जन चेतना मंच, बोकारो (JCMB), एक गैर-सरकारी संस्था (NGO) है, जो झारखंड के बोकारो ज़िले के चंदनकियारी प्रखंड में हाशिये पर रहने वाले लोगों के साथ काम करती है। यह अध्ययन बोकारो ज़िले के ग्रामीण इलाकों में JCMB द्वारा चलाए जा रहे महिला स्वास्थ्य केंद्र, चेतना महिला स्वास्थ्य केंद्र (CMSK), के ज़रिए किया गया। पिछले कुछ सालों में केंद्र ने देखा कि गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के दौरान पुरुषों की मौजूदगी बढ़ रही थी। लेकिन पुरुषों की यह भागीदारी ज़्यादातर महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचाने तक ही सीमित थी। गर्भावस्था, प्रसव या प्रसव के बाद ठीक होने के दौरान उन्हें लगातार मदद देने में उनकी भागीदारी बहुत कम थी।
2005 से 2021 के बीच किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षणों (NFHS) के आँकड़े बताते हैं कि प्रसव-पूर्व देखभाल (ANC) के बारे में पुरुषों की जानकारी, ANC के दौरान होने वाली जाँचों में उनकी मौजूदगी और गर्भावस्था की जटिलताओं, आपात स्थिति से निपटने की तैयारी, माँ के पोषण, संस्थागत प्रसव और नवजात शिशु की ज़रूरी देखभाल से जुड़ी जानकारी तक उनकी पहुँच में काफी बढ़ोतरी हुई है। हालाँकि, अलग-अलग राज्यों में स्थिति अलग-अलग है।
सर्वेक्षण यह भी बताते हैं कि पुरुषों की बढ़ती मौजूदगी और उनकी सार्थक भागीदारी में फर्क करना ज़रूरी है। JCMB के कर्मचारियों ने ANC की जाँचों और प्रसव के दौरान पुरुषों की बढ़ती मौजूदगी देखी है। लेकिन उन्हें ऐसे मामले भी देखने को मिले हैं, जहाँ पुरुष परिवार वालों की गलत दखलंदाज़ी के कारण माँ के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा।
पुरुष की दखलंदाज़ी से हुई माँ की मौत: कंचन देवी की कहानी
कंचन देवी चेतना महिला स्वास्थ्य केंद्र (CMSK) में गर्भावस्था के दौरान नियमित जाँच करा रही थीं और केंद्र तथा वहाँ के कर्मचारियों से अच्छी तरह परिचित हो गई थीं। एक बार उन्हें प्रसव की झूठी पीड़ा हुई और उन्हें केंद्र में भर्ती कर लिया गया। उनकी हालत ठीक होने तक वे वहीं रहीं। लेकिन कुछ ही समय बाद वे घरेलू हिंसा की एक घटना के बाद फिर केंद्र पहुँचीं। इस घटना के कारण उनका पानी टूट गया और उसके बाद प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। इस बार वे अपनी माँ के साथ आई थीं, क्योंकि उनके पति ने शराब पी रखी थी।
इस तरह के दुखद मामलों ने यह साफ कर दिया कि मातृ स्वास्थ्य में पुरुषों की भागीदारी को बढ़ाना ही काफी नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान देना ज़रूरी है। इसके लिए पुरुषों की भागीदारी को सकारात्मक, सम्मानजनक और सहयोगी बनाने की ज़रूरत थी।
दो घंटे बाद उसका पति बारह से ज़्यादा पुरुषों के एक समूह के साथ CMSK पहुँचा। उनमें से ज़्यादातर ने शराब पी रखी थी और सभी बेहद आक्रामक थे। उन्होंने कंचन को मिल रही देखभाल पर सवाल उठाए और वहाँ मौजूद नर्सों के साथ गाली-गलौज और बदसलूकी की। कंचन आराम से लेटी हुई थीं, लेकिन पति ने अपने दोस्तों के उकसाने पर उन्हें खींचकर बाहर निकाला और करीब 35 किलोमीटर दूर एक छोटे-से निजी नर्सिंग होम में ले गया।
समूह में शामिल एक व्यक्ति उस नर्सिंग होम का एजेंट था। वहाँ पहुँचने के कुछ ही समय बाद कंचन का सीज़ेरियन ऑपरेशन कर दिया गया।
ऑपरेशन के बाद कंचन का पति और उसके साथी बच्चे के जन्म का जश्न मनाने चले गए। डॉक्टर भी अपने घर चला गया और कंचन के माता-पिता वहीं रह गए। लेकिन ऑपरेशन के बाद उनकी ठीक से निगरानी नहीं की गई। कंचन का खून बहता रहा। जब उनके दिल ने काम करना बंद कर दिया, तब नर्सिंग स्टाफ ने डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने जल्दी से उन्हें एक “बड़े केंद्र” में भेजने के लिए टैक्सी का इंतज़ाम किया।
राँची जाते समय कंचन के पिता को एहसास हुआ कि उनकी बेटी की साँस चलना बंद हो चुकी है। उन्होंने टैक्सी ड्राइवर से नर्सिंग होम वापस चलने को कहा। डॉक्टर ने जल्दी से उन्हें दो लाख रुपये का एक चेक थमा दिया और पिता कंचन को अंतिम संस्कार के लिए ले गए।
बाद में वह चेक भी बाउंस हो गया। कंचन के पति ने तब तक दूसरी शादी कर ली थी।
ऐसे दुखद मामलों ने यह ज़रूरत सामने रखी कि मातृ स्वास्थ्य में पुरुषों की भागीदारी को सिर्फ बढ़ाया ही न जाए, बल्कि उसे सकारात्मक, सम्मानजनक और सहयोगी भी बनाया जाए। इसी सोच के साथ एक ऐसी पहल शुरू की गई जिसमें काउंसलिंग के ज़रिए पति-पत्नी दोनों को साथ लेकर चलने पर ज़ोर दिया गया। इसमें उन्हें गर्भावस्था और बच्चे के जन्म से जुड़ी देखभाल के अलग-अलग पहलुओं की जानकारी दी गई।
इस अध्ययन का मकसद यह देखना था कि यह पहल कितनी आसानी से लागू की जा सकती है, लोग इसे कितना स्वीकार करते हैं और शुरुआती तौर पर इसका क्या असर पड़ता है।
CMSK आने वाले पति-पत्नी के बीच एक मिश्रित-पद्धति (mixed-methods) का पायलट अध्ययन किया गया। इसमें मात्रात्मक सर्वेक्षण, फोकस ग्रुप डिस्कशन (FGD) और गहन साक्षात्कार (IDI) शामिल थे।

अध्ययन के खास मकसद थे:
- यह देखना कि इस पहल से इनमें सुधार हुआ या नहीं:
- जानकारी
- नज़रिया
- बच्चे के जन्म की तैयारी
- सहयोग देने वाला व्यवहार
- मातृ स्वास्थ्य से जुड़े अनुभव
- पुरुषों की सकारात्मक भागीदारी के रास्ते में आने वाली रुकावटों और उसे बढ़ावा देने वाली चीज़ों की पहचान करना।
इस काउंसलिंग आधारित पहल में पति-पत्नी ने गर्भावस्था के अलग-अलग महीनों के हिसाब से आयोजित सत्रों में हिस्सा लिया। ये सत्र JCMB के कर्मचारियों ने लिए। इनमें खान-पान और शारीरिक गतिविधि की ज़रूरत, नियमित प्रसव-पूर्व जाँच का महत्व, टीकाकरण और बच्चे के जन्म की तैयारी जैसी बातों की जानकारी दी गई। जानकारी, शिक्षा और संचार (IEC) के लिए फ्लिप चार्ट, पोस्टर, वीडियो और बच्चे के जन्म की तैयारी से जुड़ी पुस्तिकाओं का इस्तेमाल किया गया। पति-पत्नी को प्रसव और बच्चे की देखभाल के लिए तैयार करने के लिए बातचीत और भागीदारी वाली जन्म-तैयारी कक्षाएँ भी आयोजित की गईं।
मुख्य निष्कर्ष
कुल 103 पुरुषों ने इस पहल में हिस्सा लिया। उनकी उम्र 24 से 27 साल के बीच थी। इनमें ज़्यादातर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और मुस्लिम समुदायों से थे और उन्होंने अधिकतर हायर सेकेंडरी तक पढ़ाई की थी।
इस पहल से गर्भावस्था और प्रसव के दौरान महिलाओं की देखभाल को लेकर पुरुषों की जानकारी और उनके नज़रिए में सुधार हुआ। बहुत-से पुरुष अपनी पत्नियों की मदद करने में पहले से ज़्यादा शामिल होने लगे। वे उन्हें स्वास्थ्य केंद्र ले जाने लगे, घर के कामों में हाथ बँटाने लगे, पौष्टिक खाना लाने लगे और यह सुनिश्चित करने लगे कि उनकी पत्नी ठीक से खाना खाए। कुछ पुरुषों ने प्रसव के दौरान अपनी पत्नियों को भावनात्मक सहारा भी दिया।
- जानकारी में सुधार
इस पहल के बाद पुरुषों की जानकारी में काफी बढ़ोतरी हुई। उन्हें बच्चे के जन्म की संभावित तारीख (EDD), गर्भावस्था के दौरान पोषण, प्रसव-पूर्व जाँचों में होने वाले टेस्ट, प्रसव की प्रक्रिया और गर्भावस्था तथा प्रसव के दौरान पैदा हो सकने वाली जटिलताओं के बारे में पहले से बेहतर जानकारी थी।
पहल के बाद:
- 96.1% पुरुषों को बच्चे के जन्म की संभावित तारीख की जानकारी थी, जबकि पहले यह संख्या 21.4% थी।
- 92.2% पुरुष आयरन और कैल्शियम के सही खाद्य स्रोतों की पहचान कर सकते थे, जबकि पहले यह संख्या 35% थी।
- 80.6% पुरुष जानते थे कि गर्भावस्था के दौरान जाँच के लिए अल्ट्रासाउंड कब कराना सही और सबसे अच्छा समय है, जबकि पहले यह संख्या 49.5% थी।
- 98.1% पुरुष समझते थे कि प्रसव पीड़ा शुरू होने और बच्चे के जन्म के बीच लगने वाला समय हर मामले में अलग हो सकता है, जबकि पहले यह संख्या 66.0% थी।
- 1.9% पुरुषों को आपात स्थिति से निपटने की तैयारी के बारे में जानकारी थी, जबकि पहले यह संख्या 0% थी।
महिलाओं ने भी बताया:
“घर पर उसने खाना बनाने और बर्तन धोने में मेरी मदद करना शुरू कर दिया… उसने पहले कभी ऐसा नहीं किया था। लेकिन स्वास्थ्य केंद्र की दीदी की बातें सुनने के बाद उसने कहा कि मुझे ज़्यादा काम नहीं करना चाहिए।”
एक महिला ने कहा:
“वह मेरे लिए फल लाता है… कहता है कि अगर मैं ठीक से खाऊँगी तो बच्चा भी स्वस्थ रहेगा, जैसा उन्होंने हमें क्लास में बताया था।”
- बच्चे के जन्म की तैयारी
काउंसलिंग ने पति-पत्नी को बच्चे के जन्म के लिए तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। पुरुष अब प्रसव की तैयारी में ज़्यादा शामिल होने लगे। वे आने-जाने के लिए गाड़ी का इंतज़ाम करने, प्रसव और आपात स्थिति के खर्च के लिए पैसे अलग रखने और आपात स्थिति में खून देने वाले व्यक्ति या रेफरल केंद्र का पहले से पता रखने जैसी तैयारियाँ करने लगे।
- बच्चे के जन्म से पहले आने-जाने के साधन का इंतज़ाम करने की जानकारी पहले से ही काफी अधिक थी (90.3%) और पहल के बाद भी यह 86.4% रही।
- 59.2% पुरुषों ने प्रसव और आपात स्थिति के लिए पैसों का इंतज़ाम किया था, जबकि पहले यह संख्या 23.3% थी।
- 1.9% पुरुषों को आपात स्थिति में रेफरल व्यवस्था के बारे में जानकारी हुई, जबकि पहले यह संख्या 0% थी।
कई महिलाओं ने बताया कि प्रसव के दौरान उन्हें अपने पतियों से मिले भावनात्मक सहारे से अच्छा लगा। जब प्रसव लंबा और दर्दनाक था, तब पति उनके साथ रहे और उन्हें दिलासा दिया तो उन्हें खास तौर पर सहारा महसूस हुआ।
“जब दर्द उठ रहा था, तो उसने मेरा हाथ पकड़ रखा था और मुझे साँस लेने के लिए कहता रहा… उसके वहाँ होने से मुझे कम डर लग रहा था।
कुछ पतियों के लिए बच्चे का जन्म भावनात्मक रूप से बदल देने वाला अनुभव था। एक पति ने कहा:
“उसे इतने दर्द में देखकर मैं रो पड़ा… लेकिन बच्चा होने तक वहीं रहा। मैं उसे अकेला छोड़कर नहीं जाना चाहता था।”
- नज़रिए में सकारात्मक बदलाव
कई पुरुषों के नज़रिए में गर्भावस्था और प्रसव के दौरान महिलाओं की ज़रूरतों को लेकर सकारात्मक बदलाव आया। जन्म-तैयारी की कक्षाओं में हिस्सा लेने से पुरुषों को यह समझने में मदद मिली कि प्रसव के दौरान महिलाओं के साथ सम्मान से पेश आना कितना ज़रूरी है।
ऐसे पुरुषों की संख्या:
- जो मानते थे कि प्रसव के दौरान गाली देना ज़रूरी है, 23.3% से घटकर 18.6% रह गई।
- जो सामान्य प्रसव में मदद के लिए पति-पत्नी के साथ व्यायाम करने के महत्व को समझते थे, 34.0% से बढ़कर 86.4% हो गई।
- जो स्तनपान कराने वाली महिलाओं की पोषण संबंधी ज़रूरतों को समझते थे, 12.6% से बढ़कर 68.0% हो गई।
एक महिला ने कहा:
“हम दोनों साथ में टहलते और व्यायाम करते थे… वह कहता था कि जो भी चीज़ प्रसव को आसान बनाने में मदद करे, हमें वह करनी चाहिए।”
इस तरह के अनुभवों से पता चला कि गर्भावस्था और प्रसव के दौरान पति-पत्नी की साथ-साथ भागीदारी और भावनात्मक जुड़ाव कितना मायने रखता है।

- बातचीत और फैसले लेना
पति-पत्नी ने बताया कि काउंसलिंग से उन्हें मिलकर फैसले लेने और आपस में बातचीत बेहतर करने में काफी मदद मिली। कई पुरुषों ने यह भी बताया कि उन्हें पहली बार गर्भावस्था के दौरान अपनी भूमिका के बारे में जानकारी मिली।
महिलाओं ने भी बताया कि वे बच्चे के जन्म की जगह, आने-जाने के इंतज़ाम और पैसों की व्यवस्था जैसे मुद्दों पर बच्चे के जन्म की संभावित तारीख से पहले अपने पतियों से बात करने लगी थीं।
- व्यवहार में बदलाव सीमित रहे
असल ज़िंदगी के व्यवहार में बदलाव अपेक्षाकृत कम रहा। जानकारी बढ़ने के बावजूद, गहरे जमे हुए लैंगिक मानदंड और काम का दबाव पुरुषों की भागीदारी को सीमित करते रहे। इस वजह से जानकारी और उसके व्यवहार में बदलने के बीच एक अंतर बना रहा।
फिर भी, अध्ययन से यह पता चला कि लगातार काउंसलिंग के ज़रिए व्यवहार में बदलाव लाया जा सकता है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस अध्ययन में बदलावों को बहुत कम समय के दौरान देखा गया था।
- पुरुषों की भागीदारी में आने वाली रुकावटें
हालाँकि इस पहल का मातृत्व देखभाल के कई पहलुओं पर सकारात्मक असर पड़ा, लेकिन टीम ने ऐसी कई रुकावटें भी देखीं जो पुरुषों की भागीदारी को सीमित करती थीं। मसलन, रोज़ कमाने-खाने वाले मजदूरों का काम और रोज़गार के लिए दूसरे इलाकों में जाना पतियों की भागीदारी में बड़ी रुकावट बना, भले ही वे अपनी पत्नियों की देखभाल में शामिल होना चाहते थे।
कुछ मामलों में सासों का मजबूत प्रभाव और सांस्कृतिक मान्यताएँ भी खाने-पीने पर पाबंदियों, गर्भावस्था की देखभाल और प्रसव से जुड़ी प्रथाओं के बारे में फैसलों पर हावी थीं।
इस अध्ययन में शामिल लोगों के लिए स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था भी एक रुकावट के रूप में सामने आई। चूँकि CMSK महिलाओं पर केंद्रित जगह है, इसलिए पुरुषों को वार्ड के अंदर अपनी पत्नियों के साथ रहने की इजाज़त नहीं थी। कुछ पतियों ने बताया कि स्वास्थ्य केंद्र में पुरुषों के लिए अलग या उनके अनुकूल जगह न होने की वजह से अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान वे अपनी पत्नियों की देखभाल में सक्रिय रूप से शामिल नहीं हो पाए।
कुल मिलाकर निष्कर्ष
- यह अध्ययन उन सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए उपयोगी सबूत देता है जो महिलाओं की अपनी ज़िंदगी और फैसलों पर उनके अधिकार को कम किए बिना पुरुषों को मातृ स्वास्थ्य देखभाल में शामिल करना चाहते हैं।
- रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि पुरुषों की भागीदारी का मतलब पुरुषों का नियंत्रण नहीं, बल्कि साझा ज़िम्मेदारी, हमदर्दी और गर्भावस्था तथा प्रसव के दौरान महिलाओं की गरिमा और अपने फैसले लेने के अधिकार का सम्मान होना चाहिए।
- पुरुषों की सम्मानजनक और सहयोगी भागीदारी से मातृ स्वास्थ्य देखभाल का अनुभव बेहतर हो सकता है।
- काउंसलिंग पर आधारित, पति-पत्नी को साथ लेकर चलने वाली पहलें ग्रामीण भारत में लागू की जा सकती हैं और लोग इन्हें स्वीकार भी करते हैं।
- ऐसी पहलों से पुरुषों की जानकारी, तैयारी और नज़रिए में काफी सुधार होता है।
- लेकिन समाज और लैंगिक भूमिकाओं से जुड़ी गहरी रुकावटें अब भी व्यवहार में बदलाव की राह रोकती हैं।
