भारत उन देशों में से एक है, जो स्वास्थ्य का सबसे ज्यादा बोझ उठाते हैं। यह बोझ नया या सांयोगिक नहीं है। इसकी जड़ें हमारे इतिहास, भूगोल और संस्कृति से जुड़ी हुई हैं तथा बढ़ते शहरीकरण, बदलते खान-पान और घटती शारीरिक गतिविधि ने भी इसे आकार दिया है।
इस कहानी में नमक की भूमिका हमेशा रही है। छत्तीसगढ़ जैसे भारत के अंदरूनी इलाकों में नमक बहुत मुश्किल से पहुँचता था। वहां बसे आदिवासियों ने सदियों से नमक की बड़ी कम मात्रा पर गुजारा किया है। उनके शरीर ने खुद को इस कमी के हिसाब से ढाल लिया था। लेकिन नमक से भरपूर आज की दुनिया में अपने इतिहास के चलते उच्च रक्तचाप (hypertension) का खतरा उनके लिए खासतौर पर बढ़ गया है। पश्चिम बंगाल में अकाल की यादें अब भी लोगों के शरीर से चिपकी हुई हैं। जिन परिवारों ने बार-बार अकाल का सामना किया उनकी अगली पीढ़ियों की पाचन-प्रक्रिया ही बदल गई। अकाल ख़त्म हो गया लेकिन अब उनमें से कईयों के शरीर में इन्सुलिन बहुत कम बनता है। नतीजा है मधुमेह (diabetes), वह भी ब्लड प्रेशर बढ़े बिना।
जिन परिवारों ने बार-बार अकाल का सामना किया उनकी अगली पीढ़ियों की पाचन-प्रक्रिया ही बदल गई। अकाल ख़त्म हो गया लेकिन अब उनमें से कईयों के शरीर में इन्सुलिन बहुत कम बनता है।
स्वास्थ्य के दूसरे बोझ भी स्थान और इतिहास से जुड़े हुए हैं। पान और सुपारी चबाने की पुरानी आदतों और तंबाकू के नियमित इस्तेमाल की आज की आदतों का मिश्रित प्रभाव मुंह के कैंसर में दिखाई देता है। गंगा के मैदानी इलाकों में गालब्लैडर (पित्ताशय) कैंसर के काफी मामले मिलते हैं। हिमालय के आर्सेनिक का पानी में मिल जाना तथा धीमी गति से बहती नदियों और स्थिर तालाबों से बार-बार होने वाला संक्रमण इसका कारण है। पूर्वोत्तर में नेसोफेरिन्जल (nasopharyngeal) कैंसर फर्मेंटेड भोजन, खाने के जलावन से निकले धुंवे और बार-बार होने वाले वायरल संक्रमण से जुड़ा हुआ है। शहरों में परिवार के छोटे आकार, देर से बच्चे करने और गतिहीन जीवन शैली के कारण स्तन और प्रोस्टेट कैंसर, मधुमेह और उच्च रक्तचाप की बीमारियाँ ऐसी तेजी से बढ़ रही हैं, जैसी भारत में पहले कभी नहीं देखी गई।
परम्परा और आधुनिकता के मेल के चलते भारत इतिहास के एक खास मोड़ पर खड़ा है। भारत में अधिकांश लोग दुबले-पतले हैं। उनमें मोटापे की वह समस्या नहीं है, जिसे दूर करना काफी मुश्किल है। राजस्थान जैसे राज्यों में लोग काफी मेहनत करते हैं, साबुत अनाज खाते हैं और तेल कम इस्तेमाल करते हैं। इसलिए इनमें से ज्यादातर बीमारियाँ वहां नहीं पहुंची हैं। यह हमें समय रहते उचित कदम उठाने और चीजों को “ठीक करने” का मौका देता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के बिल्डिंग ब्लॉक्स और “कंट्रोल नॉब्स” मॉडल जैसे वैश्विक ढाँचे जरूरी साधन प्रदान करते हैं। फाइनेंसिंग, संचालन, दवाएं और सेवाओं का पुनर्निर्माण उनके दायरे में आता है। भारत को इन सबकी जरूरत है। लेकिन जब बिमारी की जड़ें इतिहास, संस्कृति, पारिस्थितिकी और नए शहरी जोखिमों में निहित हों; तब हमें सार्वजनिक स्वास्थ्य के सभी साधनों – सेवाओं का पुनर्निमाण, आर्थिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षमता, पेड़-पौधों और जानवरों के परस्पर सम्बन्ध, सामाजिक नीतियों और सांस्कृतिक परिवर्तनों – का इस्तेमाल करना चाहिए।
जिन परिवारों ने बार-बार अकाल का सामना किया उनकी अगली पीढ़ियों की पाचन-प्रक्रिया ही बदल गई। अकाल ख़त्म हो गया लेकिन अब उनमें से कईयों के शरीर में इन्सुलिन बहुत कम बनता है।
सेवाओं का पुनर्निर्माण एक महत्त्वपूर्ण साधन है। उदाहरण के लिए, उड़ीसा के तटीय क्षेत्र में माँ और शिशु के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। लेकिन उच्च रक्तचाप और मधुमेह की बीमारी बढ़ रही है। यहाँ अच्छी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और बेहतर शहरी डिजाइन (सार्वजनिक पहिवहन सुविधाओं से जुड़े फुटपाथ और ऊँची इमारतों के बीच पर्याप्त दूरी) की जरूरत है। इस राज्य के ट्राइबल जिलों में सी-सेक्शन की दर बहुत कम है और बौनेपन की समस्या बनी हुई है। वहां अस्पतालों, ऑपरेशन थियेटर और आपातकालीन मेडिकल सुविधाओं की जरूरत है। पश्चिम बंगाल जैसी जगह जहाँ मधुमेह अक्सर उच्च रक्तचाप के बिना दिखाई देता है, वहां परीक्षण की सूक्ष्म और बेहतर रणनीतियों तथा इन्सुलिन के शुरुआती इस्तेमाल की जरूरत है।
अस्पताल और आर्थिक सुरक्षा भी बहुत जरूरी है। कैंसर के पैटर्न इसकी वजह बताते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में गालब्लैडर कैंसर के इलाज़ के लिए विशेष सुविधाओं की जरूरत है। गुजरात और महाराष्ट्र में मुंह के कैंसर के लिए स्थानीय संस्कृति के लिहाज से ढले कार्यक्रमों की आवश्यकता है। मिजोरम और नागालैंड को स्वच्छ-ईंधन योजनाओं और लक्षित जांच की जरूरत है। दिल्ली और मुंबई को स्तन और प्रोस्टेट कैंसर से जुड़े ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता है, जो जीवनशैली के परिवर्तन, प्रदूषण और प्रजनन पैटर्न में आए फर्क पर ध्यान दें।

जब बिमारी की जड़ें इतिहास, संस्कृति, पारिस्थितिकी और नए शहरी जोखिमों में निहित हों; तब हमें सार्वजनिक स्वास्थ्य के सभी साधनों – सेवाओं का पुनर्निमाण, आर्थिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षमता, पेड़-पौधों और जानवरों के परस्पर सम्बन्ध, सामाजिक नीतियों और सांस्कृतिक परिवर्तनों – का इस्तेमाल करना चाहिए।
दूसरे बदलाव ज्यादा समय लेंगे लेकिन, वे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। तंबाकू चबाने, ज्यादा नमक खाने या फर्मेंटेड भोजन करने जैसी आदतें बहुत गहरे में पहचान (identity) से जुड़ी हुई हैं। ये तभी बदलेंगी जब नई आदतें रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाएंगी – विद्यालय के भोजन, महिला समूहों और स्थानीय नेताओं के जरिये ये किया जा सकता है। पश्चिम बंगाल में महिलाओं के व्रत की परंपराएं और टीनएज गर्भ धारण की उच्च दर पोषण सम्बन्धी कमी का कारण है। इन सांस्कृतिक चीजों पर भी पुनर्विचार किया जाना चाहिए। केरल और तमिलनाडु में शारीरिक गतिविधियों की संस्कृति को फिर से जिन्दा करने की जरूरत है।
Subscribe to stay connected
We will send you a monthly newsletter listing all the articles that were published in the month.
भारत के पास बारीकी से काम करने का मौका है। इसका मतलब है, स्वास्थ्य बोझ के अनुसार कार्यक्रम बनाना, हर माध्यम का इस्तेमाल करना और त्वरित समाधान को दीर्घकालिक बदलावों के साथ जोड़ना। हर जगह हर चीज़ लागू करना या एक जगह के कार्यक्रम को दूसरी जगह लागू करना इसका उपाय नहीं है। सवाल बारीकी का है – बीमारी के अनुसार डिजाइन तैयार करने और बीमारी को इतिहास, भूगोल और संस्कृति से जोड़कर देखने का है।
तंबाकू चबाने, ज्यादा नमक खाने या फर्मेंटेड भोजन करने जैसी आदतें बहुत गहरे में पहचान (identity) से जुड़ी हुई हैं। ये तभी बदलेंगी जब नई आदतें रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाएंगी
