मीरा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक नर्स के रूप में काम करती हैं। उन्होंने काली नाम की एक 4 साल की बच्ची का परीक्षण किया। काली को पिछले तीन दिनों से तेज़ बुख़ार है। मीरा ने मलेरिया की जांच की और 15 मिनट के भीतर ही रोग की पुष्टि हो गई। जब मीरा ने काली का वजन और ऊंचाई मापा, तो पता चला वह गंभीर रूप से कुपोषण की शिकार है।
मीरा में डॉक्टर को बुलाया। दोनों ने साथ मिलकर उस बच्ची के इलाज की योजना बनायी। काली को खाने वाली दवाओं और थेराप्यूटिक फूड (एक प्रकार का पोषणयुक्त चिकित्सीय आहार) देकर घर भेज दिया गया। दो दिन बाद काली की हालत जांचने के लिए, उसे फिर से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केंद्र लाया गया। तब तक उसका बुखार उतर चुका था और उसे भूख भी लग रही थी। दो दशक पहले ऐसी कल्पना करना बेहद मुश्किल था।
एक तरह से यह कहा जा सकता है कि इसकी शुरुआत सन् 1978 में सोवियत संघ के अल्मा अता में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा विषय पर हुए, एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से हुई। इसी सम्मेलन से अल्मा अता का ऐतिहासिक घोषणापत्र हमारे सामने आया।
इस घोषणापत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को एक ऐसी बुनियादी स्वास्थ्य सेवा के रूप में परिभाषित किया गया, जो कि व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक हो। जिसमें सामाजिक रूप से स्वीकार्य विधियों और तकनीकों का प्रयोग किया गया हो। साथ ही यह समुदाय के लोगों तथा परिवारों के लिए सार्वभौमिक रूप से सुलभ हो। इस प्रक्रिया में उनकी पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित की जा सके तथा समुदाय और देश की क्षमता के अनुसार ये सेवाएं सबके लिए सुलभ हों।
इस घोषणा के बाद सस्ती और सुलभ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा और इसका परिणाम यह हुआ कि दूरदराज़ के इलाकों में भी स्वास्थ्य सेवाएँ पहले की तुलना में काफी बेहतर हो गईं।
जिस दौर में यह घोषणापत्र जारी हुआ था, उस समय मलेरिया की जाँच माइक्रोस्कोपी द्वारा की जाती थी। इस प्रक्रिया में कुछ घंटे या ज्यादातर मामलों में कुछ दिन लग जाते थे। जिस कारण अक्सर इलाज में देरी हो जाती थी। जिससे अन्य जटिल समस्याएं उत्पन्न हो जाती थीं। गंभीर एनीमिया, लो ब्लड शुगर और यहां तक कि कोमा में चले जाने की भी संभावना बनी रहती थी।
एक समय इस बात पर यकीन करना मुश्किल था कि फाल्सीपेरम मलेरिया से पीड़ित कोई बच्चा स्वास्थ्य केंद्र तक पैदल चलकर आ सकता है। आज हम इसे संभव होते देख रहे हैं।
एक तरह से यह कहा जा सकता है कि इसकी शुरुआत सन् 1978 में सोवियत संघ के अल्मा अता में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा विषय पर हुए, एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से हुई। इसी सम्मेलन से अल्मा अता का ऐतिहासिक घोषणापत्र हमारे सामने आया।
समय के साथ बहुत कुछ बदला है। बेहतर टेलीफोन और इंटरनेट संपर्क के कारण हमारी नर्सें डॉक्टर को कॉल कर पाती हैं और मरीजों की वीडियो साझा कर पाती हैं। इससे रोग का तुरंत पता चल पाता है और समय पर जरूरी इलाज शुरू हो पाता है।
मलेरिया जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए कीटनाशक-युक्त मच्छरदानी और आर्टेसुनेट जैसी नई दवाईयों का प्रयोग किया जाता है।
हमारी प्रबंधन सूचना प्रणाली हमें बीमारियों के प्रकोप के बारे में तुरंत सचेत करती है और जरूरी कदम उठाने में मदद करती है। साल 2024 में जब डायरिया के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी होने लगी, तो हमारी टीम ने सामुदायिक निगरानी की। हमारी टीम ने 6 बस्तियों के 100 घरों का दौरा किया। यहां डायरिया के 86 मामले मिले। उन लोगों के बीच ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ओआरएस) बांटा गया। सभी परिवारों को स्वच्छता और घरेलू देखभाल के लिए सलाह दी गई। इससे समुदायों को सचेत बनाने और बीमारी के प्रकोप को नियंत्रित करने में मदद मिली।
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा में और क्या बदलाव आ रहे हैं?
पहले मधुमेह (Diabetes) और उच्च रक्तचाप (Hypertension) के मामले ज्यादातर शहरी लोगों में मिलते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब तो दक्षिणी राजस्थान के दूरदराज के गांवों में भी लोग ‘शुगर’ और ‘बीपी’ जैसी बीमारियों से परिचित हैं और किसी न किसी को जानते हैं जो इन बीमारियों से पीड़ित है।
इन बीमारियों की निगरानी भी समय के साथ बदली है। डिजिटल बीपी मशीन और आसानी से इस्तेमाल होने वाले ग्लूकोमीटर की उपलब्धता ने घर पर ही स्वास्थ्य की निगरानी को संभव बना दिया है।
टाइप 1 डायबिटीज़ के इलाज के लिए नए तरीक़े, जैसे बेसल-बोलस पद्धति और विभिन्न प्रकार की इंसुलिन की उपलब्धता ने उपचार को सरल बना दिया है। अब इंसुलिन देने का समय, कब खाना है और क्या खाना है- इन सब पर पहले जैसी कठोर पाबंदियाँ नहीं रहीं। इससे प्रभावित बच्चों को काफी राहत मिली है।
इन बीमारियों के इलाज के क्षेत्र में भी काफी तरक्की हुई है। 1978 में बहुत कम रोगों के लिए टीके उपलब्ध थे। जबकि आज निमोनिया, दस्त और मैनिंजाइटिस जैसी बचपन में होने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए पर्याप्त टीके उपलब्ध हैं।

डिप्थीरिया और पोलियो जैसी बीमारियों में कमी आई है। लेकिन कोरोना, डेंगू, और चिकनगुनिया जैसी नई बीमारियों का उदय भी हुआ है। हालांकि मुख्य रूप से गरीबों को प्रभावित करने वाली टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियों की रोकथाम के लिए अभी भी प्रभावी टीके उपलब्ध नहीं हैं।
प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के दायरे में आने वाली सुविधाओं की विविधता लगातार बढ़ रही है। पिछले 12 वर्षों में हमारे कामकाज से पता चलता है कि पोषण (विशेष रूप से कुपोषित बच्चों और टीबी से पीड़ितों के लिए), व्यावसायिक स्वास्थ्य (इसमें टीबी और सिलिकोसिस प्रमुख बीमारियां हैं), मानसिक स्वास्थ्य और फिजियोथेरेपी (स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और उपचारात्मक देखभाल के लिए भी) के क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की सेवाएं उपलब्ध हैं।
हमारे लिए सबसे नया प्रयास है नर्सों और दाइयों में प्रेरणा और नेतृत्व का विकास करना। इससे स्वास्थ्य सेवाओं में विभिन्न जेंडर पहचानों से आने वाले लोगों की भागीदारी बढ़ी है। उम्मीद के अनुसार ही शुरुआती समय की तुलना में अब हमारी टीम कहीं अधिक विविध हो गई है।
इन बीमारियों के इलाज के क्षेत्र में भी काफी तरक्की हुई है। 1978 में बहुत कम रोगों के लिए टीके उपलब्ध थे। जबकि आज निमोनिया, दस्त और मैनिंजाइटिस जैसी बचपन में होने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए पर्याप्त टीके उपलब्ध हैं।

हम मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों के बीच सामुदायिक स्वास्थ्य कार्य के जरिये काम करते हैं। हमारे क्लिनिक (जिन्हें अमृत क्लिनिक कहा जाता है) दक्षिणी राजस्थान के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में स्थित हैं। यहाँ और इसी तरह के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का विकास हो जाने के कारण रेफरल चिकित्सीय सेवा की जरूरत वाले मरीजों के इलाज की संभावनाएं बढ़ी हैं। इसी तरह, इंटरनेट की उपलब्धता के कारण एक फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ता डॉक्टरों से सलाह करने और सुझाव लेने में सक्षम हो पायी हैं।
हमारे क्लिनिक की प्राथमिक सेवा के अंतर्गत नर्सों ने मुश्किल घड़ी में व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिये प्रसव संबंधी जटिलताओं, डायबिटीज़ की गम्भीर स्थितियों और फेफड़ों की पुरानी बीमारी जैसे मामलों में भी उचित चिकित्सीय सहायता प्रदान की है। वे बीमार मरीजों ही हालत स्थिर करने के बाद उन्हें शहर के अस्पतालों में ले जाने में भी सफल रही हैं। दो दशक पहले खराब सड़कों के कारण यह संभव नहीं था।
विशेष रूप से नर्सों को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल देने के लिए उपयुक्त एवं कुशल गैर-चिकित्सक मिड-लेवल स्वास्थ्य प्रदाताओं को अधिक स्वीकृति मिली है। पिछले दो दशकों में योग्य नर्सों के प्रशिक्षण और उपलब्धता में भारी वृद्धि देखी गई है। सबसे अधिक वंचित और दूरदराज के इलाकों में भी इसका असर दिखता है।
हमारे अपने अनुभव ने यह दिखाया है कि जब नर्सों को उचित कौशल, अधिकार और सहयोग दिया जाता है, तो वे संवेदनशील और गुणवत्तापूर्ण देखभाल प्रदान करती हैं। ग्रामीण समुदायों से आने वाली नर्सें दूरदराज के समुदायों में अधिक आसानी से घुलमिल कर काम कर सकती हैं और आसानी से मरीजों का विश्वास भी जीत सकती हैं।
अल्मा अता के बाद से व्यावहारिक, सामाजिक रूप से स्वीकार्य और वैज्ञानिक रूप से सही स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा काफी बढ़ा है। हालांकि, ये स्वास्थ्य सेवाएं सार्वभौमिक रूप से सबके लिए उपलब्ध हों, ये अभी भी एक अधूरा सपना है।
हमारे क्लिनिक की प्राथमिक सेवा के अंतर्गत नर्सों ने मुश्किल घड़ी में व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिये प्रसव संबंधी जटिलताओं, डायबिटीज़ की गम्भीर स्थितियों और फेफड़ों की पुरानी बीमारी जैसे मामलों में भी उचित चिकित्सीय सहायता प्रदान की है।
इन संभावनाओं के बावजूद, ग्रामीण और शहरी, अमीर और गरीब, तथा विशेषाधिकार प्राप्त और वंचित जातियों के बीच स्वास्थ्य परिणामों में अब भी भारी असमानताएँ बनी हुई हैं। उदाहरण के लिए, आदिवासी आबादी में टीबी के मामले दूसरे समूहों की तुलना में लगभग 4 गुना अधिक मिलते हैं। ग्रामीण गरीब लोग शहरी धनी लोगों की अपेक्षा एक दशक कम जीवन जीते हैं।
हम अपने इलाकों में देखते हैं कि किफायती, गुणवत्तापूर्ण और जिम्मेदार स्वास्थ्य सेवा की कमी के कारण कई लोग आसानी से संभाली जा सकने वाली बीमारियों पर हजारों रुपये खर्च कर देते हैं। इस प्रक्रिया में अपनी संपत्ति और गरिमा दोनों खो बैठते हैं।
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चिकित्सकों और स्वास्थ्य सेवा में काम करने वालों दूसरे लोगों के मंच से हम अक्सर सुनते हैं कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो केवल “छोटी-मोटी बीमारियों” का इलाज करने की जगह है। कुछ लोग अफ़सोस जताते हैं कि यहाँ काम करने से उन्हें “रोमांच या उत्साह” महसूस नहीं होता, इसलिए वे बड़े अस्पतालों में काम करना ज़्यादा पसंद करते हैं।
हमारा अनुभव इसके बिल्कुल उलट है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा नवाचारों और रोमांच से भरी संभावनाओं का एक गहरा समंदर है। यह उन लोगों के स्वास्थ्य में बड़ा बदलाव लाती हैं, जो अक्सर समाज की नज़रों से ओझल रहते हैं और सम्मानजनक देखभाल के दायरे से बाहर रह जाते हैं।
इन संभावनाओं के बावजूद, ग्रामीण और शहरी, अमीर और गरीब, तथा विशेषाधिकार प्राप्त और वंचित जातियों के बीच स्वास्थ्य परिणामों में अब भी भारी असमानताएँ बनी हुई हैं।
हम आपको इस रोमांचकारी और सार्थक यात्रा का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित करते हैं!
