भारत में नशे की समस्या से निपटने का तरीका अक्सर डर और नैतिक आक्रोश से प्रभावित होता है। डर होना स्वाभाविक है। नशे की लत परिवारों, आजीविका और भरोसे को नुकसान पहुँचा सकती है। समाज सरकार से सख्त कदम उठाने की अपेक्षा करता है। परिवार चाहते हैं कि उनके बच्चे फिर से सामान्य जीवन में लौटें। सरकारें दिखाना चाहती हैं कि वे मुद्दे की गंभीरता को समझती हैं। लेकिन जब डर ही नीतियों का आधार बन जाता है, तो इलाज भी सज़ा जैसा लगने लगता है। मरीजों को बार-बार यह साबित करना पड़ता है कि वे इलाज के योग्य हैं। डॉक्टरों से डॉक्टर की बजाय पहरेदार का व्यवहार करने की अपेक्षा की जाती है। परिवारों को शर्म, दोबारा नशे की ओर लौटने के खतरे और दूसरी परेशानियां झेलने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है।
लोगों के भीतर यह डर पैठा हुआ है कि अफीम की लत छुड़ाने के लिए दवा देना बस एक लत को दूसरी लत से बदल देने जैसा है। जबकि दूसरी गंभीर बीमारियों के लिए हम इसी तरह नहीं सोचते।
यही सबसे बड़ी समस्या है और हमें इसका सामना करना होगा। आज भी नशे की लत को अक्सर चारित्रिक समस्या या कानून-व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में देखा जाता है। इसे ऐसी दीर्घकालिक बीमारी के रूप में नहीं देखा जाता जो मरीज को दोबारा अपनी चपेट में ले सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि नशीले पदार्थों की तस्करी, जबरदस्ती या नशे के अवैध कारोबार को नजरअंदाज किया जाए। इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है। लेकिन इलाज के लिए आया इन्सान वही व्यक्ति नहीं है जो नशे के कारोबार से मुनाफा कमाता है। जो स्वास्थ्य व्यवस्था इस अंतर को नहीं समझेगी, उसके लिए लोगों को नशे से बाहर निकालना बड़ा मुश्किल होगा।
अफीम की लत के इलाज के लिए साक्ष्य आधारित सबसे प्रभावी तरीकों में से एक ओपिऑयड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी (OST) है। इसका तरीका बिल्कुल सरल है। खतरनाक और कुछ समय तक असर करने वाले अफीम की लत से जूझ रहे व्यक्ति को डॉक्टरों की निगरानी में सुरक्षित लेकिन देर तक असर करने वाली दवा दी जाती है। भारत में ‘बुप्रेनोर्फिन’ इस इलाज की एक महत्वपूर्ण दवा है, जो अक्सर ‘नेलोक्सोन’ के साथ दी जाती है। यह नशे की इच्छा और नशा छोड़ने से होने वाली तकलीफों को घटाती है। यह इलाज के दीर्घकालिक होने की सम्भावना बढ़ाती है, अवैध अफीम का इस्तेमाल घटाती है तथा अपने काम, परिवार और सामाजिक जीवन को फिर से सामान्य बनाने का मौका देती है।
कौर एवं अन्य के लेख (https://doi.org/10.24966/aad-7276/100173) में कहा गया है कि ओपिऑयड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी सबसे अधिक कारगर तब होती है, जब इलाज की अवधि और दवा की खुराक पर्याप्त हो तथा इलाज से जुड़े फैसलों में मरीज शामिल हो और दवाओं के साथ-साथ मनो-सामाजिक सहयोग भी दिया जाए।
पंजाब ने ओपिऑयड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी की इजाजत दी है, लेकिन इसके मानक नियम के अनुसार मरीज को घर ले जाने के लिए एक बार में बूप्रेनॉर्फिन-नेलोक्सोन की अधिकतम 14 दिन की खुराक या 100 टैबलेट (जो भी कम हो) दी जा सकती है। दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए बनाया गया यह नियम व्यावहारिक धरातल पर वैध इलाज को जारी रखना मुश्किल बना देता है।
फिर भी सरकारी नीतियों में इस दृष्टिकोण को लेकर अक्सर एक झिझक रहती है। लोगों के भीतर यह डर पैठा हुआ है कि अफीम की लत छुड़ाने के लिए दवा देना बस एक लत को दूसरी लत से बदल देने जैसा है। जबकि दूसरी गंभीर बीमारियों के लिए हम इसी तरह नहीं सोचते। हम ये नहीं कहते कि मधुमेह के मरीज को इंसुलिन की लत है या उच्च रक्तचाप के मरीज को ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने वाली दवाओं की लत है। हम जानते हैं कि ऐसी स्थितियों में दवाओं का लंबा इस्तेमाल संतुलित जीवन में मददगार हो सकता है। नशे की लत छुड़ाने वाली दवाओं को भी उसी गंभीरता से देखने की जरूरत है।
पंजाब इस बात का एक अच्छा उदाहरण है कि हद से ज्यादा नियंत्रण अच्छे इलाज के असर को भी कम कर सकता है। पंजाब ने अफीम की गंभीर समस्या का सामना किया है। पंजाब ओपिऑयड डिपेंडेंस सर्वे के अनुसार राज्य में करीब 2.3 लाख लोग अफीम की लत से जूझ रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। इस चुनौती से निपटने के लिए पंजाब ने ओपिऑयड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी की इजाजत दी है, लेकिन इसके मानक नियम के अनुसार मरीज को घर ले जाने के लिए एक बार में बूप्रेनॉर्फिन-नेलोक्सोन की अधिकतम 14 दिन की खुराक या 100 टैबलेट (जो भी कम हो) दी जा सकती है। इसका मतलब यह है कि ठीक हो रहे मरीजों को भी हर दो सप्ताह में दवाओं के लिए वापस आना पड़ सकता है। किसी दिहाड़ी मजदूर, ट्रक ड्राइवर, प्रवासी मजदूर, किसान या उपचार केंद्र से दूर रहने वाले व्यक्ति के लिए यह कोई मामूली असुविधा नहीं है। यह उनके लिए दिहाड़ी के नुकसान, आने-जाने के अतिरिक्त खर्चे, सामाजिक कलंक, काम से बार-बार छुट्टी और अनावश्यक परेशानियों का कारण बन सकता है। दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए बनाया गया यह नियम व्यावहारिक धरातल पर वैध इलाज को जारी रखना मुश्किल बना देता है।
ठीक हो रहे ऐसे मरीज जो काम कर रहे हैं, अपने परिवारों से जुड़े हैं और इलाज के लिए नियमित रूप से आते हैं उनके ऊपर गैर-जरूरी सीमाएं नहीं थोपनी चाहिए। स्वास्थ्य व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो मरीजों को इलाज से जुड़े रहने में मदद करे, न कि उन्हें उससे बाहर निकाले।
दवाओं के गलत इस्तेमाल की चिंता बेशक सही है। जिन दवाओं के गलत इस्तेमाल की गुंजाइश हो, उनकी निगरानी जरूरी है। नशे के लिए दवाओं के दुरुपयोग, नशा छोड़ने से पैदा होने वाली समस्याओं के लिए अनौपचारिक रूप से दवाओं के आदान-प्रदान और इलाज चाहने वाले ऐसे लोग जो आसानी से औपचारिक इलाज नहीं करवा सकते इन सबके बीच नीतियों को फर्क करना चाहिए। दवाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त प्रतिबंध लगाने की तुलना में इलाज को सुलभ बनाना, परामर्श करना, समय-समय पर जांच करना और डॉक्टरों के सही निर्णय कहीं ज्यादा प्रभावी साबित हो सकते हैं।
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नशे के इलाज के लिए भारत को अविश्वास पर आधारित व्यवस्था से आगे बढ़कर भरोसे पर आधारित जवाबदेह व्यवस्था अपनाने की जरूरत है। इसका मतलब नियमों में ढील देना नहीं है। उपचार केंद्रों की निगरानी होनी चाहिए। डॉक्टरों को अपने फ़ैसलों का रिकॉर्ड रखना चाहिए। मरीज़ों को परामर्श और सामाजिक सहयोग मिलना चाहिए। दवाओं के दुरुपयोग पर नजर रखनी चाहिए। लेकिन ठीक हो रहे ऐसे मरीज जो काम कर रहे हैं, अपने परिवारों से जुड़े हैं और इलाज के लिए नियमित रूप से आते हैं, उनके ऊपर गैर-जरूरी सीमाएं नहीं थोपनी चाहिए। स्वास्थ्य व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो मरीजों को इलाज से जुड़े रहने में मदद करे, न कि उन्हें उससे बाहर निकाले।

नशा-मुक्ति की नीतियों को नैतिक पक्ष की तुलना में व्यावहारिक पक्ष पर ज़्यादा ध्यान देना होगा। सवाल यह नहीं है कि हम नशे के इस्तेमाल को सही मानते हैं या नहीं। सवाल यह है कि हमारी व्यवस्था नुकसान को कम करने, मौतों से बचाने, लोगों की कार्यक्षमता को बहाल करने और उन्हें सामान्य जीवन में वापस लाने में मददगार है या नहीं। केवल नशे से लड़ना हमारा मकसद नहीं है। बात एक ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था के निर्माण की है जहाँ नशे की लत से जूझ रहे लोग ठीक होने तक टिके रह सकें।
