भारत में लगभग 6 लाख लोग ऐसे हैं, जो सड़कों पर रहते हैं और गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिन्हे कोई उपचार नहीं मिल पाता। यह संख्या सरकारी अनुमान से कहीं अधिक है। जनगणना के अनुसार केवल कोलकाता में ही लगभग 69,000 बेघर लोग हैं, पर वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रस्त लोगों को अक्सर गिना ही नहीं जाता।
सरबानी अपने उस सफ़र को याद करती हैं, जब वे कॉर्पोरेट जीवन से निकलकर कोलकाता की सड़कों पर पहुँचीं, जहाँ एक अकेली घटना ने सब कुछ बदल दिया। एक दिन उन्होंने मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी के पास एक युवक को कचरे के डिब्बे से खाना खाते देखा, जबकि पास ही मुफ़्त भोजन बाँटा जा रहा था। वही क्षण उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बना। इसी अनुभव ने उन्हें मनोचिकित्सक डॉ. के. एल. नारायणन के साथ मिलकर ‘ईश्वर संकल्प’ की स्थापना के लिए प्रेरित किया। संगठन की मूल सोच साफ़ थी- लोग जहाँ भी हैं, इलाज उन तक पहुँचना चाहिए, न कि लोगों को ज़बरदस्ती चिकित्सालयों में भेजा जाए।
बातचीत के दौरान सरबानी बताती हैं कि लगभग 35% बेघर लोग मानसिक बीमारी या उसके साथ ही नशे से पीड़ित होते हैं। तब भी उन तक देखभाल बहुत कम ही पहुँचती है। अस्पतालों और आश्रय स्थलों के बजाय, ‘ईश्वर संकल्प’ ने सड़कों पर ही देखभाल का मॉडल विकसित किया। सड़क किनारे के चायवाले देखभाल करने लगे। मोहल्ले वाले सहारा बने। यहाँ अस्पतालों और आश्रय स्थलों की चारदीवारी से ज़्यादा विश्वास मायने रखता था, और कई बार चिकित्सीय उपचार से पहले ही सामाजिक पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू हो जाती थी।
यह एपिसोड उस लंबी प्रक्रिया को भी दर्शाता है, जिसने राज्य को उन सच्चाइयों को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया, जिन्हें वह नज़रअंदाज़ करता रहा था। पुलिस थाने कभी देखभाल की जगह नहीं माने जाते थे, लेकिन सरबानी के आग्रह पर उन्हें यह भूमिका निभानी पड़ी। सरकारी दफ्तरों ने उन्हें बार-बार लौटा दिया, पर निरंतर प्रयास और कानूनी समझ के बल पर धीरे-धीरे दरवाज़े खुलने लगे। समय के साथ व्यवस्था में बदलाव आया और उन लोगों के लिए जगह बनी, जो लंबे समय से हर जगह ठोकर खाकर गिरते रहे थे।
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एक निर्णायक क्षण तब आया, जब सरबानी ने ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को पत्र लिखकर उनसे बेघर और मानसिक रूप से बीमार लोगों के साथ खड़े होने का आग्रह किया। उन्होंने तुरंत उत्तर दिया- “मैं आऊँगा।” उनकी उपस्थिति ने सब बादल दिया, और संस्थानों के लिए अब अनदेखी करना संभव नहीं रहा। यह केवल मानसिक स्वास्थ्य की कहानी नहीं है।
यह गरिमा, अपनापन और उस देखभाल की कहानी है। ये तब पैदा होती है, जब लोग आगे बढ़कर ज़िम्मेदारी लेते हैं। अब पूरा एपिसोड देखें।
