आदिवासी समुदायों के स्वास्थ्य पर काम : मौजूदा हालात और आगे की राहें

दो दिग्गजों के साथ एक गहरी और दिल को छू लेने वाली बातचीत। इस सत्र में डॉ. अभय बंग (SEARCH, गढ़चिरौली) और डॉ. जॉनी उम्मन (क्रिश्चियन हॉस्पिटल, बिसमकटक) हृषिकेश पार्थसारथी (अजीम प्रेमजी फाउंडेशन) के साथ अपने अनुभव साझा कर कर रहे हैं।

आइए, आदिवासी समुदायों के स्वास्थ्य पर काम : मौजूदा हालात और आगे की राहें विषय पर एक गहरी और दिल को छू लेने वाली बातचीत का हिस्सा बनें। 

इस सत्र में डॉ. अभय बंग (SEARCH, गढ़चिरौली) और डॉ. जॉनी उम्मन (क्रिश्चियन हॉस्पिटल, बिसमकटक) अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के हृषिकेश पार्थसारथी के साथ संवाद कर रहे हैं। वे भारत के सबसे वंचित आदिवासी समुदायों के साथ काम करने के अपने जमीनी अनुभव साझा कर रहे हैं। 

वे बताते हैं कि कैसे गांधीवादी मूल्यों की प्रेरणा से उनके सफ़र की शुरुआत हुई, दूर-दराज़ और साधन-हीन इलाकों में काम करने में शुरू में क्‍या चुनौतियाँ सामने आईं। वे आदिवासियों के स्वास्थ्य के लिए समर्पित अपने जीवन से जुड़े सबक और कहानियां सुनाते हैं और यह भी बताते हैं कि उन्होंने किस तरह बदलाव लाने वाले समुदाय-आधारित तरीकों की शुरुआत की। संवाद के मुख्य विषयों में शामिल हैं- समुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में नयेपन की शुरुआत, जिससे शिशु मृत्यु दर में भारी कमी आई, बीमारियों के बदलते स्वरूप (जैसे मलेरिया और गुर्दा रोग) के अनुसार ढलना, और NGOs व सिविल सोसाइटी के लिए व्यवहारिक सुझाव, जैसे कि समुदाय की आवाज़ सुनना, स्थानीय नवाचार को बढ़ावा देना, और स्वास्थ्य नीतियों पर असर डालना। 

बातचीत में जो अहम मुद्दे सामने आए : 

  • स्थानीय समुदायों से आने वाले प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता आदिवासियों के स्वास्थ्य में अहम भूमिका निभाते हैं। वे सीधे लोगों तक कार्यक्रम और मदद पहुँचाते हैं। इसलिए, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका को मज़बूत करना लोगों की स्वास्थ्य संबंधी मुख्य ज़रूरतों को पूरा करने में मददगार हो सकता है। 
  • हमें पहले ठहरकर समुदाय की आवाज़ सुननी चाहिए। लोग ख़ुद बता देंगे कि उनकी स्वास्थ्य संबंधी मुख्य समस्याएँ कौन सी हैं और उनकी प्राथमिकताएँ क्या हैं। लोगों के नजरिए को समझे बिना कोई भी काम नहीं किया जाना चाहिए। 
  • महामारियों में हो रहे बदलावों को समझना ज़रूरी है ताकि हम अपनी समझ और व्यवहार को भी उसी हिसाब से ढाल सकें। बहुत से इलाकों में असंक्रामक रोग (NCDs), जैसे किडनी खराब होना या स्ट्रोक आदि के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। मानसिक बीमारियों और नशे की लत का हाल भी यही है। 
  • समुदाय के हालातों और उनकी परंपराओं को ध्यान में रखते हुए नये तरीक़े विकसित करने की जरूरत है। ऐसे तरीक़े समुदाय के पूरे स्वास्थ्य में बड़ा सुधार ला सकते हैं। 
  • आदिवासी स्वास्थ्य के मामले में सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र में डेटा और शोध को प्राथमिकता देने की ज़रूरत है। शोध और डेटा के जरिए असली जमीनी समस्याओं को समझने और स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद कमियों को दूर करने में सिविल सोसाइटी संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 

आप चाहे डॉक्टर हों या समाजसेवी, नीति-निर्माता हों या जागरूक नागरिक – यह बातचीत आपसे जुड़ी है। यह कीमती संवाद आदिवासी समुदायों के लिए दयालुता, भागीदारी और प्रमाणों पर आधारित टिकाऊ और समतामूलक स्वास्थ्य तंत्र के बारे में मूल्यवान अंतर्दृष्टियां देता है।