छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के शांत से गांव खरकट्टा में रहने वाली कृपालता मिंज सिर्फ एक ग्रामीण स्वास्थ्य अधिकारी नहीं हैं। यहाँ के परिवारों के लिए, वह एक ऐसी स्वास्थ्य सेविका हैं, जो ज़रूरत पड़ने पर जीवन बचाती हैं। उन्होंने पारंपरिक मान्यताओं और आधुनिक चिकित्सा को आपस में जोड़ने का बेहतरीन काम किया है। गाँव के उप-स्वास्थ्य केंद्र में बिताए पिछले 13 सालों में, इस 50 वर्षीय स्वास्थ्य सेविका ने एक ऐसा बदलाव देखा है जो ग्रामीण भारत की बदलती स्वास्थ्य व्यवस्था की साफ़ तस्वीर को दिखाता है।

अतीत के सूने गलियारे
गांव वालों का भरोसा जीतना कृपालता के लिए आसान नहीं था। उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
तेरह साल पहले जब कृपालता पहली बार यहां आईं थीं, तब स्वास्थ्य केंद्र पर कोई नहीं आता था। वह याद करते हुए कहती हैं, ‘‘एक समय था जब यहां मक्खी तक नहीं आती थी।’’ सरकारी इलाज पर लोगों का भरोसा इतना कम था कि टीकाकरण की किट देखते ही माँएँ खेतों की ओर भाग जाती थीं। वे हंसते हुए कहती हैं, ‘‘वे इतनी तेज भागती थीं कि उन्हें पकड़ना मुश्किल हो जाता था।’’ इसके बाद वे और उनके साथी उन्हें ढूंढ़कर पेड़ों के नीचे बच्चों को जीवनरक्षक टीके लगाते थे। उस समय गांव में असुरक्षित प्रसव तरीकों और गर्भनाल की सही देखभाल न होने के खतरे के बावजूद, लोग पूरी तरह पारंपरिक दाइयों पर ही निर्भर थे।

ज़िंदगी की पहली जंग: कृपालता की अग्निपरीक्षा
नियुक्ति के कुछ समय बाद उन्हें लाल माटी पारा नाम के एक टोले में एक गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा। उस समय स्वास्थ्य केंद्र में मच्छरदानियों के ढेर लगे थे, जिससे सुरक्षित प्रसव के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं थी। जब एक महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तो कृपालता ने देखा कि बच्चे का सिर बाहर आने ही वाला था। महिला को कहीं और ले जाने का समय बिल्कुल नहीं था।
जब बच्चा पैदा हुआ, तो वह बिल्कुल शांत था। कृपालता याद करती हैं, ‘‘वह न तो साँस ले रहा था और न ही रो रहा था।’’ बाहर खड़ी स्थानीय दाई और गाँव वाले पहले से ही कानाफूसी करने लगे थे कि ‘‘नई सिस्टर’’ ने बच्चे को मार डाला। लेकिन कृपालता ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने बच्चे का मुंह साफ किया और प्रशिक्षण के दौरान सीखी हुई विधि से उसे मुँह से ऑक्सीजन दी। कुछ बेहद तनावपूर्ण पलों के बाद बच्चे ने जोर से रोना शुरू कर दिया। आज वही बच्चा स्वस्थ है और स्कूल जाता है।
चार किलो का चमत्कार
कृपालता के कार्यकाल की सबसे यादगार घटनाओं में से एक उस महिला की है, जिसका प्रसव इसलिए रुक गया था क्योंकि गर्भ में पल रहा बच्चा असामान्य रूप से बड़ा था। उस समय 26 वर्ष की यह महिला पूरी तरह थक चुकी थी और रोते हुए कह रही थी, ‘‘सिस्टर, अब मैं नहीं बचूंगी।’’ दूसरे स्वास्थ्यकर्मी उसे बड़े अस्पताल भेजने के लिए रेफरल पत्र तैयार कर रहे थे, लेकिन कृपालता ने देखा कि बच्चा बाहर आने की स्थिति में पहुँच चुका था।
बिना किसी विशेष उपकरण के कृपालता ने 4 किलोग्राम वज़न वाले बच्चे का सुरक्षित प्रसव कराया। लेकिन बच्चा जन्म लेते समय नीला पड़ चुका था और एकदम शांत था। उस घबराहट भरे समय में कृपालता ने एक बार फिर अपने मुंह से सांस देकर बच्चे को जीवित किया। आज वह बच्चा पांच साल का हो चुका है। कृपालता को देखते ही वह दौड़कर उनके पैर छूता है। कृपालता कहती हैं, ‘‘उस पल मुझे आत्मिक खुशी मिलती है।’’

जागरूकता का नया दौर
आज कृपालता जिस वातावरण में काम कर रही हैं, वहां की तस्वीर पहले से बिल्कुल बदल चुकी है। 2021 से वह सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (CHO) उर्मिला चौहान के साथ मिलकर काम कर रही हैं। उर्मिला आंकड़ों और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर स्वास्थ्य सेवाएं देने पर विशेष ध्यान देती हैं। दोनों मिलकर अब तक 100 से अधिक सुरक्षित प्रसव करा चुकी हैं।
इस बदलाव की झलक सुषमा भगत जैसी महिलाओं में साफ दिखाई देती है। सुषमा अपनी तीसरी गर्भावस्था के दौरान गांव लौट आई हैं। दिल्ली में 17 सालों तक खाना बनाने का काम करने वाली सुषमा के लिए पहली गर्भावस्था में सही देखभाल नहीं के बराबर थी। वह बताती हैं कि शहर में अपनी पहली दो गर्भावस्थाओं के दौरान उन्हें बहुत कमजोरी रहती थी, लेकिन उन्हें न तो उचित देखभाल मिली और न ही सही मार्गदर्शन। वह कहती हैं, ‘‘तब मुझे कुछ भी पता नहीं था… हमें बताने वाला भी कोई नहीं था।’’
दिल्ली के उस बुरे अनुभव के उलट, आज खरकट्टा में वे एक सुव्यवस्थित और भरोसेमंद स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा हैं। वह नियमित रूप से जीवंती मिंज जैसी मितानिनों (सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) से मिलती हैं, जो परामर्श पुस्तिकाओं की मदद से उन्हें गर्भ में पल रहे बच्चे के मस्तिष्क और हड्डियों के विकास के बारे में समझाती हैं।
कृपालता और उर्मिला ने बाजार में उपलब्ध महंगे पोषण सप्लीमेंट की जगह स्थानीय और सस्ते खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया। वे गर्भवती महिलाओं से कहती हैं, ‘‘एक बिही (अमरूद) खाना सौ संतरे खाने के बराबर है।’’ इस तरह वे उन्हें अपने घर के आस-पास उगने वाली चीज़ों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित भी करती हैं।
वे खतरनाक अंधविश्वासों के खिलाफ भी बदलाव की एक बड़ी लड़ाई भी लड़ रही हैं। कभी गांव में यह परंपरा थी कि प्रसव के बाद नई मां को तीन दिनों तक भोजन नहीं दिया जाता था। कृपालता और उर्मिला अब स्वयं घर-घर जाकर यह सुनिश्चित करती हैं कि प्रसूता माँ को समय पर पौष्टिक भोजन मिले। वे लोगों से पूछती हैं, ‘‘अगर मां को खाना नहीं मिलेगा, तो बच्चे के लिए दूध कैसे बनेगा?’’ इस बात को समझाने के लिए वे गाय और उसके बछड़े का उदाहरण भी देती हैं, ताकि लोग इस वैज्ञानिक तथ्य को आसानी से समझ सकें।

चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं
गांव में स्वास्थ्य सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन कृपालता का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी आज भी एक बड़ी बाधा है। स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में अभी भी अल्ट्रासाउंड मशीन नहीं है, जिसकी वजह से गर्भवती महिलाओं को जांच (स्कैन) के लिए अंबिकापुर या कुनकुरी जाना पड़ता है। स्वास्थ्य ढांचे की कई कमियां आज भी बनी हुई हैं। गर्भावस्था के गंभीर मामलों में समय पर रेफरल और उपचार अब भी चुनौतीपूर्ण है। हालांकि, अब गाँव के लोग कृपालता पर भरोसा करते हैं और इस पूरे मामले में उनकी सलाह मानते हैं।’’
आज 50 वर्ष की हो चुकी कृपालता मिंज अब भी संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) कर्मचारी हैं, लेकिन उनकी प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आई है। वे रोज़ अपनी स्कूटी से गांव के विभिन्न टोलों का दौरा करती हैं, गर्भवती महिलाओं का ब्लड प्रेशर जांचती हैं, और यह सुनिश्चित करती हैं कि कोई भी बच्चा जरूरी टीकाकरण से छूट न जाये। वह बहुत दृढ़ता से कहती हैं, ‘‘मुझे राजनीति नहीं करनी है। मैं बस एक-दो घंटे अपने इलाके में घूमना चाहती हूँ और सुनिश्चित करना चाहती हूँ कि यहां की हर मां और हर बच्चा स्वस्थ हो।’’ खरकट्टा में उन्होंने जिन बच्चों की जिंदगी बचाई है उनकी नज़रों में उनका इतना सम्मान है, जो कई बार राजनेताओं को भी नहीं मिल पाता।
