सन् 2017 में, छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक बस यात्रा के दौरान, मेडिको फ्रेंड्स सर्कल की बैठक के लिए जाते हुए, मेरी मुलाकात सीएमसी वेल्लोर के डॉ. आनंद ज़कारिया से हुई। उस दिन हम दोनों को एक बात ने सबसे अधिक प्रभावित किया – ढेर सारे युवा डॉक्टरों का दृश्य – जो उत्साह, ऊर्जा और जिज्ञासा से भरे हुए थे – वे सभी महाराष्ट्र में सर्च द्वारा चलाए जा रहे निर्माण नामक कार्यक्रम से प्रेरित थे। यह एक ऐसा कार्यक्रम था जो साफ तौर पर इन युवाओं के दिलोदिमाग को गहराई से छू रहा था। लेकिन, यह कार्यक्रम पूरी तरह से मराठी और हिंदी भाषा आयोजित किया गया था। जिस कारण दक्षिण भारत के मेडिकल छात्रों की एक पूरी पीढ़ी इससे वंचित रह गई।
निर्माण गाँवों को केंद्र में रखकर युवाओं द्वारा शुरू की गई एक पहलकदमी है। इसे सन् 2006 में डॉ. अभय और डॉ. रानी बंग द्वारा सर्च और एमकेसीएल के तहत शुरू किया गया था। इसे गढ़चिरौली के शोधग्राम से संचालित किया गया और इसके तहत आवासीय कार्यशालाओं के माध्यम से युवाओं को बदलाव लाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, ताकि भारत के हाशिए पर पड़े ग्रामीण समुदायों को प्रभावित करने वाली जटिल सामाजिक, वैज्ञानिक और तकनीकी चुनौतियों से निपटा जा सके।
इसे देख सुनकर मन में एक विचार आया। कैसा हो कि एक छोटी और सुलभ योजना हो, सबके लिए खुली, जो मेडिकल छात्रों और युवा डॉक्टरों को ग्रामीण और आदिवासी भारत में स्वास्थ्य संबंधी जमीनी हकीकत से रूबरू करा सके? कोई व्याख्यान श्रृंखला नहीं, कोई प्रमाणपत्र और एजेंडे वाली कार्यशाला नहीं। बल्कि, कुछ ऐसा, जो असली, ईमानदार और मानवीय हो। कुछ ऐसा, जो शहरी मेडिकल शिक्षा और उन समुदायों के बीच की गहरी खाई को पाट सके, जिन्हें डॉक्टरों की सबसे ज्यादा जरूरत है।
डॉ. आनंद और मेरे बीच हुई वह बातचीत ही ग्रामीण जागरूकता कार्यक्रम (आरएसपी) का आधार बनी।
एक अनिश्चित शुरुआत
हम- ट्राइबल हेल्थ इनिशिएटिव- ने दिसंबर सन् 2017 में पहला आरएसपी आयोजित किया और इसकी शुरुआत, जैसा कि अधिकतर अच्छी चीजों के साथ होता है, अनिश्चितता के साथ हुई। हमने डॉ. आनंद के परिचित मेडिकल कॉलेजों में संपर्क किया तथा उन्हें इस बारे में जानकारी भेजी, नोटिस छपवाए और कम्युनिटी हेल्थ विभागों से अनुरोध किया कि वे उन्हें हॉस्टल के नोटिस बोर्डों और कॉलेज के गलियारों में लगा दें। हमें लगभग 40 आवेदन मिले, लेकिन आवेदन लोग नहीं होते हैं और हमेशा लोग आएं, ये ज़रूरी नहीं।
ट्राइबल हेल्थ इनिशिएटिव (टीएचआई) एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले के सित्तिलिंगी के आदिवासी क्षेत्र में स्थित है। इस संस्था ने स्वास्थ्य और स्वास्थ्य पर असर डालने वाले सामाजिक करकों पर व्यापक रूप से काम करते हुए पिछले 34 वर्षों में सबसे वंचित समुदायों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने तथा सुधारने की दिशा में काफी प्रयास किया है।
पहले आरएसपी की सुबह, मैं बस स्टॉप पर खड़ा था और सलेम की ओर से आने वाली इकलौती बस की प्रतीक्षा कर रहा था। मेरा दिल उन पलों में वैसे ही धड़क रहा था, जैसे दुविधा के पलों में धड़कता है। जब बस आई, तो मैंने बस पर चढ़कर अपनी आधी-अधूरी उम्मीद से पूछा: “क्या कोई आरएसपी के लिए आया है?”
और पूरी बस खाली हो गई!
उस समय जो राहत मिली, उसे मैं बयान नहीं कर सकता। वह पहला कार्यक्रम केवल दो दिन चला क्योंकि हम अभी भी इस कार्यक्रम की रूपरेखा समझ ही रहे थे। अंधेरे में अपना रास्ता ढूंढ रहे थे और कुछ ऐसा कर रहे थे जो देश में पहले कभी किसी ने नहीं किया था। आज, आरएसपी तीन दिनों तक चलता है: सीखने, ठहाकों, ईमानदार चर्चा और नामुमकिन दोस्तियाँ बनाने के तीन दिन।

यहाँ आकर, जो छात्र आमतौर पर कक्षा में पीछे चुपचाप बैठे रहते हैं, वे बोलने लग जाते हैं। जब सीनियर जूनियर का बोझ हट जाता है तो वे प्रश्न पूछते हैं, चुनौती देते हैं, कल्पना करते हैं। इससे उनमें आत्म-अभिव्यक्ति, रचनात्मक आलोचना और रचनात्मक सोच पनपती है।
पुरानी परंपराओं को भूलकर सीखना
शुरूआत से ही, हमने एक मूलभूत निर्णय लिया: कोई पहले से तय एजेंडा नहीं होगा। यह एक और कक्षा नहीं होने वाली थी। प्रतिभागी ही इन चर्चाओं को आकार देंगे। उनके भीतर जो भी सवाल हैं, वे उसको लेकर प्रश्न उठाएंगे और कार्यक्रम को उस दिशा में ले जाएँगे जो उनके लिए सबसे अधिक मायने रखती है। यह एक अन्-औपचारिक सम्मेलन (un-conference) होगा – और इसी भावना से, “अन्” का पूरा दर्शन उभरा है।
यह कॉलेज जैसी शिक्षा नहीं थी, ये वो ज्ञान था जो उन रिक्तियों को भर रहा था, जिन्हें औपचारिक मेडिकल प्रशिक्षण कभी भी संबोधित नहीं करते या करना नहीं चाहते। यहाँ कोई “सर” या “मैडम” नहीं है। हर कोई, उम्र या अनुभव की परवाह किए बिना, अपने पहले नाम से बुलाया जाता है। यह सीनियर-जूनियर की उस मानसिकता के खिलाफ एक सोचा-समझा और शांत विद्रोह है, जिसे मेडिकल संस्कृति अक्सर सामान्य मान लेती है। और यकीन मानिए, ये तरीका काम करता है। इस माहौल में, जैसे कुछ बदल सा जाता है। जो छात्र सामान्यतः व्याख्यान कक्ष के पीछे चुपचाप बैठे रहते हैं, वे बोलने लग जाते हैं। जब सीनियर-जूनियर होने का बोझ हट जाता है, वे सवाल पूछते हैं, चुनौती देते हैं, कल्पना करते हैं। इससे उनमें आत्म-अभिव्यक्ति, रचनात्मक आलोचना और रचनात्मक सोच पनपती है।

क्या बदलता है
आरएसपी का उद्देश्य छात्रों को ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की मौजूदा कमियों से अवगत करवाना था। लेकिन, हमें जल्द ही एहसास हुआ कि कमियाँ उस प्रणाली में ही हैं, जिसमें वे प्रशिक्षित हो रहे थे। सम्मानजनक सेवा, तर्कसंगत व्यवहार, स्वास्थ्य को संचालित करने वाली चीजों के बारे में ईमानदार बातचीत, अपने आंतरिक संघर्षों को अभिव्यक्त करने का उचित स्थान तथा वास्तविक मानवीय संबंध- ये सब उनके औपचारिक प्रशिक्षण से गायब थे।
डॉ. पवित्रा, जो हर साल बीएचएस, उदयपुर में आरएसपी का आयोजन करती हैं, वह कहती हैं – “जब लोग मुझसे पूछते हैं कि आरएसपी के आयोजन से वास्तव में क्या हासिल होता है, तो मैं खुद को आँकड़ों के बजाय उन क्षणों की ओर लौटता हुआ पाती हूँ।”
एक युवा मेडिकल छात्रा ने एक आरएसपी के समापन सत्र में जेल के बंदियों के एक बैंड की प्रस्तुति सुनी, उसे सुनने के बाद वह मेरी ओर मुड़ी और उसने कहा: “हम हमेशा सोचते थे कि जेल में लोग अपराधी होते हैं। हमने कभी नहीं सोचा था कि वे इतने आत्म-सचेत हो सकते हैं।” उस छात्रा के अंदर चुपचाप ही कुछ बदल गया।
एक अंतिम वर्ष के छात्रा ने एक बार मुझसे कहा: “मैं हमेशा बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में रेजीडेंसी करना चाहती थी, क्योंकि मुझे बच्चों से प्यार है। लेकिन, मेरे दोस्त कहते थे – रेडियोलॉजी करो। ताकि, कम काम होगा और ज्यादा पैसा आएगा। मुझे आरएसपी कार्यशाला का हिस्सा बनने के बाद यह एहसास हुआ कि मुझे अपने दिल की बात सुननी चाहिए।” बाद में, वह छात्रा दुबारा हमारे केंद्र पर आयी और उसने यहाँ और गहन अनुभव प्राप्त करने के लिए एक सप्ताह समय बिताया।
डॉ. वसुंधरा, जिन्होंने पूरे भारत में आयोजित होने वाले विभिन्न आरएसपी में भाग लिया है, उन्होंने शायद इसे सबसे अच्छी तरह से व्याख्यायित किया है: “आरएसपी का उद्देश्य छात्रों को ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की मौजूदा कमियों से अवगत करवाना था। लेकिन, हमें जल्द ही एहसास हुआ कि कमियाँ उसी प्रणाली में हैं, जिसमें वे प्रशिक्षित हो रहे थे। सम्मानजनक सेवा, तर्कसंगत व्यवहार, स्वास्थ्य को संचालित करने वाली चीजों के बारे में ईमानदार बातचीत, अपने आंतरिक संघर्षों को अभिव्यक्त करने का उचित स्थान तथा वास्तविक मानवीय संबंध – ये सब उनके औपचारिक प्रशिक्षण से गायब थे। यह एक संयोग है कि आरएसपी ने लगभग उन सब पहलुओं को पूरा किया, जो कि छूट जा रहे थे।”

इन बेफिक्र पलों में छात्र अपनी सारी चिंताएं भूल जाते हैं- एक प्रकार का सुरक्षात्मक कवच, जिसे मेडिकल प्रशिक्षण अक्सर उन्हें विकसित करने के लिए मजबूर करता है (वे उससे बाहर निकल आते हैं)। इस प्रकार, इस प्रक्रिया में उनका एक स्वतंत्र और जिज्ञासु व्यक्तित्व उभर कर सामने आता है।
ज्ञान का उत्सव
आरएसपी कई मायनों में एक उत्सव भी है। प्रत्येक केंद्र पर स्थानीय भोजन परोसा जाता है- सित्तिलिंगी में, मुख्य रूप से बाजरा परोसा जाता है, जिससे प्रतिभागियों को यह जानने का मौका मिलता है कि समुदाय के लोग वास्तव में क्या खाते हैं। यह केवल नृवंशविज्ञान का अभ्यास भर नहीं है, बल्कि ये एकजुटता के एक प्रतीक के रूप में कार्य करता है। वहाँ स्थानीय नृत्य, सहज ढ़ंग से खाना बनाने की प्रक्रिया, चांदनी रात में सैर, जंगल की यात्राएँ और कभी-कभी जंगल की नदी में डुबकी भी लगाई जाती है। उत्सुक छात्र अपने मेंटर्स के आसपास इकठ्ठा तो होते हैं, लेकिन केवल नोट्स लेने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें सुनने के लिए, यह समझने के लिए कि ये डॉक्टर किसी ख़ास निर्णय तक कैसे पहुँचते हैं, किस चीज़ ने उनकी सहायता की, किस चीज़ ने उन्हें तोड़ा और किस चीज़ ने उन्हें फिर से पूरी मजबूती के साथ दुबारा खड़ा किया।
इन बेफिक्र पलों में छात्र अपनी सारी चिंताएं भूल जाते हैं। वे उस खोल से बाहर आ जाते हैं, जिसे मेडिकल प्रशिक्षण अक्सर मजबूत करने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार, इस प्रक्रिया में उनका एक स्वतंत्र और जिज्ञासु व्यक्तित्व उभर कर सामने आता है।

हालाँकि, हर केंद्र की अपनी अलग विशेषता है, फिर भी, उनके प्रारूपों में एक साझा भावना निहित है: माध्यमिक स्वास्थ्य सेवाओं वाले अस्पतालों का दौरा करना, ताकि पता किया जा सके कि ईमानदारी से, किफ़ायती स्वास्थ्य सेवा कैसे मुहैय्या करवाई जाती है; दूर दराज़ के इलाकों का दौरा करना ताकि उन इलाकों में स्वास्थ्य सेवा की चुनौतियों को समझा जा सके; साथ ही, इस बारे में खुलकर चर्चा करना, ताकि चिकित्सा पेशे की प्रैक्टिस करने का असली मतलब समझा जा सके; और ये समझना कि जाति, लिंग, गरीबी और भूगोल स्वास्थ्य को किस हद तक प्रभावित कर सकते हैं। इन बातों पर कोर्स की किताबों में बहुत सीमित चर्चा मिलती है।
जड़ें जम रही हैं…
आरएसपी के पास कोई आधिकारिक अनुमति या पाबंदी नहीं है। यह कोई प्रमाणपत्र नहीं देता। प्रतिभागियों को अपने आने-जाने की व्यवस्था भी स्वयं करनी होती है। भोजन के लिए उन्हें एक छोटी सी फीस अदा करनी होती है। और शायद प्रतिबद्धता की सबसे सच्ची परीक्षा- अपनी औपचारिक कक्षाओं छोड़कर इस कार्यक्रम में भाग लेना। फिर भी, जैसे ही सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा होती है, सीटें कुछ ही दिनों में भर जाती हैं। लंबी प्रतीक्षा सूची हैं। यह कार्यक्रम पूरी तरह से उन लोगों के मौखिक प्रचार और ऊर्जा पर चलता है, जो इससे प्रभावित हुए हैं।
एक प्रयास जो तमिलनाडु के एक छोटे से कोने में शुरू हुआ था, वह अब दूर-दूर तक फैल गया है। आरएसपी और इसी तरह के कार्यक्रम अब अश्विनी – गुदलूर, बेसिक हेल्थ सर्विसेज उदयपुर; जन स्वास्थ्य सहयोग- गनियारी; आईडीओ- भद्राद्री; भंसाली ट्रस्ट- डांग; और जन चेतना मंच- बोकारो; में चल रहे हैं। हालाँकि, हर सेंटर की अपनी अगल विशेषता है। फिर भी, उनके प्रारूपों में एक साझा भावना है : माध्यमिक स्वास्थ्य सेवाओं वाले अस्पतालों का दौरा करना, ताकि पता किया जा सके कि ईमानदारी से, किफ़ायती स्वास्थ्य सेवा कैसे मुहैय्या करवाई जाती है; दूर दराज़ के इलाकों का दौरा करना ताकि उन इलाकों में स्वास्थ्य सेवा की चुनौतियों को समझा जा सके; साथ ही, इस बारे में खुलकर चर्चा करना, ताकि चिकित्सा पेशे की प्रैक्टिस करने का असली मतलब समझा जा सके; और ये समझना कि जाति, लिंग, गरीबी और भूगोल स्वास्थ्य को किस हद तक प्रभावित कर सकते हैं। इन बातों पर कोर्स की किताबों में बहुत सीमित चर्चा मिलती है।

सन् 2017 के बाद से, हर साल सभी केंद्रों में लगभग 200 या उससे अधिक मेडिकल छात्र आरएसपी कार्यक्रम में भाग लेते हैं। कुछ ट्रैवल फेलोशिप के लिए वापस भी आते हैं।
यात्रा जारी है…
ट्रैवल फेलोशिप आरएसपी का एक स्वाभाविक विस्तार है – यह एक वर्षीय कार्यक्रम है, जिसमें युवा डॉक्टर भारत के 21 केंद्रों में यात्रा करते हैं। वे प्रत्येक केंद्र में दो से तीन महीने बिताते हैं। इस दौरान वे उन विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, संस्कृतियों और स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के तरीकों रम जाते हैं। वर्तमान समय में, इस फेलोशिप के तहत हर साल पाँच फेलो इसमें भाग लेते हैं।
डॉ. हसिता ट्रैवल फेलो के मौजूदा बैच का हिस्सा हैं, वह बताती हैं कि क्या चीज ने उन्हें यहाँ लेकर आयी : “स्नातक होने के महीनों बाद, सित्तिलिंगी में आरएसपी में भाग लेना मेरे जीवन का एक निर्णायक मोड़ था। मेडिकल स्कूल में मैंने सामुदायिक कार्य के महत्त्व के बारे में पढ़ा था- लेकिन उन तीन दिनों में, डॉक्टरों को स्वास्थ्य के सामाजिक कारकों पर चर्चा करते हुए देखना, साथ ही, समान समझ वाले साथियों और मार्गदर्शकों के साथ होने वाली उस गहन चर्चा में भाग लेकर, मेरी वह समझ दृढ़ विश्वास में बदल गई। भारत के विभिन्न समुदायों और संदर्भों में स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ क्या है, इसे खोजने के लिए: इस दिशा में ट्रैवल फेलोशिप अगला स्वाभाविक कदम लगता है।”

आरएसपी के अंत में एक शिक्षक के रूप में, मुझे एक संतुष्टि भरे ‘आहा’ का अनुभव होता है। जैसे, प्रतिभागियों और मार्गदर्शकों दोनों के लिए कुछ जादुई घटित होता है। वह क्या था, इसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है । आरएसपी दिखाता है कि अच्छी शिक्षा परंपरागत ढांचों से बाहर भी मिल सकती है।
सन् 2017 के बाद से, हर साल सभी केंद्रों में लगभग 200 या उससे अधिक मेडिकल छात्र आरएसपी से गुजरते हैं। उनमें कुछ ट्रैवल फेलोशिप के लिए वापस आते हैं। कई लोग आगे चलकर ग्रामीण एनजीओ के साथ काम करने, वंचित क्षेत्रों में जूनियर डॉक्टर के रूप में सेवा करने और फिर स्नातकोत्तर प्रशिक्षण लेने चले गए हैं। कुछ अन्य शहरों के अस्पतालों में चले गए हैं। लेकिन, हमारा मानना है कि यह कोई बड़ी बात है।
असल बात तो वो बीज हैं…
हम एक बीज को एक युवा डॉक्टर के मन में रोपते हैं। इस समझ का बीज कि एक मरीज, एक इंसान है, वह कोई बीमारी नहीं है। कि करुणा दिखाना, कमजोर होना नहीं, बल्कि ज़रूरी है; ये बीज कि स्वास्थ्य हमारे परिवेश से अलग-थलग नहीं होता बल्कि, वह समुदाय, इतिहास और समाज के बड़ी संजीदगी से जुड़ा हुआ है। एक न एक दिन, किसी भीड़भाड़ वाली क्लिनिक या किसी शांत वार्ड में, वह बीज अंकुरित होगा। और कुछ न कुछ- चाहे वह बदलाव कितना भी छोटा क्यों न हो- बदलाव अवश्य होगा।
सीएमसी वेल्लोर के प्रोफेसर आनंद ज़कारिया की सोच आरएसपी अनुभव के बारे में कुछ दुर्लभ और गहन बातों को दर्शाता है- यह विचार कि सबसे सार्थक शैक्षणिक क्षण अक्सर सुव्यवस्थित दस्तावेजों या उन क्षणों दोहराने की कोशिश से परे होते हैं। “आरएसपी के अंत में एक शिक्षक के रूप में, मुझे एक संतुष्टि भरे ‘आहा’ का अनुभव होता है। जैसे, प्रतिभागियों और मार्गदर्शकों दोनों के लिए कुछ जादुई घटित होता है। वह क्या था, इसे शब्दों में बयान करना आसन नहीं है । आरएसपी दिखाता है कि अच्छी शिक्षा परंपरागत ढांचों से बाहर भी मिल सकती है।”
हम इनमें से किसी पर भी कॉपीराइट का दावा नहीं करते। जो कोई भी इस मॉडल को अपनाना चाहता है, इसे लागू करना चाहता है, इसे अपने तरीके से विकसित करना चाहता है- हम आपका स्वागत करते हैं।
