चुपचाप निकल जाते कर्मचारी: भारत की कार्यस्थल नीति में रजोनिवृत्ति-पूर्व अवस्था को शामिल करना क्यों ज़रूरी है

पेरिमेनोपॉज़ यानीरजोनिवृत्ति-पूर्व अवस्था में महिलाओं को गहरी शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियाँ का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद, ज़्यादातर मामलों में राष्ट्रीय स्तर की नीति बनाने की प्रक्रिया के दौरान इसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। भारत को व्यापक स्तर की ऐसी नीति और कार्यस्थल पर लागू किए जाने वाले ढाँचे की ज़रूरत है, जो संगठित एवं असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को इस ख़ास बदलाव के दौर में मदद कर सके।

चुपचाप निकल जाते कर्मचारी: भारत की कार्यस्थल नीति में रजोनिवृत्ति-पूर्व अवस्था को शामिल करना क्यों ज़रूरी है

भारत में हर साल लगभग 30 लाख महिलाएँ रजोनिवृत्ति-पूर्व अवस्था (पेरिमेनोपॉज़) में प्रवेश करती हैं। यह रजोनिवृत्ति यानी महावारी पूरी तरह बंद हो जाने (मेनोपॉज़) से पहले का बदलाव का दौर होता है, जब शरीर में हार्मोनल बदलाव आते हैं और जिससे अक्सर हार्मोनल असंतुलन के हालात पैदा होते हैं। यह कोई एक छोटी-मोटी घटना नहीं है, बल्कि एक यह प्रक्रिया अगले कई वर्षों तक भी चल सकती है। इस वजह से अचानक से गर्मी लगना (हॉट फ्लैशेज़), रात में पसीना आना, सोचने-समझने में दिक्कत होना (ब्रेन फॉग), मूड में उतार-चढ़ाव, जोड़ों में दर्द, नींद में खलल, बेचैनी और बहुत ज़्यादा या अनियमित ब्लीडिंग होना जैसी 30 से अधिक समस्याएँ हो सकती हैं।

भारत में 40 से 55 वर्ष की उम्र की लगभग आधी महिलाएँ किसी-न-किसी तरह के वेतन भोगी काम करती हैं। इस उम्र के दायरे की महिलाएं ठीक रजोनिवृत्ति-पूर्व अवस्था के दौर में होती हैं।

हालाँकि, ज़्यादातर महिलाओं को प्राकृतिक रूप से एक ख़ास उम्र में ही रजोनिवृत्ति होती है। लेकिन, एक अध्ययन से ये पता चला है कि महिलाओं में समय से पहले रजोनिवृत्ति (प्रीमेच्योर मेनोपॉज़) की अवस्था की बढ़ोतरी देखने में आयी है। ख़ासकर, सबसे कम शिक्षित महिलाओं में ये पाया गया है, जिसकी मुख्य वजह जल्दी हिस्टेरेक्टोमी (गर्भाशय निकालने का ऑपरेशन) करवाना है (1)। जल्दी और अचानक रजोनिवृत्ति होने से हार्मोन बनना अचानक से बंद हो जाता है और रजोनिवृत्ति के लक्षण उभरकर सामने आने लगते हैं। ज़्यादातर महिलाओं के लिए रजोनिवृत्ति का दौर बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। बल्कि, ये एक ऐसी समस्या है, जो जिसका सामना उन्हें अपने बेडरूम से काम करने की जगह तक और रसोई से कॉन्फ्रेंस कॉल तक करना पड़ता है।

इस बारे में, दुनिया भर से मिले आँकड़े काफ़ी चिंताजनक पैटर्न सामने लाते हैं। इन आँकड़ों के मुताबिक 10-13% तक महिलाएँ रजोनिवृत्ति-पूर्व या रजोनिवृत्ति के लक्षणों की वजह से अपना रोज़गार गँवाने पर मजबूर होती हैं।

रजोनिवृत्ति-पूर्व अवस्था महिलाओं की जिंदगी के उन बदलावों में से एक है, जिस पर सबसे कम ध्यान दिया जाता है। ये चीज़ें न सिर्फ बातचीत में, बल्कि उन सभी जगहों पर उनके रोज़मर्रा की जिंदगी को बनाती-बिगाड़ती देती हैं, जहाँ वे काम करती या रहती हैं: उनका परिवार, उनका समुदाय, वह स्वास्थ्य प्रणाली जिस पर वे निर्भर हैं और वह कार्यस्थल जहाँ वे लगभग हर दिन अपना एक तिहाई समय बिताती हैं।

इस चुप्पी की असल जीवन में आर्थिक कीमत चुकानी पड़ती है। भारत में 40 से 55 वर्ष की उम्र की लगभग आधी महिलाएँ किसी-न-किसी तरह के वेतन भोगी काम करती हैं। इस उम्र के दायरे की महिलाएं ठीक रजोनिवृत्ति-पूर्व अवस्था के दौर में होती हैं। (2)। इसका एक उदाहरण भारत की 23 लाख से ज़्यादा आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। जिनकी भर्ती 18-35 वर्ष की उम्र में की गई थी और अब वे 40 वर्ष से ज़्यादा आयु की हो चुकी हैं (3,4)। यहाँ तक आते-आते ये महिलाएँ अपने काम में सिर्फ़ माहिर ही नहीं, काम के अनुभव के परिपक्वता के दौर में होती हैं। अक्सर, वे नेतृत्व या टीम लीडर जैसे के पदों पर होती हैं, युवा सहयोगियों का मार्गदर्शन कर रही होती हैं और परिवार को आर्थिक रूप से संभाल रही होती हैं। फिर भी, इस बात का कोई विश्वसनीय और व्यवस्थित डेटा नहीं है, इस दौरान वे काम पर किन हालातों का सामना कर रही हैं।

इस बारे में, दुनिया भर से मिले आँकड़े काफ़ी चिंताजनक पैटर्न सामने लाते हैं। इन आँकड़ों के मुताबिक 10-13% तक महिलाएँ रजोनिवृत्ति-पूर्व या रजोनिवृत्ति के लक्षणों की वजह से अपना रोज़गार गँवाने पर मजबूर होती हैं।(5) यह कोई आम और छोटा आँकड़ा नहीं है। इसे एक बड़े फलक पर समझे तो यह अर्थव्यवस्था से कुशल और अनुभवी टैलेंट का एक बड़ा और काफी हद तक अनदेखा नुकसान है। यह एक ऐसा नुकसान है, जो आधिकारिक एट्रिशन रिपोर्टों (कर्मचारियों के नौकरी छोड़कर जाने की रिपोर्ट) में कहीं दर्ज नहीं होता। क्योंकि, “रजोनिवृत्ति” को शायद ही कभी नौकरी छोड़ने की वजह की तरह उद्धृत किया जाता है। महिलाएँ चुपचाप नौकरी छोड़कर चली जाती हैं। वे अक्सर अपने नौकरी छोड़ने का कारण “पारिवारिक समस्या” या “स्वास्थ्य समस्याएँ” बताती हैं। ये ऐसे शब्द हैं जो असल वजह को छिपा देते हैं – एक ऐसी वजह जिसे साफ़ तौर पर बताया जा सकता है और जिसका समाधान किया जा सकता है।

इस समस्या का एक हिस्सा चिकित्सा संबंधी है। रजोनिवृत्ति-पूर्व और रजोनिवृत्ति के लक्षणों के प्रबंधन के लिए सबसे प्रभावी हस्तक्षेपों में से एक हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) है। शुरूआती गलत शोध के कारण वह कई दशकों तक चलन से बाहर चला गया, क्योंकि उस शोध कार्य में इसके ख़तरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था। उस शोध की बाद से, इस मामले पर दोबारा शोध किया गया। इस दोबारा शोध में इसकी जांच की गई और उसे सही संदर्भों में समझने की कोशिश की गई है। HRT कई महिलाओं के लिए एक सही और साक्ष्य-आधारित विकल्प के रूप में फिर से उभरा है। जो जीवन की गुणवत्ता, नींद, सोचने-समझने की क्षमता और भावनात्मक स्थिरता में सार्थक सुधार ला सकता है। यह बदलाव मायने रखता है। लेकिन, सिर्फ चिकित्सीय समाधान इस समस्या का हल नहीं है, सामाजिक और कार्यस्थल के ढाँचे से जुड़ी समस्याओं को भी हल करना बेहद ज़रूरी है।

अचानक से गर्मी लगने और बार-बार टूटने वाली नींद की समस्या से जूझ रही महिलाओं को अक्सर एक ऐसे कार्यस्थल पर जाना पड़ता है, जो उनके शरीर की जरूरतों को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया — जहाँ हाजिरी को लेकर सख़्त नियम होते हैं, तापमान नियंत्रण में नहीं होता है। साथ ही, ऐसे सहकर्मी और प्रबंधक हैं, जिन्हें इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं होता कि वह (महिला) किस दौर से गुज़र रही है।

यहाँ पर नीतियाँ कारगर हो सकती हैं, चिकित्सीय इलाज नहीं।

इस बारे में, अच्छी बात यह है कि इसके उपाय किए भी जा सकते हैं और वे बहुत महंगे भी नहीं हैं। ‘कार्यस्थल संबंधी रजोनिवृत्ति नीति’ बनाने के मामले में अभी दुनिया में सबसे आगे अमेरिका है। उनका दृष्टिकोण लागू करने योग्य और दूसरी जगहों के लिए भी कारगर मॉडल पेश करता है। कुछ ब्रिटिश नियोक्ताओं द्वारा सुझाए गए और अपनाए गए रजोनिवृत्ति-अनुकूल तरीकों (Menopause-friendly practices) को भारत में काम करने वाले संगठन भी आसानी से अपना सकते हैं (6)।

इस संबंध में संभावित सुझाव हैं:

  • सांगठनिक स्तर पर रजोनिवृत्ति नीति बनाना।
  • रजोनिवृत्ति विषय पर जागरूकता कार्यशाला (ओरिएंटेशन) आयोजित करना: इस मुद्दे पर जानकारी की कमी होने की वजह से, महिलाओं और उनके सहकर्मी प्रबंधकों को रजोनिवृत्ति से जुड़ी बुनियादी बातों के बारे में जानकारी देना ज़रूरी है। यहाँ यह क्या है, यह कब होती है, महिला के शरीर पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है और महिलाएँ इसके बारे में बात करने से क्यों हिचकिचाती हैं जैसी बुनियादी जानकारी से शुरूआत की जा सकती है। इस तरह की चर्चा से इस मुद्दे के बारे में बेहतर जानकारी और समझ विकसित होती है। ताकि, महिलाएं इन लक्षणों को पहचान सके और इन्हें शरीर की सामान्य गड़बड़ी समझकर नज़रअंदाज़ न करें और मैनेजर्स भी इसे काम में ख़राब प्रदर्शन या अरुचि के रूप में न लें।
  • इस संबंध में महिलाओं के बीच बातचीत/चर्चा को बढ़ावा देना आवश्यक है, ताकि वे खुलकर अपनी चिंताओं को व्यक्त कर सकें। इन शारीरिक मानसिक बदलावों के बारे में बात करना उन्हें सामान्य लगे और साथ ही उनकी निजी गोपनीयता/निजता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • ख़ासकर, मुश्किल दिनों में लचीला रुख अपनाते हुए, वर्क-फ्रॉम-होम (घर से काम) की सुविधा देना, कंप्यूटर से ब्रेक लेने की समयावधि को बढ़ाना।
  • महिलाओं को भीड़ से बचने और उनकी यात्रा का समय कम करने के दृष्टिकोण से उनके काम के घंटे को लचीला (flexible work hours) करना।
  • अचानक से तेज़ गर्मी लगने जैसी स्थितियों (हॉट फ्लैशेज़) को हल करने के लिए ठंडी जगह या पर्सनल कुलिंग के साधनों की सुविधा प्रदान करना।
  • कार्यालय में मनोपॉज़ चैंपियन (समर्थक) स्थापित करना, जो इससे संबंधित चुनौतियों के बारे में बात कर सकें और ज़रूरत पड़ने पर सहायता प्रदान कर सकें।
  • जीवन-शैली में बदलाव लाने के लिए अलग से भत्ते की सुविधा देना। इसके लिए जिम की सदस्यता के लिए भत्ता देने जैसी सुविधाएँ दी जा सकती हैं।
  • ऑक्युपेशनल हेल्थ (कर्मचारियों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण को) सुनिश्चित करना।
  • संगठन के डॉक्टरों के पैनल में प्रमाणित रजोनिवृत्ति चिकित्सकों को शामिल करना और महिलाओं को उनसे जोड़ने की सिफारिश करना — स्थानीय रजोनिवृत्ति सोसायटी के साथ मिलकर काम करना।
  • कॉर्पोरेट बीमा कवरेज पर ज़ोर देना, जिसमें कॉस्मेटिक या OPD प्रक्रिया के बजाय एचआरटी (HRT) को एक आवश्यक मानक लाभ के रूप में शामिल किया जाए, जिससे उनका आर्थिक भार (OOP) भी कम हो सके।
  • आयुष्मान भारत योजना में एचआरटी (HRT) कवरेज को शामिल करना।

इनमें से किसी भी उपाय को लागू करने के लिए भारतीय कार्यस्थलों में कोई बहुत बड़े बदलाव की ज़रूरत नहीं है। इसके लिए सबसे पहले इस बात को स्वीकार करने और इस दिशा में आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति होनी चाहिए, कि रजोनिवृत्ति-पूर्व अवस्था को ऑक्युपेशनल हेल्थ का एक मान्य हिस्सा बनाया जाए, जैसे – गर्भावस्था या माता-पिता की छुट्टी को अंततः मान्यता मिली है। एक तरह से कहे तो, नीति नियमावली आमतौर पर अधिक प्रशासनिक होती है: इसमें लक्षणों की पहचान करने हुए HR छुट्टी और घर से काम करने की सुविधा प्रदान करने के लिए नीतियों को संशोधित करना ज़रूरी है। प्रबंधकों को इस बात का प्रशिक्षण देना कि वे शक की निगाह से देखने के बजाय सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करें। जहाँ तक संभव हो इससे जुड़ी सुविधाओं को शामिल करें और मौजूदा स्वास्थ्य कवरेज के भीतर हार्मोन थेरेपी और विशेषज्ञ परामर्श को शामिल करने के लिए बीमाकर्ताओं के साथ मिलकर काम करें।

भारतीय नियोक्ताओं को इसका एक साफ़ व्यावसायिक फायदा भी है। अपने 40 के दशक के आख़िर या 50 के दशक की शुरुआत में एक महिला को नौकरी पर बनाए रखने का मतलब है, दशकों के संस्थागत ज्ञान, ग्राहक संबंधों और मार्गदर्शन क्षमता को बनाए रखना – ये ऐसी अनुभवी कर्मचारी होती हैं, जिनकी जगह भरना अगर असंभव नहीं हो, तो भी फायदेमंद नहीं है। यानी, उसे एक ऐसी स्थिति की वजह से चुपचाप खो देना, जिसे मामूली और कम लागत वाले उपायों से हल किया जा सकता था। यह सिर्फ और सिर्फ कार्यस्थल की ढाँचागत नाकामी है, न कि शरीर से जुड़ी कोई मजबूरी है।

रजोनिवृत्ति-पूर्व अवस्था महिलाओं के सेहत से जुड़ी कोई ऐसी छोटी-मोटी समस्या नहीं है, जिसे कमतर करके आंका जाए और चुपचाप मैनेज कर लिया जाए। यह एक जनसांख्यिकीय वास्तविकता है, जो भारत की कामकाजी महिलाओं के एक बहुत बड़े हिस्से को प्रभावित करती है और वह भी उनके करियर के उस पड़ाव पर प्रभावित करती है, जब उनका योगदान सबसे मूल्यवान होता है। इसे चिकित्सा, नीति और सामान्य कार्यस्थल के संबंधित चर्चा में जगह मिलना चाहिए और ऐसा करके हम महिलाओं पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं। एक अच्छी प्रतिभा को बनाए रखने और आधे कार्यबल (महिलाओं) के साथ बुनियादी सम्मानजनक व्यवहार करने की यह बुनियादी शर्त है।

संदर्भ:

  1. बब्बर, के., सिंह, वी. एंड शिवकामी, एम.राइज़िंग प्रीमैच्योर मेनोपॉज़ एंड वेरिएशन्स बाय एजुकेशन लेवल इन इंडिया. वैज्ञानिक रिपोर्ट्स 14, 18238 (2024)
  2. आर्थिक सर्वेक्षण, 2025-26
  3. राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र पोर्टल, 2026
  4. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण ब्यूरो, 2023
  5. विदाउट सपोर्ट, मेनी मेनोपॉज़ल वर्कर्स आर क्विटिंग देयर जॉब्स, मेगन टेटम, 9 अप्रैल 2024, बीबीसी
  6. क्रिएटिंग एंड वर्किंग इन ए मेनोपॉज़ कॉन्फिडेंट ऑर्गनाइज़ेशन, डॉ॰ लुईस न्यूसन