जन औषधि केंद्र: शहरी हालात

जन औषधि केंद्र सस्ती दरों पर जेनरिक दवाएँ उपलब्ध कराने के लिए हैं। एक अध्ययन में इनके उपयोग, फायदों और कमियों पर विचार गया है।

जन औषधि केंद्र: शहरी हालात

बीना देवी (बदला हुआ नाम) की कमाई का ज्यादातर हिस्सा अपने परिवार की बीमारियों के इलाज पर खर्च हो जाता है। उनकी माली हालत ऐसी है कि अक्सर रात में परिवार के पास बाजरे या चावल की खिचड़ी तक भरपेट खाने को नहीं होती। ज्यादातर पैसों बीमारयों में ही चले जाते हैं। बीना देवी का बेटा आये दिन बीमार रहता है। कभी सर्दी-खांसी तो कभी पेट खराब। उनके ससुर को रोज मधुमेह (diabetes) की दवा लेनी होती है।  

चिकित्सा पर होने वाला ख़र्च परिवार के मासिक बजट का बहुत बड़ा हिस्सा है। मदद के लिए कोई और सहारा भी नहीं बचा है क्योंकि जिनसे भी मांगा जा सकता है, उनसे उन्होंने मांग लिया है। बीना देवी थक चुकी हैं और अपने परिवार के भविष्य को लेकर बेहद चिंतित हैं।  

जन औषधि केंद्र  

बीना देवी के जैसे लोगों की मदद के लिए राज्य सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं। इनमें से एक है- जन औषधि केंद्र। एक ऐसी जगह जहां जेनरिक दवाएं (generic medicines) सस्ती कीमतों पर बेची जाती हैं।  

यह कार्यक्रम 2008 में शुरू किया गया था और बाद में इसका नाम बदलकर प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (PMBJP) कर दिया गया। आज देश भर में 16,400 से अधिक जन औषधि केंद्र संचालित हो रहे हैं। 

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नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) ने हाल ही में असम और राजस्थान के शहरी इलाकों में जन औषधि केंद्रों की प्रभावशीलता की जांच के लिए एक अध्ययन किया।  

अध्ययन में इस बात की जांच की गयी कि क्या परिवार जन औषधि केन्द्रों से दवाइयां खरीदकर पैसे बचा पा रहे हैं। ये ऐसे परिवार थे जिनमें किसी सदस्य कोई पुरानी बीमारी थी। इसी अध्ययन के तहत CMS की टीम ने उन लोगों से भी मुलाकात की जो अपनी दवाइयां जन औषधि केंद्रों से नहीं खरीद रहे थे। यह लेख उसी अध्ययन के कुछ निष्कर्षों पर आधारित है।  

बचत का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव  

आज देश भर में 16,400 से अधिक जन औषधि केंद्र संचालित हो रहे हैं।  

CMS की टीम ने जिन परिवारों का अध्ययन किया, वे परिवार हर महीने औसतन 900 रुपये अपने सदस्यों के इलाज पर खर्च करते थे। इसका आधे से ज्यादा (56%) खर्च सिर्फ दवाओं पर होता था।

नियमित रूप से जन औषधि केंद्रों से दवाएं लेने वाले परिवारों ने दवाएं सस्ती होने के कारण हर महीने औसतन 550 रुपये की बचत की। हर चार में से एक परिवार ने बताया कि उन्हें हर महीने दवाइयों पर 1000 से अधिक की बचत होती है।  

प्राइवेट मेडिकल स्टोर्स में मधुमेह, उच्च रक्तचाप या गैस जैसी पुरानी बीमारियों की दवाओं की कीमत जन औषधि केंद्रों की तुलना में चार गुना ज्यादा थीं।  

इन परिवारों ने बचाया गया पैसा पौष्टिक भोजन, परिवार के सदस्यों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए बचत पर खर्च किया।  

धारणाएं और अनुभव  

लगभग 50% परिवार ऐसे थे, जो जन औषधि केंद्रों के बारे में जानते थे और उन्हें पता था कि ऐसे केंद्र उनके घर से 3 किलोमीटर के दायरे में मौजूद हैं। लगभग 45% परिवार ऐसे थे जिनका घर केंद्र से 1 किलोमीटर से भी कम दूरी पर था।  

नियमित रूप से जन औषधि केंद्रों से दवाएं खरीदने वाले परिवारों ने बताया कि दवाओं का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना चिंताजनक मुद्दा है। रोचक बात यह है कि इस समस्या के बावजूद ज्यादातर परिवारों ने जन औषधि केंद्र और उसकी अन्य सुविधाओं के प्रति काफी संतुष्टि जताई।  

जन औषधि केंद्र करीब होने के बाद भी वहां से दवा ना खरीदने वाले परिवारों में से आधे से ज्यादा (56 %) ने कहा कि मुख्य कारण यह है कि उनके डॉक्टर जेनेरिक दवाइयां नहीं लिखते। लगभग उतने ही लोगों (52%) ने कहा कि उन्हें जेनेरिक दवाओं पर भरोसा नहीं है। दवाइयों की उपलब्धता को लेकर भी कई परिवारों ने चिंता जताई।

नियमित रूप से जन औषधि केंद्रों से दवाएं लेने वाले परिवारों ने दवाएं सस्ती होने के कारण हर महीने औसतन 550 रुपये की बचत की। हर चार में से एक परिवार ने बताया कि उन्हें हर महीने दवाइयों पर 1000 से अधिक की बचत होती है।  

एक सरकारी अधिकारी ने टीम को बताया कि मध्यम-आय और सम्पन्न घरों के लोग भी जन औषधि केंद्रों से दवाइयां खरीदते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि दवाओं के घटक (composition) का सही होना ही जरूरी चीज है, और इस लिहाज से ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं में कोई विशेष अंतर नहीं होता।  

चुनौतियां  

इस अध्ययन से कई चुनौतियों का भी पता चला। इनमें दवाओं की आपूर्ति में देरी, ऑर्डर और उसकी डिलीवरी से जुड़ी समस्याएं, और जेनेरिक दवाएं लिखने में डॉक्टरों की हिचकिचाहट शामिल हैं।  

जन औषधि केंद्र करीब होने के बाद भी वहां से दवा ना खरीदने वाले परिवारों में से आधे से ज्यादा (56 %) ने कहा कि मुख्य कारण यह है कि उनके डॉक्टर जेनेरिक दवाइयां नहीं लिखते।

सुधार की गुंजाइश  

इस अध्ययन सुधार के तरीके भी पहचाने।  

जन औषधि केंद्रों के संचालकों के अनुसार दवा की आपूर्ति में सुधार, ऐसी दवाएं मंगाना जिनकी एक्सपायरी डेट लंबी हो और कम मूल्य के आर्डर भेजने की अनुमति जैसे सुधार किये जा सकते हैं।  

ज्यादा लोगों को सस्ती दवाएं मुहैया कराने के लिए लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। उन्हें बताया जाना चाहिए कि जन औषधि केंद्रों पर कम कीमत और अच्छी गुणवत्ता वाली दवाएं मिलती हैं। साथ ही डॉक्टरों को जेनेरिक दवाइयां लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।  

लाभ  

जन औषधि केंद्रों से दवाएं खरीदकर लोग हर महीने ठीक-ठाक पैसा बचा लेते हैं।  

‘भरोसे का कारक’ भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोगों ने पाया कि यहां से मिलने वाली दवाइयां अच्छी गुणवत्ता की हैं।  

निष्कर्ष  

आपूर्ति की समस्या, लाभार्थियों की ज़रूरतों पर फार्मासिस्ट रवैया और जेनेरिक दवाएं लिखने में डॉक्टरों की अनिच्छा अभी मौजूद असली समस्याएं हैं।  

फिर भी, जन औषधि केंद्र ज़रूरतमंद लोगों की एक बड़ी आबादी को कम कीमत में दवाएं उपलब्ध करा सकते हैं।  

देशभर में और अधिक जन औषधि केंद्र खुलने से बीना देवी जैसे बहुत से लोग स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च को घटा पाएंगे।