प्रिस्क्रिप्शन से परे: एक गाँव ने मुझे मानसिक स्वास्थ्य के बारे में क्या सिखाया

यहाँ एनजीओ किस तरह काम करते हैं, समुदाय के साथ मिलकर किस तरह सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, सबसे कमज़ोर लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ लगातार जारी रखते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में किस तरह मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में कैसे बदलाव लाए गए हैं, आदि के बारे में एक डॉक्टर के अनुभवों को साझा किया गया है।

प्रिस्क्रिप्शन से परे: एक गाँव ने मुझे मानसिक स्वास्थ्य के बारे में क्या सिखाया

एक डॉक्टर के तौर पर हमें बीमारी का पता लगाने, दवा लिखने और इलाज करने की ट्रेनिंग दी जाती है। हम ब्लड प्रेशर मापते हैं, दवा की डोज़ तय करते हैं और जाँच-पड़ताल के नतीजों को समझते हैं। फिर भी, ‘हेल्थ इक्विटी फ़ेलोशिप’ के तहत ‘शिफ़ा मेंटल हेल्थ एंड डिसएबिलिटी प्रोजेक्ट’ के दौरान फ़ील्ड में लगातार जाने-आने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मरीज़ को ठीक करने में कुछ ऐसी चीज़ों की सबसे अहम भूमिका होती हैं, जिसे किसी चार्ट के ज़रिए नहीं दिखाया जा सकता है।

उन्हें भरोसे से मापा जाता है।

‘अज़ीम प्रेमजी हेल्थ इक्विटी फ़ेलोशिप’, अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन की एक पहल है। इसके तहत डॉक्टरों (MBBS और पोस्ट-ग्रेजुएट) को भारत के दूर-दराज़ और सुविधाओं से वंचित इलाक़ों में मौजूद ऐसे अस्पतालों में भेजा जाता है, जो जन-सेवा के भाव से और बिना मुनाफ़े के काम करते हैं। कमज़ोर और ज़रूरतमंद लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के मक़सद से विशेषज्ञों की देखरेख में यह फ़ेलोशिप दी जाती है। इसके तहत डॉक्टरों को चिकित्सकीय और सामुदायिक स्वास्थ्य का व्यावहारिक अनुभव पाने का मौका दिया जाता है।

एक ग्रामीण इलाक़े में चल रहे ‘शिफ़ा मेंटल हेल्थ एंड डिसेबिलिटी प्रोजेक्ट’ ने चुपचाप एक दशक से ज़्यादा समय में कुछ ऐसी व्यवस्था बनाई है, जिसे हासिल करना किसी भी स्वास्थ्य ढाँचे के लिए आसान नहीं होता है। इस व्यवस्था के तहत मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की एक ऐसी लगातार चलने वाली प्रक्रिया कायम की गई, जो बीमारी के हलके से लक्षण दिखने से पहले ही शुरू हो जाती है और क्लिनिक में डॉक्टर को दिखाने के बाद भी जारी रहती है। इस काम में बीमारी की रोकथाम, समुदाय को मज़बूत बनाना, पेशेवर देखभाल तक पहुँच और मानसिक बीमारी व विकलांगता के साथ जी रहे लोगों के अधिकारों की वकालत करना शामिल है। मुझे यह बात सबसे ज़्यादा प्रभावित कर रही थी कि यहाँ मानसिक स्वास्थ्य देखभाल मरीज़ के डॉक्टर के कमरे में आने पर नहीं, समुदाय में ही शुरू हो जाती थी।

SHIFA एक समुदाय आधारित मानसिक स्वास्थ्य पहल है। यह पहल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हर्बर्टपुर क्रिश्चियन हॉस्पिटल और इमैनुएल हॉस्पिटल एसोसिएशन (EHA) चलाते हैं। इससे आर्थिक-सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्गों के समावेशी विकास, इलाज के लिए किए जाने वाले दौरों, सामाजिक-मनोवैज्ञानिक देखभाल और आजीविका में मदद मिलती है। साथ ही, यह सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विकलांगता वाले लोगों को सशक्त बनाता है और स्थानीय वॉलंटियर्स के ज़रिए समुदाय की क्षमता को बेहतर बनाता है।

यह मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक हर दो हफ़्तों में लगता है। इन मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक में मैंने अवसाद (डिप्रेशन) और एंग्जायटी से लेकर गंभीर मानसिक बीमारियों से जूझ रहे मरीज़ों को देखा। यहाँ इन मरीज़ों से बातचीत का तरीक़ा जाना-पहचाना था, जिसमें लक्षणों की जाँच होती थी, दवाइयों में बदलाव किया जाता था और इलाज के तरीक़ों पर चर्चा होती थी। लेकिन, कई बाह्य रोगी विभागों (OPD) के उलट बात इतने पर ही ख़त्म नहीं होती थी।

यह क्लिनिक मरीज़ के घर तक पहुँचता था

प्रशिक्षित सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य वॉलंटियर्स का नेटवर्क इस कार्यक्रम की सबसे ख़ास बातों में से एक है। ये वॉलंटियर्स मनोचिकित्सक (साइकियाट्रिस्ट) या मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिस्ट) नहीं होते हैं, बल्कि उसी समुदाय के सदस्य होते हैं। उन्हें स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने वालों और लोगों के बीच की दूरी को कम कर आपसी तालमेल बैठने के लिए ज़रूरी जानकारी और कौशल सिखाए गए होते हैं। वे समय-समय पर मरीज़ घर जाकर यह सुनिश्चित करते हैं कि मरीज़ दवाइयाँ लें, देखभाल करने वाले बीमारी को समझें, साइड-इफ़ेक्ट्स को जल्दी ही पहचान पाए। इसके साथ ही मरीज़ के घर जाने का मकसद मरीज़ों को धीरे-धीरे घर की ज़िम्मेदारियों या छोटे-मोटे कामों के ज़रिए रोज़मर्रा की आम ज़िंदगी में फिर से शामिल होने के लिए बढ़ावा दिया जाना भी है।

इसने मेरे मन में एक ऐसा सवाल खड़ा किया जिस पर मैंने शायद ही कभी सोचा हो। वह सवाल था – कितनी दवाइयाँ (प्रिस्क्रिप्शन) सिर्फ़ इसलिए बेअसर हो जाती हैं, क्योंकि मरीज़ को दवाइयाँ लेना शुरु करने में मदद करने वाला कोई नहीं होता?

मानसिक बीमारी एक अदृश्य बोझ होता है। यह बोझ, बीमारी के लक्षणों से कहीं ज़्यादा बड़ा होता है। सामाजिक कलंक, अकेलापन, पैसों तंगी और समझ की कमी भी अक्सर बीमारी से भी बड़ी दिक्कतें बन जाते हैं। कम संसाधनों वाली कई जगहों पर मानसिक स्वास्थ्य के लिए ज़रूरत के मुताबिक विशेषज्ञ सेवाएँ आसानी से नहीं मिल पातीं। ‘शिफ़ा मॉडल’ हमें यह बताता है कि समुदाय ख़ुद भी समाधान का हिस्सा बन सकते हैं। वहीं, आस-पास रहने वाले वॉलंटियर्स को प्रशिक्षण देकर, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ आसानी से उपलब्ध कराई जा सकती हैं। यह सेवाएँ सांस्कृतिक रूप से अपनाई जाने और लंबे समय तक चल सकने में मददगार साबित होने के मकसद से किया जाता है।

क्लिनिक छोड़ने के काफ़ी समय बाद भी एक और बात मेरे ज़हन में बनी रह गई। हर मरीज़ के पास न सिर्फ़ उसकी बीमारी की जानकारी होती थी, बल्कि उसका परिवार भी होता था। देखभाल करने वाले सवाल पूछते, अपनी चिंताएँ बताते और मरीज़ की हालत में हुए छोटे-छोटे सुधारों पर ख़ुश होते। यहाँ मानसिक बीमारी को कभी भी सिर्फ़ एक व्यक्ति की समस्या नहीं माना जाता था; ठीक होने की प्रक्रिया को सब की मिली-जुली ज़िम्मेदारी के तौर पर देखा जा रहा था। उस पल मुझे समझ आया कि मानसिक स्वास्थ्य की सफल देखभाल का मतलब सिर्फ़ मरीज़ का इलाज करना नहीं है, बल्कि परिवारों और समुदायों को मज़बूत और एक हद तक आत्मनिर्भर बनाना भी है।

A healthcare professional sitting at a table with a patient, while another person engages in conversation. The setting appears to be a clinic or office.

पेशेवर स्वास्थ्य सेवा प्रदाता के तौर पर हम अक्सर मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में “ट्रीटमेंट गैप” (ज़रूरत के मुताबिक इलाज न मिलने) की बात करते हैं। आँकड़े चौंकाने वाले हैं, लेकिन सिर्फ़ आँकड़ों से शायद ही पूरी कहानी बयाँ हो पाती है। असली “गैप” अस्पताल पहुँचने और लगातार, सहानुभूतिपूर्ण देखभाल पाने के बीच होता है। शिफ़ा मॉडल इस गैप (अंतर) को कम करता है। वह ऐसे सिर्फ़ दवाओं के ज़रिए ही नहीं, बल्कि अपनत्व और रिश्तों के ज़रिए भी करता है।

स्वास्थ्य सेवाओं में समानता (हेल्थ इक्विटी) पर अक्सर बुनियादी ढाँचा, अनुदान या कार्यबल के नज़रिए से बात की जाती है। ये चीज़ें ज़रूरी हैं, लेकिन समानता का मतलब यह सुनिश्चित करना भी है कि सम्मानजनक मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता इस बात से तय न हो कि कोई व्यक्ति कहाँ रहता है। इसका मतलब यह समझना भी है कि इलाज या देखभाल ठीक होने की प्रक्रिया सिर्फ़ डॉक्टरों पर ही नहीं, बल्कि उन समुदायों पर भी निर्भर करती है जो अपने सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद सदस्यों के साथ खड़े होने को तैयार रहे।

शिफ़ा के मेरे सफ़र ने मुझे याद दिलाया कि यह ज़रूरी नहीं है कि कुछ सबसे मज़बूत स्वास्थ्य व्यवस्थाास्थिी नहीं है कि तकनीक के मामले में सबसे पेशतर हों। कभी-कभी उनका आधार कहीं ज़्यादा साधारण चीज़ें होती हैं: जैसे किसी मरीज़ के दरवाज़े पर दस्तक देने वाला कोई वॉलंटियर, कोई देखभाल करने वाला जो आख़िरकार बीमारी को समझता है और कोई ऐसा समुदाय जो भेदभाव के बजाय हमदर्दी को अपनाता है।

हो सकता है कि कम संसाधनों वाली जगहों पर मानसिक स्वास्थ्य सेवा का भविष्य सिर्फ़ अस्पतालों के भीतर ही तय न हो। हो सकता है कि इसका भविष्य वहाँ तय हो, जहाँ शिफ़ा हमेशा से काम करता रहा है; घरों, गाँवों और समुदायों में, उनके बीच होने वाली बातचीत में।