बत्तीस साल पहले एक युवा डॉक्टर दंपति अपना आरामदायक कैरियर छोड़कर तमिलनाडु के धर्मपुरी ज़िले के सिट्टिलिंगि गाँव में आकर बस गए। उस समय यह भारत के सबसे पिछड़े आदिवासी इलाकों में से एक था। जल्दबाज़ी में बनाई गई मिट्टी की झोपड़ी से शुरू हुई एक छोटी-सी क्लिनिक ने आगे चलकर सिट्टिलिंगि घाटी की पूरी आबादी के जीवन को बदल कर रख दिया।
यह कहानी है डॉ. रेजी और डॉ. ललिता की, जिन्होंने 1993 में ट्राइबल हेल्थ इनिशिएटिव नाम से एक गैर-सरकारी संस्था (NGO) की बनाई ।
शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में कमी लाना शुरुआती सालों में उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। उन दिनों घाटी में पैदा हुए हर पाँच में से एक बच्चा पहले ही साल में मर जाता था।
रेजी और ललिता ने समझ लिया कि समुदाय के स्वास्थ्य में सुधार लाने की पहली शर्त यह है कि समुदाय अपने स्वास्थ्य की कमान खुद अपने हाथ में ले। उन्होंने स्थानीय आदिवासी लड़कियों को स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में प्रशिक्षित करना शुरू किया। साथ ही, उन्होंने एक और समूह बनाया जिसमें गाँवों द्वारा चुनी गई बड़ी उम्र की महिलाओं को स्वास्थ्य सहायिका (Health Auxiliaries) के रूप में तैयार किया गया। तभी से बदलाव की शुरुआत हुई। शिशु मृत्यु दर तीन गुना तक कम हो गई।
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लेकिन दंपति ने महसूस किया कि स्वास्थ्य को और बेहतर करने के लिए सिर्फ इलाज नाकाफी है। इसके लिए स्वास्थ्य से जुड़े कुछ अन्य पहलुओं, जैसे कि पोषण और रोज़गार पर भी काम करना ज़रूरी है। ये दोनों अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी थे।
अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के राम जी वल्लथ के साथ एक प्रेरक बातचीत में डॉ. रेजी विस्तार से अपने अनुभवों के बारे में बात करते हैं। वे बताते हैं कि किस तरह उन्होंने जैविक फसलों की खेती, उसकी उपज की प्रोसेसिंग और बिक्री, जल संरक्षण, बेहतर पोषण और स्थानीय शासन जैसे क्षेत्रों में काम को बढ़ावा देकर समुदाय को बदलने में मदद की।
यह एक प्रेरक कहानी है, ऐसी कहानी जो सुनने वाले को प्रशंसा और हैरानी से भर देगी।
