सरकार द्वारा संचालित स्वास्थ्य सेवाओं के प्रदर्शन को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। नतीजों में असमानता बनी हुई है और अंतर बहुत बड़े हैं। सुधार की कोशिशें अक्सर सुधार की तुलना में कागज़ी कामकाज बढ़ाने वाली लगती हैं।
चिकित्सीय निर्णय अनिश्चितता के माहौल में लिए जाते हैं। नतीजे कोशिशों के साथ-साथ रोगी की स्थिति, समय, बुनियादी ढांचे और संयोग पर भी निर्भर होते हैं।
सरकारें लगातार अपेक्षित पारंपरिक ढंग से काम करती हैं : कड़ी निगरानी, अधिक ऑडिट, कठोर लक्ष्य और सख्त अमल। हालाँकि जमीनी हकीकत अलग है। कई सार्वजनिक स्वास्थ्यकर्मी इन उपायों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के तरीके की बजाय सतर्क होने, अपना बचाव करने और जोखिम से बचने के संकेत के रूप में देखते हैं। जब जवाबदेही की प्रणालियाँ मूलतः नियंत्रण और सजा के इर्द-गिर्द बनाई जाती हैं, तो अक्सर उनसे ठीक उलटे नतीजे निकलते हैं : यानी जिम्मेदारी नहीं बढ़ती बल्कि सावधानी से अपना बचाव करने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
सार्वजनिक सेवाओं में जवाबदेही के सवाल को लंबे समय से दो तरीकों से देखा जाता रहा है। एक तरीका नागरिकों की आवाज और सामुदायिक दबाव पर जोर देता है और दूसरा तरीका नियमों, मुआयनों, लक्ष्यों और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के जरिये नौकरशाही की निगरानियों पर जोर देता है। दोनों महत्त्वपूर्ण हैं।
बीच की स्थिति वाले मामले जल्दी ही आगे बढ़ा दिये जाते हैं। ऐसी कार्रवाइयों का चुनाव किया जाता है जिन्हें बाद में उचित ठहराना आसान होता है। लचीलेपन को टाल दिया जाता है भले ही पेशेवर समझ कुछ और कहती हो।
लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी जटिल सेवाओं में इन तरीकों की स्पष्ट सीमाएं होती हैं। चिकित्सीय निर्णय अनिश्चितता के माहौल में लिए जाते हैं। नतीजे कोशिश के साथ-साथ रोगी की स्थिति, समय, बुनियादी ढ़ांचे और संयोग पर भी निर्भर होते हैं। फिर भी जवाबदेही की कई प्रणालियाँ यह मानकर चलती हैं कि नतीजे पूरी तरह अपने हाथ में होते हैं और विचलन असफलता की निशानी है। ऐसे माहौल में विवेक खतरनाक बन जाता है। पेशेवर निर्णय की जगह ऐसे व्यवहार ले लेते हैं, जो रोगी के लिए सबसे बेहतर होने की बजाय अपने बचाव की दृष्टि से सबसे सुरक्षित होते हैं।
भारत की सार्वजनिक प्रसूति सेवाओं के मामले में यह स्थिति स्पष्ट रूप से दिखती है। मातृ स्वास्थ्य परिणामों और सिजेरियन सेक्शन की कड़ी निगरानी के कारण कई डॉकटर सतर्कता बरतने लगे हैं। बीच की स्थिति वाले मामले जल्दी ही आगे बढ़ा दिये जाते हैं। ऐसी कार्रवाइयों का चुनाव किया जाता है जिन्हें बाद में उचित ठहराना आसान होता है। लचीलेपन को टाल दिया जाता है भले ही पेशेवर समझ कुछ और कहती हो।
यह व्यवहार किसी लालच या उदासीनता से प्रेरित नहीं होता। बल्कि ऐसा जांच, तबादले, निलंबन और कुछ गलत होने पर खतरनाक स्थितियों में छोड़ दिए जाने के डर से होता है। पर्याप्त सक्षम क्षेत्रों खासकर दक्षिणी और पश्चिमी भारत में इस डर ने सार्वजनिक क्षेत्र में सिजेरियन सेक्शन की दर को लगातार बढ़ाने का काम किया है।
प्रदर्शन की निगरानी होती है, लेकिन व्यक्तिगत दोषारोपण की बजाय निरंतरता, सीखने की प्रवृत्ति और प्रणाली स्तर के परिणामों पर अधिक जोर दिया जाता है।
महत्वपूर्ण यह है कि ये केवल भारत की कहानी नहीं है। कई विकासशील देशों के अनुभव बताते हैं कि जब अग्रिम पंक्ति के प्रदाता राज्य के साथ एक स्पष्ट और विश्वसनीय समझौते के तहत काम करते हैं, तो प्रणालियां बेहतर काम करती है। एक ऐसा समझौता जो अपेक्षाओं और सुरक्षा के बीच तथा जवाबदेही और स्वायत्तता के बीच एक संतुलन बनाता है। थाईलैंड की यूनिवर्सल कवरेज योजना इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें खरीददार और सेवा प्रदाताओं को एक-दूसरे से अलग कर दिया गया, फिर भी दोनों सार्वजनिक बने रहे। सेवा प्रदाताओं से स्पष्ट उम्मीदें रखी गईं तथा कैपिटेशन और वैश्विक बजट के माध्यम से उन्हें स्थिर वित्तीय मदद और साथ ही सार्थक प्रबंधकीय स्वायत्तता दी गई। जवाबदेही असली थी, लेकिन दंडात्मक निगरानी की बजाय इसे आंकड़ों, संवादों और समय-समय पर होने वाली समीक्षाओं के जरिये लागू किया गया। जिसके परिणामस्वररूप सीमित संसाधनों वाले परिवेश में भी पहुँच बढ़ी तथा दक्षता और गुणवत्ता में निरंतर सुधार हुआ।
सार्वजनिक स्वास्थ्यकर्मियों के साथ एक नए समझौते की शुरुआत के लिए यह स्वीकार करना जरूरी है कि जोखिम स्वास्थ्य सेवाओं का एक स्वाभाविक हिस्सा है जिसे निगरानी के जरिये नहीं ख़त्म किया जा सकता।
ब्राजील का यूनिफाइड हेल्थ सिस्टम भी ऐसा ही पैटर्न दिखाता है। नगरपालिका प्रदाता वित्तपोषण और योजना के एक दीर्घकालिक ढांचे के भीतर पर्याप्त स्वायत्तता के साथ काम करते हैं। प्रदर्शन की निगरानी होती है, लेकिन व्यक्तिगत दोषारोपण की बजाय निरंतरता, सीखने की प्रवृत्ति और प्रणाली स्तर के परिणामों पर अधिक जोर दिया जाता है।
इन सभी मामलों में सुधार अमीर देशों के मॉडल को अपनाने या नौकरशाही के नियंत्रण को सख्त बनाने से नहीं हुआ। सुधार ऐसी संस्थागत व्यवस्था से हुआ जिसमें अग्रिम पंक्ति के प्रदाता तार्किक तौर पर उम्मीद कर सकते थे कि नेक इरादे से लिए गए उनके पेशेवर फैसलों को स्वीकार किया जाएगा, न कि उन्हें दंडित किया जाएगा। यही चीज़ आज हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में गायब है। एक स्पष्ट समझौते की बजाय हमने नियंत्रण की कई परतें तैयार कर ली हैं। अपेक्षाएँ तो बहुत ज्यादा हैं, लेकिन सुरक्षा बहुत कम है। जिम्मेदारी व्यक्तियों पर डाली जाती हैं और जोखिम को नीचे धकेल दिया गया है।
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सार्वजनिक स्वास्थ्यकर्मियों के साथ एक नए समझौते की शुरुआत के लिए यह स्वीकार करना जरूरी है कि जोखिम स्वास्थ्य सेवाओं का एक स्वाभाविक हिस्सा है जिसे निगरानी के जरिये नहीं ख़त्म किया जा सकता। यह जवाबदेही को किसी प्रतिकूल घटना से जोड़कर देखने की बजाय व्यवहार और सीखने की दीर्घकालिक प्रवृतियों से जोड़ेगा। अपेक्षाओं की स्थिरता प्रदान करेगा और स्वीकार करेगा कि सुरक्षा के बिना स्वायत्तता डर पैदा करती है। ठीक उसी तरह जैसे जवाबदेही के बिना सुरक्षा लापरवाह बनाती है।
राज्य के साथ काम करने वाले गैर-लाभकारी संगठनों के लिए यह बेहद महत्त्वपूर्ण है। बड़े सोचे-समझे ढंग से शुरू की गई कई योजनाएं असफल हो जाती हैं, इसलिए नहीं कि विचार गलत होते हैं; बल्कि इसलिए कि वे ऐसी व्यवस्था से टकराते हैं जो डर पर टिकी होती है। किसी नए समझौते के बिना ये समस्याएँ बनी रहेंगी। जबकि एक नया समझौता उन्हीं स्थितियों में बिलकुल अलग व्यवहार पैदा कर सकता है। यही तो नए समझौते का अर्थ है।
