स्वास्थ्यकर्मी के आने से पहले और बाद में भी देखभाल जारी रहती है

भारतीय स्वास्थ्य सिस्टम में देखभालकर्ताओं को काम को बगल में खड़े होकर सिर्फ़ देखने वाले यानी ‘तमाशबीन’ कहा जाता है। लेकिन असल में, अगर देखभाल कर्ताओं को स्वास्थ्य सेवा सिस्टम का एक औपचारिक हिस्सा माना जाए। उन्हें उसी के मुताबिक महत्व दिया जाए, तो वे स्वास्थ्य सेवा का एक अहम हिस्सा बन सकते हैं। 

स्वास्थ्यकर्मी के आने से पहले और बाद में भी देखभाल जारी रहती है

भारत के स्वास्थ्य सिस्टम के संदर्भ में अक्सर अस्पतालों, डॉक्टरों, नर्सों, दवाओं, बीमा और सरकारी बजट के बारे में बात की जाती है। ये सभी चीज़ें महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन यान तथा अन्य लोगों द्वारा लिखे गए एक शोध पत्र (https://doi.org/10.3389/fpubh.2025.1666386) से पता चलता है कि स्वास्थ्य सिस्टम का एक और हिस्सा है, जो हमेशा मौजूद रहता है मगर जिस पर ठीक से ध्यान नहीं दिया जाता है। वे हैं – देखभाल करने वाले परिवार के सदस्य।

जब स्वास्थ्य सिस्टम द्वारा देखभाल करने वालों के लिए बिना सोचे समझे ‘तमाशबीन’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, तब यह बात और भी साफ़ तौर पर सामने आने लगती है। यह एक ऐसा शब्द है जो उन्हें सिर्फ ‘चुपचाप तमाशा देखने वाले’ बनाकर रख देता है, जबकि असल में वे ही सबसे कठिन और महत्त्वपूर्ण काम कर रहे होते हैं।

देखभाल करने वाला इंसान कोई भी हो सकती है। कोई बेटी अपनी माँ की दवाइयों का ध्यान रख सकती है, कोई पति प्रसव के बाद अपनी पत्नी को नियमित जाँच के लिए ला सकता है, कोई दादी भी नवजात शिशु की देखभाल में मदद कर सकती है, कोई माता-पिता किसी दिव्यांग बच्चे का सहारा हैं, या कोई पड़ोसी किसी बुजुर्ग व्यक्ति को क्लिनिक तक पहुँचाने में मदद करता है। भारत में, इस तरह की देखभाल कोई असामान्य बात नहीं है। यह देखभाल की असल सूरत-ओ-शक्ल है। एक अंदाज़े के मुताबिक़ भारत में लगभग 27.5 करोड़ देखभाल करने वाले हो सकते हैं, जो जनसंख्या का लगभग पाँचवाँ हिस्सा है। फिर भी, उनमें से ज़्यादातर अनौपचारिक, किसी और की मदद नहीं पाने वाले, बगैर कोई तनख़्वाह पाने वाले और अक्सर बगैर प्रशिक्षण पाए लोग होते हैं।

कई ज़रूरी कामों में परिवार के सदस्य सुरक्षित रूप से मदद कर सकते हैं। इन कामों में परेशान करने वाले इशारों को समझना, वक्त पर सही दवाइयों को लेना सुनिश्चित करना, खाने-पीने और साफ़-सफ़ाई में मदद करना, बिस्तर पर पड़े रहने से होने वाले घावों को रोकना, चलने-फिरने में मदद करना, आपात स्थितियों के लिए तैयारी करना और स्वास्थ्य सेवा देने वालों को समझना और होने वाली दिक्कतों को बताना शामिल है।

यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि मरीज़ और औपचारिक स्वास्थ्य सिस्टम के बीच संपर्क अक्सर बहुत कम समय के लिए होता है। किसी भी डॉक्टर या नर्स के पास बीमारी के बारे में बताने, दवा लेने का समय समझाने, ख़तरे के संकेतों, खान-पान में बदलाव, ठीक होने के चरणों या अस्पताल में दोबारा कब आना है, यह सब बताने के लिए शायद कुछ ही मिनट होते हैं। एक बार जब मरीज़ घर चला जाता है, तो सारी ज़िम्मेदारी परिवार पर आ जाती है। अगर परिवार इसके लिए पहले से तैयार न हो, तो वे परेशान हो सकते हैं और उन पर बहुत अधिक बोझ पड़ सकता है। हो सकता है कि वे ख़तरे के संकेतों को न समझ पाएँ, निर्देशों को ग़लत समझ लें या समय पर इलाज न ले पाएँ। ऐसा इसलिए नहीं होता है कि उन्हें मरीज़ की परवाह नहीं है। बल्कि ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हमने उनसे देखभाल का काम तो करने की उम्मीद की, लेकिन उन्हें ‘केयर टीम’ (देखभाल करने वाली टीम) का हिस्सा नहीं माना। स्वास्थ्य सिस्टम में ये बातें तब साफ़ तौर पर दिखाई पड़ती हैं, जब देखभाल करने वालों के लिए ‘तमाशबीन’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक ऐसा शब्द है, जो उन्हें सिर्फ़ एक ‘दर्शक’ मान लेता है, जबकि असल में वे ही सबसे मुश्किल और अहम काम कर रहे होते हैं।

इसका हल यह नहीं है कि इलाज में देखभाल से जुड़ा सारा काम परिवार के लोगों पर डाल दिया जाए। पेचीदा क्लिनिकल काम तो प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों को ही करने चाहिए। कई ज़रूरी कामों में परिवार के सदस्य सुरक्षित रूप से मदद कर सकते हैं। इन कामों में परेशान करने वाले इशारों को समझना, वक्त पर सही दवाइयों को लेना सुनिश्चित करना, खाने-पीने और साफ़-सफ़ाई में मदद करना, बिस्तर पर पड़े रहने से होने वाले घावों को रोकना, चलने-फिरने में मदद करना, आपात स्थितियों के लिए तैयारी करना और स्वास्थ्य सेवा देने वालों को समझना और होने वाली दिक्कतों को बताना शामिल है। ये कोई छोटी-मोटी बातें नहीं हैं। इन्हीं बातों से तय होता है कि मरीज़ कितनी अच्छी तरह ठीक होगा, क्या उसे बिना ज़रूरत के दोबारा अस्पताल जाना पड़ेगा या घर पर उसकी हालत और बिगड़ जाएगी।

एक प्रशिक्षित देखभाल करने वाला व्यक्ति मरीज़ में होने वाले बदलावों को देख सकता है, बेहतर सवाल पूछ सकता है, निर्देशों का सही ढंग से पालन कर सकता है और टाली जा सकने वाली जटिलताओं को रोकने में मदद कर सकता है। इसमें मुख्य भूमिका तो स्वास्थ्यकर्मी की ही होती है, लेकिन परिवार एक बेहतर सहयोगी बन जाता है।

इस बारे में क्या किया जा सकता है या इसके क्या उपाय हो सकते हैं, इस बारे में कुछ भारतीय संगठन पहले से ही काम कर रहे हैं। नूरा हेल्थ केयर कंपेनियन प्रोग्राम अक्सर सार्वजनिक अस्पतालों से डिस्चार्ज होने से पहले ही मरीज़ों और उनके परिवार के सदस्यों को व्यावहारिक, सांस्कृतिक रूप से सही कौशल का प्रशिक्षण देता है। पैलियम इंडिया ने घर पर किए जाने वाले तथा उपशामक देखभाल (palliative care) के लिए प्रशिक्षण सामग्री और वीडियो विकसित किए हैं। केयरगिवर साथी देखभाल के भावनात्मक और समाज-मनोवैज्ञानिक भार पर काम करता है। नई दिशा विकासात्मक अक्षमताओं वाले बच्चों के परिवारों को जानकारी, अधिकार-आधारित मार्गदर्शन और मिल-जुल कर काम करने से जुड़ी सहायता हासिल करने में मदद करती है। केरल का उपशामक देखभाल अनुभव दिखाता है कि कैसे सामुदायिक वोलंटियर अलगाव को कम कर सकते हैं और परिवारों की सहायता कर सकते हैं। भले ही यह अलग-अलग जगहों के उदाहरण हैं, लेकिन इनसे हमें एक ही बात का पता चलता है कि देखभाल करने वालों को जब पहचान, प्रशिक्षण, संपर्क और समर्थन मिलता है, तो वे बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

स्वास्थ्यकर्मियों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। देखभाल करने वालों की सहायता करने को नर्सों, डॉक्टरों, आशा कार्यकर्ताओं या सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं पर एक और बोझ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अगर इस काम को सही तरीक़े से किया जाए, तो ये उनके काम को आसान बना सकता है। एक प्रशिक्षित देखभाल करने वाला व्यक्ति मरीज़ में होने वाले बदलावों को देख सकता है, बेहतर सवाल पूछ सकता है, निर्देशों का सही ढंग से पालन कर सकता है और टाली जा सकने वाली जटिलताओं को रोकने में मदद कर सकता है। इसमें मुख्य भूमिका तो स्वास्थ्यकर्मी की ही होती है, लेकिन परिवार एक बेहतर सहयोगी बन जाता है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता केंद्रीय भूमिका में रहता है, लेकिन परिवार एक बेहतर भागीदार और साथी बन जाता है।

सोच में बदलाव – यह पहला क़दम है। हमें मरीज़ के परिवार को सिर्फ़ मरीज़ को आकर देखने-मिलने वाले, मरीज़ की सेवा करने वाले या उसे दूर से देखने वाले मानना बंद करना होगा। यही लोग अक्सर बेहतर ढंग से लगातार देखभाल करते हैं। अगर हम उन्हें अच्छी तरह से प्रशिक्षित करें, उन पर पड़ने वाले काम के बोझ को कम करें और उनकी भूमिका का सम्मान करें, तो वे स्वास्थ्य सिस्टम का परदे के पीछे रहकर काम करने वाला एक शक्तिशाली हिस्सा बन सकते हैं।

दूसरा क़दम है – परिवार के भीतर देखभाल करने वालों की भूमिकाओं को औपचारिक रूप देना। इसके तहत एक ऐसा दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के स्वास्थ्य सिस्टम निर्माण खंडों (https://l1nk.dev/gsnd6l2) में से कई को मज़बूत करने में मददगार हो सकता है। हालांकि, लैंगिक चिंता भी एक ऐसी समस्या है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। देखभाल का ज़्यादातर अवैतनिक काम महिलाओं द्वारा किया जाता है। देखभाल करने वालों को औपचारिक मान्यता देने से महिलाओं के अदृश्य श्रम की मांग और ज़्यादा नहीं बढ़नी चाहिए। इससे बोझ कम होना चाहिए, ज़िम्मेदारी आपस में बंटनी चाहिए, काम में एक-दूसरे का हाथ बंटाया जाना चाहिए और जहाँ ज़रूरत हो, वहाँ वित्तीय या सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। भारत में पहले से ही कुछ छिटपुट उदाहरण मौजूद हैं, जैसे जीवन रक्षक उपकरणों का उपयोग करने वाले परिवारों के लिए सहायता और कुछ विशेष स्थितियों के लिए देखभाल करने वालों को भुगतान किया जाना। इन्हें सिर्फ़ कल्याणकारी योजनाओं की तरह ही नहीं देखा जाना चाहिए। इन्हें स्वास्थ्य सिस्टम के लक्ष्यों से जोड़ा जा सकता है, ख़ासकर जहाँ देखभाल करने वालों की मदद से जटिलताओं और दोबारा भर्ती होने या टाले जा सकने वाली संस्थागत देखभाल को रोका जा सकता है।

भारत को देखभाल की व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए एक आदर्श स्वास्थ्य कार्यबल के तैयार होने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है। इसकी शुरुआत उन लोगों को मज़बूत करके की जा सकती है, जो पहले से ही देखभाल का काम कर रहे हैं।