भारत में नेत्रहीनता की गंभीर समस्या से निपटने के लिए पारंपरिक अस्पताल-आधारित देखभाल से कहीं अधिक की ज़रूरत है। इसके लिए तकनीक और दूर दराज के इलाकों तक पहुंच बनाने के लिए खास तरह की रणनीति बनाने की ज़रूरत है। एक तरफ, जहाँ मोतियाबिंद जैसी बीमारियों से निपटने के लिए एक बार में ही ऑपरेशन से ठीक हो जाने वाली सुविधा जैसी स्थापित प्रक्रिया मौजूद है, वहीं दूसरी ओर, डायबिटिक रेटिनोपैथी1 और रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमेच्योरिटी2 (आरओपी) जैसे उभरते रोग सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए अभी भी एक चुनौती बने हुए हैं। इन रोगों में अक्सर शुरुआती लक्षण पता नहीं चलते, इसलिए प्रभावी रोकथाम के लिए जांच का समय पर होना आवश्यक है।
“नयना” कार्यक्रम विट्टल इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी द्वारा सन् 2005 में शुरू किया गया। यह कार्यक्रम डायबिटिक रेटिनोपैथी के लिए एक अनूठा समाधान प्रस्तुत करता है। बड़ी पूंजीगत लागत और ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञों की कमी के कारण मदद बहुत से लोगों तक नहीं पहुँच पाती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए, इस कार्यक्रम ने एक मोबाइल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया। लगभग 1.5 करोड़ रुपये के विशेष लेजर और चिकित्सीय उपकरणों से युक्त एक पूरी तरह से आत्मनिर्भर वैन बनाई गई। यह वैन एक पूर्वनिर्धारित मासिक योजना के अनुसार अनेक ग्रामीण इलाकों में जाती है। स्थानीय नेत्र रोग विशेषज्ञों को यह विशेष स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित किया गया, जिससे समुदायों में लोगों का उपचार उनके स्थान पर ही सुलभ हो सके और किफ़ायती भी हो।
इसी तरह, विट्टल आरओपी (रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमेच्योरिटी) कार्यक्रम नेत्रहीनता के जोखिम वाले समय से पहले जन्मे शिशुओं की तत्काल सहायता करता है। चूँकि, आरओपी कुछ ही हफ्तों में आजीवन अंधेपन का कारण बन सकता है, एक तकनीशियन-संचालित मॉडल के तहत पोर्टेबल कैमरों का उपयोग करके कर्नाटक के 14 जिलों में नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट्स (एनआईसीयू) में शिशुओं की जांच की जाती है। ये तस्वीरें क्लाउड-आधारित इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड (ईएमआर) सिस्टम पर अपलोड की जाती हैं और विशेषज्ञ दूर बैठे ही उन शिशुओं की पहचान कर सकते हैं, जिन्हें तत्काल लेजर उपचार की आवश्यकता होती है।
प्रौद्योगिकी और मौजूदा सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर जांच की सुविधा का लाभ उठाकर, इन पहलकदमियों के माध्यम से 78,000 से अधिक लोगों की सफलतापूर्वक जांच की जा चुकी है और हजारों लोगों को आजीवन नेत्रहीनता की समस्या से से बचाया है। यह नया दृष्टिकोण, वैश्विक स्तर पर असंक्रामक नेत्र रोगों के बढ़ते खतरे को व्यापक दायरे में नियंत्रित करने का एक रोडमैप प्रदान करता है।
हम विट्टल इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी के निदेशक डॉ. कृष्णा आर. मूर्ति के साथ यह साक्षात्कार साझा करते हुए, काफी खुशी महसूस कर रहे हैं।
