VHSND सत्र में एक आम-सी सुबह
2 जुलाई 2026 को हरवाल आंगनवाड़ी केंद्र-1 में गाँव के स्वास्थ्य, सफ़ाई और पोषण दिवस (VHSND) का सत्र चल रहा था। हर बार की तरह इस दिन भी वज़न लिया जा रहा था, टीके लगाए जा रहे थे और गर्भवती महिलाओं की जाँच हो रही थी। उस सुबह जाँच के लिए आई महिलाओं में 28 साल की एक गर्भवती महिला भी थी। उसके गर्भ के 32 हफ़्ते पूरे हो चुके थे। उसके माता-पिता उसे लेकर आए थे। उन्होंने उसकी पिछली ज़िंदगी और सेहत के बारे में जो बातें बताईं, उनकी गंभीरता का अंदाज़ा शुरू में किसी को नहीं हुआ। दस साल पहले, जब वह अपने पति के घर रह रही थी और गर्भवती थी, तब उसे दौरा पड़ा था।
वह इस नाज़ुक हालत में VHSND सत्र में पहुँची थी। उसका चेहरा और हाथ जल चुके थे, वह गहरे सदमे और दुख से गुज़र रही थी और अब तक उसकी ठीक से चिकित्सकीय जाँच भी नहीं हुई थी।
उसकी पिछली गर्भावस्थाओं का सिलसिला काफ़ी पेचीदा था। पहली गर्भावस्था में दौरे पड़ने की समस्या से जुड़ा गर्भपात हुआ था। इसके बाद उसकी दो बेटियाँ हुईं। फिर दस साल का लंबा अंतराल आया। पति-पत्नी के बीच संबंध बिगड़ गए थे। घरेलू झगड़े के बाद वह पाँच साल तक पति से अलग अपने मायके में रहने लगी। बाद में दोनों के बीच सुलह हुई। इस बार उसकी चौथी गर्भावस्था थी और वह पूरा वक़्त अपने पति के घर ही रही। पाँच महीने पहले परिवार पर एक और मुसीबत आ पड़ी। उसके पति की पानी में डूबने से मौत हो गई। गर्भावस्था के आख़िरी तीन महीने चल रहे थे और वह विधवा हो गई थी। उसकी गर्भावस्था पहले से ही ख़तरे वाली थी।
VHSND सत्र से सिर्फ़ दो दिन पहले वह कई महीनों बाद पहली बार अपनी माँ के घर लौटी थी। अगले ही दिन, खुले चूल्हे पर सांभर बनाते समय उसे दो से चार मिनट तक दौरा पड़ा। वह चूल्हे की आग में गिर गई। इससे उसके चेहरे का आधा हिस्सा और दोनों हाथों की उँगलियाँ जल गईं। शाम होते-होते उसकी बाईं आँख से दिखना भी बंद हो गया। वह इसी नाज़ुक हालत में VHSND सत्र में पहुँची थी। उसका चेहरा और हाथ जल चुके थे, वह गहरे सदमे और दुख से गुज़र रही थी और अब तक उसकी ठीक से चिकित्सकीय जाँच भी नहीं हुई थी।
जाँच के आँकड़े ख़तरे की तरफ़ इशारा कर रहे थे
नियमित जाँच शुरू हुई। ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर नापा गया, कद और वज़न भी दर्ज किए गए। पहली ही जाँच में ब्लड प्रेशर का आँकड़ा देखकर पूरी टीम चौंक गई। यह 178/110 mmHg था। किसी भी वयस्क के लिए इतना ज़्यादा ब्लड प्रेशर ख़तरनाक होता है, और 32 हफ़्ते की गर्भवती महिला के लिए तो और भी ज़्यादा। उसका ब्लड शुगर सामान्य था – 89 mg/dl। वज़न 76 किलो और कद 166 सेंटीमीटर था। लेकिन ब्लड प्रेशर का इतना बढ़ा होना गंभीर चिंता की बात थी।
उसने एक दिन पहले दौरा पड़ने की बात तो बताई, लेकिन जब उससे पूछा गया कि उसे इतना पसीना क्यों आ रहा है, तो वह बस इतना कह सकी कि उसे ख़ुद नहीं मालूम। उसने किसी और तकलीफ़ का भी ज़िक्र नहीं किया। टीम ने एहतियात बरतते हुए पाँच मिनट इंतज़ार किया और फिर ब्लड प्रेशर नापा। इस बार भी यह 175/110 mmHg था। यानी पाँच मिनट बाद भी इसमें लगभग कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा था।
मौके पर अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन के स्वास्थ्य संसाधन व्यक्ति थॉमस पीटर, CHO सेबास्टिना, PHCO अर्चना और स्थानीय आशा कार्यकर्ता सरस्वती तथा रेणुका मौजूद थीं। अब उनके सामने पूरी बात साफ़ थी। महिला को दौरा पड़ा था और गर्भावस्था के दौरान उसका ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ा हुआ था, जो काबू में नहीं आ रहा था। यह एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी थी। उसे तुरंत अस्पताल में इलाज की ज़रूरत थी। ऐसे में उसे सिर्फ़ घर जाकर आराम करने की सलाह देकर नहीं छोड़ा जा सकता था।
परिवार के पास उसी समय अस्पताल तक जाने और वहाँ भर्ती होने का ख़र्च जुटाने के पैसे नहीं थे। उन्होंने कहा कि वे पैसे इकट्ठा करके अगली सुबह अस्पताल जाएँगे।
पुरानी जाँचों में ख़तरे के संकेत थे, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया
महिला को घर जाकर आराम करने की सलाह दी गई, लेकिन टीम ने उसकी माँ को थोड़ी देर रोककर उनसे अलग से बात की। बातचीत में जो बात सामने आई, वह चिंता बढ़ाने वाली थी। इससे पहले गर्भावस्था के दौरान उसकी तीन बार जाँच हो चुकी थी। ये तीनों जाँच तब हुई थीं, जब वह अपने पति के घर रह रही थी। हर बार उसका ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ आया था।
लेकिन न अस्पताल वालों ने और न ही उसके ससुराल वालों ने इसकी ख़बर उसके मायके वालों तक पहुँचाई थी। महीनों से ख़तरे के संकेत मिल रहे थे, मगर किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया। टीम ने उसकी माँ को साफ़-साफ़ समझाया कि हालत कितनी गंभीर है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि महिला को तुरंत ऐसे बड़े अस्पताल ले जाना ज़रूरी है, जहाँ उसे विशेषज्ञ डॉक्टरों से इलाज मिल सके।
इस बातचीत में इस पूरी कहानी का एक और गंभीर पहलू सामने आया – पैसों की कमी। परिवार के पास उसी समय अस्पताल तक जाने और वहाँ भर्ती होने का ख़र्च जुटाने के पैसे नहीं थे। उन्होंने कहा कि वे पैसे इकट्ठा करके अगली सुबह अस्पताल जाएँगे।
वक़्त हाथ से निकल रहा था
स्वास्थ्य टीम ने आशा कार्यकर्ता सरस्वती से कहा कि वह ख़ुद परिवार के साथ जाएँ और यह पक्का करें कि महिला को अस्पताल भेजने की पूरी व्यवस्था में कहीं कोई रुकावट न आए। सरस्वती महिला को तालुका अस्पताल ले गईं। वहाँ भी उसका ब्लड प्रेशर 180/110 mmHg से ऊपर था। इससे साफ़ हो गया कि ख़तरा अभी टला नहीं था। वहाँ से उसे ज़िला अस्पताल भेज दिया गया और सरस्वती पूरे समय उसके साथ रहीं।
ज़िला अस्पताल में उसे दो दिन तक निगरानी में रखा गया। इस दौरान ब्लड प्रेशर कम करने की दवाएँ शुरू की गईं। धीरे-धीरे ब्लड प्रेशर कम होने लगा, लेकिन वह पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ। यानी गर्भावस्था में ख़तरा अब भी बना हुआ था। डॉक्टरों ने समझ लिया कि अब और देर करने की गुंजाइश नहीं है। उन्होंने इमरजेंसी में सिज़ेरियन ऑपरेशन (LSCS) करने का फ़ैसला लिया।
“अगर आधा दिन भी और गुज़र जाता, तो शायद माँ या बच्ची में से कोई एक ज़िंदा नहीं बचता।”
मुश्किल सफ़र के बाद बच्ची की किलकारी
ऑपरेशन से 3.2 किलो वज़न की एक स्वस्थ बच्ची पैदा हुई। माँ की जान भी बच गई। हालाँकि, उसे अब भी डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया था। कई हफ़्तों से काबू में न आ रहे ब्लड प्रेशर, दौरे पड़ने की बीमारी, जलने से हुए ज़ख़्मों और पति की मौत के गहरे सदमे से उसका शरीर अब भी उबर रहा था। गर्भावस्था के आख़िरी दौर में उसे इन सारी मुश्किलों का सामना लगभग अकेले ही करना पड़ा था।
Subscribe to stay connected
We will send you a monthly newsletter listing all the articles that were published in the month.
इस घटना से क्या सीख मिलती है?
- एक जाँच से ख़तरे का पता चल सकता है। VHSND सत्र में ब्लड प्रेशर, शुगर, वज़न और कद की जाँच से ही पता चल गया कि महिला का ब्लड प्रेशर ख़तरनाक हद तक बढ़ा हुआ है और यह एक मेडिकल इमरजेंसी है। इससे पहले गर्भावस्था के दौरान हुई तीन जाँचों में भी बढ़े हुए ब्लड प्रेशर की बात दर्ज थी, लेकिन किसी ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।
- ससुराल और मायके के बीच जानकारी पहुँचने में कमी जानलेवा साबित हो सकती है। किसी महिला की सेहत से जुड़ी ज़रूरी बातें उसके मायके वालों तक न पहुँचने से समय पर इलाज में देरी हो सकती है। ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली स्वास्थ्य टीमों को ख़ुद पहल करके इस दूरी को पाटना चाहिए।
- पैसों की कमी इलाज तक पहुँचने में बड़ी रुकावट है। महिला की हालत कितनी ख़तरनाक है, यह पता चल जाने के बाद भी अस्पताल तक पहुँचने और वहाँ भर्ती होने का ख़र्च न जुटा पाना उसकी जान के लिए ख़तरा बना रह सकता है।
- आशा कार्यकर्ता का लगातार साथ देना इलाज जितना ही अहम हो सकता है। सरस्वती महिला और उसके परिवार के साथ गाँव से तालुका अस्पताल और फिर ज़िला अस्पताल तक रहीं। उनके इस साथ और लगातार कोशिशों ने महिला की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
- स्वास्थ्य टीम की ज़िम्मेदारी जाँच तक ख़त्म नहीं होती। ख़तरे की पहचान करने से लेकर महिला को सही अस्पताल में भर्ती कराने तक पूरी ज़िम्मेदारी निभाना ज़रूरी है। इस मामले में स्वास्थ्य टीम की इसी पहल ने बेहतर नतीजा हासिल करने में अहम भूमिका निभाई।
