गाँव की राह चुनने वाला डॉक्टर

अज़ीम प्रेमजी हेल्थ इक्विटी फ़ेलोशिप (Azim Premji Health Equity Fellowship) से जुड़े दो पोस्ट-ग्रेजुएट डॉक्टरों से एक बातचीत – अपनी वजह, अपने तजुर्बे और अपनी सीख के बारे में, उन्हीं की ज़ुबानी।

भारत में डॉक्टरी का पेशा आज एक मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ़ कॉरपोरेट अस्पताल हैं, जो देखने में चमकदार हैं, हर सुविधा से लैस हैं और तनख़्वाह भी अच्छी देते हैं, मगर इनकी नींव अंतत: मुनाफ़े पर ही टिकी हुई है। दूसरी तरफ़ सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था है। इसका मक़सद तो यही था कि सबसे कमज़ोर लोगों तक स्‍वास्‍थ्‍य सेवा पहुँचे, लेकिन हक़ीक़त में यह व्यवस्था ख़ुद पैसे की तंगी, कामकाज की उलझनों और घटते-बढ़ते इलाज के स्तर से जूझती रहती है।

जो डॉक्टर दिल से उपेक्षित तबक़ों के लिए कुछ करना चाहता है, उसके पास आख़िर रास्ता कौन-सा बचता है?

इसका जवाब यह है कि देश भर में ऐसे सैकड़ों अस्पताल मौजूद हैं, जो मुनाफ़े के लिए नहीं बल्कि मिशन की भावना से चलते हैं। वे हाशिए पर खड़े लोगों को अपनेपन के साथ अच्छा और सस्ता इलाज देते हैं। मुश्किल बस इतनी है कि बहुत-से नौजवान डॉक्टरों को इन अस्पतालों की ख़बर ही नहीं होती, या फिर इनकी राह उन्हें आसानी से नहीं मिलती।

यहीं पर अज़ीम प्रेमजी हेल्थ इक्विटी फ़ेलोशिप काम आती है। यह फ़ेलोशिप अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन की एक पहल है। इसके तहत एमबीबीएस और पोस्ट-ग्रेजुएट डॉक्टरों को भारत के दूर-दराज़ और उपेक्षित इलाक़ों के उन अस्पतालों में भेजा जाता है, जो जनहित की भावना से चलते हैं, मुनाफ़े के लिए नहीं। वहाँ डॉक्टरों को मरीज़ों के साथ सीधा काम करने, समुदाय के बीच जाकर अनुभव लेने और वरिष्ठ डॉक्टरों की निगरानी में सीखने के मौक़े मिलते हैं। बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों में ऐसे मौक़े शायद ही मिलते हैं।

इस वीडियो में फ़ेलोशिप के पहले बैच के दो पोस्ट-ग्रेजुएट डॉक्टर अपनी बात रख रहे हैं – गाँव में ज़मीनी स्तर पर काम करते हुए उन्होंने क्या सफ़र तय किया, किन मुश्किलों से गुज़रे, और इस दौरान उन्होंने क्या सीखा।