एक मरीज को ऑक्सीजन की कमी हो रही थी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के दो कर्मचारी अंबु बैग (हाथ से चलाया जाने वाला श्वसन उपकरण) के माध्यम से उसे ऑक्सीजन देने का प्रयास कर रहे थे। भारत के इस पहाड़ी राज्य में चीन की सीमा से सटे इस इलाके में बाहर घुटनों तक बर्फ गिरी हुई थी और यहाँ पहुँचने के सभी रास्ते बंद थे। ऑक्सीजन सिलेंडर लाने के लिए एक एंबुलेंस जैसे-तैसे निकली तो थी, लेकिन भरोसा नहीं था कि वह वापस लौट पाएगी।

अस्पताल के अंदर मरीज को जिंदा रखने की लड़ाई जारी थी। दोनों स्वास्थ्यकर्मी बीच-बीच में नंगे पैर जनरेटर तक भागते, जैसे-तैसे चालू करते, लेकिन कुछ देर बाद फिर जनरेटर बंद। और फिर वही दृश्य —
“अंबु… अंबु… अंबु…”
अगर बिजली होती तो ऑक्सीजन कंसंट्रेटर (एक ऐसा इलेक्ट्रिक उपकरण जो हवा से ऑक्सीजन अलग करके मरीज को शुद्ध ऑक्सीजन प्रदान करता है) की मदद से मरीज को लगातार ऑक्सीजन मिल पाती।
काफी देर तक यही संघर्ष चलता रहा। तभी एक कर्मचारी की नजर जनरेटर पर लिखे एक नंबर पर पड़ी। उन्होंने सोचा- क्यों न फोन पर मदद मांगी जाए? फोन लगाया गया, किसी ने उठाया भी, लेकिन एक औपचारिक जवाब मिला- “एक application भेज दीजिए, फिर देखते हैं कि क्या कर सकते हैं।” और फिर वही कहानी-
“अंबु… अंबु… अंबु…”
कुछ देर बाद एंबुलेंस भी खाली हाथ लौट आई। लेकिन एक रास्ता निकाला गया- मरीज को वहाँ तक पहुँचाया गया जहाँ सड़क बंद थी, पैदल पार करवाकर दूसरी एंबुलेंस में बिठाया गया और जिला अस्पताल भेजा गया।
मरीज बच गया।
लेकिन इस घटना को सुनाने वाली सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी तनुजा आज भी उस दिन को नहीं भूल पातीं – वह दिन जब हर साँस इंसानी हाथों पर टिकी हुई थी। ऐसा दिन इन दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की कठोर सच्चाई को स्पष्ट रूप से सामने रखता है।
तनुजा पिछले दो वर्षों से इस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के एक उपकेन्द्र पर कार्यरत हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से उपलब्ध करवाए गए सरकारी आवास में रहती हैं। आपात स्थितियों में तनुजा अपनी औपचारिक जिम्मेदारियों से ऊपर उठ कर पूरी टीम का सहयोग करती हैं और एक सच्चे पेशेवर की तरह अपने नैतिक उत्तरदायित्वों को बखूबी निभाती हैं।

यह इलाका जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर है। यहाँ पहुँचने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग तो है, लेकिन कभी भूस्खलन तो कभी बर्फबारी के कारण अक्सर बंद हो जाता है। यातायात के साधन भी बहुत सीमित हैं- एक गाँव से दूसरे गाँव पहुँचने के लिए परिवहन के साधन बहुत सीमित हैं। अधिकतर दिनों में तनुजा इस उम्मीद के साथ पैदल चलना शुरू करती हैं कि रास्ते में कोई लिफ्ट मिल जाए; नहीं तो पूरी दूरी पैदल ही तय करनी पड़ती है। रास्ते घने जंगलों से होकर गुजरते हैं, जहाँ भालू और तेंदुए के हमलों की खबरें असामान्य नहीं हैं। फिर भी, जिन्हें जाना होता है, वे चलते रहते हैं।
नेटवर्क की स्थिति इतनी अनिश्चित है कि तनुजा के पास तीन अलग-अलग कंपनियों के सिम कार्ड हैं, क्योंकि यह निश्चित नहीं होता कि किसका नेटवर्क चलेगा – या फिर कोई एक भी चलेगा या नहीं।
एक प्रतिष्ठित संस्थान से नर्सिंग की पढ़ाई के दौरान तनुजा ने सोचा था कि वह आगे मास्टर्स करके अध्यापन की तरफ बढ़ेंगी। सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी के पद के लिए आवेदन उन्होंने लगभग यूँ ही, बिना ज़्यादा सोच-विचार के कर दिया था। जब तक परिणाम आया, तब तक शादी भी हो चुकी थी। तनुजा चाहती थीं कि उनके पति आगे की पढ़ाई पूरी करें, इसलिए उन्होंने यह नौकरी स्वीकार कर ली।
नौकरी के शुरुआती दिनों में एक दिन तनुजा ने कुछ बच्चों को घुटनों तक बर्फ में 4–5 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते देखा। तब उन्हें समझते देर नहीं लगी कि जिन पहाड़ों, नदियों और बर्फ को देखने के लिए लोग हजारों रुपये खर्च कर आते हैं – वहाँ का जीवन आसान नहीं होता। लेकिन इसी क्षण से उनके काम को एक गहरा अर्थ मिलने लगा।
दवाइयों से भरा बैग कंधे पर डालकर तनुजा सुबह अपने कमरे से निकलती हैं। उप-केंद्र यहाँ से 5 किलोमीटर दूर है। लगता तो है कि कोई गाड़ी मिल जाएगी, लेकिन इंतज़ार में समय न गंवाते हुए वह सुनसान सड़क पर पैदल ही चल पड़ती हैं – जब तक कि कोई वाहन न मिल जाए। उप-केंद्र के पास चार गाँवों की जिम्मेदारी है, इसलिए वह बारी-बारी से लगभग रोज़ हर गाँव जाती हैं।

स्ते में लोग अपने आँगनों से आवाज लगाते हैं –
“तनु, ज़रा BP देख लो।”
“मेरी दवा खत्म हो गई है, साथ लेती आना।”
और कभी-कभी हँसते हुए डांट भी लगाते हैं –
“तू कल चाय पीने क्यों नहीं आई?”
तनुजा सबकी सुनती हैं, दवाएँ देती हैं और धैर्यपूर्ण समझाती हैं, जब तक कि सामने वाला संतुष्ट न हो जाए।
लोगों के दु:ख-सुख में साथ रहना, बीमारियों का फॉलो-अप करना और अच्छे स्वास्थ्य की सलाह देना – अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। गाँव वाले भी उनका बहुत ध्यान रखते हैं; कभी देर हो जाए तो कोई कह देता है –
“अंधेरा हो गया है, मैं छोड़ आता हूँ।”
और कभी-कभी तो अपनी गाड़ी भी थमा देते हैं –
“आज तुम गाड़ी ले जाओ, कल दे देना।”
पर शुरुआत में सब कुछ ऐसा नहीं था। यह विश्वास जीतने में और समुदाय का हिस्सा बनने में उन्हे समय लगा। किसी की तबीयत खराब होने पर बार-बार हालचाल पूछना, स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों को समझने का प्रयास करना – ऐसे छोटे-छोटे कदमों ने धीरे-धीरे लोगों से उनका जुड़ाव मजबूत किया। यहाँ के नवयुवक मंगल दल के साथ तनुजा रोज़ सुबह सफाई अभियान में भी जाती थीं।
अपनी नौकरी के शुरुआती महीनों में तनुजा ने उसी गाँव में एक कमरा किराए पर लिया था, जहाँ उपकेंद्र स्थित है। यह गाँव मुख्यतः राजपूत समुदाय का है। इस क्षेत्र में यह धार्मिक मान्यता प्रचलित है कि ब्राह्मण समुदाय राजपूतों के हाथों से बना पका चावल नहीं खाता। इसलिए जब भी गाँव में कोई धार्मिक अनुष्ठान होता और बाहर से ब्राह्मण आते, तो वे अपना भोजन स्वयं बनाते थे। तनुजा भी ब्राह्मण हैं। जैसे ही गाँव वालों को यह पता चला, वे ऐसे अवसरों पर उनसे सहयोग लेने लगे। तनुजा भी पूरी इच्छा और मन से अनुष्ठानों के दौरान भोजन बनाने में मदद करती रहीं।
इन सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते-लेते वह धीरे-धीरे गाँव से गहराई से जुड़ती चली गईं। समय के साथ उन्होंने कुछ पुरानी परंपराओं का पालन भी करना शुरू कर दिया – जैसे मासिक धर्म के दौरान किसी के घर न जाना या मंदिरों से दूरी बनाए रखना।
शहर में पली-बढ़ी एक लड़की के लिए ये परंपराएँ नई थीं। उनके सामने एक विकल्प था – या तो पहले की तरह ही बनी रहें, या फिर स्थानीय संस्कृति के अनुसार स्वयं को ढालें।
उन्हें यह एहसास हुआ कि उनका काम केवल दवाइयाँ बाँटना या सेवाएँ उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि समग्र स्वास्थ्य सेवा देना है। इसे प्रभावी ढंग से निभाने के लिए लोगों की आस्थाओं को समझना, उनकी संस्कृति का सम्मान करना और संवेदनशीलता के साथ स्वयं को ढालना आवश्यक है। सेवा और संवेदना साथ-साथ चलें – तभी काम सही मायनों में सार्थक होता है। इसी समझ ने उन्हें समुदाय का सच्चा हिस्सा बनने में मदद की और अपने दायित्वों को अधिक प्रभावी ढंग से निभाने की क्षमता दी।

समय के साथ वह धीरे-धीरे स्वयं को इसी जगह का हिस्सा महसूस करने लगीं। आज तनुजा से बातचीत करके कोई भी यह नहीं कह सकता कि वह जीवन के 22 साल एक शहर में पढ़ाई कर यहाँ आयी हैं। स्कूटी और कार चलाने वाली तनुजा अब पहाड़ की पगडंडियों पर बहुत ही सहजता और निडर होकर चलती हैं।
एक महिला होने के कारण उन्हें कई बार मनचले लड़कों की सीटी, देर रात के फोन कॉल और अनचाही निगाहें भी झेलनी पड़ती हैं – लेकिन काम की तल्लीनता में यह सब पीछे रह जाता है।

पलायन की मार झेल रहे इन पहाड़ों में बुज़ुर्गों के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी किसी वरदान से कम नहीं हैं। जो लोग चलकर उप-केंद्र तक आ सकते हैं, उनके लिए दवाइयों और जांच की व्यवस्था उपकेंद्र पर ही रहती है लेकिन जो नहीं आ पाते, उनके घर जाकर हालचाल पूछना, BP–शुगर जांचना, दवाइयाँ देना- यह सब तनुजा पूरी ज़िम्मेदारी के साथ करती हैं।
गर्भवती महिलाओं को वह अपना व्यक्तिगत नंबर देती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके 108 पर बात करने और पूरी जानकारी देने में समय ज़्यादा लग जाएगा और जोखिम बढ़ सकता है। 108 पर तनुजा महिलाओं की जगह स्वयं बात करके जानकारी देती हैं और जल्द सेवा की उपलब्धता को सुनिश्चित करवाती हैं।
एक दिन तनुजा ने उप-केंद्र के बाहर एक लड़के को भांग के पौधे को रगड़ते देखा, और उसी दिन उन्हें लगा कि सिर्फ इलाज से काम पूरा नहीं होगा।
अब वह समय समय पर स्कूल जाती हैं – लड़कियों के साथ किशोरी स्वास्थ्य पर बात करती हैं और लड़कों के साथ नशे से होने वाले नुकसान पर।

लेकिन यह सब इतना आसान भी नहीं है। तनुजा का पिछले पाँच महीनों से वेतन नहीं आया है। जैसे-तैसे वह घर वालों की मदद से अपना खर्च चला रही हैं। ऊपर बैठे अधिकारी भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाते – लेकिन कार्य फिर भी जारी रहता है। सिस्टम को बस डेटा और रिपोर्ट्स चाहिए, चाहे ज़मीनी परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
एक बार एक गर्भवती महिला ने 108 पर फोन किया, लेकिन बात करते-करते नेटवर्क चला गया। परिवार ने बड़ी मुश्किल से खुद ही गाड़ी की व्यवस्था की, लेकिन गाड़ी में बैठते ही महिला का प्रसव हो गया। जच्चा-बच्चा सुरक्षित थे, फिर भी सवाल यह उठा कि प्रसव अस्पताल में क्यों नहीं हुआ।
असल में प्रसव किसी नियम या प्रक्रिया का इंतज़ार नहीं करता, लेकिन व्यवस्था अक्सर हालात को समझे बिना तयशुदा कारण ढूँढने लगती है। ऐसे मामलों में नेटवर्क जैसी मजबूरियाँ पीछे रह जाती हैं और पूरा दबाव स्वास्थ्य कर्मचारियों पर आ जाता है। इसका असर उनके काम के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। तनुजा कहती हैं – “हमारी गलती बस यही थी कि उस वक्त हमें और हालात को समझने वाली कोई व्यवस्था हमारे साथ नहीं थी।”
ऐसी भौगोलिक परिस्थितियों में कई कर्मचारी शहर में रहना ही बेहतर समझते हैं और आवश्यकता पड़ने पर ही अपने कार्यस्थल तक आते-जाते हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ इस निर्णय को समझने योग्य बनाती हैं। परिणामस्वरूप स्वास्थ्यकर्मी दो मोर्चों पर संघर्ष करते हैं – एक घर की जिम्मेदारियों के साथ और दूसरा कार्यस्थल पर।

तनुजा आज हर चुनौती का सामना डटकर कर लेती हैं- बर्फ, जंगल के रास्ते, पहाड़, नेटवर्क की समस्या, और मानसिक दबाव। यह उनकी ‘आंतरिक प्रेरणा’ ही है जिसने उन्हें अब तक यहाँ थामे रखा है। लेकिन यह कहानी हमें एक बड़े सच का सामना करने पर मजबूर करती है कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम करने के लिए जुनून ज़रूरी तो है, लेकिन यह बुनियादी सुविधाओं का विकल्प नहीं हो सकता।
किसी भी स्वास्थ्य सेवा की सफलता को केवल कर्मचारी की ‘इच्छाशक्ति’ के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि हर कर्मचारी तनुजा जैसा असाधारण त्याग करेगा। एक मज़बूत स्वास्थ्य ढांचा वह है जिसमें एक सामान्य कर्मचारी भी निर्धारित प्रक्रियाओं और मज़बूत सिस्टम के दम पर कुशलता से काम कर सके। सेवा तब तक ही टिकती है जब पीछे से व्यवस्था साथ देती है। अगर बिजली नहीं है, सैलरी नहीं है और नेटवर्क गायब है, तो वहां व्यक्तिगत जुनून भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है।
पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवा का असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक फ्रंटलाइन वर्कर कितनी मेहनत करता है। असली सवाल यह है कि क्या हमारी व्यवस्था इतनी ज़िम्मेदार है कि हर कमी के समय किसी के “सुपरहीरो” बनने का इंतज़ार न करे। तनुजा जैसे लोगों की सराहना अवश्य होनी चाहिए, लेकिन व्यक्तिगत साहस के पीछे छिपने के बजाय व्यवस्था को उन प्रक्रियाओं को मजबूत करना होगा जो सेवा को संभव बनाती हैं। अंततः स्वास्थ्य सेवा तब टिकाऊ बनती है, जब वह किसी एक व्यक्ति की प्रतिबद्धता पर नहीं, बल्कि एक मजबूत और संवेदनशील तंत्र पर आधारित होती है।
