया जाना चाहिए। ताकि, ये मुद्दे सोशल मीडिया के छोटे समूहों से बाहर निकलकर मुख्यधारा का मुद्दा बन सके।

फ़ेडरेशन ऑफ़ ऑब्स्टेट्रिक एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ़ इंडिया (FOGSI) द्वारा समर्थित क्लिनिकल उपचार प्रोटोकॉल सभी स्वास्थ्य सुविधाओं से संपन्न तो हैं, लेकिन ये क्लिनिकल उपचार प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के स्तर पर गांवों में उपलब्ध नहीं हैं। इस संदर्भ में डेटा में मौजूद कमियों से पता चलता है कि नीतिगत कमियों को सुधारने और एक मुकम्मल एवं उन्नत स्वास्थ्य कार्यक्रम को विकसित करने का रास्ता बहुत लंबा है।

महिलाओं की बातों को ध्यानपूर्वक सुनना – नीति परिवर्तन के पहले चरण में समस्या की पहचान करने के लिए एक शुरूआती बिंदु हो सकता है। पेरिमेनोपॉज़ल और मेनोपॉज़ल से गुज़र रही महिलाओं की कहानियाँ और आप-बीती, इस बात की गहरी समझ बनाने में मदद कर सकते हैं कि दैनिक जीवन में इन लक्षणों को कैसे पहचाना जा सकता है और इसका हल कैसे किया जाता है।

कई बार लोगों के अनुभव और कहानियों सुनने के साथ-साथ, बेहतरीन ढंग से बड़े पैमाने पर डेटा इकट्ठा करना भी ज़रूरी है। वैश्विक स्तर पर इस्तेमाल में लाए जाने वाले सबसे अच्छे व्यावहारिक तरीकों से सबक लिया जा सकता है। जैसे कि अमेरिका में लंबे वक्त तक चलने वाले अध्ययन – SWAN (स्टडी ऑफ विमेन्स हेल्थ एक्रॉस द नेशन), यूके या ऑस्ट्रेलिया के मेनोपॉज़ल एडवाइज़री ग्रुप से मिले सुझावों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

रजोनिवृत्ति के बारे में एक खुली चर्चा की जानी चाहिए और उससे निकलने वाली आम मांगों पर आगे काम करना ज़रूरी है। ताकि, ये मुद्दे सोशल मीडिया के छोटे समूहों से बाहर निकलकर खुलकर सबके सामने आ सके। इसके लिए एक सामुदायिक मंच बनाना चाहिए, जहाँ शहरी एवं ग्रामीण महिलाएं अपने अनुभवों को साझा कर सकें। साथ ही, इन चर्चाओं में पुरुषों को भी शामिल करना चाहिए। इस मुद्दे को सरकारी या सिस्टम के एजेंडे के रूप में स्थापित कर, इस दिशा में एक अच्छी पहलकदमी की जा सकती है।

चाहे शहरी महिलाएं हो या ग्रामीण परिवेश, दोनों ही परिस्थितियों में रहनी वाली महिलाएं अपनी जटिल शारीरिक स्थितियों, भावनात्मक एवं सामाजिक बदलावों से काफ़ी हद तक अकेले ही संघर्ष करती हैं। इसमें परिवारों, समुदायों या स्वास्थ्य सिस्टम से बहुत कम सहायता मिल पाती है।

इस बारे में, केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी सीख ली जा सकता है। इन राज्यों ने अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य सिस्टम के तहत पहले से ही मेनोपॉज़ क्लीनिक शुरू कर दिए हैं। दुनिया भर से ऐसे क्लीनिकों और आउटरीच कार्यक्रमों का अध्ययन, इस संदर्भ में नीति बनाने और कार्यक्रमों को तैयार करने की दिशा में कारगर साबित होगा।

इस संदर्भ में, समस्या के संभावित समाधान प्रस्तुत करने वाले छोटे अभ्यास मॉडल नीतिगत विकल्पों को तैयार करने एवं उनकी पहचान करने में मददगार हो सकते हैं।

चुप्पी से सार्वजनिक मांग तक का सफ़र

मेरे पास सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में काम करने का दो दशकों से भी ज़्यादा लंबा अनुभव है। इस दौरान मेरी सबसे महत्त्वपूर्ण सीख यह नहीं है कि क्या बदला है, बल्कि यह है कि क्या नहीं बदला है। मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में हुए सुधारों की वजह से उम्र में बढ़ोतरी ज़रूर हुई है, लेकिन अभी भी प्रौढ़ महिलाओं के स्वास्थ्य एवं कल्याण पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।

अलग-अलग कई इलाकों की महिलाओं के साथ लगातार मेरा जुड़ाव रहा है। इस दौरान मैंने सीखा कि प्रौढ़ावस्था की आयु को लगातार चुप्पी साधे संघर्ष करने (साइलेंट नेगोशिएशन) की समयावधि के रूप में ही झेला जाता है। चाहे शहरी इलाका हो या ग्रामीण इलाका, दोनों ही परिवेशों में महिलाएं जटिल शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक परिवर्तनों को काफ़ी हद तक अकेले ही झेलती हैं। जिसमें उन्हें परिवारों, समुदायों या स्वास्थ्य सिस्टम से बहुत कम मदद मिल पाती है।

मैंने कई महिलाओं के साथ बातचीत की है। इस बातचीत से सबसे महत्त्वपूर्ण यही बात निकलकर आयी है कि महिलाओं के अंदर अपने परिवार के प्रति गहराई से भरा सेवाभाव एवं देखभाल करने की चाहत ही, उनकी अपनी बीमारी के प्रति उनकी प्रतिक्रिया को बनाता-बिगाड़ता देता हैं। वे अपनी परेशानी को सामान्य मानती हैं। अपने इलाज में देरी करती हैं और बिना किसी अभिव्यक्ति या सहायता की मांग के बीमारी के लक्षणों को चुपचाप बर्दाश्त करती रहती हैं।

A woman in a bright yellow saree stands confidently in a green rice field, smiling at the camera.

विकसित भारत के लिए जीवन-चक्र संबंधी दृष्टिकोण

इस सब बातों को ध्यान में रखते हुए, मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि : प्रौढ़ावस्था की महिलाओं के स्वास्थ्य पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है। बल्कि, यह सामाजिक और आर्थिक पहलुओं के लचीलेपन मज़बूत करने के दृष्टिकोण से भी बेहद ज़रूरी है। भारतीय स्वास्थ्य सिस्टम एक संकीर्ण यानी छोटी सोच का शिकार है, जिसमें महिलाओं के स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ़ बच्चे पैदा करने से संबंधित स्वास्थ्य देखभाल ही होता है। इसे बदलने के लिए यह आवश्यक है कि भारतीय स्वास्थ्य सिस्टम को इस सोच से हटकर उम्र के अलग-अलग पड़ावों को बेहतर बनाने का दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। इस तरह, भारतीय स्वास्थ्य सिस्टम के अंतर्गत महिलाओं के स्वास्थ्य की अवधारणा में एक मौलिक बदलाव करना बेहद ज़रूरी है।

इस बदलाव में पहला कदम समस्या की पहचान करना और बेहतरीन ढंग से इस बारे में आंकड़े व जानकारी इकट्ठा करना है। इसके बिना, सरकारी नीतियाँ महिलाओं के जीवन के एक महत्त्वपूर्ण चरण को अनदेखा करती रहेगी।

अगर भारत को 2045 तक विकसित भारत के अपने मकसद को हासिल साकार करना है, तो वह प्रजनन काल समाप्त होने के बाद की आयु वाली महिलाओं की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है। यह विकासात्मक और संरचनात्मक दोनों ही नज़रियात से ज़रूरी है।