दूर-दराज़ और आदिवासी क्षेत्रों में जन आरोग्य समितियों को सक्रिय करना

महाराष्ट्र के चार दूर-दराज़ ब्लॉकों में जन आरोग्य समितियों को सक्रिय करने से वहाँ के लोगों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भागीदारी और जिम्मेदारी काफी बढ़ गई है। इससे वहाँ के स्वास्थ्य केंद्रों की सेवाओं में भी सुधार हुआ है और कई महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संकेतकों में भी बेहतर परिणाम देखने को मिले हैं।

दूर-दराज़ और आदिवासी क्षेत्रों में जन आरोग्य समितियों को सक्रिय करना

शिनोली हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर की मरीज श्रीमती लक्ष्मीबाई भिले कहती हैं:
“दो साल पहले हमारे सरकारी क्लिनिक में ब्लड प्रेशर और शुगर की दवाइयाँ अक्सर नहीं मिलती थीं। लेकिन आज ये दवाइयाँ नियमित रूप से मिल रही हैं। अब यहाँ ब्लड प्रेशर और शुगर की जाँच के लिए समय-समय पर स्वास्थ्य शिविर भी लगाए जाते हैं।”

पृष्ठभूमि 

आयुष्मान भारत योजना, जो भारत सरकार की प्रमुख स्वास्थ्य योजना है, के तहत उप-स्वास्थ्य केंद्रों (सब-सेंटर) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) को हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर (एचडब्ल्यूसी) में बदला जा रहा है, ताकि लोगों को व्यापक और बेहतर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध करायी जा सकें।

इस पहल का एक महत्वपूर्ण आधार सामुदायिक भागीदारी है। पीएचसी स्तर पर रोगी कल्याण समितियाँ (आरकेएस) स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और मार्गदर्शन का कार्य करती हैं, जबकि गाँव स्तर पर ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण समितियाँ (वीएचएसएनसी), जन आरोग्य समितियाँ (जेएएस), आशा कार्यकर्ता तथा शहरी क्षेत्रों में महिला आरोग्य समितियाँ समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करती हैं।

प्रत्येक हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर को स्थानीय स्वास्थ्य गतिविधियों और आवश्यक संचालन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिवर्ष 50,000 रुपये का ‘अनटाइड फंड’ (बिना किसी निर्धारित मद की राशि) मिलता है। इस फंड का सही उपयोग सुनिश्चित करने और समुदाय की भागीदारी को मजबूत बनाने के लिए प्रत्येक एचडब्ल्यूसी में एक सक्रिय जन आरोग्य समिति का होना आवश्यक माना गया है।

महाराष्ट्र के चार ग्रामीण और आदिवासी बहुल विकास खंडों—अंबेगांव और वेल्हे (जिला पुणे), घाटंजी (जिला यवतमाल) तथा धारणी (जिला अमरावती)—में अनुसंधान ट्रस्ट–साथी ने जन आरोग्य समितियों के गठन और उन्हें सक्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

अनुसंधान ट्रस्ट–साथी वर्ष 1998 से स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य कर रहा है। इसकी गतिविधियाँ मुख्य रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों पर केंद्रित रही हैं। महामारी के दौरान शहरों में जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सहायता की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए संस्था ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार शहरी समुदायों तक भी किया।

जन आरोग्य समितियों के सक्रिय होने से पहले की स्थिति 

साथी (SATHI) ने जून 2024 में जन आरोग्य समितियों को सक्रिय बनाने का काम शुरू किया। पहले वर्ष में संस्था की टीम चार ब्लॉकों के 90 हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों (एचडब्ल्यूसी) तक पहुँच गई, जहां सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचओ) की नियुक्ति सुनिश्चित की और जन आरोग्य समितियों को सुदृढ़ करने में मदद की ।

हालाँकि सरकारी अभिलेखों में यह दर्ज था कि 96 जन आरोग्य समितियों का गठन पहले ही हो चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर किए गए निरीक्षण से पता चला कि उनके संचालन में कई गंभीर कमियाँ थीं।” अधिकांश समितियों के पास बुनियादी रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं थे। सदस्यों की सूची, बैठकों की कार्यवाही, बैठक का एजेंडा या लिए गए निर्णयों का कोई व्यवस्थित दस्तावेज नहीं था। कई स्थानों पर किसी जन आरोग्य समिति के “सक्रिय” होने का एकमात्र प्रमाण केवल उसका बैंक खाता था, जिसे सरपंच, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) या एएनएम संयुक्त रूप से संचालित कर रहे थे। इतना ही नहीं, समिति के कई सदस्यों को यह भी पता नहीं था कि वे जन आरोग्य समिति के सदस्य हैं या उनकी क्या जिम्मेदारियाँ हैं।

इन कमियों को दूर करने के लिए साथी ने स्थानीय लाभार्थियों के साथ मिलकर काम किया। समितियों का पुनर्गठन किया, नए सदस्यों की पहचान की, उनकी भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ स्पष्ट की गईं तथा नियमित बैठकों की व्यवस्था सुनिश्चित की गई।

कई चुनौतियों के बावजूद, संस्था ने दूसरे वर्ष के अंत तक 125 जन आरोग्य समितियों को सफलतापूर्वक पुनर्जीवित और सक्रिय कर दिया।

जन आरोग्य समिति (जेएएस) के सदस्य कौन होते हैं? 

सरपंच जन आरोग्य समिति के अध्यक्ष होते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) समिति के सचिव की भूमिका निभाते हैं। यदि सीएचओ का पद खाली हो, तो यह जिम्मेदारी एएनएम (सहायक नर्स एवं प्रसूति कर्मी) निभाती हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) के चिकित्सा अधिकारी समिति के सह-अध्यक्ष होते हैं।

इसके अलावा समिति में निम्नलिखित सदस्य भी शामिल होते हैं—

  • आशा कार्यकर्ता
  • आंगनवाड़ी कार्यकर्ता
  • विद्यालयों के प्रतिनिधि
  • स्थानीय समुदाय के प्रमुख व्यक्ति
  • मरीज समूहों के प्रतिनिधि

आवश्यकतानुसार ग्राम सेवक भी बैठकों में भाग लेते हैं।

जन आरोग्य समिति की बैठकें आमतौर पर हर महीने या दो महीने में एक बार आयोजित की जाती हैं। इन बैठकों में सदस्य हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर (एचडब्ल्यूसी) की कार्यप्रणाली की समीक्षा करते हैं, स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद कमियों पर चर्चा करते हैं, महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संकेतकों की निगरानी करते हैं और स्थानीय स्तर पर समाधान खोजने का प्रयास करते हैं। बैठकों में प्रायः निम्नलिखित मुद्दों पर चर्चा की जाती है—अधिक जोखिम वाली गर्भावस्थाएँ, कुपोषित बच्चे, गैर-संचारी रोगों की जाँच, दवाओं की उपलब्धता, स्वास्थ्य केंद्रों की बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी आवश्यकताएँ ।

JAS Meeting at Dabiya Health and Wellness Centre

एक सक्रिय जन आरोग्य समिति स्वास्थ्य सेवाओं को कैसे बेहतर बनाती है?

एक सक्रिय जन आरोग्य समिति समुदाय, स्वास्थ्य व्यवस्था, ग्राम पंचायत और अन्य सरकारी विभागों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती है। जन आरोग्य समितियाँ स्थानीय स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान कर और उनके समाधान के लिए उपलब्ध संसाधनों को जुटाकर निम्नलिखित क्षेत्रों में सुधार करने में मदद करती है।

  • तृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार 
  • पोषण की हालत में बेहतरी  
  • गैर-संचारी रोगों की जाँच और उपचार तक लोगों की पहुँच बढ़ाना 
  • आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना 
  • स्वास्थ्य केंद्रों की मरम्मत और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाना 
  • स्वास्थ्य कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी बढ़ाना। 

जन आरोग्य समितियों के सक्रिय होने का प्रभाव 

अधिक जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं को सहायता

टंजी के राजूरवाड़ी गाँव की रंजना आत्राम आवश्यक दस्तावेज़ों में उपलब्ध जानकारी के मेल न खाने के कारण गर्भावस्था संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ नहीं ले पा रही थीं। ऐसे में जन आरोग्य समिति ने उनकी मदद की और उनका स्वास्थ्य व्यवस्था में पंजीकरण कराया ।
रंजना बताती हैं,

“पहले किसी ने मुझे ठीक से जानकारी नहीं दी थी। जन आरोग्य समिति की मदद से मेरा स्वास्थ्य परीक्षण पूरा हुआ और मुझे समय पर जरूरी उपचार मिल सका।” 

Home-visit of a high-risk pregnant mother

स्वास्थ्य व्यवस्था में पंजीकरण होने के बाद उन्हें बेहतर सुविधाओं वाले अस्पतालों में रेफर किया जा सका। बाद में उनकी सुरक्षित डिलीवरी हुई । इस अनुभव को याद करते हुए वे कहती हैं- “कुछ समय तक मैं बहुत डरी हुई थी, लेकिन डॉक्टरों और आप लोगों की मदद से मैं और मेरा बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।”

ऐसा ही एक उदाहरण धारणी क्षेत्र की सरिता का है। सरिता छह महीने की गर्भवती थीं, उनका वजन मात्र 32 किलोग्राम था और खून में हीमोग्लोबिन केवल 6 g/dL (ग्राम प्रति डेसीलीटर) था। इसके अलावा उन्हें गुटखा खाने की आदत भी थी। उनके गाँव से हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर तक पहुँचने के लिए सड़क भी नहीं थी।   
हालत की गंभीरता को देखते हुए सहायक नर्स एवं प्रसूति कर्मी (एएनएम) और जन आरोग्य समिति के सदस्यों ने परिवार को समझाया कि सरिता को उनकी माँ के घर भेज दिया जाए। उनका घर हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के नज़दीक था। वहाँ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने उन्हें अमृत आहार और आयरन की गोलियाँ उपलब्ध करायी, जिससे उनके स्वास्थ्य में सुधार हो सके। नियमित उपचार, पौष्टिक आहार और लगातार निगरानी का असर यह हुआ कि उनका हीमोग्लोबिन 6 से बढ़कर 9 g/dL हो गया। बाद में उनका सफल सीज़ेरियन ऑपरेशन कराया गया। डिलीवरी के बाद उन्होंने ज।  
न आरोग्य समिति के एक सदस्य से कहा, “भैया, आपके सहयोग से मेरी सेहत में सुधार हुआ और मेरी डिलीवरी सुरक्षित रूप से हो सकी। इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”            

Sarita with her newborn

गंभीर कुपोषण से पीड़ित बच्चों की मदद 

यवतमाल जिले के सयात खरड़ा गाँव के दो साल के आरव को गंभीर रूप से कुपोषित पाया गया। उसकी हालत इतनी खराब थी कि ठीक से बैठ भी नहीं पाता था और न ही लोगों को कोई प्रतिक्रिया देता था। उसकी माँ दूसरी बार गर्भवती थीं और पिता निर्माण मजदूर थे। घर में बच्चे की देखभाल करने वाला कोई नहीं था।

आरव की माँ बताती हैं, “अब मेरा बच्चा सुस्त नहीं रहता है। वह बातों का जवाब देता है और चलना भी शुरू कर चुका है। हम दिल से आभारी हैं। आपकी मदद से ही हमारा बच्चा आज जीवित और स्वस्थ है।”

इस मामले पर जन आरोग्य समिति की बैठक में चर्चा की गई। इसके बाद समिति के सदस्यों ने परिवार से मुलाकात की और बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराने के लिए माता-पिता को समझाया।

Follow up of pregnant women and malnourished children in Dharni

समय पर उपचार और पोषण संबंधी देखभाल मिलने के बाद आरव की सेहत में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

आरव की माँ बताती हैं, “अब मेरा बच्चा सुस्त नहीं रहता है। वह बातों का जवाब देता है और चलना भी शुरू कर चुका है। हम दिल से आभारी हैं। आपकी मदद से ही हमारा बच्चा आज जीवित और स्वस्थ है।”

गैर-संचारी रोगों की सेवाओं तक पहुँच में सुधार

जन आरोग्य समिति के सदस्यों ने हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों को ऐसे गाँवों और बस्तियों में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के जाँच शिविर लगाने के लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया, जहाँ पहले स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत कम या बिल्कुल नहीं पहुँच पाती थीं।

जन आरोग्य समिति के प्रयासों से गाँवों और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों के स्तर पर कुल 562 एनसीडी जाँच शिविर आयोजित किए गए। इन शिविरों में 6,566 मरीजों को हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों के जरिए नियमित रूप से दवाएँ मिलनी शुरू हो गईं।

पुणे जिले का कोलवाड़ी-कोटमदरा एक ऐसा ही गाँव था।

NCD patient’s follow-up and awareness

कोलवाड़ी गाँव की निवासी मानबाई पारधी बताती हैं कि “हमने कभी सोचा भी नहीं था कि डॉक्टर हमारे टोले में आकर हमारी सेहत की जाँच करेंगे। हमारी उम्र में इलाज के लिए दूर-दूर तक जाना बहुत मुश्किल होता है। घर के पास ही इलाज मिलना हमारे लिए बहुत बड़ी राहत की बात है।”

लोगों में जैसे-जैसे स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति जागरूकता बढ़ी और अधिक लोग उपचार के लिए हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर जाने लगे।

शिनोली हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संतोष ठोकल के अनुसार- जन आरोग्य समिति की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ी है और अब पहले की तुलना में अधिक लोग इलाज के लिए हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर आ रहे हैं।”

यवतमाल जिले के घोटी हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर में जन आरोग्य समिति के सदस्यों ने ऐसे मरीजों की पहचान की, जिन्हें एक साथ कई विशेष दवाओं की जरूरत थी। ये दवाएँ सामान्य सरकारी आपूर्ति व्यवस्था के माध्यम से उपलब्ध नहीं थीं। इस समस्या को लेकर ग्राम पंचायत के साथ चर्चा की गई और गरीब मरीजों को दवाएँ खरीदने के लिए धन का इंतजाम किया गया। इसके कारण सात मरीजों को जरूरी उपचार और दवाएँ नियमित रूप से मिलने लगीं।

 स्थानीय पहल के जरिये स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना 

हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों (एचडब्ल्यूसी) के सामने आने वाली कई समस्याएँ ऐसी होती हैं, जिनके समाधान के लिए बहुत अधिक फंड की जरूरत नहीं होती। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और सामूहिक प्रयासों से इनका समाधान किया जा सकता है।

जन आरोग्य समितियों द्वारा ऐसे 218 मुद्दे उठाए गए जिनके समाधान के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता थी। इनमें से 127 मामलों (58 प्रतिशत) का समाधान पहले ही एचडब्ल्यूसी स्तर के फंड या ग्राम पंचायत की मदद से किया जा चुका है। बाकी बचे मामलों के समाधान के लिए पहल की जा रही है ।

पुणे की आशा कार्यकर्ता कमल हिलाऊ बताती हैं कि “जन आरोग्य समिति के सक्रिय होने से पहले हम बार-बार समस्याएँ उठाते थे, लेकिन उन पर बहुत कम कार्रवाई होती थी। अब समस्याओं का समाधान कहीं ज्‍यादा तेजी से होता है और दवाओं की कमी भी जल्दी दूर हो जाती हैं।”

शिनोली के सरपंच मंगेश पारधी कहते हैं कि “जन आरोग्य समिति हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर की गतिविधियों पर लगातार नजर रखती है। जब भी दवाओं या अन्य किसी सामग्री की कमी होती है, समिति तुरंत उस पर कार्रवाई करती है और यह सुनिश्चित करती है कि समस्या का समाधान हो जाए।”

उपलब्ध धनराशि का इस्‍तेमाल इन जरूरी कामों के लिए किया गया-

  • बिजली बिलों का भुगतान
  • इन्वर्टर की खरीद
  • भवनों की मरम्मत
  • दवाओं की खरीद
  • उपकरणों और फर्नीचर की खरीद
  • सफाई और स्वच्छता संबंधी काम
  • जांच किट और टेस्टिंग स्ट्रिप्स की खरीद
  • चिकित्सा उपकरणों और अन्य सुविधाओं की मरम्मत

निष्कर्ष 

एक सक्रिय जन आरोग्य समिति किसी भी हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर की महत्वपूर्ण ताकत होती है। यह समुदाय, स्वास्थ्यकर्मियों, स्थानीय शासन संस्थाओं और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को एक मंच पर लाकर जवाबदेही को बढ़ाती है, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाती है और यह सुनिश्चित करती हैं कि स्थानीय स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों का समय पर समाधान हो। महाराष्ट्र के दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों का अनुभव यह दर्शाता है कि जब लोगों को स्वास्थ्य व्यवस्था में भागीदारी का अवसर और अधिकार मिलता है, तो स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, गुणवत्ता और जवाबदेही में सुधार होता है ।